CHAPTER -8 HIS CLASS12TH धार्मिक इतिहास : भक्ति-सूफी परंपरा

भूमिका


भक्ति मार्ग कोई नया मार्ग नहीं था। इस का उल्लेख उपनिषदों और भगवद्गीता में भी आता है। कुछ काल के लिए यह मत लुप्त सा हो गया था। 8वीं सदी से 18वीं सदी के दौरान भारतीय इतिहास में भक्ति आन्दोलन, इस्लाम एवं सूफी आन्दोलन ने प्रमुख भूमिका निभाई। दक्षिण भारत में अलवारों और नयनारों को भक्ति आन्दोलन का संस्थापक माना जाता है। इन्होंने समाज में प्रचलित सामाजिक धार्मिक कुरीतियों का खण्डन किया। इस का ज्ञान हमें अनेक साहित्यक स्रोतों से मिलता है। संत कवियों की रचनाएँ जन साधारण को क्षेत्रीय भाषाओं में मौखिक रूप में रची गई थी तथा बाद में उन संतों के अनुयायियों ने संकलित किया। हिन्दुओं और मुसलमानों में एकेश्वरवाद और भातृ भाव और समानता का प्रभाव पड़ा। दोनो धर्मों के विद्वानों ने उनको मेल जोल और प्रेम से रहने की शिक्षा की धार्मिक कर्मकाण्डो, झूठे आडम्बरो, जात पात और मूर्ति पूजा का घोर विरोध किया। एक ईश्वर की पूजा करने का प्रचार किया। एक ईश्वर की प्रेमपूर्वक पूजा करने का मार्ग ही भक्ति मार्ग कहलाता है।

अधिगम्य उद्देश्य ( Learning Objective )इस अध्याय का अध्ययन करने के पश्चात आप धार्मिक विश्वास और तांत्रिक पद्धति में भेद और संघर्ष के बारे में आप को जानकारी मिलेगी। भक्ति आन्दोलन के उदय में आपको गुरुनानक देव जी, कबीर और आम सन्तो की शिक्षाओं की जानकारी प्राप्त कर सकोंगे।मुहम्मद साहिब जी की शिक्षाओं और इस्लाम मत के फैलने के बारे में पता चलेगा। सूफी मत की शिक्षाएँ, प्रभाव और सूफी सिलसिलों में किस प्रकार चिश्ती सिलसिला और सुहारावरदी सिलसिला का उदय हुआ इस की जानकारी मिलेगी।

धार्मिक विश्वास 

           1 पूजा प्रणालियों का समन्वय :

इतिहासकारों के विचारानुसार इस काल में भारत में दो प्रकार की प्रक्रियाएँ प्रचलित थीं।

(1) एक प्रक्रिया ब्राह्मणीय विचारधारा इस का प्रचार पौराणिक ग्रन्थों की रचना संकलन और परीक्षण: द्वारा हुआ। यह ग्रन्थ सरल संस्कृत भाषा में थे, जो स्त्रियों एवं शुद्रों द्वारा भी प्रयोग में लाए जाते थे। 

(2) दूसरी प्रक्रिया स्त्रियों, शूद्रों एवं अन्य सामाजिक वर्गों के विश्वासों एवं प्रधाओं को ब्राह्मणों द्वारा स्वीकार किया जाना और उसे एक नया रूप प्रदान करना। वास्तव में समाजशास्त्रियों का वह विश्वास है कि संपूर्ण उपमहाद्वीप में अनेक धार्मिक विचारधाराएँ एवं पद्धतियां महान संस्कृत पैराणिक परम्परा लघु परम्परा के मध्य हुए लगातार पारस्परिक क्रिया का परिणाम है।

पूजा प्राणलियों के समन्वय का सबसे बड़ा उदाहरण हमें उड़ीसा के पुरी से मिलता है। यहां के मुख्य देवता जगन्नाथ जो कि विष्णु का ही एक रूप था उसे प्रस्तुत किया गया। मन्दिरों में जगन्नाथ को मूर्ति उसकी बहन सुभद्रा तथा भाई बलराम के साथ दर्शायी जाती थी। इस काल में विष्णु की पत्नी लक्ष्मी, शिव की पत्नी पार्वतों और बौद्ध देवी मारिचों की पूजा का काफी प्रचलन रहा।


 भेद और संघर्ष: तांत्रिक पद्धति

देवी की आराधना पद्धति को तांत्रिक के नाम से जाना जाता है। तांत्रिक पूजा पद्धति उपमहाद्वीप के कई भागों में प्रचलित थी। इस में स्त्री और पुरुष दोनों ही शामिल हो सकते थे। इसके अतिरिक्त कर्मकांड करते समय वर्ग और वर्ण का भेदभाव नहीं किया जाता। अगामी समय में इन विश्वासों का वर्गीकरण हिन्दू के रूप में किया गया। यदि हम वैदिक और पौराणिक परंपरा के बीच तुलना करें तो यह विषमता और भी अधिक दिखाई देती है। इस मे इन्द्र अग्नि सोम आदि का महत्व कम हो गया था। परन्तु विष्णु, शिव और देवो की पूजा का प्रचलन इस काल में भी जारी रहा।

