CHAPTER -10 उपनिवेशवाद एवं ग्रामीण समाज सरकारी अभिलेखों के साक्ष्य CLASS 12TH
उपनिवेशवाद एवं ग्रामीण समाज सरकारी अभिलेखों के साक्ष्य
(Colonialism and Rural Society - Evidence from Official Report)
भूमिका (Introduction)
इस अध्याय में यह बताया गया है कि औपनिवेशिक शासन का अर्थ उन लोगों के लिये क्या था जो उस समय देहात में रहते थे। इसके अतिरिक्त इसमें राजमहल की पहाड़ियों के बारे में जानकारी मिलेगी जहां पहाड़िया और संथाल लोग रहते थे। इस अध्याय में यह भी बताया गया है कि अंग्रेजी कम्पनी ने देहात में अपना राज्य कैसे स्थापित किया। कम्पनी ने जिस राजस्व नीति को कार्यान्वित किया उसके बारे में भी पता चलेगा। अंग्रेजी कम्पनी के राज्य का लोगों के दैनिक जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा और अंग्रेजी कानूनों के प्रभावाधीन कौन अधिक धनवान हो गया और समाज का कौन सा वर्ग अधिक गरीब हो गया इसके बारे में भी पता चलेगा। इस अध्याय में यह भी बताया गया है कि अंग्रेजी शासन के प्रभावाधीन किसे जमीन प्राप्त हुई और किसे अपनी जमीन गवानी पड़ी। लोग कम्पनी के कानूनों का पालन करने के लिये विवश थे। किन्तु फिर भी वे अन्यायपूर्ण कानूनों का विरोध करने से भी हिचकिचाते नहीं थे। इस प्रकार उनके परिणामों और प्रभावों में कुछ परिवर्तन लाने में सफल हो जाते थे। इस अध्याय में इतिहास के स्रोतो और इतिहासकारों के सामने आई समस्याओं का भी वर्णन किया गया है। इसके साथ-2 राजस्व अभिलेखों की जानकारी के साथ-2 यात्रियों तथा सर्वेक्षकों द्वारा छोड़े गये विवरणों तथा जांच आयोगों की रिपोर्ट की जानकारी भी प्राप्त होगी।
अधिगम्य उद्देश्य ( Learning Objectives )
इस अध्याय का अध्ययन करने के पश्चात आप :
औपनिवेशिक शासन काल में जमीदारों, किसानों तथा दस्तकारों के जीवन के बारे में जानकारी प्राप्तं होगी। ब्रिटिश काल में राजस्व बन्दोबस्त के अर्न्तगत इस्तमरारी बन्दोबस्त, रैयतवाड़ी बन्दोबस्त तथा महालवाड़ी
बन्दोबस्त के बारे जानकारी प्राप्त कर सकेंगे।
राजस्व बन्दोबस्त ( Revenue Settlement )
18वीं शताब्दी में जब ईस्ट इंण्डिया कम्पनी ने भारत में औपनिवेशिक शासन की स्थापना की तो उसे सेना तथा अन्य प्रशासनिक कार्यों पर खर्च करने के लिये धन की आवश्यकता थी। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये उसने भू-राजस्व प्रबन्ध में सुधार लाना आवश्यक समझा। अतः उसने भारत में तीन प्रकार के भू-राजस्व प्रवन्ध लागू किये। इनके नाम थे
(1) बंगाल का इस्तमरारी (स्थाई) बन्दोबस्त
(2) रैयतवाड़ी बन्दोबस्त
3) महालवाड़ी बन्दोबस्त
इन तीनो बंदोबस्त का वर्णन इस प्रकार है।
1. बंगाल का इस्तमरारी (स्थायी) बन्दोबस्त (Permanent Settlement of Bengal) :- बंगाल के इस्तमरारी बन्दोबस्त लागू करना लार्ड कार्नवालिस की महान सफलताओं में से एक माना जाता है। 1786 में जब वह भारत का गवर्नर जनरल बन कर आया तो उस समय भू-राजस्व प्रबन्ध के क्षेत्र में बहुत अव्यवस्था फैली हुई थी। कृषि तथा व्यापार नष्ट हो रहा था जमीदार खेतिहर मजदूर, किसान दिन प्रतिदिन और अधिक निर्धन होते जा रहे थे। ऐसा वारेन हेस्टिगज की गलत नीतियों के कारण हुआ था। उसने 1772 ई० में सबसे अधिक बोली देने वाले ठेकेदारों को पांच वर्ष के लिये एक निश्चित क्षेत्र में भू राजस्व एकत्र करने का अधिकार दिया था। 1777 ई० में इस ठेके को वार्षिक बना दिया। परन्तु यह बन्दोबस्त बहुत विनाशकारी सिद्ध हुआ। जमीदार भू-राजस्व का अधिकार प्राप्त करने के उद्देश्य से जोश में आकर अधिक बोली दे देते थे। परन्तु उन्हें उतना भू-राजस्व प्राप्त नहीं होता था। परिणामस्वरूप सरकार का भू-राजस्व बकाया रह जाता था। अतः उसकी आमदन में अनिश्चितता आ गई। दूसरा जमीदारों ने कृषि की दशा को सुधारने का तनिक भी प्रयास नहीं किया क्योंकि उन्हें यह यकीन नहीं था की अगले वर्ष भी उन्हें उस भूमि पर ठेके का अधिकार मिलेगा या नहीं। इस कारण फसलों की पैदावार में भारी कमी हुई। तीसरा जमोदारों ने अधिक से अधिक भू राजस्व प्राप्त करने के उद्देश्य से किसानों का उत्पीड़न आरम्भ कर दिया था।
