तीन वर्ग
(Three Orders)
मध्यकालीन यूरोपीय समाज तीन वर्गों में बँटा हुआ था। प्रथम वर्ग में पादरी, दूसरे वर्ग में कुलीन एवं तीसरे वर्ग में किसान सम्मिलित थे। समाज के बहुत कम लोग प्रथम दो वर्गों में सम्मिलित थे। उन्हें अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे। वे सभी प्रकार के करों से मुक्त थे। समाज में उनका विशेष सम्मान था। वे विलासिता का जीवन व्यतीत करते थे। समाज की अधिकाँश जनसंख्या तीसरे वर्ग से संबंधित थी। उनकी स्थिति अत्यंत दयनीय थी। उन्हें अपने गुजारे के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी। इसके बावजूद उन्हें दो वक्त भरपेट खाना नसीब नहीं होता था। उन्हें अनेक प्रकार के कर देने के लिए भी बाध्य किया जाता था। वास्तव में उनका जीवन जानवरों से भी बदतर था।
तीन वर्ग:
यूरोप में फ्रांसिसी समाज मुख्यत: तीन वर्गों में विभाजित था जो निम्नलिखित है
(1) पादरी वर्ग इस वर्ग में चर्च के पोप आदि सम्मिलित थे ।
(ii) अभिजात वर्ग इस वर्ग में सामत, जमींदार और धनी व्यापारी वर्ग शामिल थे।
(iii) कृषक वर्ग इस वर्ग में किसान और मजदुर आदि शामिल थे।
(1) पादरी वर्ग- मध्यकालीन यूरोपीय समाज में पादरी प्रथम वर्ग में सम्मिलित थे। इस वर्ग में पोप, आर्कबिशप एवं विशप सम्मिलित थे। यह वर्ग बहुत शक्तिशाली एवं प्रभावशाली था। इसका कारण यह था कि उनका चर्च पर पूर्ण नियंत्रण था। चर्च के अधीन विशाल भूमि होती थी, जिससे उसे बहुत आमदनी होती थी। लोगों द्वारा दिया जाने वाला दान भी बर्च की आय का एक प्रमुख स्रोत था। इनके अतिरि चर्च किसानों पर टीथ नामक कर लगाता चर्च की इस विशाल आय के चलते पादरी वर्ग बहुत धनी हो गया था। इस वर्ग का यूरोप के शासकों पर भी बहुत प्रभाव था। ये शासक पोप को आज्ञा का उल्लंघन करने का साहस नहीं रखते थे। कुलीन वर्ग भी पादरी वर्ग का बहुत सम्मान करता था। पादरी वर्ग को अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे। वे राज्य को किसी प्रकार का कोई कर नहीं देते थे। वे विशाल एवं भव्य महलों में रहते थे। यद्यपि वे लोगों को पवित्र जीवन व्यतीत करने का उपदेश देते थे किंतु वे स्वयं विलासिता का जीवन व्यतीत करते थे। दूसरी ओर लोगों को धर्मोपदेश देने का कार्य निम्न वर्ग के पादरी करते थे। उनके वेतन कम थे। उनकी दशा शोचनीय थी। पादरी वर्ग में यह असमानता वास्तव में इस वर्ग के माथे पर एक कलंक समान थी।
2.कुलीन वर्ग --मध्यकालीन समाज में कुलीन वर्ग की क्या स्थिति थी ? उत्तर- कुलीन वर्ग दूसरे वर्ग में सम्मिलित था। यूरोपीय समाज में इस वर्ग की विशेष भूमिका थी। केवल कुलीन वर्ग के लोगों को ही प्रशासन, चर्च एवं सेना के उच्च पदों पर नियुक्त किया जाता था। उन्हें अनेक प्रकार के विशेषाधिकार प्राप्त थे। वे सभी प्रकार के करों से मुक्त थे। उनके पास विशाल जागीरें होती थीं। कुलीन इन जागीरों पर एक छोटे राजे के समान शासन करते थे। वे अपने न्यायालय लगाते थे तथा मुकद्दमों का निर्णय देते थे। वे अपने अधीन सेना रखते थे। उन्हें सिक्के जारी करने का भी अधिकार प्राप्त था। उन्हें लोगों पर कर लगाने का भी अधिकार था। वे कृषकों से बेगार लेते थे। उनके पशु किसानों की खेती उजाड़ देते थे, किंतु इन पशुओं को रोकने का साहस उनमें नहीं था। कुलीन अपने क्षेत्र में आने वाले माल पर चुंगी लिया करते थे। कुलीन वर्ग बहुत धनवान् था। राज्य की अधिकाँश संपत्ति उनके अधिकार में थी। वे विशाल महलों में रहते थे। वे बहुत विलासिता
