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जून, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

CHAPTER -10 उपनिवेशवाद एवं ग्रामीण समाज सरकारी अभिलेखों के साक्ष्य CLASS 12TH

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 उपनिवेशवाद एवं ग्रामीण समाज सरकारी अभिलेखों के साक्ष्य (Colonialism and Rural Society - Evidence from Official Report)  भूमिका (Introduction) इस अध्याय में यह बताया गया है कि औपनिवेशिक शासन का अर्थ उन लोगों के लिये क्या था जो उस समय देहात में रहते थे। इसके अतिरिक्त इसमें राजमहल की पहाड़ियों के बारे में जानकारी मिलेगी जहां पहाड़िया और संथाल लोग रहते थे। इस अध्याय में यह भी बताया गया है कि अंग्रेजी कम्पनी ने देहात में अपना राज्य कैसे स्थापित किया। कम्पनी ने जिस राजस्व नीति को कार्यान्वित किया उसके बारे में भी पता चलेगा। अंग्रेजी कम्पनी के राज्य का लोगों के दैनिक जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा और अंग्रेजी कानूनों के प्रभावाधीन कौन अधिक धनवान हो गया और समाज का कौन सा वर्ग अधिक गरीब हो गया इसके बारे में भी पता चलेगा। इस अध्याय में यह भी बताया गया है कि अंग्रेजी शासन के प्रभावाधीन किसे जमीन प्राप्त हुई और किसे अपनी जमीन गवानी पड़ी। लोग कम्पनी के कानूनों का पालन करने के लिये विवश थे। किन्तु फिर भी वे अन्यायपूर्ण कानूनों का विरोध करने से भी हिचकिचाते नहीं थे। इस प्रकार उनके परिणामों और प्र...

CHAPTER-6 तीन वर्ग CLASS 11TH HISTORY

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 तीन वर्ग (Three Orders) मध्यकालीन यूरोपीय समाज तीन वर्गों में बँटा हुआ था। प्रथम वर्ग में पादरी, दूसरे वर्ग में कुलीन एवं तीसरे वर्ग में किसान सम्मिलित थे। समाज के बहुत कम लोग प्रथम दो वर्गों में सम्मिलित थे। उन्हें अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे। वे सभी प्रकार के करों से मुक्त थे। समाज में उनका विशेष सम्मान था। वे विलासिता का जीवन व्यतीत करते थे। समाज की अधिकाँश जनसंख्या तीसरे वर्ग से संबंधित थी। उनकी स्थिति अत्यंत दयनीय थी। उन्हें अपने गुजारे के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी। इसके बावजूद उन्हें दो वक्त भरपेट खाना नसीब नहीं होता था। उन्हें अनेक प्रकार के कर देने के लिए भी बाध्य किया जाता था। वास्तव में उनका जीवन जानवरों से भी बदतर था।  तीन वर्ग: यूरोप में फ्रांसिसी समाज मुख्यत: तीन वर्गों में विभाजित था जो निम्नलिखित है (1) पादरी वर्ग इस वर्ग में चर्च के पोप आदि सम्मिलित थे ।  (ii) अभिजात वर्ग इस वर्ग में सामत, जमींदार और धनी व्यापारी वर्ग शामिल थे।  (iii) कृषक वर्ग इस वर्ग में किसान और मजदुर आदि शामिल थे। (1) पादरी वर्ग- मध्यकालीन यूरोपीय समाज में पादरी प्रथम वर्ग मे...

CHAPTER-5 यायावर साम्राज्य CLASS 11TH HISTORY

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 CHAPTER-5  यायावर साम्राज्य  यायावरिता का स्वरूप (The Nature of Nomadism) मंगोल मध्य एशिया के आधुनिक मंगोलिया प्रदेश में रहने वाला एक यायावर समूह था । यह समूह विभिन्न कबोलों में विभाजित था। इनमें प्रमुख थे मंगोल, तातार, नेमन एवं खितान । 12वीं शताब्दी में चंगेज खों के उत्थान से पूर्व मंगोल पशुपालक एवं शिकार संग्राहक थे। वे तंबुओं में निवास करते थे। उनका प्रमुख भोजन दूध एवं माँस था। उनका समाज अनेक पितृपक्षीय वंशों में विभाजित था। समाज में स्त्रियों की दशा संपूर्ण रूप से अच्छी नहीं थी। उस समय विभिन्न कबीलों में आपसी लड़ाइयाँ चलती रहती थीं वास्तव में लड़ाइयाँ एवं लूटमार करना मंगोल जीवन शैली का एक अभिन्न अंग बन चुका था। उस समय मंगोलों ने चीन के साथ व्यापारिक संबंध स्थापित किए हुए थे। 1. यायावरी कबीलों के प्रमुख व्यवसाय---  12वीं शताब्दी में यायावरी कबीलों का प्रमुख व्यवसाय पशुपालन था। उस समय मंगोलिया में अनेक अच्छी चरागाहें थीं। अल्लाई पहाड़ों की बर्फीली चोटियों से निकलने वाले सैंकड़े झरनों तथा ओनोन (Onon) एवं सेलेंगा (Selenga) नदियों के पानी के कारण यहाँ हरी घास प्रचुर ...