उपरोक्त कारणों से कार्नवालिस ने राजस्व बोर्ड के अध्यक्ष सरजॉन शोर तथा अन्य सदस्यों की सिफारिश के आधार भूमि प्रबन्ध की स्थिति को सुधारने के उद्देश्य से एक नया भूमि बन्दोबस्त लागू किया। यह बंगाल के इस्तमरारी अथवा स्थाई बंदोबस्त के नाम से विख्यात हुआ। आरम्भ में 1790 में लार्ड कार्नवालिस ने इसे दस वर्षों का बंदोबस्त करने का निर्णय किया था परन्तु बाद इसके आरम्भिक अच्छे परिणामों को देखते हुए 22 मार्च 1793 ई० में इस बंदोबस्त को स्थायी तौर पर लागू कर दिया गया। इस बन्दोबस्त को बंगाल के साथ-2 बाद में बिहार उड़ीसा, बनारस तथा उत्तरी सरकार के प्रदेशों में भी लागू किया गया था। इसे भारत में कृषि अधीन क्षेत्र के
18 प्रतिशत भाग यह लागू किया गया। इस बंदोबस्त को मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित थी।
1. सरकार ने जमीदारों को भूमि का स्थायी तौर पर स्वामी मान लिया। उन्हें उस समय तक इस अधिकार से चंचित नहीं किया जा सकता था जब तक वे अपना निश्चित भूराजस्व सरकार को देते रहेंगे।
2 जमीदारों से लिया जाने वाला भू-राजस्व हमेशा के लिये निश्चित कर दिया गया। इसमें कमी या वृद्धि नहीं की जा सकती थी। सरकार ने भू-राजस्व की दर 10/11 भाग निश्चित करदी थी शेष भाग जमोदार के पास रहता था।
3. फसलों के किसी कारण नष्ट होने या अकाल पड़ने की सूरत में भी जमीदारों को निश्चित भू-राजस्व समय पर सरकारी कोष में जमा करवाना होता था। ऐसा न कर सकने की सूरत में सरकार उनकी जमीन का कुछ भाग बेचकर भू-राजस्व वसूल कर सकती थी।
4.जमीदारों को प्राप्त उनके न्यायकि अधिकारों से वंचित कर दिया गया।
5.सरकार जमीदारों एवं किसानों के मामले में हस्ताक्षेप नहीं करेगी।
6.किसानों को जो जमीन सन्बन्धी अधिकार प्राप्त थे उन्हें उनसे वंचित कर दिया गया।
इस्तमरारी बन्दोवस्त के लाभ (Merits of Permanent Settlement)
प्रसिद्ध इतिहासकारों पी०ई० राबर्टस, मार्शमैन, आर०सी० दत्त आदि ने लार्ड कार्नवालिस के इस्तमरारी
बन्दोबस्त की बहुत प्रशंसा की है। उनके अनुसार इस बन्दोबस्त के अग्रालिखित लाभ हुए।
1. इस्तमरारी बन्दोबस्त का सबसे बड़ा लाभसरकार को हुआ। सरकार को अब प्रति वर्ष निश्चित भू राजस्व मिलने लगा जिससे उसकी आय निश्चित हो गई। अतः उस सरकार को प्रशासनिक कार्यों पर किए जाने वाले व्यय के सम्बन्ध में बजट बनाना आसान हो गया। इस प्रबन्ध सरकार को लगान को राशि समय पर तथा नियमपूर्वक मिलने लगी।
2. स्थायी बन्दोबस्त के कारण सरकार को समय-2 पर भू-राजस्व निर्धारित करने के झंझट से छुटकारा मिल गया। इसके लिये उसे भू-राजस्व की वसूली के लिये भी बहुत से योग्य अधिकारियों को न्युक्ति करनी पड़ती थी। अब उसे इस उलझन से भी मुक्ति मिल गई। इस कारण सरकार के लिये प्रशासन के अन्य विभागों की ओर ध्यान देना सम्भव हो गया जिससे प्रशासन मे कुशलता आई।
3. इस बन्दोबस्त के कारण कृषि में आश्चर्यजनक उन्नति हुई। इससे पूर्व जमीदार कृषि कार्यों में कोई रूचि नहीं लेते थे। इसका कारण यह था कि उन्हें यह भरोसा नहीं होता था कि अगले वर्ष भूमि उनके पास रहेगी या नहीं परन्तु अब उन्हे हमेशा के लिये भूमि का स्वामी बना दिया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें निश्चित भू-राजस्व ही सरकारी कोष में जमा करवाना होता था, शेष आय के मालिक वे स्वयं थे। अतः उन्होंने कृषि को समृद्ध करने में जी जान से मेहनत की। परिणामस्वरूप देखते ही देखते बंगाल भारत का समृद्ध प्रान्त बन गया।
