CHAPTER-5 यायावर साम्राज्य CLASS 11TH HISTORY

 CHAPTER-5  यायावर साम्राज्य 

यायावरिता का स्वरूप (The Nature of Nomadism)


मंगोल मध्य एशिया के आधुनिक मंगोलिया प्रदेश में रहने वाला एक यायावर समूह था। यह समूह विभिन्न कबोलों में विभाजित था। इनमें प्रमुख थे मंगोल, तातार, नेमन एवं खितान। 12वीं शताब्दी में चंगेज खों के उत्थान से पूर्व मंगोल पशुपालक एवं शिकार संग्राहक थे। वे तंबुओं में निवास करते थे। उनका प्रमुख भोजन दूध एवं माँस था। उनका समाज अनेक पितृपक्षीय वंशों में विभाजित था। समाज में स्त्रियों की दशा संपूर्ण रूप से अच्छी नहीं थी। उस समय विभिन्न कबीलों में आपसी लड़ाइयाँ चलती रहती थीं वास्तव में लड़ाइयाँ एवं लूटमार करना मंगोल जीवन शैली का एक अभिन्न अंग बन चुका था। उस समय मंगोलों ने चीन के साथ व्यापारिक संबंध स्थापित किए हुए थे।

1. यायावरी कबीलों के प्रमुख व्यवसाय--- 12वीं शताब्दी में यायावरी कबीलों का प्रमुख व्यवसाय पशुपालन था। उस समय मंगोलिया में अनेक अच्छी चरागाहें थीं। अल्लाई पहाड़ों की बर्फीली चोटियों से निकलने वाले सैंकड़े झरनों तथा ओनोन (Onon) एवं सेलेंगा (Selenga) नदियों के पानी के कारण यहाँ हरी घास प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होती थी। मंगोल जिन पशुओं का पालन करते थे उनमें प्रमुख थे घोड़े एवं भेड़ें। इनके अतिरिक्त वे गार्यो, बकरियों एवं ऊँटों का पालन भी करते थे। इन पशुओं का प्रयोग चे दूध, माँस एवं ऊन प्राप्त करने के लिए तथा सामान को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ढोने के लिए करते थे। घोड़ों का प्रयोग वे घुड़सवारी के लिए करते थे। मंगोल घोड़ों पर सवार होकर ही युद्धों में भाग लेते थे। कुछ मंगोल शिकार संग्राहक (hunter-gatherers) थे। वे जंगली जानवरों का शिकार करते थे एवं मछलियाँ पकड़ते थे। वे साइबेरियाई वनों में रहते थे। वे पशुपालक लोगों को तुलना में अधिक गरीब होते थे। उस समय मंगोलिया को भौगोलिक परिस्थितियाँ कृषि के अनुकूल नहीं थीं। अतः यायावरी कबीले कृषि कार्य नहीं करते थे। इस कारण यायावरी कबीलों की अर्थव्यवस्था घनो जनसंख्या वाले क्षेत्रों का भरण-पोषण करने में समर्थ नहीं थी। अतः यहाँ कोई नगर नहीं उभर पाया।

2. निवास स्थान– यायावरी कबीले चरागाहों की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते रहते थे। अत: वे किसी स्थान में स्थाई रूप से नहीं रहते थे। मंगोल गोलाकार तंबुओं में रहते थे जिसे वे जर (ger) कहते थे। 
3. समाज (Society) – यायावरी समाज की मूल इकाई परिवार थी। उस समय परिवार पितृपक्षीय  होते थे। परिवार का सबसे बुजुर्ग व्यक्ति इसकी देखभाल करता था। धनी परिवार बहुत विशाल होते थे। उस समय परिवार में पुत्र का होना बहुत आवश्यक माना जाता था। उस समय मंगोल समाज में बहु-विवाह  प्रचलित थी। उस समय विवाह परिवार एवं कबीले में करने पर कड़ा प्रतिबंध था। विवाह के लिए लड़की के लिए दूसरे कबीले से संबंधित होना जरूरी था। अतः विवाह के लिए दूसरे कबीलों की लड़कियों को उठा लाते थे। इस कारण उनमें आपसी लड़ाइयाँ चलती रहती थीं। उस समय स्त्रियाँ समाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं। वे न केवल घरेलू कार्य करती थीं अपितु आवश्यकता पड़ने पर रणभूमि में दुश्मनों से लोहा लेती थीं। 

4. भोजन (Diet) यायावरी लोगों का प्रमुख भोजन माँस एवं दूध था। मंगोल घोड़े का माँस खाने के बहुत शौकीन थे। वे गायों, भेड़ों एवं बकरियों का माँस भी खाते थे। इनके अतिरिक्त वे कुत्तों, लोमड़ियों, खरगोशों तथा चूहों का माँस भी खाते थे। वे सामान्य तौर पर पकाए हुए अथवा उबले हुए माँस का प्रयोग करते थे। कभी-कभी वे कच्चा माँस भी खा जाते थे। बचे हुए माँस को वे चमड़े के थैले में रख लेते थे। खाने के बर्तनों की सफाई की ओर बहुत कम ध्यान देते थे। वे घोड़ी का दूध पीने के बहुत शौकीन थे। धनी लोग शराब पीने के भी शौकीन थे। इसे चीन से मंगवाया जाता था। इसके सेवन को बहुत सम्मानजनक समझा जाता था।