इस में कभी कभी संघर्ष की स्थिति पैदा हो जाती थी। वैदिक परम्परा को मानने वाले उन विचारों को निन्दा करते थे जो ईश्वर की पूजा के लिए मन्त्रों के उच्चारण और यज्ञों के संपादन से परे थे। वे विष्णु और शिव को सर्वोच्च मानते थे। प्रायः अन्य परम्पराओं जैसे बौद्ध धर्म और जैन धर्म से भी सम्बन्ध तनावपूर्ण हो जाते थे। इसके बावजूद संघर्ष उदाहरण बहुत कम मिलते थे।

 प्रारंभिक भक्ति परपराएँ 

1. अलवार  :- विष्णुमत को मानने वाले अलवार कहलाएं उन्होंने दक्षिण भारत में वैष्णवमत को लोकप्रिय बनाने में बड़ा योगदान दिया। अलवार संतो में 12 सन्त बहुत प्रसिद्ध थे। ये विष्णु के भक्त थे।

2. नयनार (The Nayannars) शैव मत को मानने वाले नयनार कहलाए। दक्षिण भारत में शैव मत को लोकप्रिय बनाने के बड़ी भूमिका निभाई। नयनार शिव के भक्त थे नयनार सन्तों की कुल संख्या 63 बताई गई थी।

भक्ति आन्दोलन 

भक्ति आन्दोलन का अभिप्राय  'भक्ति' शब्द संस्कृत के"भज" धातु से बना है जिस का अर्थ है " भजन करना" अर्थात भक्ति करना है। इस आन्दोलन के सभी प्रचारक मुक्ति प्राप्त करने के लिए भक्ति के महत्व पर बल देते थे। इस कारण इस आन्दोलन को भक्ति आन्दोलन कहा जाने लगा।


भक्ति आन्दोलन की उत्पत्ति के कारण

1. हिन्दू धर्म में बुराइयाँ (Evils in the Hinduism) :- समय के साथ हिन्दू धर्म में बहुत सी बुराइयों आ गई। ऊंच-नीच का भेदभाव बहुत बढ़ गया था। निम्न जाति के लोगों की दशा बड़ी खराब थी। लोग अन्धविश्वासों, रीती-रिवाज़ो और जादू टोनो में विश्वास करने लगे थे। लोग इन बुराइयों से तंग आ चुके थे।


2. इस्लाम खतरा (Danger from Islam) :- इस्लाम धर्म के कारण निम्न जाति के लोग इस्लाम धर्म में जाने लगे। वे इस्लाम धर्म में समानता के सिद्धान्त और एक ईश्वर में विश्वास आदि गुणों से प्रभावित होकर इस्लाम धर्म की ओर जाने लगे। इस खतरे को समाप्त करने तथा हिन्दु धर्म की रक्षा के लिए भक्ति आन्दोलन शुरु हुआ।


3.महान सुधारकों का जन्म (Birth of Great Reformers) :- मध्यकाल में भारत के भिन्न-2 भागों में कई महान सुधारकों ने जन्म लिया। रामानन्द, रामानुज, शंकरदेव, चैतन्य महाप्रभु, नामदेव,जयदेव, कबीर, गुरु नानक देव आदि समाज सुधारकों ने हिन्दु धर्म की बुराइयों को दूर किया और भक्ति मार्ग का प्रचार किया।

4. हिन्दू-मुस्लिम एकता ( Hindu Muslim Unity) :- कई मुसलमानों ने हिन्दु स्त्रियों से विवाह सम्बन्ध कायम किए। इन स्त्रियों ने अपने धर्म की परम्पराओं को अपनाए रखा। जिस से मुसलमानों को हिन्दू परम्पराओं को समझने का मौका मिला। हिन्दु-मुसलमानों में एकता कायम हुई और आपसी प्यार बढ़ा।


 भक्ति आन्दोलन की विशेषताएँ (शिक्षाएँ)

1. एक ईश्वर में विश्वास (Faith in One God) :- भक्ति आन्दोलन के नेताओं ने एक ईश्वर पर विश्वास रखने पर बल दिया हमे एक ईश्वर में विश्वास रखना चाहिए। ईश्वर, अल्लाह, विष्णु, राम आदि अनेक है पर ईश्वर एक ही है। वह सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान है।

2. गुरु में विश्वास (Faith in Guru) :- सभी भक्त कवियों और विद्वानों ने गुरु भक्ति पर बहुत ब दिया है। गुरु के बिना आध्यात्मिक ज्ञान और ईश्वर की प्राप्ति कठिन है। गुरु सभी प्रकार के कष्टों से मुक्त करता है।