4. अंग्रेजो ने जमीदारों को सदैव के लिये भूमि का स्वामी बना दिया था। इसलिये वे अंग्रेजों के दृढ़ समर्थक बन गए। उन्होंने हर संकट के समय अंग्रेजों को पूर्ण सहयोग दिया। यहां तक कि 1857 के विद्रोह के समय भी वे अंग्रेजों के बफादार बने रहे और उन्होंने 1857 के विद्रोह को दबाने में अंग्रेजों का पूर्ण सहयोग दिया अतः भारत में ब्रिटिश शासन को स्थिरता प्राप्त हुई।
5.स्थायी बन्दोबस्त के परिणाम स्वरूप कृषि का विकास होने से समोदार काफी अमीर हो गए उनके पास अतिरिक्त धन इकट्ठा हो गया इस धन से उन्होंने उद्योग तथा वाणिज्य व्यापार में भाग लेना आरम्भ कर दिया। परिणामस्वरूप उद्योग तथा वाणिज्य व्यापार में काफी उन्नति हुई।
इस्तमरारी बंदोबस्त के दोष
बंगाल का स्थाई बन्दोबस्त दोष रहित नहीं था। होम्स, थार्नटन, आर०सी० मजूमदार, तारा आदि इतिहासकारों ने कार्नवालीस के इस्तमरारी बन्दोबस्त की कटु आलोचना की है। और इसे कार्नवालिस की भयंकर भूल बताया है। उनके अनुसार इस बन्दोबस्त के निम्नलिखित दुष्परिणाम निकले।
1.स्थायी बन्दोबस्त ने सरकार को भविष्य में लगान की राशि बढ़ाने से वंचित कर दिया इसलिये सरकार को भविष्य में भारी आर्थिक हानि उठानी पड़ी क्योंकि समय के साथ बंगाल में भूमि से प्राप्त होने वाली पैदावार कई गुना बढ़ गई परन्तु सरकार भू-राजस्व में वृद्धि नहीं कर सकी। इस प्रकार स्थाई बदोबस्त सरकार के लिये लाभकारी सिद्ध नहीं हुआ।
2 इस बन्दोबस्त में किसानों तथा मुजारों के अधिकारों का कोई ध्यान नहीं रखा गया। जमीदारों को भूमि का स्वामी बना दिया और कृषको को उनकी दया पर छोड़ दिया गया। परिणाम स्वरूप समीदारों ने किसानों पर मनमाने जुल्म करने आरम्भ कर दिये ते। वास्तव में इस बन्दोबस्त से रैयत अथवा किसानों को बुरी तरह उपेक्षा की गई जो अपने खून-पसीने से अनाज पैदा करता था, जिससे जमीदारों का गुजारा चलता था और सरकार का खजाना भरता था
3.आरम्भ में स्थायी बन्दोबस्त का जमीदारों पर बहुत विनाशकारी प्रभाव पड़ा। इसका कारण यह था कि सरकार ने भू-राजस्व की राशी बहुत अधिक निश्चित की थी। इस कारण बहुत से जमीदार अपनी भू राजस्व राशी समय पर सरकारी कोष में जमा नहीं करवा सके अतः सरकार ने उनकी जमीने बेचकर भू राजस्व राशि वसूल की। एक अनुमान के अनुसार 1794 और 1815 के मध्य लगभग आधे जमोदारों को अपनी जमीनों से हाथ धोना पड़ा। इस कारण ये जमीदार केवल भिखारी बन कर रह गये ।।
4. समय के साथ-2 कृषि क्षेत्र में अत्याधिक उन्नति होने के कारण जमोदारों की आय में काफी वृद्धि हुई। इस कारण वे शहरों में रहने लगे तथा विलासी जीवन व्यतीत करने लगे। उन्होंने अपनी भूमि का प्रबन्ध अपने एजेंटों पर छोड़ दिया। ये एजेन्ट जमोदारों की अनुपस्थिति में किसानों का शोषण करने लगे।
5.स्थायी बन्दोबस्त के कारण क्योंकि सरकार को प्रतिवर्ष भारी घाटा हो रहा था इसलिये उसने अपनी आय को बढ़ाने के उद्देश्य से गैर कृषक वर्गों पर भी कर लगा दिये यह सरासर अनुचित तथा अन्यायपूर्ण कार्यवाही थी।
2. रैयतवाड़ी बन्दोबस्त (Ryotwari System)