3. किसान (कृषक वर्ग) – किसान यूरोपीय समाज के तीसरे वर्ग से संबंधित थे। तीसरे वर्ग की गणना यूरोपीय समाज के सबसे निम्न वर्ग में की जाती थी। यूरोपीय समाज की कुल जनसंख्या का 85% से 90% भाग किसान थे। उस समय समाज में दो प्रकार के किसान थे। ये थे स्वतंत्र किसान एवं कृषकदास। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है
(क) स्वतंत्र किसान (Free Peasants) — यूरोपीय समाज में स्वतंत्र किसानों की संख्या बहुत कम थी। यद्यपि वे अपनी भूमि सामंतों से प्राप्त करते थे किंतु वे इस पर अपनी इच्छानुसार खेती करते थे। सामंत इन किसानों से बेगार नहीं लेते थे। उन पर कृषकदासों की तरह प्रतिबंध नहीं लगे हुए थे। वे केवल निश्चित मात्रा में सामंतों को भूमि कर प्रदान करते थे।
(ख) कृषकदास (Serfs) यूरोपीय समाज की अधिकांश जनसंख्या कृषकदास से संबंधित थी। कृषकदासों का जीवन नरक के समान था। उनके प्रमुख कर्तव्य ये थे
(1) वर्ष में कम-से-कम 40 दिन सामंत (लॉर्ड) की सेना में कार्य करना।
(ii) उसे एवं उसके परिवार के सदस्यों को सप्ताह में तीन अथवा उससे कुछ अधिक दिन सामंत की जागीर पर जा कर काम करना पड़ता था। इस श्रम से होने वाले उत्पादन को श्रम अधिशेष कहा जाता था।
(iii) वह मेनर में स्थित सड़कों, पुलों तथा चर्च आदि की मुरम्मत करता था।
(iv) वह खेतों के आस-पास बाड़ बनाता था।
(v) वह जलाने के लिए लकड़ियाँ एकत्र करता था।
(vi) वह अपने सामंत के लिए पानी भरता था, अन्न पोसता था तथा दुर्ग की मरम्मत करता था।
(vii) वह अपने स्वामी को शत्रु द्वारा बंदी बनाए जाने पर उसे धन देकर छुड़ाता था।
(viii) वह राजा को टैली नामक कर भी देता था। इस कर को कोई निश्चित दर नहीं थी। यह राजा की इच्छा पर निर्भर करता था।
(ix) कृषकदास की स्त्रियाँ एवं बच्चे सूत कातने, वस्त्र बुनने, मोमबत्ती बनाने एवं मंदिरा के लिए अंगूरों का रस निकालने का काम करते थे।
कृषकदासों पर अनेक प्रकार के प्रतिबंध लगे हुए थे-
(i) वे सामंत की अनुमति के बिना उसकी जागीर नहीं छोड़ सकते थे।
(ii) उन्हें शिक्षा ग्रहण करने एवं चर्च में उपासना का अधिकार नहीं था।
(iii) वे अपने पुत्र-पुत्रियों के विवाह सामंत की अनुमति के बिना नहीं कर सकते थे।
(iv) वे केवल अपने सामंत की चक्की में ही आटा पीस सकते थे, उनके तंदूर में ही रोटी सेंक सकते थे एवं उनके मंदिरा संपीड़क (wine-presses) में ही आसवन मंदिरा {distil wine) तैयार कर सकते थे। इसके लिए उन्हें कर देना पड़ता था।
(v) कृषकदास अपने स्वामी के अत्याचारी होने पर भी उसके विरुद्ध कोई अपील नहीं कर सकते थे।
कृषकदास जानवरों से भी बदतर जीवन व्यतीत करते थे। 16 से 18 घंटे रोजाना कड़ी मेहनत करने के बावजूद उन्हें दो समय भरपेट खाना नसीब नहीं होता था। वे गंदी झोंपड़ियों में निवास करते थे। इन झोपड़ियों में रोशनी का एवं गंदे पानी की निकासी का कोई प्रबंध नहीं था। वर्षा के दिनों में इन झोपड़ियों में पानी भर जाता था। इससे बीमारियाँ फैलने का सदैव खतरा बना रहता था।
सामंतवाद से अभिप्राय
सामंतवाद को मध्ययुगीन यूरोपीय सभ्यता का आधार स्तंभ कहा जाता है। यह जर्मन शब्द फ्यूड (Feud) में बना है। इससे अभिप्राय है भूमि का एक टुकड़ा अथवा जागीर। इस प्रकार सामंतवाद का संबंध भूमि अथवा जागर से है। सामंतवाद को समझना कोई सरल कार्य नहीं है। इसका कारण यह है कि सामंतवाद के विभिन्न देशों में लक्षणता में भिन्नता थी।
यूरोप में सामंतवाद के उदय के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी थे