3. आत्म-सर्मपण (Self-Surrender) :- उनके मतानुसार मनुष्य को स्वयं को पूर्ण रूप में ईश्वर के प्रति समर्पण कर देना चाहिए। प्रभु की कृपा मनुष्य के सब कार्य पूरे हो जाते है और मनुष्य मोक्ष से प्राप्त कर लेता है परन्तु मनुष्य को काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार का नाश करना चाहिए।

4 पवित्र जीवन पर बल (Stress on Pure Life) :- मनुष्य को सदा सादा और पवित्र जीवन व्यतीत करना चाहिए उसे सच बोलना चाहिए। गरीबों और दुखियों की सेवा करनी चाहिए।

5 जाति प्रथा में अविश्वास (Disbelief in Caste System) :- भक्ति आन्दोलन के प्रचारकों ने जाति-पाति का डट कर विरोध किया। सभी लोगो को समानता में विश्वास पर बल दिया कि कोई भी व्यक्ति जाति द्वारा बड़ा नहीं होता है वह तो केवल अपने कर्मों द्वारा ही बड़ा होता है। मनुष्य को मोक्ष उसके कर्मों के अनुसार मिलेगा न कि जाति के अनुसार||

6. मूर्ति पूजा में अविश्वास (Disbelief in Idol Workship) :- भक्ति आन्दोलन के प्रचारकों ने मूर्ति पूजा के विरूध प्रचार किया। मन्दिरों में देवताओं की मूर्तियों रख कर उनको पूजा व्यर्थ है। मनुष्य को एक ईश्वर की भक्ति करनी चाहिए जिस का कोई आकार नहीं है। सच्चे मन से ईश्वर की भक्ति करने से मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है।


 वैष्णव आन्दोलन (दक्षिण के महान प्रचारक )

1. रामानुज (Ramanuja) :-


रामानुज दक्षिण भारत में वैष्णव मत के महान प्रचारक थे। उनका जन्म 1017 में मद्रास में पेरन्भ्वदूर में हुआ। 1137 ई० में उन की मृत्यु हो गई। वह तमिल ब्राह्मण थे। उन के अनुसार संसार की उत्पत्ति होने से पहले भी विष्णु थे और वह सर्वशक्तिमान थे। विष्णु की आज्ञा से ही समस्त सृष्टि की रचना हुई। उन्होंने मोक्ष प्राप्ति के लिए परमात्मा भक्तिपर बल दिया। उन्होंने जाति प्रथा का खण्डन किया। उन की सरल शिक्षाओं का लोगों के दिलों पर गहरा प्रभाव पड़ा उनके जीवन काल में ही उनके अनुयायियों की संख्या 10,000 तक पहुंच थी।


2. रामानंद (Rama Nanda) :-


राम भक्ति के विचार को प्रचलित करने वालों में रामानंद जी को विशेष स्थान प्राप्त है। वह ब्राह्मण परिवार से सम्बन्ध रखते थे। वे गद्यवानंद के अनुयायी थे। उन्होंने जाति प्रथा, अन्धविश्वासों आदि का खण्डन किया। उन्होंने अपनी सरल शिक्षाओं का प्रचार हिन्दी भाषा में किया।

3 शंकरदेव (Shankaradeva):-

शंकरदेव वैष्णव धर्म के प्रमुख प्रचारक थे। उनका जन्म 788 ई० मालावार के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। हिन्दु धर्म में फैली कुरीतियों को दूर करने के लिए बहुत प्रयास किए। उन्होंने रीति-रीवाजों, मूर्ति पूजा और जाति प्रथा का विरोध किया उन्होंने ईश्वर की भक्ति पर बल देने को कहा। उन्होंने भारत के चारों कोनों जगन्नाथ पुरी, द्वारिका पुरी, बद्रीनाथ और शृंगेरी में जो चार मठ स्थापित किए। वे आज तक हिन्दु धर्म की बड़ी सेवा कर रहें है। 32 वर्ष की आयु 820 ई० मे उनका देहांत हुआ।

4. वल्लभाचार्य (Vallabhacharya) :-

इन का जन्म 1479 ई० मे बनारस के समीप एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। उन्होंने कृष्णभक्ति का खूब प्रचार किया उन्होंने महाराष्ट्र और राजस्थान में वैष्णव मत का काफी प्रचार किया। उन्होंने राधाकृष्ण की भक्ति पर बल दिया और वल्लभाचार्य सम्प्रदाय की स्थापना की। वे ईश्वर के अतिरिक्त और किसी को नहीं मानते थे।

5. मीराबाई (Mirabai) :-


मीराबाई का जन्म 1498 ई० मे हुआ। 1516 ई० मीराबाई का विवाह उसकी इच्छा के विरूद्ध कर दिया परन्तु वह अपना अधिकांश समय कृष्ण भक्ति में व्यतीत करने लगी। मीराबाई राजभवन को त्याग कर वृदांवन तथा बाद में द्वारिका चली गई। वहां वह कृष्ण भक्तिः मे लीन रही।