रैयतवाड़ी बन्दोबस्त मद्रास के गवर्नर थामस मुनरो ने कैप्टन रोड के सहयोग से 1820 में मद्रास में लागू किया था। बाद में इसे बंबई तथा असम तथा देश के अन्य भागों में भी लागू किया था। यह बंदोबस्त भारत के कृषि अधीन 51 प्रतिशत क्षेत्र में लागू किया गया था। इस बंदोबस्त के अन्तर्गत सरकार ने रैयत तथा किसानों के साथ सीधा समझौता किया। उन्हें भूमि का स्वामी मान लिया इसके लिये केवल एक ही शर्त थी कि वे समय पर भू-राजस्व सरकार के पास जमा करवाते रहें। किसानों से लिया जाने वाला भू-राजस्व 20 से 40 वर्षों के बाद पुनः बढ़ाया जा सकता था। इस प्रकार इस बन्दोबस्त में सरकार ने स्थायी बन्दोबस्त की त्रुटियों को दूर करने का प्रयास किया।
रैयतवाड़ी बन्दोबस्त के कारण किसानों की स्थिति अच्छी हो गई क्योंकि उन्हें भूमि का स्वामी मान लिया गया था। उनके तथा सरकार के बीच जितने भी मध्यस्य थे उनको समाप्त कर दिया गया था। यह बन्दोबस्त सरकार के लिये भी लाभकारी सिद्ध हुआ क्योंकि इस कारण सरकार की आय में भी वृद्धि हो गई। इन्ही कारणों से रैयतवाड़ी बन्दोबस्त को स्थाई बन्दोबस्त से अधिक अच्छा माना जाता था। परन्तु इस बन्दोबस्त में भी कई दोष थे। प्रथम सरकार ने किसानों से बहुत अधिक भू-राजस्व वसूल किया। यह कुल उत्पादन को 45% से 55% तक होता था और किसानों को फसल नष्ट होने की सूरत में भी उन्हें भू-राजस्व देना पड़ता था। अन्यथा सरकार को उनकी ज़मीन बेचने का अधिकार था। सरकार को यह भी अधिकार था कि वह जब चाहे भू-राजस्व की दरों में वृद्धि कर सकती थी। वास्तव में इस बंदोबस्त में सरकार ने जमीदारों की अपेक्षा किसानों का हो शोषण किया।
3.महालवाड़ी बन्दोबस्त (Mahalwari System),
पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में राबर्ट वरड तथा जेम्स थामसन नामक अंग्रेज अधिकारियों ने महालवाड़ी बन्दोबस्त को लागू किया। बाद में इस बन्दोबस्त को पंजाब में भी लागू किया गया। यह बन्दोबस्त गांव के समूचे भाईचारे के साथ किया जाता था। गांव के समूह महाल कहलाते ते। इसलिये इनके साथ किये गये बन्दोबस्त को महालवाड़ी बन्दोबस्त कहा जाने लगा। इस बन्दोबस्त के अर्न्तगत सरकार को भू राजस्व देने की जिम्मेवारी गांवों के भाईचारे की होती थी। भाईचारे में प्रत्येक किसान से लिया जाने वाला भू राजस्व अलग रूप से निश्चित किया जाता था। परन्तु यदि वह यह भू-राजस्व अदा न कर सके तो भाईचारा सामूहिक रूप से इसकी अदायगी सरकार को कर देता था। इस कारण सरकार को कोई हानि नहीं उठानी पड़ती थी। इस बन्दोबस्त को सबसे उत्तम माना जाता था क्योंकि इससे स्थाई तथा रैयतवाड़ी बन्दोबस्त के गुण विद्यमान थे। यह बन्दोबस्त दीर्घ समय के लिये किया जाता था। इस व्यवस्था का दोष यह था कि गांव के भाईचारे से वसूल किये जाने वाले भू-राजस्व की दर बहुत अधिक थी।
राजस्व बन्दोबस्त के अंर्तगत जमीदारों का जीवन
इस्तमारारी बन्दोबस्त के अधीन जमीदार गांव में राज्य के लिये राजस्व एकत्र करने वाला अधिकारी बन गया। जमीदार के अधीन 400 तक गांव होते थे। ये गांव मिलकर एक राजस्व संपदा का रूप ले लेते थे। कम्पनी समस्त संपदा से ली जाने वाली कुल माँग को निश्चित करती थी। इसके पश्चात जमीदार प्रत्येक गांव से लिया जाने वाला राजस्व निश्चित करता था एवं उसे एकत्र करता था। ब्रिटिश अधिकारी जमीदार से यह अपेक्षा करते. थे कि वह समय रहते उन्हे निश्चित राजस्व अदा करेगा। इसके साथ ही कम्पनी ने सूर्यास्त कानून (Sunset Law) का प्रचलन किया। इस कानून के अनुसार यदि निश्चित तारीख को सूर्य अस्त होने तक भू-राजस्व की अदायगी नहीं की जाती थी तो जमीदारों को जमीन नीलाम करने का प्रावधान था। इसमें इस बात की ओर ध्यान नहीं दिया जाता था कि फसल अच्छी हुई अथवा खराब।