1. समय की माँग — पश्चिमी यूरोप का अधिकाँश भाग रोमन साम्राज्य के अधीन था। रोमन साम्राज्य के पतन के पश्चात् पश्चिमी यूरोप में अराजकता एवं अशांति फैल गई। इस स्वर्ण अवसर का लाभ उठाते हुए अनेक आक्रमणकारियों ने पश्चिमी यूरोप पर आक्रमण करने आरंभ कर दिए थे। इससे स्थिति अधिक विस्फोटक हो गई। लोगों की जान-माल की सुरक्षा करने वाला कोई नहीं था। बड़ी संख्या में खेत नष्ट हो गए थे। इससे किसानों की स्थिति बहुत बदतर हो गई थी। ऐसी स्थिति में उन्हें सामंतों के आश्रय की आवश्यकता पड़ी। इसका कारण यह था कि सामंतों के पास अस्त्र-शस्त्र एवं दुर्ग थे। दूसरी ओर सामंतों अपने दुर्गों एवं धन की सुरक्षा के लिए सेना की आवश्यकता थी। अतः दोनों ने एक-दूसरे से सहयोग करने का निर्णय किया।
2. राजाओं के लिए आवश्यक (Need of Kings) रोमन साम्राज्य के पतन के पश्चात् केंद्रीय सरकार का प्रभाव एवं नियंत्रण खत्म हो गया था। स्थानीय अधिकारी अपनी मनमर्जी करने लगे थे। वे लोगों से धन बटोरने के उद्देश्य से उन पर घोर जुल्म करने लगे। इस कारण लोगों की समस्याएँ बढ़ गई। बाह्य आक्रमणकारियों ने अपनी लूटमार द्वारा स्थिति को अधिक बदतर बना दिया था। संकट के इस समय में राजा के लिए दूर के प्रदेशों पर नियंत्रण रखना एवं कर एकत्र करना कठिन हो गया था। अतः विवश होकर राजा ने अपने राज्य की भूमि जागीरों के रूप में कुछ बड़े सामंतों को बाँट दी।
III. सामंतवाद का प्रसार
सामंतवाद का प्रसार यूरोप के अनेक देशों में था। इनमें से प्रमुख यूरोपीय देश निम्नलिखित थे—
1.फ्रॉस (France) - गॉल (Gaul) रोमन साम्राज्य का एक महत्त्वपूर्ण प्राँत था। जर्मनी की एक जनजात फ्रैंक (Franks) ने अपने राजा क्लोविस (Clovis) के अधीन 486 ई० में गॉल पर आक्रमण कर इस पर अधिकार कर लिया। उन्होंने गॉल का नाम परिवर्तित कर फ्राँस रख दिया। फ्राँस के लोगों ने 496 ई० में ईसाई धर्म को अपना लिया था। शॉर्लमेन (Charlemagne) फ्राँस का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था। उसने 768 ई० से 814 ई० तक शासन किया। उसके पोप लियो तृतीय के साथ अच्छे संबंध थे। अत: पोप ने उसे 800 ई० में पवित्र रोमन सम्राट्) की उपाधि से सम्मानित किया।
2. इंग्लैंड (England)–6वीं शताब्दी में मध्य यूरोप से एंजिल (Angles) एवं सैक्सन (Saxons), इंग्लैंड में आकर बस गए। इंग्लैंड देश का नाम 'एंजिललैंड' का रूपांतरण है। 1066 ई० में नारमंडी (Normandy) जो कि फ्राँस का एक प्राँत था के ड्यूक विलियम (Duke William) ने एक सेना के साथ इंग्लिश चैनल (English Channel) को पार कर इंग्लैंड के सैक्सन राजा हैरलड (Harold) को हैस्टिग्ज़ की लड़ाई (Battle of Hastings) में पराजित कर दिया। विलियम ने इंग्लैंड पर विजय के पश्चात् यहाँ सामंतवादी व्यवस्था को लागू किया। उसने संपूर्ण इंग्लैंड की भूमि की पैमाइश करवाई। इस संबंधी उसने मानचित्र बनवाए। उसने इस भूमि को 180 भागों में विभाजित कर अपने साथ आए 180 कुलीन वर्ग के लोगों में बाँट दिया। यही लोग राजा के प्रमुख सामंत बन गए। इसके बदले उन्होंने राजा को सैनिक सहयोग देना स्वीकार कर लिया। इन सामंतों ने अपनी जागीरों में से कुछ भूमि नाइटों को उपहार में दी सामंत इन नाइटों से उसी प्रकार सेवा की आशा रखते थे जैसे कि वे राजा की करते थे।
3. जर्मनी (Germany) — जर्मनी की गणना 11वीं शताब्दी के मध्य तक यूरोप के शक्तिशाली राष्ट्रों में को जाती थी। 14वीं शताब्दी तक पहुँचते इसकी शक्ति बहुत कमजोर हो चुकी थी। अतः जर्मनी कई छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित हो गया था। इनके शासक बहुत कमजोर थे। इन शासकों ने अपनी स्थिति को मजबूत करने के उद्देश्य में सामंतवादी व्यवस्था को लागू किया।