 सन्त आन्दोलन (The Saint Movement


नाम देव (Namdev) :-

नाम देव महाराष्ट्र के सबसे विख्यात संत एकनाथ तुकाराम महाराष्ट्र में भक्ति प्रचार के लिए बड़ा योगदान दिया। उन्होंने समाज फैले अन्धविश्वास विरुद्ध प्रचार किया। उन्होंने तीर्थ यात्रा, मूर्ति पूजा, यज्ञ, बलि, संस्कार तथा वृत रखने का जोरदार खण्डन किया। उन्होंने को पवित्र जीवन और मातृभाव का भी प्रचार किया। उन्होंने मराठी, हिन्दी तथा पंजाबी भाषा भजनो की रचना की। उनके शब्दों को गुरु ग्रन्थ साहिब सम्मिलित किया गया।


गुरु रविदास जी (Guru Ravidas)

गुरु रविदास जी का जन्म बनारस हुआ। रविदास एक ईश्वर की भक्ति करते उनके अनुसार ईश्वर (हरि) सर्वव्यापक तथा वह सबके हृदय करता है। मनुष्य गृहस्थ जीवन व्यतीत करते हुए ईश्वर को सकता उन्होंने मूर्ति तथा का घोर विरोध किया। एकता समर्थक गुरु रविदास वाणी शामिल की गई हैं।


कबीर (Kabir) :-

कबीर एक महान संत प्रचारक उनका जन्म 1398 बनारस हुआ। उनका पालन पोषण एक जुलाहे किया। गृहस्थ जीवन रहते अधिकांश समय भक्ति करते वह रामानन्द शिष्य संत कबीर उपदेश बहुत सरल स्पष्ट उन्होंने ईश्वर भक्ति बल दिया। उनके अनुसार अल्लाह राम एक परमात्मा परमात्मा मस्जिद, मन्दिर बनारस, मक्का रहता मनुष्य हृदय वास करता कबीर समाज प्रचलित धार्मिक सामाजिक कुरीतियों का खण्डन किया। उन्होंने पूजा, रखना उपवास रखना, टोनो विश्वास रखने आदि विरोध जाति विवाह, विरूद्ध उन्होंने धार्मिक सहनशीलता वह भाईचारे का संदेश दिया गया लोगों को सादा व पवित्र जीवन व्यतीत करने के लिए प्रेरित किया गया 


 गुरु नानक (Guru Nanak Dev


पंजाब में भक्ति लहर के प्रमुख नेता गुरु नानक देव जी थे वे सिख धर्म के संस्थापक थे।


गुरु नानक जीवन :-गुरु नानक देव जी का जन्म 1469 ई० तलवड़ी के ननकाना साहिब में हुआ था। उनके पिता का नाम मेहता कालू चंद तथा माता का नाम तृप्ता देवी था। 14 वर्ष की आयु के उनका विवाह सुलक्षणी नामक कन्या से कर दिया गया। उन्होंने शीघ्र ही भाषा, ज्ञान, गणित सीख लिया वे ईश्वर ज्ञान की प्राप्ति के इच्छुक थे। य वर्ष की आयु में सुल्तानपुर में सत्य की प्राप्ति हुई। सत्य प्राप्ति के बाद वे सतनाम का प्रचार करने के लिए लम्बी-लम्बो यात्राओं पर निकल पड़े जिन्हें आमतौर पर उदासियां कहा जाता है। उन्होंने हिन्दुओं, मुसलमानों व बौद्धों के अनेक तीर्थ स्थानों के दर्शन किए। गुरु नानक देव जी ने अपने विचार पंजाबी भाषा के शब्द के माध्यम से लोगों के सामने रखे। अपने उपदेशों के कारण ही हिन्दुओं और मुसलमानों में लोकप्रिय बन गए।


 शिक्षाएं 
1. ईश्वर एक है वह सर्वशक्तिमान और महान है। वह निराकार और सर्वव्यापक है।

2. उन्होंने समानता पर बल दिया कि सभी मनुष्य समान है हमे किसी से कोई भी भेदभाव नहीं करना
चाहिए।
3 उन्होंने मूर्ति पूजा का घोर विरोध किया है।
4.गुरु नानक देव जो ने जाति-पाति का भी विरोध किया।
5. उन्होंने यज्ञ, हवन, बलि और व्यर्थ के कर्मकाण्डो का भी घोर विरोध किया।
6.  उन्होंने गुरु के महत्व पर अधिक बल दिया।

गुरु नानक देव जी के उतराधिकारी 

गुरु नानक देव जी के बाद सिखों के नौ अन्य गुरु हुए। गुरु अंगद देव जी, गुरु अमर दास जो, गुरु राम दास जी, गुरु अर्जुन देव जी, गुरु हरगोबिंद जी, गुरु हरराय जी, गुरु हरकिशन जो, गुरु तेग बहादुर जी, गुरु गोबिन्द सिंह जी। गुरु गोबिन्द सिंह जी ने 1699 ई० में खालसा पन्थ की स्थापना की।