5. पोशाक (Dress) यायावरी लोग सूती, रेशमी एवं ऊनी वस्त्र पहनते थे। वे सूती एवं रेशमी वस्त्रों का चीन से आयात करते थे। ऊनी वस्त्र वे स्वयं बनाते थे। जनसाधारण के वस्त्र सामान्य प्रकार के होते थे। धनी लोग बहुमूल्य वस्त्रों को धारण करते थे। सर्दियों से बचाव के लिए वे फर के कोट एवं टोप पहनते थे। स्त्रियों के वस्त्र एवं उनके सिर पर डालने वाला टोप विशेष प्रकार से बना होता था।

6. मृतकों का संस्कार (Disposal of the Dead) यायावरी लोग रात्रि के समय अपने मृतकों का संस्कार करते थे। वे शवों को जमीन में दफ़न करते थे। मंगोल मृत्यु के पश्चात् जीवन में विश्वास रखते थे। अतः वे शवों के साथ खाने-पीने की वस्तुएँ एवं बर्तनों आदि को भी रखते थे। धनी व्यक्तियों के साथ अनेक बहुमूल्य वस्तुएँ उसके घोड़ों, नौकरों एवं स्त्रियों को भी दफ़न किया जाता था। प्रायः शवों को उस स्थान पर दफन किया जाता था जिसका चुनाव उसने अपने जीवनकाल में किया हो अथवा जो स्थान उसे सबसे अधिक प्रिय हो ।

7. व्यापार (Trade)-स्टेपी क्षेत्र अथवा मंगोलिया में संसाधनों की बहुत कमी थी। अतः यायावरी कबीले व्यापार के लिए अपने पड़ोसी देश चीन पर निर्भर करते थे। उनका व्यापार वस्तु विनिमय (barter) पर आधारित था। यह व्यवस्था दोनों पक्षों के लिए लाभकारी थी यायावर कबीले चीन से कृषि उत्पाद एवं लोहे के उपकरणों का आयात करते थे। इनके बदले वे घोड़ों, फर एवं शिकारी जानवरों का निर्यात करते थे। कभी-कभी दोनों पक्ष अधिक लाभ कमाने हेतु सैनिक कार्यवाही कर बैठते थे एवं लूटपाट में भी सम्मिलित हो जाते थे। इस संघर्ष में यायावरों को कम हानि होती थी। इसका कारण यह था कि वे लूटपाट कर संघर्ष क्षेत्र से दूर भाग जाते थे। 

चंगेज़ खाँ 

चंगेज़ खाँ का वास्तविक नाम तेमुजिन (Temujin) था। उसका जन्म लगभग 1162 ई. में हुआ। वह छोटे से कबीले के सरदार येसूजेई (Yesugei) का पुत्र था। जब चंगेज़ खाँ की आयु बारह वर्ष थी तब उसके पिता को किसी ने ज़हर देकर मार दिया। परिणामस्वरूप चंगेज़ का बचपन बहुत निर्धनता तथा दुखों में व्यतीत हुआ। उसने अपने जीवन की इन कठिनाइयों का सामना, कबीला राजनीति को अच्छी प्रकार समझ कर किया। उसके लिए उसे स्वामीभक्ति, मक्कारी, भयानक धोखाधड़ी और शारीरिक बल की आवश्यकता थी। अपने विरोधियों को सफलतापूर्वक दबाने के पश्चात् चंगेज़ खाँ ने मंगोली भाषा बोलने वाले कबीलों को अपने अधीन इकट्ठा करके एक कबीला बना लिया। 1206 ईसवी में मंगोलों की एक सभा ने उसे कबीला समाज का सर्वोच्च मुखिया घोषित किया तथा उसको चंगेज़ खाँ, 'समुद्री खान' "सर्वोच्च शासक" " की उपाधि दी।

चंगेज़ खाँ की विजयें

। चीन पर विजय

चंगेज़ खाँ के विजय अभियान के लिए एशिया की राजनीतिक दशा बहुत अनुकूल थी। चीन तीन खंडों में बँटा हुआ था जिसमें चिनवंश  उसके उत्तरी भाग पर, शुंग वंश  दक्षिण भाग पर तिब्बत- टेरौटुस उत्तर पश्चिम पर शासन करता था। उनकी राजधानी हसी हंसिया (Hsi-Hsia) थी। इस प्रकार चीन एक सुदृढ तथा एकीकृत देश नहीं था। यूरेशिया में शक्ति संतुलन बिगड़ा हुआ था। चीन के पश्चिम में करा खिता (Qara Khita) राज्य के बोखारा तथा समरकंद में हरे-भरे नगर थे। इसके आगे ओक्स (Oxus) नदी के किनारे मुस्लिम राज्य ख्वारजम (Khwarazm) था तथा इससे भी परे पश्चिम में अब्बासी खलीफों का बगदाद था। दोनों की शान समाप्त हो चुकी थी।