chapter 9 class 12th HISTORY यात्रियों के नज़रिए में मध्यकालीन समाज

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  यात्रियों के नज़रिए में मध्यकालीन समाज  भूमिका दसवी से सत्रहवीं शताब्दी के बीच अनेक विदेशी यात्री महिला व पुरुष भारत का भ्रमण किया। यह यात्री भारत में अपने भिन्न-भिन्न उद्देश्य के लिए आए। इन यात्रियों ने अनेक वृत्तांतों की रचना की। इन वृत्तातों का विषय-वस्तु अलग-2 था। कुछ वृतांत दरबार की गतिविधियाँ, धार्मिक विषय, स्थापत्य, स्मारकों एवं भवनों से संबंधित थे और कुछ भारत के सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक व प्रशासनिक व्यवस्था से संबंधित थे। उन्होंने भारतीयों के जीवन तथा प्रथाओं में विशेष दिलचस्पी दिखाई। उन्होंने अपने अनुभवों को वृतांतों में लिखा। यात्रा वृतांत भारतीय इतिहास का पुननिर्माण करने में बहुमूल्य स्रोत सिद्ध हुए। इन यात्रियों ने यूरोपवासियों को भारतीय सभ्यता की वास्तविक तस्वीर की जानकारी प्रदान की।   अधिगम्य उद्देश्य ( Learning Objectives ) इस अध्याय का अध्ययन करने के पश्चात आप : अलवेरुनी का जीवन और किताब-उल-हिन्द में लोगों के सामाजिक और धार्मिक जीवन के बारे में पता चलेगा। इब्न बतूता  इब्न बतूताका जीवन और उस का लिखित ग्रन्थ रिहला में नारियल एवं पान के उपर, भारतीय शहर...

CHAPTER -8 HIS CLASS12TH धार्मिक इतिहास : भक्ति-सूफी परंपरा

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भूमिका भक्ति मार्ग कोई नया मार्ग नहीं था। इस का उल्लेख उपनिषदों और भगवद्गीता में भी आता है। कुछ काल के लिए यह मत लुप्त सा हो गया था। 8वीं सदी से 18वीं सदी के दौरान भारतीय इतिहास में भक्ति आन्दोलन, इस्लाम एवं सूफी आन्दोलन ने प्रमुख भूमिका निभाई। दक्षिण भारत में अलवारों और नयनारों को भक्ति आन्दोलन का संस्थापक माना जाता है । इन्होंने समाज में प्रचलित सामाजिक धार्मिक कुरीतियों का खण्डन किया। इस का ज्ञान हमें अनेक साहित्यक स्रोतों से मिलता है। संत कवियों की रचनाएँ जन साधारण को क्षेत्रीय भाषाओं में मौखिक रूप में रची गई थी तथा बाद में उन संतों के अनुयायियों ने संकलित किया। हिन्दुओं और मुसलमानों में एकेश्वरवाद और भातृ भाव और समानता का प्रभाव पड़ा। दोनो धर्मों के विद्वानों ने उनको मेल जोल और प्रेम से रहने की शिक्षा की धार्मिक कर्मकाण्डो, झूठे आडम्बरो, जात पात और मूर्ति पूजा का घोर विरोध किया। एक ईश्वर की पूजा करने का प्रचार किया। एक ईश्वर की प्रेमपूर्वक पूजा करने का मार्ग ही भक्ति मार्ग कहलाता है। अधिगम्य उद्देश्य ( Learning Objective ) इस अध्याय का अध्ययन करने के पश्चात आप धार्मिक विश्वास औ...