भक्ति आन्दोलन का प्रभाव 


धार्मिक प्रभाव 

1. भक्ति आन्दोलन से हिन्दु धर्म में फैली बुराइयाँ दूर हुई। 
(2) भक्ति आन्दोलन से बौद्ध धर्म के पतन को काफी धक्का लगा।
(3) भक्ति आन्दोलन से हिन्दू धर्म के लोग इस्लाम धर्म कबूलने से बच गए। 
(4)गुरु नानक देव जी ने सिख धर्म की स्थापना को जिससे सिख धर्म का उदय हुआ।
(5) छुआछूत और जात-पात का भेदभाव मिट जाने से समानता और भातृभाव की भावना बढ़ी। 
सामाजिक प्रभाव 
(1) भक्ति आन्दोलन में लोगों की अन्धविश्वास की भावना कम हुई।
(2)भक्ति आन्दोलन के प्रचार में एकता पर बल दिया जिससे द्वेष की भावना दूर हुई।
(3) भक्ति आन्दोलन से नैतिकता का बोलबाला बढ़ा।

सांस्कृतिक प्रभाव 
(1) भक्ति आन्दोलन से बंगाली, गुजराती, संस्कृत, मराठी, पंजाबी, हिन्दी, उर्दू आदि भाषाओं का विकास हुआ अनेक ग्रन्थ लिखे गए।
(2) इससे देशी भाषा साहित्य का विकास हुआ। 
(3) भक्ति आन्दोलन से हिन्दू मुस्लिम कला का विकास हुआ जिससे सहनशीलता का समावेश हुआ।
: राजनीतिक प्रभाव 
1. भक्ति आन्दोलन से दयालु और न्यायी शासक हुए शेरशाह सूरी और अकबर जैसे मुसलमान शासकों ने हिन्दु प्रजा से न्यायप्रिय व्यवहार किया और उनसे धार्मिक सहनशीलता की नीति अपनाई।

2. भक्ति आन्दोलन से सिक्खों और मराठों का उदय हुए। पंजाब में गुरु नानक देव जी और गुरु गोबिंद सिंह को काफी योगदान दिया। महाराष्ट्र में नामदेव, तुकाराम, रामदास आदि भक्तों ने राष्ट्रीता की भावना पैदा कर दी।

इस्लाम 
 हजरत मुहम्मद साहिब का जीवन व शिक्षाए 

जीवन :- मुहम्मद साहिब का जन्म 570 ई० में अरब देश के मक्का में बाबा नानक स्थान पर हुआ। बचपन में हो उनके माता-पिता का देहान्त हो गया था। मुहम्मद साहिब धार्मिक प्रवृति के व्यक्ति थे। वे प्रभु भक्ति में लीन रहते थे। वे हीरा पर्वत पर एक गुफा में बैठ कर प्रभु का ध्यान करने लगे। 40 वर्ष की आयु में उन्हें ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त हुआ।

ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त होने के बाद उन्होंने मूर्ति पूजा और अन्धविश्वासों का घोर विरोध करना शुरु कर दिया। मक्का निवासियों ने इस पर मुहम्मद साहिब का विरोध किया। 622 ई० मे मुहम्मद साहिब अपने साथियों सहित मक्का छोड़ कर मदीना चले गए इस घटना को हिजरत कहते है। इसी तिथि (2 जुलाई 622) ई०) से मुसलमानों का हिजरी सन् शुरु होता है। 8 जून 632 ई० को वे परलोक सिधार गए उन्होंने अपनी
शिक्षाओं को एक पुस्तक में लिख दिया। जो 'कुरान' के नाम से प्रसिद्ध है।

मुहम्मद साहिब (पैगम्बर मोहम्मद) की शिक्षाएँ या इस्लाम धर्म की शिक्षाएं ---



1. संस्थापक:

इस्लाम धर्म के संस्थापक हज़रत मुहम्मद साहब थे।

इनका जन्म 571 ईस्वी में मक्का (सऊदी अरब) में हुआ।



2. एकेश्वरवाद (Tawhid):

इस्लाम धर्म केवल एक ईश्वर – अल्लाह को मानता है।

अल्लाह सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ और दयालु है।

मूर्तिपूजा का विरोध किया गया है।



3. पैग़ंबरों पर विश्वास (Prophets):

अल्लाह ने मानवता को सही मार्ग दिखाने के लिए अपने दूत (पैग़ंबर) भेजे।

हज़रत मुहम्मद साहब अंतिम पैग़ंबर माने जाते हैं।



4. पवित्र ग्रंथ (The Holy Quran):