चंगेज खाँ ने 1206 ई. से 1209 ई. के बीच हंसी-हंसिया को अपने अधीन कर लिया था तथा इसे कर देने पर विवश कर दिया था। चंगेज खाँ ने उत्तरी चीन में पहले चीन की दीवार के उत्तरी क्षेत्र पर आक्रमण करके "पीली नदी" (Yellow River) के आसपास के मैदानी क्षेत्रों को पार किया। 1215 ई. तक चंगेज़ खाँ ने पीकिंग पर लूटमार करके उस पर अधिकार कर लिया था। उन्होंने उन चीनी सैनिकों को भी अपने राज्य में नौकरियों पर नियुक्त कर दिया जो नगरों पर घेरा डालना जानते थे और ऐसे व्यक्तियों को जो भूमि प्रबंध कर सकें तथा कृषि समितियाँ स्थापित कर सकें। अपनी योजनाओं के अनुसार चंगेज खाँ ने अपने पड़ोसी जनजाति कले के क्षेत्रों में भी अभियान चलाए उसने 1216 ई- में मन्चूरिया पर 1218 ई. में कोरिया तथा करा खिता (Qara-Khaita) अधिकार कर लिया। इन विजयों से वह ख्वारजम (Khwarazm) की सीमाओं पर पहुँच गया। वह 1219 ई. से 1221 ई-तक सीमाओं को भी पार कर गया।

 ■ बुखारा वर विजय 

चंगेज खाँ ने धनी तथा सुदृढ नगरों जैसे कि ओटार, बुखारा, समरकंद बल्ख, सर्व, निशापुर, हेरात, गुरगज, में लूट मचा दी। और नगरवासियों का नरसंहार किया। उसने केवल निपुण कारीगरों को छोड़ दिया जिन्हें उसने मंगोलिया भेज दिया।

1220 ई में चंगेज खाँ बुखारा पर अधिकार करने के पश्चात् नगर के मेला लगने के स्थान पर पहुंचा जहाँ पर नगर के धनी लीग: इकट्ठे हुए थे। चंगेज़ खाँ ने उनको एक भाषण दिया। "ओ लोगों तुमने घोर अपराध किए हैं। आप पूछोगे कि मेरे पास उनका क्या हैं तो मैं कहता हूँ कि ईश्वर ने मुझे तुमको दंड देने के लिए भेजा है। अगर तुमने घोर अपराध न किए होते तो ईश्वर ने तुम जैसे लोगों। को दंड देने के लिए मुझे न भेजा होता।" बुखारा खुरासान पहुंचने वाले एक व्यक्ति ने लोगों को बुखारा नगर की भयानक दुर्दशा बारे में बताया। वह (मंगोल) आए, उन्होंने दीवारों को तोड़ा, नगर को आग लगाई, लोगों को लूटा और उनका वध किया और फिर वहाँ से चले गए।

■ अन्य विजयें

चंगेज़ खाँ दूर पूर्व तथा मध्य पूर्व की इन शानदार विजयों को प्राप्त करके भी पूरी तरह संतुष्ट न हुआ। उसकी सेनाएँ काउकासस (Caucases) की ओर आगे बढ़ी तथा गेशियनों (Geogrians) को पराजित किया। 1223 ई. में यूक्रेन (Ukrains) की ओर बढ़ कर मंगोलो ने रूस की शक्तिशाली सेना को कुचल दिया। इस बीच चंगेज़ खाँ चीन के राज्य इसी हसिया (HSI HSIA) पर विजय अभियान चलाने के लिए मंगोलिया वापिस आ गया जिसने उसके विरुद्ध विद्रोह किया था। यह चंगेज खों का अंतिम अभियान था। इसके पश्चात 1227 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।