इस बन्दोबस्त ने जमीदारों की शक्ति को रैयत से राजस्व एकत्र करने और अपनी जमीदारी का प्रबन्ध करने तक सीमित कर दिया था। कम्पनी ने जमीदारों पर अपना नियन्त्रण बढ़ाने के उद्देश्य से उनकी सैन्य टुकड़ियां को भंग कर दिया। सीमा शुल्क को समाप्त कर दिया। जमीदारों से स्थानीय न्याय और स्थानीय पुलिस की व्यवस्था के अधिकार छीन लिये गए। उनको कचहरियों को कम्पनी द्वारा नियुक्त कलैक्टर के अधीन कर दिया। इन सोमित अधिकारों के चलते ज़मीदारों का गांवों में प्रभाव कम हो गया। इसके चलते जमीदारों के लिये भू-राजस्व एकत्र करना एक सिरदर्द बन गया।
किसानों का जीवन (Life of Peasant )
अंग्रेजी द्वारा लागू की गई लगान व्यवस्था के कारण किसान अत्याचारों का शिकार होने लगे। जमीदारी क्षेत्रों में जहां स्थाई तथा अस्थाई बन्दोबस्त प्रचलित थे वहां जमीदार बुरी तरह किसानों का शोषण करते थे। जमीदार सरकार को निश्चित राशी देते थे तथा किसानों से मनचाहा कर इकट्ठा करते थे। जमीदार किसानों से भूमि कर के अतिरिक्त और कई प्रकार की बेगार भी लेते थे। सरकार भी जमीदारों को किसानों पर अत्याचार करने से नहीं रोक सकती थी क्योंकि सरकार द्वारा जमीदारों को बहुत अधिकार मिले हुए थे। जमीदार तो भूमि स्वामी बन गये थे। रैयतवाड़ी क्षेत्रों में भी किसान जमीदार के स्थान पर सरकार के अत्याचारों का शिकार होते थे। इन क्षेत्रों में भूमि पर उपज का 1/3 से 1/2 भाग होता था तथा आने वाले प्रत्येक वर्ष में लगान में वृद्धि होती रहती थी। इस प्रकार की दशा में किसान का दरिद्र होना स्वभाविक ही था। किसानों को दरिद्रता का एक अन्य कारण साहूकारों द्वारा किया जाने वाला शोषण था। फसल अच्छी न होने की स्थिति में तथा लगान समय पर चुकाने के लिये किसान साहूकारों से कर्ज लेने के लिये मजबूर हो जाता। इसके अतिरिक्त परिवार में जन्म, मृत्यु, शादी तथा अन्य अवसरों पर उसे अपनी आय से अधिक खर्चा करना पड़ता अतः इस खर्च के लिये उसे साहूकार के आगे हाथ फैलाने पड़ते थे। साहूकार ब्याज की बहुत ऊंची दरो पर किसानों को कर्ज देते थे कई बार यह दर 200 से 300 गुना होती थी। इसके अतिरिक्त साहूकार किसानो की निरक्षरता का लाभ का अवसर नहीं छोड़ते थे। इस प्रकार जो किसान एक बार साहूकार के चुंगल में फस जाता। फिर उसका बाहर उनको धोखा देने निकलना लगभग असम्भव था। इस प्रकार ब्रिटिश शासन काल में भारतीय किसान दरिद्रता के कुचक्र में फंसे रहे।
दस्तकारों का जीवन (Life of Artisans )
अंग्रेजों को भारत विजय के कारण भारत की अर्थव्यवस्था पर विनाशकारी प्रभाव पड़ा। उन्होंने अपने स्वार्थी हितों की पूर्ति के लिये भारतीय अर्थव्यवस्था के परंपरागत ढाँचे को पूरी तरह छिन्न भिन्न कर दिया। परिणामस्वरुप भारतीय दस्तकार एवं शिल्पकार जो शताब्दियों से अपने शिल्पों के कारण विश्व भर में प्रसिद्ध थे बर्बाद हो गए। उनकी बर्बादी के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे।
1. औद्योगिक क्रान्ति के कारण इंग्लैण्ड में बड़े-2 कारखानों को स्थापना हो गई। इन कारखानों में बढ़ो मात्रा में उत्पादन होता था। मशीनों से बना होने के कारण अंग्रेजी माल सस्ता था सुन्दर होता था अतः भारतीय माल अंग्रेजी माल के सामने नहीं टिक सका।
2. 1813 के चार्टर एक्ट के द्वारा इंग्लैण्ड के व्यापारियों को भारत के साथ मुक्त व्यापार करने की आज्ञा दे दी गई। इस कारण इंग्लैण्ड का तैयार माल बिना किसी बाधा के तीव्रता से भारत आने लगा। इसका भारतीय पापार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
3.अंग्रेजो ने रेलों का विकास करके अपने माल को सुदूर गावों में पहुंचाया इस कारण ग्रामीण उद्योगों का पतन हो गया।
4. 18वीं तथा 19वीं शताब्दी के दौरान इंग्लैण्ड तथा यूरोप में भारतीय वस्तुओं के आयात पर कई प्रकार के प्रतिबन्ध लगा दिया। इस कारण भारतीय लघु उद्योगों के गहरा धक्का पहुंचा।