4. अन्य देश (Other Countries) उपरोक्त देशों के अतिरिक्त सामंतवादी व्यवस्था का प्रचलन इटलो, स्पेन एवं ऑस्ट्रिया में हुआ।
III. सामंतवाद की विशेषताएं:- सामंतवाद मध्यकालीन पश्चिमी यूरोप की एक महत्त्वपूर्ण संस्था थी। इसमें राजा अपने बड़े सामंतों एवं बड़े सामंत अपने छोटे सामंतों में जागीरों का बंटवारा करते थे। ऐसा कुछ शर्तों के अधीन किया जाता था। रोमन साम्राज्य के पतन के पश्चात् पश्चिमी यूरोप में फैली अराजकता एवं केंद्रीय सरकारों के कमजोर होने के कारण राजाओं के लिए सामंतों का सहयोग लेना आवश्यक हो गया था। सामंतवाद का प्रसार यूरोप के अनेक देशों में हुआ। इनमें फ्रांस, इंग्लैंड, जर्मनी, इटली एवं स्पेन के नाम उल्लेखनीय थे। सामंतवाद के यूरोपीय समाज पर दूरगामी प्रभाव पड़े। इसने यूरोपीय समाज में कानून व्यवस्था लागू करने, कुशल प्रशासन देने, निरंकुश राजतंत्र पर नियंत्रण लगाने एवं कला एवं साहित्य को प्रोत्साहन देने में प्रशंसनीय भूमिका निभाई। सामंतवादी व्यवस्था ने दूसरी ओर शासकों को कमज़ोर किया। इसने किसानों का घोर शोषण किया। इसने युद्धों को प्रोत्साहित किया। यह राष्ट्रीय एकता के मार्ग में एक बड़ी बाधा सिद्ध हुई। 15वीं शताब्दी में सामंतवाद का अनेक कारणों के चलते पतन हो गया।
सामंत (The Feudal Lords)– सामंत (लॉर्ड) अपनी जागीर के अंदर सर्वशक्तिशाली होता था। उसके अधीन एक सेना होती थी। वह इस सेना में बढ़ौत्तरी कर सकता था। वह बाहरी शत्रुओं से अपने अधीन सामंतों की रक्षा करता था। वह अपना न्यायालय भी लगाता था।
मेनर ; मेनर शब्द से क्या अभिप्राय है ? उत्तर- लॉर्ड के आवास क्षेत्र को मेनर कहा जाता था। इसका आकार एक जैसा नहीं होता था। इसमें प्रतिदिन के उपयोग की प्रत्येक वस्तु मिलती थी। यहां लॉर्ड का दुर्ग, कृषि फार्म, कारखाने, चर्च, वन एवं कृषकों की झोंपड़ियां होती थीं। कोई भी व्यक्ति लॉर्ड की अनुमति के बिना मेनर को छोड़ कर नहीं जा सकता था।
नाइट्स -नाइट्स सामंत (लॉर्ड) के अधीन होते थे। वे उसे सैनिक सहायता प्रदान करते थे। इसके बदले सामंत उन्हें भूमि का कुछ टुकड़ा जिसे फ़ीफ़ कहा जाता था देते थे।
टैली- टैलीएक भूमि कर था जो फ्रांस के शासक द्वारा लगाया जाता था। यह कर केवल किसानों से वसूल किया जाता था।
सामंत प्रथा के गुण (i) इसने यूरोप में कानून एवं व्यवस्था की स्थापना की।
(ii) इसने यूरोप में कुशल शासन व्यवस्था की।
(iii) इसने शूरवीरता को प्रोत्साहित किया।
(iv) इसने निरंकुश शासकों पर अंकुश लगाया।
(v) इसने कला एवं साहित्य को प्रोत्साहित किया।
विस्तार से
i) कुशल प्रशासन- सामंतों ने मध्यकाल यूरोप में कुशल शासन व्यवस्था स्थापित की। इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने यूरोप में फैली अराजकता को दूर करने में सफलता प्राप्त की। सामंतों ने राजा को सेना तैयार करने में उल्लेखनीय योगदान दिया। इसके अतिरिक्त सामंत अपने अधीन जागीर में राजा के एक अधिकारी के रूप में भी कार्य करते थे। वे अपनी जागीर में शांति एवं व्यवस्था बनाए रखने के लिए उत्तरदायी थे। वे अपने न्यायालय भी लगाते थे तथा लोगों के झगड़ों का निर्णय भी देते थे।