इस्लाम का पवित्र ग्रंथ कुरआन शरीफ़ है।

इसमें 114 सूरा (अध्याय) हैं।

🕋 इस्लाम धर्म की शिक्षाए
अल्लाह एक है गॉड इस वन पैगंबर मोहम्मद ने अपनी शिक्षाओं पर बार-बार इस बात पर बल दिया कि अल्लाह एक है वह सर्वोच्च एवं सर्वशक्तिमान है वह जो चाहे वह कर सकता है वह संसार की रचना करता है वह इसकी पालना करता है वह जब चाहे इसे नष्ट कर सकता है संसार की सभी वस्तुएं उसके नियंत्रण में है।

2. इस्लाम के पांच स्तम्भ 


(1) कलमा पढ़ना 
 प्रत्येक मुसलमान का यह धार्मिक कर्तव्य है कि वे कलमा पढ़े वे अल्लाह पर विश्वास रखे।

2 नमाज
प्रत्येक मुसलमान दिन में पांच बार  पढ़े।

(3 )रोजा
 मुहम्मद साहिब ने अपने अनुयायियों को कहा कि वे रमजान के महीने में व्रत (रोजा) रखें)

4 )  (हज़)
प्रत्येक मुसलमान अपने जीवन काल में कम से कम एक बार मक्का की यात्रा (हज़) करें।

5 ) जकात
प्रत्येक मुसलमान अपनी नेक कमाई का दान दें अथवा जकात देता रहे।

3. मूर्ति पूजा का विरोध: मुहम्मद साहिब ने मूर्ति पूजा का घोर विरोध किया।

3.. मुहम्मद साहिब ने कर्म सिद्धान्त पर बल दिया। 
4. मुहम्मद साहिब ने जात-पात, ऊंच-नीच का भी विरोध किया।

5 नैतिक सिद्धांत 
कुरान में अनेक नैतिक नियमों का वर्णनकया गया है 
सदैव सत्य बोलो अपने माता-पिता का सम्मान करो अपने अतिथियों का आदर करो अपने छोटों से प्यार करो सदा एवं पवित्र जीवन व्यतीत करो सदैव पापों से दूर रहो लालच एवं घृणा मत करो किसी की निंदा मत करो किसी को धोखा एवं कष्ट ना दो गरीबों नाथन और बीमारी की सेवा करो नशीले पदार्थों से दूर रहो। 
6 सामान्य में विश्वास इस्लाम में समानता को विशेष महत्व दिया गया है इसके अनुसार सभी एक अल्लाह के बच्चे हैं सभी भाई बहन हैं इस्लाम में अमीर गरीब जाति भाषा लिंग आदि के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता सभी को एक समान अधिकार दिए गए

क़ुरआन
 इस्लाम धर्म का पवित्र ग्रंथ है। इसे अरबी भाषा में लिखा गया है इसका संकलन 650 ईस्वी में कियागयसे
 अल्लाह का वचन माना जाता है, जो पैग़ंबर हज़रत मुहम्मद साहब को फ़रिश्ता जिब्राईल के माध्यम से प्राप्त हुआ था। क़ुरआन में 114 सूरा (अध्याय) और 6,000 से अधिक आयतें (श्लोक) हैं। इसमें मनुष्य के जीवन से संबंधित धार्मिक, नैतिक, सामाजिक और कानूनी शिक्षाएँ दी गई हैं।

क़ुरआन मानवता को सत्य, न्याय, समानता, दया और शांति का मार्ग दिखाता है। इसमें ईश्वर (अल्लाह) की एकता पर बल दिया गया है और मूर्तिपूजा का विरोध किया गया है। यह मुसलमानों के लिए जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मार्गदर्शक का कार्य करता है। मुसलमान इसे न केवल पढ़ते हैं, बल्कि उसके निर्देशों के अनुसार जीवन जीने का प्रयास करते हैं।

संक्षेप में, क़ुरआन इस्लाम धर्म की आत्मा है, जो मनुष्य को नैतिक, धार्मिक और सामाजिक रूप से एक उत्तम जीवन जीने की प्रेरणा देती है।

इस्लाम  के शीघ्र फैलने के कारण 
1. इस्लाम धर्म में समानता और भातृ भाव था।

2 एक सर्वशक्तिमान ईश्वर की उपासना का सिद्धान्त लोगों को बहुत पसन्द आया। 
3. इस्लाम धर्म के अनुयायियों के अपने धर्म को फैलाने का बड़ा जोश था।
4. मुसलमान शासकों ने भी इस्लाम धर्म को फैलाने में बड़ा योगदान दिया।
5. इस्लाम धर्म ने के बारे लोगों को सभ्य और सुखो बनाने में बड़ा योगदान दिया है।