5.अंग्रेजों ने इंग्लैण्ड के उद्योगों के लिये आवश्यक कच्चा माल भारत से सस्ते मूल्य पर भेजना आरम्भ कर दिया। कच्चे माल की कमी के कारण भारतीय दस्तकार तथा शिल्पकारों के हितों को गहरा धक्का लगा।
उपरोक्त कारणों के कारण भारतीय उद्योग धन्धे पतन के कगार पर पहुंच गये और इन उद्योगों से
सम्बन्धित दस्तकार तथा शिल्पकार भी पूरी तरह बर्बाद हो गए।
पहाड़ियों का जीवन
ब्रिटिश राजमहल की पहाड़ियों के आस पास बसने वाले पहाड़ी लोगों को पहाड़िया कहा जाता था। 19वीं शताब्दी के आरम्भिक वर्षों में फ्रांसिस बुकानन ने राजमहल की पहाड़ियों का भ्रमण किया था उसके अनुसार ये पहाड़ियां अभेध नजर आती थी। यह एक ऐसा खतरनाक क्षेत्र या जहां बाहर के लोग बहुत कम आने का साहस करते थे। फ्रांसिस बुकानन जहां भी गया उसने पहाड़िया लोगों को कम्पनी के अधिकारियों के प्रति अशांकित पाया। अतः यह लोग उनसे बातचीत करने के लिये कदापि तैयार नहीं थे। कई बार तो वे बातचीत करने की अपेक्षा अपना गांव छोड़कर भाग जाते थे। फ्रांसिस बुकानन ने अपनी पत्रिका में इन पहाड़ियों की दयनीय हालत तथा उनकी परम्पराओं का वर्णन किया है।
पहाड़िया लोग राजमहल की पहाड़ियों के आस पास रहते थे वे अपने जीवन निर्वाह के लिये झूम खेती करते थे। वे जंगल के एक छोटे से हिस्से में झाड़ियों को काटकर एवं घास फूस को जलाकर जमीन को साफ कर लेते थे। वे अपने कुदाल से जमीन को थोड़ा खुरच कर उसमें बीज डाल देते थे। वे जमीन को उपजाऊ बनाने के उद्देश्य से राख की पोटास का प्रयोग करते थे। वे ज्वार-बाजरा एवं अनेक प्रकार की दालों का उत्पादन करना जानते थे। वे कुछ वर्षों तक एक स्थान पर खेती करते थे तथा उसके पश्चात के नए क्षेत्र में लेते थे। पहाडिया लोगों के जीवन में वनों का विशेष महत्व या वे इमली के पेड़ों के मध्य झोपड़ियाँ बनाकर रहते थे। वे आम के पेड़ो की छांव में आराम करते थे। वे वनों में शिकार करते थे। वे खाने के लिये महुआ के फूल एकत्र करते थे एवं बेचने के लिये रेशम का कोया एवं काठकोयला के लिये लकड़ियां एकत्र करते थे। उनके पशुओं के लिये पेड़ो के नीचे उगने वाले छोटे-2 पौधे तथा पास चारे का काम करते थे इस प्रकार पहाड़िया लोगों के जीवन में वनों का विशेष महत्व था।
पहाड़िया लोग अक्सर मैदानी इलाकों पर आक्रमण कर देते थे। जहां किसान स्थायी कृषि के लिये निवास करते थे। उनके यह आक्रमण अकाल अथवा अभाव के वर्षों में अपने आपको जीवित रखने के लिये किये जाते थे। पहाड़ियों द्वारा मैदानी इलाकों का लगातार किए जा रहे आक्रमणों से ब्रिटिश अधिकारी बहुत परेशान थे अतः 1770 के दशक में ब्रिटिश अधिकारियों ने पहाड़िया लोगों के प्रति क्रूर नीति अपना ली। उनका पीछा बड़ी संख्या में उन्हें मौत के घाट उतार दिया किन्तु इस नीति के वांछित परिणाम नहीं निकले। अतः विवश होकर 1780 के दशक में ब्रिटिश अधिकारियों ने पहाडिया लोगों के प्रति मित्रता की नीति अपनाने का निर्णय किया।
संथालों का जीवन
1810 के अन्त में फ्रांसीस बुकानन गजरिया पहाड़ जो कि राजमहल श्रंखलाओं का एक भाग था, को पार कर एक गांव में पहुंचा यद्यपि यह गांव पुराना था किन्तु इसमें आसपास की जमीन खेती के लिये अभी-2 साफ की गई थी वहाँ के भू-दृश्य को देखकर बुकानन अचाभिंत रह गया। यहां पर उत्पन्न किये जाने वाले तम्बाकू तथा सरसों से बढ़िया किसम कहीं अन्य नहीं देखी। पूछने पर पता चला कि संथाल इस क्षेत्र में लगभग 1800 में आए थे। उन्होंने वहां पर रहने वाले पहाड़िया लोगों को वहां से खदेड़ दिया था। इसके पश्चात उन्होंने वनों का सफाया किया तथा फिर वहीं पर बस गये। संथालो की जीवन शैली को देखकर अब ब्रिटिश अधिकारियों ने अपना ध्यान संथालो की ओर किया क्योंकि अब तक उनके पहाड़िया लोगों पर नियन्त्रण पाने तथा उन्हे स्थाई कृषि के लिये राजी करने के सभी प्रयास विफल रहे थे।