 चंगेज़ खाँ की सफलता के कारण 


चंगेज़ खाँ की गणना विश्व के महान् विजेताओं में की जाती है। उसने 20 वर्ष के अल्प काल में एक विशाल साम्राज्य की स्थापना कर सबको स्तब्ध कर दिया था। उसकी सफलता के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे
 (1) चंगेज खाँ स्वयं जन्मजात सेनापति था। वह जिस ओर रुख करता सफलता उसके कदम चूमती थी। अ उसका नाम सुनते ही शत्रु की रूह काँप जाती थी।
 (ii) चंगेज़ खाँ ने एक शक्तिशाली सेना का गठन किया था। यह सेना बहुत अनुशासित थी। इस सेना का मुकाबला करना कोई सहज कार्य न था। 
(iii) चंगेज़ खाँ का जासूसी विभाग अत्यंत कुशल था। उसके जासूस कोई भी युद्ध आरंभ होने से पूर्व उसके शत्रु के संबंध में प्रत्येक छोटी-से-छोटी जानकारी उपलब्ध करवाते थे। यह जानकारी उसके लिए बहुत बहुमूल्य सिद्ध होती थी।
 (4) चंगेज खाँ मनोवैज्ञानिक युद्ध (psychological warfare) के महत्त्व को भली-भाँति जानता था। अतः जब भी किसी स्थान के लोग उसकी सेना का मुकाबला करने का साहस करते तो उसकी सेना वहाँ इतना विनाश करती जिसे सुनकर लोग थर-थर काँपने लगते थे। अतः लोग बिना लड़ाई किए ही उसके समक्ष आत्म-समर्पण कर देते थे।
 (v) मंगोल सैनिक घुड़सवारी एवं तीरंदाजी में इतने कुशल थे कि शत्रु भौचक्के रह जाते थे। 
(vi) चंगेज खाँ आमतौर पर शीत ऋतु में अपने अभियान आरंभ करता था। इस ऋतु में नदियाँ बर्फ के कारण जम जाती थीं। अतः इन नदियों को पार करना सुगम हो जाता था। 
(vii) चंगेज़ खाँ ने शत्रु दुर्गों को नष्ट करने के लिए घेराबंदी यंत्र (siege engine) एवं नेफथा (naphtha) बमबारी का व्यापक प्रयोग किया। इनके युद्ध में घातक प्रभाव होते थे।

IV. चंगेज़ खाँ की अलोकप्रियता के कारण 

चंगेज़ खाँ द्वारा विजित लोगों को अपने नवीन यायावर शासकों से कोई लगाव न था। इसके लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे। 
1 मंगोलों ने अपने युद्धों के दौरान अनेक भव्य नगरों का विनाश कर दिया था। अनेक नगर तो सदैव के लिए अपना अस्तित्व खो बैठे। 
2 मंगोलों ने बड़ी संख्या में खेतों को जला दिया था। इससे कृषि को गहरा आघात लगा 
3  मंगोलों के आक्रमणों के दौरान व्यापार को भी व्यापक क्षति पहुँची। 
4. इन युद्धों के दौरान लाखों की संख्या में लोग मारे गए तथा बड़ी संख्या में लोगों को दास बना लिया गया था। 5.  इन आक्रमणों के कारण ईरान के शुष्क क्षेत्रों में भूमिगत नहरों की समय पर मुरम्मत नहीं हो सकी। परिणामस्वरूप मरुस्थल का आकार तीव्रता से बढ़ने लगा। इससे कृषि उत्पादन को गहरा आघात लगा। इस कारण समाज के सभी वर्गों के लोगों को अनेक कष्टों का सामना करना पड़ा।
 यास से  अभिप्राय
उत्तर – यास वे विधि नियम थे, जिन्हें चंगेज़ खाँ के शासनकाल में कुरिलताई द्वारा पारित किया

इसके प्रमुख नियम  निम्नलिखित थे

(i) लोगों को एक परमात्मा में विश्वास रखना चाहिए जो कि स्वर्ग एवं पृथ्वी का स्वामी है। वह ही जीवन एवं मृत्यु, अमीरी तथा गरीबी देता है। (ii) धार्मिक नेताओं, परामर्शदाताओं, पुरोहितों, मस्जिदों की देखभाल करने वालों, डॉक्टरों एवं शवों को स्नान कराने वालों को राज्य की तरफ से मुफ्त भोजन दिया जाना चाहिए।

(iii) जो भी व्यक्ति कुरिलताई से मान्यता प्राप्त किए बिना अपने आपको खाँ घोषित करता है उसे मृत्यु दंड

दिया जाना चाहिए।

(iv) जिन कबीलों ने मंगोलों की अधीनता स्वीकार कर ली हो उनके मुखिया महत्त्वपूर्ण उपाधियाँ धारण नहीं

कर सकते।

(v) जो कोई शासक अथवा कबीला मंगोलों की अधीनता स्वीकार नहीं करता उसके साथ किसी प्रकार का कोई

समझौता न किया जाए।

(vi) सभी धर्मों का सम्मान किया जाए। सभी धर्मों के पुरोहितों को सभी प्रकार के करों से मुक्त रखा जाए। (vii) किसी चलते हुए दरिया में वस्त्र धोकर अथवा मलमूत्र द्वारा गंदा करने पर कड़ा प्रतिबंध था। ऐसा करने वालों को मृत्यु दंड दिया जाता था।
 मंगोल प्रशासन

चंगेज खान खायद्यपि अपना संपूर्ण जीवन युद्धों में ही उलझा रहा इसके बावजूद वह एक कुशल प्रशासक भी प्रमाणित हुआ। उसने अपनी सेना को शक्तिशाली बनाया। उसने नागरिक प्रशासन में भी अनेक उल्लेखनीय सुधार किए। उसका प्रशासन इतना अच्छा था कि यह लगभग उसी रूप में उसके उत्तराधिकारियों के समय में भी जारी । 

