class 11th आधुनिकीकरण के रास्ते

 
1894-95 ई० के चीन-जापान युद्ध का तत्कालीन कारण

-कोरिया में 'तोंगहाक' संप्रदाय द्वारा किया गया विद्रोह चीन-जापान युद्ध का तात्कालिक कारण बना। इस संप्रदाय के लोग विदेशियों को पसंद नहीं करते थे। 1894 ई० में इस संप्रदाय ने विदेशियों को कोरिया से निकालने के लिए विद्रोह कर दिया था। विवश होकर कोरिया की सरकार ने चीन से सैनिक सहायता मांगी। चीन ने 1500 से 3000 के बीच अपने सैनिक कोरिया की राजधानी सियोल में भेज दिए। चीन की सरकार ने जापान को सेना भेजने की सूचना दी। सूचना प्राप्त करने के पश्चात् जापान ने भी अपने 8000 से 10000 सैनिक कोरिया की राजधानी सियोल में भेज दिए। परंतु चीनी सेना के पहुंचने से पहले ही विद्रोह का दमन कर दिया गया था। कोरिया सरकार ने दोनों सरकारों को अपनी-अपनी सेनाएं वापस बुलाने की प्रार्थना की। परंतु दोनों देशों ने अपनी सेनाएं वहां से न निकालीं। अब केवल युद्ध और शक्ति परीक्षण का मार्ग ही बचा था। जापानी सेनाओं ने कोरिया के राजा को बंदी बना लिया और वहां की सरकार का पुनर्गठन किया। पुनर्गठित सरकार ने जापान से आग्रह किया कि वह चीन की सेनाओं को कोरिया से मार

भगाए। इस प्रकार 1 अगस्त, 1894 ई० को यह युद्ध आरंभ हो गया।

शिमोनोसेकी की संधि कब और क्यों हुई ? इसके मुख्य तीन प्रभाव 
 -1894-95 ई० में युद्ध में पराजित होने के पश्चात् चीन ने 17 अप्रैल, 1895 ई० को आपानी अधिकारियों के साथ शिमोनोसेकी की संधि की। इस संधि की मुख्य धाराएं निम्नलिखित अनुसार थीं-

(1) चीन ने कोरिया को एक पूर्ण स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दे दी।

(ii) चीन ने पोर्ट आर्थर, फारमोसा तथा लियाओतुंग जापान को दे दिए।

(iii) चीन ने स्वीकार किया कि वह युद्ध की क्षतिपूर्ति के रूप में जापान को 2 करोड़ तायल देगा।

(iv) चीन जापान को सर्वाधिक प्रिय देश स्वीकार करेगा।

(v) चीन जापान के व्यापार के लिए अपनी चार बंदरगाहें खोलेगा।

(vi) जब तक चीन युद्ध की क्षतिपूर्ति की राशि जापान को नहीं चुकाएगा उसकी वी-हाई-वी नामक बंदरगाह जापान के पास रहेगी।

इस संधि से जहां चीन की प्रतिष्ठा को गहरा आघात लगा वहीं जापान की प्रसिद्धी दूर-दूर तक फैल गई।

  1894-95 ई० के चीन-जापान युद्ध के कोई चार प्रमुख 
दूर-दूर तक
1. जापान की प्रतिष्ठा में वृद्धि एशिया का एक छोटा सा देश होने के बावजूद जापान ने एशिया के एक विशाल देश चीन को इस युद्ध में पराजित कर दिया था। इस युद्ध में विजय से जापान की प्रतिष्ठा को चार चांद लग गए। सभी यूरोपीय शक्तियों को विश्वास था कि इस युद्ध में चीन विजयी रहेगा। परन्तु उसकी पराजय ने सभी को आश्चर्यचकित कर दिया। परिणामस्वरूप जापान की शक्ति की धाक सारे विश्व में बैठ गई।

2. चीन की लूट आरंभ-जापान के हाथों पराजित होने से चीन की दुर्बलता सारे विश्व के सामने आ गई। इस कारण यूरोपीय शक्तियों की मनोवृत्ति में आश्चर्यजनक परिवर्तन आया। अतः जिन पश्चिमी शक्तियों ने चीन में कई प्रकार की रियायतें प्राप्त की थीं वे अब इसे आपस में बांटने के बारे में सोचने लगीं। अतः ये सभी देश चीन की लूट में जापान के भागीदार बनने के लिए तैवार हो गए।

3. चीन में सुधार आंदोलन-चीन की अपमानजनक पराजय से चीन के शिक्षित देशभक्त बड़े दुःखी हुए। वे अब चीन में आधुनिक ढंग के सुधारों की मांग करने लगे। परंतु उस समय के मांचू शासक बड़े रूढ़िवादी थे। अतः उन्होंने उनकी मांगों की ओर कोई ध्यान न दिया। परिणामस्वरूप चीन में मांचू विरोधी सुधार आंदोलन चल पड़ा।

4. जापान-रूस शत्रुता शिमोनोसेकी की संधि के पश्चात् रूस जापान के विरुद्ध हो गया। उसने फ्रांस तथा जर्मनी के साथ मिल कर जापान को लियाओतुंग प्रायद्वीप चीन को वापस करने को कहा। इससे जापान रूस से नाराज हो गया। इसके अतिरिक्त चीन-जापान युद्ध के पश्चात् जापान भी रूस के समान दूर-पूर्व में एक शक्ति के रूप में उभरा। दोनों देश महत्त्वाकांक्षी थे और यही महत्त्वाकांक्षा उन्हें 1904-05 के युद्ध की ओर ले गई।

1904-05 ई० के रूस-जापान युद्ध 

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