(ii) निरंकुश राजतंत्र पर अंकुश- सामंतवाद की स्थापना से पूर्व यूरोप के शासक निरंकुश थे। उनकी शक्तियाँ असीम थीं। वे प्रशासन की ओर कम ध्यान देते थे। वे अपना अधिकाँश समय सुरा एवं सुंदरी के संग व्यतीत करते थे। अतः लोगों के कष्टों को सुनने वाला कोई न था। इन परिस्थितियों में सामंत आगे आए। उन्होंने निरंकुश शासकों पर अंकुश लगाया एवं उन्हें जनता की भलाई करने के लिए बाध्य किया। निस्संदेह यह सामंतवाद की एक महान् उपलब्धि थी।
(iii) शूरवीरता को प्रोत्साहन सामंतवाद में शूरवीरता के विकास पर विशेष बल दिया जाता था। सभी सामंत बहुत बहादुर होते थे। वे सदैव अपना रणकौशल दिखाने के लिए तैयार होते थे। वे रणक्षेत्र में विजय प्राप्त करने अथवा वीरगति को प्राप्त करने को बहुत गौरवशाली समझते थे। अतः सामंतवादी काल में बहादुरी दिखाने वाले सामंतों का समाज द्वारा विशेष सम्मान किया जाता था।
(iv) कला तथा साहित्य को योगदान - सामंतवाद ने कला तथा साहित्य को बहुमूल्य योगदान दिया। सामंतों ने गोथिक शैली में दुर्गों एवं भवनों का निर्माण किया। उनके द्वारा बनवाए गए भवन अपनी सुंदरता एवं भव्यता के लिए विख्यात थे। उन्होंने चित्रकला को भी प्रोत्साहित किया। अतः इस काल में चित्रकला ने उल्लेखनीय विकास किया। इनके अतिरिक्त इस काल में साहित्य ने भी खूब प्रगति की।
सामंतवाद के मुख्य दोष
-(i) इसने शासकों को कमजोर बनाया।
ii) इसने युद्धों को प्रोत्साहित किया।
(iii) इसने कृषकों का घोर शोषण किया।
(iv) यह राष्ट्रीय एकता के मार्ग में एक बड़ी बाधा सिद्ध हुआ।
(v) इसने भ्रष्टाचार एवं अनैतिकता को प्रोत्साहित किया।
विस्तार से
(i) कमजोर शासक-सामंत प्रथा के अधीन शासक केवल नाममात्र के ही शासक रह गए थे। राज्य की वास्तविक शक्ति सामंतों के हाथों में आ गई थी। उनके अधील एक विशाल सेना होती थी। वे ही अपने अधीन जागौर में कानून एवं व्यवस्था बनाए रखने के लिए उत्तरदायी थे। वे अपने न्यायालय लगाते थे तथा लोगों के मुकद्दमों का निर्णय देते थे। राजा अपने सभी कार्यों के लिए सामंतों की सहायता पर निर्भर करता था। (ii) किसानों का शोषण-सामंत प्रथा किसानों के लिए एक अभिशाप सिद्ध हुई। इस प्रथा के अधीन किसानों
का घोर शोषण किया गया। किसानों को सामंत के खेतों में काम करने के लिए बाध्य किया जाता था। इसके अतिरिक्त उन्हें अपने सामंत के कई प्रकार के अन्य कार्य भी करने पड़ते थे। इन कार्यों के लिए उन्हें कुछ नहीं दिया जाता था।
(ii) युद्धों को प्रोत्साहन- सामंत प्रथा ने मध्यकालीन यूरोप में अराजकता फैलाने में प्रमुख भूमिका निभाई। इसका कारण यह था कि वे अपने स्वार्थी हितों की पूर्ति के लिए आपसी युद्धों में उलझ जाते थे। सभी सामंतों के अधीन एक विशाल सेना होती थी। इसलिए उन पर नियंत्रण पाना बहुत कठिन होता था। सामंत अवसर देखकर राजा के विरुद्ध विद्रोह करने से भी नहीं चूकते थे। अराजकता के इस वातावरण में न केवल लोगों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा अपितु इससे संबंधित देश की अर्थव्यवस्था को भी भारी आघात पहुँचता था।
(iv) राष्ट्रीय एकता में बाधा-सामंत प्रथा राष्ट्रीय एकता के मार्ग में एक बड़ी बाधा सिद्ध हुई। इसका कारण यह था कि लोग अपने सामंत से जुड़े हुए थे। अतः वे अपने सामंत के प्रति अधिक वफ़ादार थे। वे अपने राजा से कोसों दूर थे। इसका कारण यह था कि उस समय लोगों में राष्ट्रीय चेतना न के बराबर थी। उनकी दुनिया तो उनके मेनर तक ही सीमित थी। मेनर के बाहर की घटनाओं का उन्हें कुछ लेना-देना नहीं था। निस्संदेह इसके हानिकारक परिणाम निकले।
सामंतवाद पतन के कारण
सामंतवादी प्रथा के पतन के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे।