I. सैनिक प्रशासन 

चंगेज खाँ एक महान् योद्धा था। अतः उसने मंगोल साम्राज्य के विस्तार एवं इसकी सुरक्षा के लिए सैनिक प्रशासन की ओर विशेष ध्यान दिया। मंगोलों के सैनिक प्रशासन की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं 
1 भर्ती(Recruitment)- चंगेज खाँ के समय सभी स्वस्थ व्यक्तियों के लिए सेना में भर्ती होना अनिवार्य था। केवल पुरोहितों, डॉक्टरों एवं विद्वानों को इसमें छूट दी गई थी। अधिकारियों की भर्ती का कार्य केवल चंगेज़ खाँ के हाथों में था। प्रायः ऊँचे और बहुत ही विश्वसनीय अधिकारियों के पुत्रों को अफसर पद पर नियुक्त किया जाता था।
 2. संगठन (Organization) चंगेज खाँ की सेना पुरानी दशमलव पद्धति के अनुसार गठित की गई थी। यह

10, 100, 1000 एवं 10,000 सैनिकों की इकाइयों में विभाजित थी। 

३. रचना (Composition)- चंगेज खाँ की सेना में विभिन्न मंगोल जनजातियों के लोग सम्मिलित थे। उसने विभिन्न देशों के लोगों को जिन्हें उसने अपने अधीन किया, को भी सेना में भर्ती किया। इसमें उसकी सत्ता को स्वेच्छा से स्वीकार करने वाले तुर्की मूल के उइगुर (Uighurs) लोग सम्मिलित थे। यहाँ तक कि चंगेज खाँ ने अपनी सेना में कैराईटों (Kereyits) को भी सम्मिलित किया। कैराईट चंगेज खाँ के कट्टर शत्रु थे।
 4. अनुशासन (Discipline)—चंगेज खाँ सेना में अनुशासन को विशेष महत्त्व देता था। वह अनुशासनहीन सेना को एक भीड़ मात्र समझता था। उसने सेना में अनुशासन बनाए रखने के उद्देश्य से अनेक नियम बनाए हैं। इनका उल्लंघन करने वाले सैनिकों को मृत्यु दंड दिया जाता था ये नियम थे (i) युद्ध के आरंभ होने पर छुट्टी पर गए सभी सैनिक तुरंत रिपोर्ट करें।

(ii) सभी सैनिकों के लिए आवश्यक था कि वे अपने अधिकारियों के आदेश का पालन करें। (iii) कोई भी सैनिक अपनी इकाई को छोड़कर किसी दूसरी इकाई में नहीं जा सकता था। (iv) युद्ध में जाने से पहले सभी सैनिकों को अपने हथियारों का निरीक्षण कर लेना चाहिए। 
(V) कोई भी सैनिक अपने अधिकारियों की अनुमति के बिना लूटपाट न करे। (Vi) अधिकारियों द्वारा अनुमति मिलने पर ही लूटपाट आरंभ की जाए। लूट के धन से अधिकारियों एवं खाँ

हिस्सा दिया जाना चाहिए।

5. सेना की कुल संख्या (Total Strength of the Army) चंगेज़ खाँ की सेना की कुल संख्या के बार में इतिहासकारों में मतभेद हैं। इसका कारण यह है कि आरंभ में उसकी सेना की संख्या कम थी। जैसे-जैसे उसके साम्राज्य का विस्तार होता गया वैसे-वैसे उसके सैनिकों की संख्या में बढ़ोत्तरी होती चली गई। अनुमानतयः यह 1 लाख से 1.5 लाख के मध्य थी।

6 हथियार एवं सामान (Arms and Equipments ) उस समय घुड़सवार सेना का युग था। अतः प्रत्येक सैनिक के पास एक से अधिक घोड़े होते थे। ये घोड़े बहुत फुर्तीले थे। प्रत्येक घोड़ा एक दिन में सहजता से 100 मील दौड़ सकता था। हल्के घुड़सवार (light cavalry) सैनिकों के पास दो धनुष (bows) एवं दी तरकस (quivers) होते थे जिनमें अनेक तीर रखे जाते थे।
 II. नागरिक प्रशासन 

मंगोल यायावर समाज से संबंधित थे। इसलिए उनका नागरिक प्रशासन न तो अधिक उत्तम था एवं न ही अच्छी प्रकार संगठित। इसके बावजूद यह उस समय की परिस्थितियों के अनुकूल था। मंगोलों के नागरिक प्रशासन की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं

1. खाँ की स्थिति (Position of Khan) मंगोल साम्राज्य में खाँ (सम्राट) की स्थिति सर्वोच्च थी। उसे असीम शक्तियाँ प्राप्त थीं। उसके द्वारा राज्य की सभी आंतरिक एवं बाह्य नीतियाँ तैयार की जाती थीं। राज्य को समस्त सेना उसके अधीन होती थी तथा उसके निर्देश अनुसार कार्य करती थी। राज्य के सभी उच्च पदों की नियुक्ति चाहे वे सैनिक हों अथवा असैनिक उसके द्वारा की जाती थी। उसे किसी देश के साथ युद्ध करने अथवा उससे संधि करने का अधिकार प्राप्त था। वह प्रजा पर कोई भी नया कर लगा सकता था अथवा पुराने करों को हटा सकता था अथवा उन्हें कम या अधिक कर सकता था। उसके मुख से निकला प्रत्येक शब्द प्रजा के लिए कानून होता था। कोई भी व्यक्ति इसका उल्लंघन नहीं कर सकता था। ऐसा करने पर उसे मृत्यु दंड दिया जाता था। यद्यपि खाँ की शक्ति किसी तानाशाह से कम नहीं थी किंतु उसकी शक्तियों पर कुरिलताई द्वारा कुछ अंकुश जरूर लगाया जाता था।

2. नागरिक प्रशासकों की भूमिका (Role of Civil Administrators) चंगेज खाँ स्वयं अनपढ़ था तथा वह यायावर समाज से संबंधित था। उसने अपनी बहादुरी से एक विशाल साम्राज्य की स्थापना कर ली थी। इसमें विभिन्न जातियों एवं सभ्य समाजों से संबंधित लोग थे। ऐसे लोगों पर शासन करना कोई सुगम कार्य न था। इस कार्य में मंगोल उसकी सहायता करने में असमर्थ थे। अत: चंगेज खाँ ने अपने अधीन किए गए सभ्य समाजों में से नागरिक प्रशासकों को भर्ती किया।


३. उलुस (Ulus) — मंगोल प्रशासन की एक उल्लेखनीय विशेषता चंगेज खाँ द्वारा उलुस का गठन करना था। इसके अनुसार चंगेज़ खाँ ने नव-विजित क्षेत्रों पर शासन करने का उत्तरदायित्व अपने चारों पुत्रों को दे दिया।  उलूस में चंगेज़ खाँ के पुत्रों की स्थिति उप-शासक जैसी थी। उनके अधीन अलग-अलग सैन्य टुकड़ियाँ (तामा) थीं। वे अपने अधीन क्षेत्रों से लोगों को सेना में भर्ती कर सकते थे। उन्हें लोगों पर नए कर लगाने का अधिकार दिया गया था।
 4याम—चंगेज़ खाँ को एक बहुमूल्य देन याम की स्थापना करना था। याम एक प्रकार की सैनिक चौकियों थी। मंगोल साम्राज्य में प्रत्येक 25 मील की दूरी पर ऐसी चौकियाँ स्थापित की गई थीं। इन चौकियों में घुड़सवार संदेशवाहक तथा फुर्तीले घोड़े सदैव तैनात रहते थे। घुड़सवार संदेशवाहक सभी प्रकार के सरकारी संदेशों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाते थे। प्रत्येक घुड़सवार अपने घोड़े के गले में एक घंटी बाँध कर रखता था। जब वह किसी याम के निकट पहुँचता तो इस घंटी की आवाज़ सुन कर संदेशवाहक अपने घोड़े के साथ आगे गंतव्य तक बढ़ने के लिए तैयार हो जाता। इन यामों में ठहरने वाले यात्रियों की सुविधा के लिए उनके खाने-पीने का पूरा इंतजाम किया जाता था। यात्रियों की सुरक्षा के लिए सरकार की तरफ से एक प्रकार के पास जारी किए जाते थे। इन पासों को फ़ारसी में पैजा तथा मंगोल भाषा में जेरेज़ कहते थे। ये पास तीन प्रकार-सोने, चाँदी एवं लोहे के होते थे। प्रत्येक याम में यात्रियों को इन पासों के अनुसार सुविधाएँ दी जाती थीं। इन चौकियों के कारण सड़क मार्गों

को सुरक्षित बनाया जाता था।
: 5. यास (Yasa) – मंगोल प्रशासन चलाने में यास को महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। यास वे विधि नियम थे जिन्हें इंगेज खाँ के शासनकाल में 1206 ई० में कुरिलताई द्वारा पारित किया गया था। इन नियमों को 1218 ई० में अंतिम रूप दिया गया था। ये नियम उसके उत्तराधिकारियों के समय में भी जारी रहे। ये नियम मूल रूप में उपलब्ध नहीं हैं। इनके संबंध में हमें जानकारी अन्य पुस्तकों में दिए गए उदाहरणों से मिलती है। ये नियम मंगोल सेना, शिकार झक प्रणाली, नैतिक एवं सामाजिक व्यवस्था से संबंधित थे। वास्तव में यास मंगोल जनजाति की ही परंपराओं का एक संकलन था। इन नियमों को मंगोलों ने पराजित लोगों पर भी लागू किया। वास्तव में पास ने मंगोलों को एक सूत्र में पिरोने, उनकी अपनी कबीलाई पहचान बनाए रखने, जटिल शहरी समाजों पर शासन करने तथा एक विश्वव्यापी मंगोल साम्राज्य की स्थापना में प्रशंसनीय योगदान दिया।
 6, धार्मिक नीति (Religious Policy) - मंगोल शासकों का धर्म में बहुत विश्वास था। वे मुख्य रूप से गरी (Tengri) भाव सूर्य देवता की उपासना करते थे। वे इसे सर्वशक्तिमान् मानते थे। वे इसे प्रसन्न करने के लिए जानवरों एवं विशेषतः घोड़ों की बलियाँ देते थे। वे पवित्र धार्मिक लोगों जिन्हें शामन (sharmans) कहा जाता था। का विशेष सम्मान करते थे। चंगेज़ ख़ाँ का विश्वास था कि परमात्मा ने मंगोलों को विशेष रूप से पृथ्वी पर शासन झरने के लिए भेजा है। अत: यह मंगोलों का धार्मिक कर्तव्य है कि वे अधिक से अधिक देशों को अपने अधीन करें।