ब्रिटिश अधिकारियों के अनुरोध पर संथालो ने राजमहल को तलहट्टी में बसना स्वीकार कर लिया। 1832 ई० तक संथालों के अधीन एक बहुत बड़ा प्रदेश हो गया। इसे दामिन-ए-कोह का नाम दिया। इसे स्थानों की भूमि घोषित कर दिया। संथालों को इस भूमि के भीतर रहने का आदेश दिया। इस पूरे क्षेत्र का सर्वेक्षण करके उसका मानचित्र तैयार किया गया। तथा इसको सीमा तय करने के लिये इसमें चारों ओर खंबे गाड़ दिये। इस प्रकार स्थालों को पहाड़िया एवं मैदानी लोगों से अलग कर दिया गया। दामिन-ए-कोह को स्थापना के बाद संथालों की बस्तियां बहुत तीव्रता से बढ़ी। वे कई तरह की व्यापारिक फसलों की खेती करने लगे। दूसरी ओर जैसे-2 संथाल खेती का विस्तार करते गए वैसे-2 कम्पनी के राजस्व में वृद्धि होती चली गई। संथालों द्वारा बनो की सफाई के कारण पहाड़िया लोगों को शिकार करने की समस्या आ गई तथा नयी जमीनों के उपलब्ध न होने
के कारण वे परंपरागत झूम खेती भी न कर सके। धीरे-2 परिस्थितियां सचालों के विरुद्ध होती जा रही थी उन्होंने जिस भूमि को खेती योग्य बनाया था उसके मालिक अब नये जमीदार बन रहे थे। ये मालिक उन पर घोर अत्याचार करते थे उनके बढ़ते शोषण से संथालों में असंतोष बढ़ता जा रहा था अंततः विवश होकर 60,000 संथालो ने 7 जुलाई 1855 ई० को विद्रोह कर दिया। संथालो ने अनेक जमीदारों, साहूकारो तथा अंग्रेज अधिकारियों की हत्याएँ कर दी। ब्रिटिश सरकार ने फरवरी 1856 ई० तक इस विद्रोह का निर्ममतापूर्वक दमन कर दिया। इसके पश्चात सरकार ने वहां शान्ति स्थापित करने के उद्देश्य से संथालों के लिये पृथक संथाल परगना स्थापित कर दिया।
पांचवी रिपोर्ट
पांचवी रिपोर्ट एक ऐसी रिपोर्ट है जिसे एक प्रवर समिति द्वारा तैयार किया गया था यह उन रिपोर्टों में से पांचवी थी जिसे भारत में कम्पनी के प्रशासन एवं क्रियाकिलाप सम्बन्धी तैयार किया गया था। इस रिपोर्ट में -1002 पृष्ठ थे। इसमें 800 से अधिक पृष्ठों में परिशिष्ट दिये गए हैं। इनमें जमीदारों एवं रैयतों की अर्जियां, भिन्न-2 जिलों के कलैक्टरों की रिपोर्ट तथा बंगाल एवं मद्रास के राजस्व एवं न्यायाकि प्रशासन पर लिखित टिप्पणियों को शामिल किया गया था।
पांचवी रिपोर्ट में 18वीं शताब्दी के अंतिम दशको में ग्रामीण बंगाल के सम्बन्ध में दिये गये साक्ष्य बहुमूल्य है। परन्तु पाँचवी रिपोर्ट में जो लिखा है उसे बिना किसी तर्क के आधुनिक विद्वान स्वीकार करने को तैयार नहीं है। उनके लिये यह जानना आवश्यक है कि यह रिपोर्ट किसने तथा किस उद्देश्य से लिखी। आधुनिक शोध कर्ताओं ने कई जमीदारों के अभिलेखों और स्थानीय अभिलेखों की जांच की थी जिससे पता चलता है कि पांचवी रिपोर्ट लिखने वाले कम्पनी के कुप्रशासन की आलोचना करना जरूरी समझते थे और पांचवी रिपोर्ट में इस बात का बढ़ा चढ़ा कर वर्णन किया गया था कि पुराने जमीदार व्यापक स्तर पर अपनी जमीदारी खोते जा रहे थे जबकि वास्तविक स्थिति ऐसी नहीं थी। जैसा कि पहले लिखा जा चुका है कि यदि किसी प्रकार जमीदारियां नीलाम होती थी तो उन्हें बचाने के लिये जमीदार कैसे नए-नए हथकंडे अपनाते थे।
बुकानन का विवरण