कुछ प्रमुखःकारणों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है
1. सामंतों के आपसी झगड़े-मध्यकाल यूरोप में सामंत काफी शक्तिशाली थे। उनके पास विशाल जागीरें होती थीं। इसलिए उनके पास धन की कोई कमी नहीं थी। उनके पास बड़ी संख्या में सैनिक भी होते थे। उनमें आपसी ईर्ष्या बहुत थी। इस कारण उनमें आपसी लड़ाइयां चलती रहती थीं। इन लड़ाइयों के कारण सामंतों की शक्ति को गहरा आघात लगा। निस्संदेह इससे सामंतवाद के पतन को प्रक्रिया तीव्र हुई।
2. धर्मयुद्धों का प्रभाव - 11वीं से 13वीं शताब्दी के दौरान यूरोप के ईसाइयों एवं मध्य एशिया के मुसलमानों के मध्य जेरुसलम को लेकर युद्ध हुए। ये युद्ध इतिहास में धर्मयुद्धों के नाम से जाने जाते हैं। इन धर्मयुद्धों में पोप की अपील पर बड़ी संख्या में सामंत अपने सैनिकों समेत सम्मिलित हुए। इन धर्मयुद्धों में जो काफी लंबे समय तक चले में बड़ी संख्या में सामंत एवं उनके सैनिक मारे गए। इससे उनको शक्ति को गहरा आघात लगा। राजाओं ने इस स्वर्ण अवसर का लाभ उठाते हुए बचे हुए सामंतों को कुचल डाला। इस प्रकार धर्मयुद्ध सामंतों के लिए विनाशकारी प्रमाणित हुए।
: 3. मध्य श्रेणी का उत्थान–15वीं एवं 16वीं शताब्दी यूरोप में मध्य श्रेणी का उत्थान सामंतवादी व्यवस्था के लिए घातक प्रमाणित हुआ। मध्य वर्ग में व्यापारी, उद्योगपति एवं पूंजीपति सम्मिलित थे। इस काल में यूरोप के व्यापार में तीव्रता से विकास हो रहा था। इस कारण समाज में मध्य श्रेणी का सम्मान बहुत बढ़ गया। इस श्रेणी ने सामंतों द्वारा किए जा रहे अत्याचारों का अंत करने के लिए शासकों से सहयोग किया। शासक पहले ही सामंतों के कारण बहुत परेशान थे। अतः उन्होंने मध्य श्रेणी के लोगों को राज्य के उच्च पदों पर नियुक्त करना आरंभ कर दिया। मध्य श्रेणी द्वारा दिए गए आर्थिक सहयोग के कारण ही शासक अपनी स्थायी एवं शक्तिशाली सेना का गठन कर सके। इससे सामंतों की शक्ति को एक गहरा आघात लगा।
4. मुद्रा का प्रचलन- सामंतवादी काल में वस्तु विनिमय की प्रथा प्रचलित थी। मध्य काल यूरोप में मुद्रा का प्रचलन आरंभ हुआ। इससे यूरोपीय अर्थव्यवस्था में क्रांतिकारी परिर्वतन हुए। अब प्रत्येक वस्तु मुद्रा के माध्यम से खरीदी जाने लगी। मुद्रा के प्रचलन से लोगों को सामंतों के जुल्मों से छुटकारा मिला। इसका कारण यह था कि पहले वे अपनी लगभग सभी आवश्यकताओं के लिए सामंतों पर निर्भर थे। मुद्रा के प्रचलन से वे कहीं से भी वस्तु खरीद सकते थे। इसके अतिरिक्त मुद्रा के प्रचलन के कारण राजाओं के लिए अब स्थायी सेना रखना संभव हुआ। निस्संदेह मुद्रा के प्रचलन से सामंतों की शक्ति कमजोर पड़ गई।
5. नगरों का उत्थान - 15वीं शताब्दी में यूरोप में नगरों के उत्थान से सामंतवाद को गहरा आघात लगा। इस काल में जो नए नगर बने उनमें वेनिस, जिनेवा, फ्लोरेंस, पेरिस, लंदन, फ्रैंकफर्ट, एम्स्टर्डम एवं मीलान आदि के नाम उल्लेखनीय थे। ये नगर व्यापार एवं उद्योग के प्रसिद्ध केंद्र बन गए। इन नगरों में रहने वाले लोगों को स्वतंत्रता प्राप्त थी। इसलिए बहुत से कृषकदास सामंतों के अत्याचारों से बचने के लिए नगरों में आ बसे। इन नगरों में उन्हें व्यवसाय के अच्छे अवसर प्राप्त थे। इसके अतिरिक्त गांवों के अनेक लोग नगरों में इसलिए आ कर बस गए क्योंकि वहां बेहतर सुविधाएं उपलब्ध थीं। इस प्रकार नगरों के उत्थान से सामंतवाद पतन की ओर अग्रसर हुआ।
चर्च एवं समाज
मध्यकालीन यूरोप में चर्च के क्या कार्य थे ?