 चंगेज़ खाँ के उत्तराधिकारी 


1227 ई० में चंगेज खाँ की मृत्यु के पश्चात् उसके अनेक उत्तराधिकारियों ने चौदहवीं शताब्दी के अंत तक शासन किया। इनमें औगोदेई, गुयूक एवं मॉक प्रमुख हैं। ओगोदेई ने यायावर साम्राज्य के विस्तार एवं संगठन में उल्लेखनीय योगदान दिया। गुथूक का अल्प शासनकाल रहा। उसका उत्तराधिकारी मौके भी एक प्रसिद्ध शासक था।। उसका शासनकाल विशेष रूप से विभिन्न धर्मों के प्रति अपनाई गई धार्मिक सहनशीलता के लिए जाना जाता है।

1. ओगोदेई 1229-1241 ई० –सर्वप्रथम उत्तरी चीन पर विजय प्राप्त की। इसके पश्चात् उसने ईरान के शासन जलालुद्दीन को पराजय दी थी। यहाँ उसे डाकुओं के एक दल द्वारा मौत के घाट उतार दिया गया। ईरान की विजय से ओगोदेई की प्रतिष्ठा बहुत बढ़ गई। इसके पश्चात् ओगोदेई ने कोरिया पर विजय प्राप्त को चंगेज खाँ के पोते बाट ने 1236 ई० से 1242 ई० के अपने अभियानों के दौरान रूस, हंगरी, पोलैंड एवं ऑस्ट्रिया पर विजय प्राप्त कर मंगोल साम्राज्य के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ओगोदेई ने न केवल मंगोल साम्राज्य का विस्तार किया अपितु इसे अच्छी प्रकार से संगठित भी किया। उसने मंगोल साम्राज्य की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से करों को नियमित किया। एवं व्यापार को प्रोत्साहन दिया। उसने संपूर्ण मंगोल साम्राज्य में प्रजा को न्याय देने के उद्देश्य से अनेक न्यायालयों की स्थापना की। उसने शिक्षा को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से अनेक स्कूलों की स्थापना की। उसने सिविल सर्विस में भी उल्लेखनीय सुधार किए। उसने याम को अधिक विस्तृत किया। 1241 ई० में ओगोदेई की मृत्यु हो गई।
2. यूक 1246 – 1248 ई०  – 1246 ई० में कुरिलताई ने ओगोदेई के गुयूक को मंगोलों का नया महान् खाँ नियुक्त किया। उसने केवल 1248 ई० तक शासन किया। उसका शासनकाल पोप इनोसेंट चतुर्थ (Pope Innocent IV) के साथ स्थापित किए गए कूटनीतिक संबंधों के लिए जाना जाता है। उसने नेस्टोरियन (Nestorian) ईसाई धर्म का पक्ष लिया। इस कारण अनेक कट्टर मंगोल गुयूक विरुद्ध हो गए। के इस समय बाटू ने सुनहरा गिरोह (Golden Horde) का विस्तार किया। गुयूक इसे सहन करने को तैयार नहीं था। 1248 ई० में वह बाटू को एक सबक सिखाने के लिए अपनी सेना के साथ चल पड़ा। दुर्भाग्यवश रास्ते में ही गुयुक की मृत्यु हो गई। इस प्रकार उसके अल्पकाल शासन का अंत हो गया।

3. मोंके 1251-1259 ई० - 1248 ई० में गुयूक की मृत्यु के पश्चात् मंगोलिया में एक गहरा राजनीतिक संकट उत्पन्न हो गया था। इसके दो कारण थे। प्रथम, गुयूक का देहांत अचानक हो गया था। दूसरा, उसके पश्चात् उसको विधवा खातून ओगुल गैमिश  ने 1248 इं से लेकर 1251 ई० के आरंभ तक राजप्रतिनिधि के तौर पर शासन किया। उसके षड्यंत्रों ने स्थिति को अधिक विस्फोटक बना दिया था। 1251 ई० में कुरिलताई ने चंगेज़ खाँ के पौत्र एवं तोलूई के पुत्र मोंके को मंगोलों का नया महान् खाँ नियुक्त किया। उसने 1259 ई० तक शासन किया। वह चंगेज खाँ के उत्तराधिकारियों में से सबसे योग्य प्रमाणित हुआ।