भारत में इस्लाम धर्म का उत्थान 

भारत में इस्लाम के प्रसार का श्रेय मुहम्म दिन कासिम को जाता है। महमूद गजनवी और मुहम्मद गौरी ने भी इस्लाम का प्रचार किया। इस प्रकार 18 वीं शताब्दी में अनेक क्षेत्रीय स्वतन्त्र राज्यों की स्थापना हुई। इन में से भी शासक इस्लाम को मानने वाले थे। 
उलेमा (Ulma) :- उलेमा इस्लाम के ज्ञाता होते थे। उन्हें इस्लाम का संरक्षक समझा जाता था।
मुसलमान शासक भी उलेमा के मार्गदर्शन पर चलते थे। 
शरिया (Sharia) :- शरिया से अभिप्राय है इस्लामी कानून यह कुरान, हदीस, कियास एवं इजमा पर आधारित है। हदीस (Hadis) :- हदीस से अभिप्राय है पैगंबर मुहम्मद से जुड़ी परंपराएँ।

कियास (Qiyas) :- कियास से अभिप्राय है सदृशता के आधार पर तर्क ।

इजमा (Ijma) :- इजमा से अभिप्राय है समुदाय की सहमति।

जिम्मी (Zimmi) :- जिम्मी संरक्षित श्रेणी को कहा जाता था। जिम्मी के लोग थे, जो उद्घटित अर्थात
प्रकाशित ग्रन्थों को मानने वाले थे। इन लोगों को जजिया कर के बदले मुस्लिम नियमों का पालन करने
से छूट दी जाती थी।

 सूफी मत (Sufism )

सूफी का अर्थ (Meaning of Sufi) : सूफी मत से अभिप्राय है इस सम्बन्ध में विद्वानों के विचारों में अलग-2 मतभेद है। कुछ कहते हैं कि वे साफ़ हृदय वाले थे। कुछ विद्वानों के अनुसार के परमात्मा के दरबार में प्रथम पंक्ति में खड़े होते थे। कुछ विद्वान कहते हैं कि वे सूफ (ऊन) के कपड़े पहनते थे।

सूफीमत की शिक्षाएँ 


1. एक ईश्वर में विश्वास  :- सूफी संतों के विश्वास था कि ईश्वर एक है और वह सर्वव्यापक है वह प्रत्येक स्थान पर है।
2: ईश्वर की भक्ति पर बल  :- सूफीयों के अनुसार मनुष्य को संसार के सुख दुख त्याग कर ईश्वर भक्ति में लग जाना चाहिए। इसी में ईश्वर प्राप्ति होती है। सूफी ईश्वरत पहुंचने का साधन भक्ति और प्रेम को मानते हैं।
3. आत्म समर्पण :- सूफी सन्तो का मत था कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए मनुष्य अहंकार का नाश करे और अपने आप को पूर्ण रूप से ईश्वर के हवाले कर दे।
4. गुरु का महत्व  :सूफी मत में गुरु (पीर) को अधिक महत्व दिया है। एक सच्चा पौर (गुरु) ही अपने शिष्य (मुरीद) को प्रभु से मिला सकता है।
5 शुद्ध जीवन  :- सूफी अपना शुद्ध जीवन व्यतीत करते थे वे व्यर्थ के रोती-रिवाजो कर्म काण्डो और बाह्य आडम्बरों को कोई महत्व नहीं देते थे। 
6. संगीत से प्रेम  :- सूफी सन्त संगीत के बड़े प्रेमी थे। उस के मतानुसार मनुष्य संगीत के माध्यम से ईश्वर की भक्ति और ईश्वर प्रेम में लीन होता है।

 सूफी सिलसिले

भारत में दो सूफी सिलसिलों की जड़े मजबूत हुई। एक चिश्तो सिलसिला और दूसरा सुहारावरदी सिलसिला।

1. चिश्ती सिलसिला  :- इस सिलसिले की स्थापना अवु इशाक के मध्य अफ़गानिस्तान के शहर चिश्ती में की थी। भारत में इस सिलसिले की स्थापना 12वीं शताब्दी में शेख मुइनुद्दीन चिश्तों ने की थी। इस सिलसिले के प्रसिद्ध शेख इस प्रकार हैं।

(i) शेख मुइनुद्दीन चिश्ती  :- शेख मुइनुद्दीन चिश्ती भारत में चिश्ती सिलसिले के संस्थापक थे। वह अजमेर में बस गए थे। इन्होंने निर्धनों और जरूरतमंदों की सहायता की। जिससे बड़ी संख्या में लोग उनके साथ जुड़ गए। लोग उन को प्रेम से गरीब नवाज कह कर बुलाते थे। 1236 ई० में उनकी मृत्यु हो गई और उनका अजमेर में मकबरा बनाया गया जहाँ लोग अपनी मन्नतों को पूर्ण करने के लिए एकत्रित होते है।