उत्तर- मध्यकाल में चर्च अनेक प्रकार के कार्य करता था।
(i) इसने सामाजिक एवं धार्मिक रीति-रिवाज संबंधी अनेक नियम बनाए थे जिनका पालन करना प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यक था।
(ii) चर्च की देखभाल के लिए अनेक अधिकारियों की नियुक्ति की जाती थी।
(iii) चर्च में धर्मोपदेश दिए जाते थे तथा सामूहिक प्रार्थना की जाती थी।
(iv) यहाँ विद्यार्थियों को शिक्षा भी दी जाती थी।
(v) इसके द्वारा रोगियों, गरीबों, विधवाओं एवं अनाथों की देखभाल की जाती थी।
(vi) यहाँ विवाह की रस्में पूर्ण की जाती थीं।
(vii) यहाँ वसीयत उत्तराधिकार के मामलों की सुनवाई की जाती थी।
(viii) यहाँ धर्म विद्रोहियों के विरुद्ध मुकद्दमे चलाए जाते एवं उन्हें दंडित किया जाता था।
(ix) चर्च कृषकों से उनकी उपज का दसवाँ भाग कर के रूप में एकत्रित करता था। इस कर को टीथ (tithe) कहते थे।
(x) चर्च श्रद्धालुओं से दान भी एकत्रित करता था।
मध्यकालीन मठों के प्रमुख कार्य निम्नलिखित थे
मठ :-i)मठों द्वारा लोगों को उपदेश देने का कार्य किया जाता था।
(ii) उनके द्वारा प्रसिद्ध पांडुलिपियों को तैयार करवाया जाता था। (
(iii) वे लोगों को शिक्षा देने का कार्य करते थे।
(iv) वे लोगों को पवित्र जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा देते थे
।v) वे रोगियों की सेवा करते थे।
(vi) वे मठ में आने वाले यात्रियों की देखभाल करते थे।
(vii) वे मठ को दान में दी गई भूमि पर कृषि एवं पशुपालन का कार्य करते (vita) मठ के नियमों की उल्लंघना करने वाले को कठोर दंड दिए जाते थे।
पोप कौन था ?
- पोप चर्च का सर्वोच्च अधिकारी था। वह रोम में निवास करता था। मध्यकाल में उसके हाथों में अनेक शक्तियाँ थीं। उसे पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था। वह चर्च से संबंधित सभी प्रकार के नियमों को बनाता था। वह चर्च की समस्त गतिविधियों पर अपना नियंत्रण रखता था। उसका अपना न्यायालय था जहाँ वह विवाह, तलाक, वसीयत एवं उत्तराधिकार से संबंधित मुकद्दमों के निर्णय देता था। उसके निर्णयों को अंतिम माना जाता था। वह यूरोपीय शासकों को पदच्युत करने की भी क्षमता रखता था। वह किसी भी सिविल कानून की जो उसकी नज़र में अनुचित हो, को रद्द कर सकता था। वह चर्च से संबंधित विभिन्न अधिकारियों की नियुक्ति भी करता था। कोई भी यहाँ तक कि शासक भी पोप की आज्ञा का उल्लंघन करने का साहस नहीं करता था। संक्षेप में पोप की शक्तियों असीम थीं।
पादरी (Priest ) – मध्यकाल में चर्च में पादरी की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती थी। वह रविवार के दिन चर्च में आने वाले लोगों को धर्मोपदेश सुनाता था। वह लोगों की दुःख-तकलीफों को सुनता था। वह लोगों के सुखों जीवन के लिए सामूहिक प्रार्थनाएँ करता था। वह जन्म, विवाह एवं मृत्यु से संबंधित सभी प्रकार के संस्कारों को संपन्न करवाता था। वह पोप से प्राप्त सभी आदेशों का पालन करवाता था। पादरियों के लिए कुछ विशेष योग्यताएँ। निर्धारित की गई थीं। पादरी विवाह नहीं करवा सकते थे। कृषकदास, अपंग व्यक्ति एवं स्त्रियाँ पादरी नहीं बन सकती थीं। पादरियों का स्थानीय लोगों पर बहुत प्रभाव होता था।
मध्यकालीन यूरोप में नगरों के उत्थान के लिए कौन-से कारण उत्तरदायी थे ?