कुबलई खाँ पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
 उत्तर – कुबलई खाँ ने 1260 ई० में पीकिंग में यूआन वंश की स्थापना की घोषणा की। कुबलई खाँ ने 1294 ई० तक शासन किया। कुबलई ख़ाँ एक योग्य एवं महान् शासक प्रमाणित हुआ। उसने सर्वप्रथम उत्तरी चीन स्थिति को सुदृढ किया। उसने अपनी सेना को शक्तिशाली बनाया। उसके पश्चात उसने अधिक बुका को पराजित किया। 1280 ई० में कुबलई खाँ ने दक्षिण चीन के शुंग शासक को पराजित करने में सफलता प्राप्त की। निस्संदेह यह कुबलई ख़ाँ को एक महान् सफलता थी। इसके पश्चात् उसने बर्मा, चंपा एवं कंबोडिया के शासकों को पराजित किया। कुबलई खाँ ने न केवल अपने साम्राज्य का विस्तार ही किया अपितु इसे अच्छी प्रकार से संगठित भी किया। उसने चीन में प्रचलित परंपराओं को जारी रखा। उसने अनेक नई सड़कों का निर्माण किया एवं पुरानी की मुरम्मत करवाई। उसने सड़कों के किनारे छाया वाले वृक्ष लगवाए। उसने यात्रियों की सुविधा के लिए सराएँ बनवाई। उसने शिक्षा को प्रोत्साहित किया। उसने सिविल सर्विस में उल्लेखनीय सुधार किए। उसने राज्य की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से अनेक कदम उठाए। उसने 1282 ई० में कागज की मुद्रा का प्रचलन किया। उसने अकालों से निपटने के लिए भी अनेक प्रयास किए। यद्यपि कुबलई खाँ का झुकाव बौद्ध धर्म की ओर था किंतु उसने अन्य धर्मों के प्रति सहनशीलता की नीति अपनाई।
हुलेगु कौन था ? वह क्यों प्रसिद्ध था ? 
उत्तर- हुलेगु ने 1256 ई० में ईरान में इल-खानी वंश की स्थापना की। उसने सर्वप्रथम ईरान में अपने विरोधियों को पराजित किया। उसकी सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण सफलता 1258 ई० में बग़दाद पर अधिकार करना था। उसने बगदाद के खलीफा अल-मुस्तासिम का वध करके अब्बासी वंश का अंत कर दिया। खलीफ़ा के वध ने मुस्लिम दुनिया में खलबली मचा दी। हुलेगु ने 1260 ई० में सीरिया पर अधिकार करने का प्रयास किया किंतु उसे मिल की सेनाओं द्वारा पराजय का सामना करना पड़ा। इसका प्रमुख कारण यह था कि मंगोलों की इस समय चीन में रुचि बहुत बढ़ गई थी। दूसरा, उन्होंने मिस्र की सेना का सामना करने के लिए अपनी बहुत कम सेना भेजी। तीसरा, इस समय मंगोलों के विभिन्न राजवंशों में आपसी झगड़े आरंभ हो गए थे। इस कारण उनकी शक्ति को गहरा आघात लगा हुलेगु का शासनकाल विशेष रूप से फ़ारसी साहित्य को प्रोत्साहन देने के लिए जाना जाता है। उसके शासनकाल का सर्वाधिक प्रसिद्ध फ़ारसी इतिहासकार जुवाइनी था। उसने 1260 ई० में हिस्ट्री ऑफ द कनकरर ऑफ़ द वर्ल्ड की रचना की। हुलेगु ने अनेक प्रशंसनीय आर्थिक सुधार भी लागू किए।
 जोचिद वंश पर एक संक्षिप्त नोट लिखें। 
उत्तर-मंगोलों का जोचिद वंश भी काफी प्रसिद्ध था जोची चंगेज खाँ का सबसे बड़ा पुत्र था। चंगेज खाँ ने उसे 1224 ई० में रूसी स्टेपी प्रदेश सौंपा था। इसे दक्षिण रूस अथवा गोल्डन होई के नाम से भी जाना जाता था। 1227 ई० में जोची की मृत्यु हो गई। उसके पश्चात् उसका छोटा पुत्र बाटू सिंहासन पर बैठा। वह एक योग्य शासक प्रमाणित हुआ। उसने 1236 ई० से 1242 ई० के अपने अभियानों के दौरान संपूर्ण रूस, हंगरी, पोलैंड एवं ऑस्ट्रिया पर अधिकार कर गोल्डन होर्ड का बहुत विस्तार किया। उसने अपने अधीन क्षेत्र को संगठित करने के उद्देश्य से अनेक महत्त्वपूर्ण पग उठाए। उसने अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ किया। उसने अपनी सेना को भी शक्तिशाली बनाया। उसकी 1256 ई० में मृत्यु हो गई। उसके उत्तराधिकारियों ने 1359 ई० तक शासन किया।

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