(ii) शेख कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी  :- यह शेख मुइनुद्दीन चिश्ती के प्रसिद्ध शिष्य थे। वह फरगना से भारत आए। कुछ दिन मुल्तान ठहरने के बाद दिल्ली आ गए। दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश ने उनका खूब स्वागत किया और उनके महल के पास खान्काह बनाने की पेशकश की परन्तु उन्होंने उनकी पेशकश ठुकरा दी क्योंकि वह राजनीति से दूर रहना चाहते थे। इल्तुतमिश सप्ताह में दो बार उनसे मिलने जाते थे। इल्तुतमिश ने उन्हें 'शेख उल इस्लाम का उच्चतम पद प्रदान किया परन्तु उन्होंने अस्वीकार कर दिया। 1235 ई० में वे संसार छोड़ गए।

(iii) शेख फरीदुद्दीन गंज-ए-शकर:- शेख फरीदुद्दीन गंज-ए-शकर बाबा फरीद के नाम से जाने जाते हैं। वह शेख कुतुबद्दीन बख्तियार के शिष्य थे। इनके प्रचार का केन्द्र अजोधन (पाकिस्तान) था। उन्होंने लोगों को प्यार का
 संदेश दिया। बाबा फरीद खां के कुछ शब्द सिखों के आदि ग्रन्थ में शामिल किए गए हैं। 1265 ई० में उनकी मृत्यु हो गई।

(iv) शेख निजामुद्दीन औलिया :- यह शेख फरीद जी के प्रसिद्ध शिष्य थे। यह सुल्तान हल-मरीख तथा महबूब-ए-इलाही के रूप में भी जाते जाते थे। वह पवित्र जीवन और मानव प्रेम पर बल देते थे। उनके विचारों से प्रभावित होकर बहुत से लोग उनके शिष्य बन गए। उनके शिष्यों में अमीर खुसरों सबसे प्रसिद्ध था। दिल्ली में उनकी दरगाह प्रसिद्ध तीर्थ स्थान बन गई।

(v) शेख नसीरुद्दीन चिराग-ए-देहली  :- यह शेख निजामुद्दीन औलिया के शिष्य एक उनके उत्तराधिकारी थे। वे मानवता की सेवा मे अपना जीवन व्यतीत करते थे। वह सुल्तानों के दरबारों से जाने से बचते रहे। बहुत से लोग उनके शिष्य बन गए। 1356 ई० में उनकी मृत्यु हो गई। वह चिश्ती सिलसिले के अन्तिम महान शेख थे।

सुहरावर्दी सिलसिले

शेख बहा-उद-दीन जकरिया  :- शेख बहा-उद दीन जकरिया एक प्रसिद्ध सूफी सन्त थे उन्होंने भारत में मुल्तान में सुहरावर्दी सिलसिले की स्थापना की। उनके विचार चिश्ती सिलसिले से बहुत भिन्न थे। वे राजनीति में दिलचस्पो लेते थे। उनका सुल्तानों, अमीरो, सरदारों के साथ बहुत सम्बन्ध था। वह इस्लामी कानूनों का कठोरता से पालन करने के पक्ष में थे। उनके प्रयासों के कारण सुहरावद सिलसिला शीघ्र ही लोकप्रिय हो गया और बहुत से लोग उनके शिष्य बन गए। 1262 ई० में मुल्तान में उनकी मृत्यु हो गई।


 सारांश


भक्ति मार्ग में हमे अनेक सन्तों की जोवनी व उनकी शिक्षाओं के बारे में पता चलता है इन में उपनिषदों और भगवदगीता का उल्लेख आता है। सन्तों के समाज में प्रचलित झूठे आडम्बर व्यर्थ के रीति रिवाजो, जातपात, छुआछूत, मूर्तिपूजा का जोर दार खण्डन किया। उन्होंने एकेश्वरवाद पर जोर दिया। सभी धर्मों के लोगों को मिलकर रहने की शिक्षा दी। दक्षिणी भारत के अलवारों और नयनारों को तो भक्ति आन्दोलन का संस्थापक माना जाता है। संत कवियों ने अनेक क्षेत्रीय भाषाओं में रचनाएँ रची। गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं से पता चलता है कि कौन प्रभु तक पहुंचा जाता है कबीर जी ने तो मूर्तिपूजा और जात पात का विरोध करते हुए भातृभाव और समानता पर बल दिआ मुहम्मद साहिब जी की शिक्षाओं और इस्लाम धर्म को जानकारी मुसलमानों के पवित्र ग्रन्थ कुरान' में मिलती है। सूफी सन्तों ने लोगों को संगीत के माध्यम से प्रभु तक पहुंचने का मार्ग बताया है। सूफी सिलसिलों में चिश्ती सिलसिला और सुहारावरदी ने लोगों को जागृत करने में बड़ी भूमिका निभाई है। शेख मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह अजमेर में आज भी लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। सुहरावर्दी सिलसिले ने भी लोगों में अन्धविश्वास की भावनाओं को दूर किया। इस प्रकार इन सन्तों ने लोगों में फैली अन्ध-विश्वास की भावनाओं को दूर कर लोगों में प्रभु भक्ति का मार्ग दिखाया।


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