उत्तर- मध्यकालीन यूरोप में नगरों के उत्थान के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है
1. कृषि का विकास रोमन साम्राज्य के पतन के पश्चात् यूरोप में अराजकता का बोलबाला था। इससे कृषि एवं व्यापार को गहरा आघात लगा अर्थव्यवस्था के तबाह हो जाने से बड़ी संख्या में नगर उजड़ गए थे। धीरे-धीरे परिस्थिति में परिवर्तन आया। इससे कृषि के विकास को बल मिला। फसलों के अधिक उत्पादन के कारण कृषक धनी हुए। इन धनी किसानों को अपनी आवश्यकता से अधिक खाद्यान्न को बेचने तथा अपने लिए एवं कृषि के लिए आवश्यक वस्तुओं को खरीदने के लिए एक बिक्री केंद्र की आवश्यकता हुई। शीघ्र ही बिक्री केंद्रों में दुकानों, घरों, सड़कों एवं चर्चा का निर्माण हुआ। इससे नगरों के विकास की आधारशिला तैयार हुई।
2. व्यापार का विकास- 11वीं शताब्दी में यूरोप एवं पश्चिम एशिया के मध्य अनेक नए व्यापारिक मार्गों का विकास आरंभ हुआ। इससे व्यापार को एक नई दिशा मिली। इटली, जर्मनी, इंग्लैंड, पुर्तगाल एवं बेल्जियम के व्यापारियों ने मुस्लिम एवं अफ्रीका के व्यापारियों के साथ संबंध स्थापित किए। व्यापार में आई इस तीव्रता ने नगरों के विकास को एक नया बल मिला।
3. धर्मयुद्ध धर्मयुद्ध यूरोपीय ईसाइयों एवं मुसलमानों के मध्य 1096 ई० से 1272 ई० के मध्य लड़े गए थे। इन धर्मयुद्धों का वास्तविक उद्देश्य ईसाइयों द्वारा अपनी पवित्र भूमि जेरुसलम को मुसलमानों के आधिपत्य से मुक्त करवाना था। इन धर्मयुद्धों के कारण यूरोपियों के ज्ञान में बहुत वृद्धि हुई। वे भव्य मुस्लिम नगरों को देखकर चकित रह गए। इन धर्मयुद्धों के कारण पश्चिम एवं पूर्व के मध्य व्यापार को एक नया प्रोत्साहन मिला। इसका कारण यह था कि यूरोपीय देशों में रेशम, मलमल, गरम मसालों एवं विलासिता की वस्तुओं की मांग बहुत बढ़ गई थी। इससे व्यापारी धनी हुए। इन व्यापारियों ने नगरों के विकास को प्रोत्साहित किया।
4. नगरों की स्वतंत्रता मध्यकाल में यह कहावत प्रचलित थी- नगर की हवा स्वतंत्र बनाती है। अनेक कृषकदास जो स्वतंत्र होने की इच्छा रखते थे तथा जो अपने सामंत द्वारा किए जाने वाले अत्याचारों से दुःखी थे नगरों में जाकर छिप जाते थे। यदि कोई कृषकदास अपने सामंत की नजरों से एक वर्ष तथा एक दिन तक छिपे रहने में सफल हो जाता तो उसे स्वतंत्र कर दिया जाता था। वह नगर में रहने वाले विभिन्न विचारों वाले लोगों से मिलता था। यहां उसे अपनी स्थिति में सुधार करने के अनेक अवसर प्राप्त होते थे। वह किसी भी व्यवसाय को अपना सकता था। यहां वह कोई भी विलास सामग्री खरीद सकता था। कृषकदास रहते हुए वह इस संबंध में स्वप्न में भी नहीं सोच सकता था। संक्षेप में नगरों के स्वतंत्र जीवन ने नगरों के विकास में बहुमूल्य योगदान दिया।
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