फ्रांसीस बुकानन के विवरण को ब्रिटिश शासनकाल के महत्वपूर्ण दस्तावेजों में से एक माना जाता है। यह विवरण हमें 19वीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में भू-दृश्यों एवं राजस्व सम्बन्धी बहुमूल्य जानकारी प्रदान करता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि फ्रांसीस बुकानन का विवरण हमें अनेक बहुमूल्य जानकारियां जुटाता है किन्तु इसके बावजूद उसमें कुछ कमियां भी थी। उसका विवरण शुद्ध रूप से जानकारी का आधार नहीं माना जा सकता। क्योंकि वह अंग्रेजी कम्पनी का एजेंट अर्थात अधिकारी था वह किसी विशेष जानकारी की प्राप्ति के लिये यात्रा कर रहा था। वह किसी क्षेत्र की सुन्दरता देख कर या उस क्षेत्र के साथ प्रेम की भावना से यात्रा नहीं कर रहा था। उसकी यात्रा का विशेष उद्देश्य था। उसके साथ नक्शा नवीस, सर्वेक्षक और पालकी उठाने वाले कुली भी यात्रा करते थे ताकि जो उद्देश्य उसे कम्पनी ने उसे दिया था उसकी रिपोर्ट वह अच्छी तरह से दे सके। उसकी यात्रा का खर्च अंग्रेजी कम्पनी उठाती थी और उसे विशेष हिदायत दी गई थी कि उसे क्या देखना और खोजना था। बुकानन जहां कहीं भी गया उसने पत्थरों चट्टानों और वहां की भूमि के विभिन्न स्तरों तथा परतों को देखा और उसकी जांच की। उसने वाणिज्यक दृष्टि से महत्वपूर्ण और मूल्यवान पत्थरों तथा खनिजों को खोजने का प्रयास किया। इस प्रकार उसने अवरक, ग्रेनाईट और साल्टपीटर से सम्बन्धित सभी स्थानों का पता लगाया था। उसने ध्यानपूर्वक स्थानीय लोगों द्वारा तैयार किये जाते नमक को भी देखा था। इस प्रकार उसने कच्चा लोहा निकालने की विधि का निरीक्षण भी किया था।
जब वह किसी भू-दृश्य के बारे में लिखता था तो केवल यही नहीं लिखता था कि उसने क्या देखा अपितु वह यह भी लिखता था कि उसमें बदलाव करके इसे अधिक उपजाऊ कैसे बनाया जा सकता था। वह यह भी लिखता था कि वहां पर कौन-2 सी फसलें उगाई जा सकती हैं। कौन-2 से पेड़ काटे जा सकते थे। और -2 से पेड़ लगाए जा सकते थे। उसका दृष्टिकोण कम्पनी के व्यापारिक और आर्थिक लाभ को बढ़ाने वाला था। वह स्थानीय लोगों की जीवन शैली की आलोचना करता था और सोचता था कि जंगल को काटकर उस भूमि को कृषि के लिये तैयार करना उनके लिये भारी आवश्यक था तभी कम्पनी की आय में वृद्धि हो सकेगी। बुकानन केवल कम्पनी का हित सोचता था। उसे स्थानीय लोगों से न तो प्यार था और न ही उनसे कोई सहानुभूति थी। वह पूर्णतया कम्पनी के प्रति वफादार था।
विद्रोह 1875 ई० तथा दक्कन दगां आयोग रिपोर्ट
जब 1875 ई० में विद्रोह दक्कन में फैला और दगें हो रहे थे तो बम्बई की सरकार ने उसे गम्भीरता से नहीं लिया। किन्तु भारत सरकार इस विद्रोह के प्रसार से घबरा गई। उसे इस बात का सन्देह था कि कहीं यह विद्रोह 1857 के विद्रोह की तरह सम्पूर्ण भारत में न फैल जाए। अतः उसने बम्बई सरकार को इस विद्रोह के दमन के लिये उचित कदम उठाने तथा इस विद्रोह के कारणों की छानबीन करने के लिये एक जांच आयोग गठित करने को कहा। अतः बम्बई की सरकार ने विद्रोह के दमन के पश्चात दक्कन दंगा आयोग की स्थापना की। इस आयोग द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट 1878 ई० में ब्रिटिश संसद में प्रस्तुत किया गया। इस रिपोर्ट को दक्कन दंगा रिपोर्ट कहा जाता है। इससे इतिहास कारों को उन दंगों के कारणों की जानकारी मिलती है जिनके कारण दक्कन में दंगा हुए थे। आयोग ने दंगा पीड़ित जिलों का भ्रमण किया। जिन जिलों में दंगे हुए थे आयोग ने उन जिलों में रहने वाले किसानो, साहूकारों और चश्मदीद गवाहों के ब्यान संकलित किये जिन्होंने सब कुछ अपनी आंखों से देखा था। आयोग ने विभिन्न क्षेत्रों में राजस्व की दरों, कीमतों और ब्याज की दरों के बारे में आकड़े एकत्रित किये और जिला कलैक्टर की रिपोर्टों का संकलन किया। इस प्रकार आयोग ने दंगों के कारणों को सरकार के समक्ष प्रस्तुत किया था तांकि सरकार उनकी तरफ ध्यान दे सके और आगे से दंगे न हो सके।

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