महात्मा गांधी class 12th History


जलियाँवाला बाग हत्याकांड 

-भारतीयों में अंग्रेज़ों के प्रति बढ़ रहे असंतोष को रोकने के लिए अंग्रेज़ों ने 1919 ६० में रॉलेट एक्ट पास किया। इस एक्ट द्वारा किसी भी व्यक्ति को बिना कारण बताए गीरफ्तार किया जा सकता था और उसको बिना मुकद्दमा चलाए दंड दिया जा सकता था।

इनको दलील, अपील और वकील का अधिकार नहीं था। इस एक्ट के विरोध में सारे देश भर में जलसे, जुलूस और हड़तालें की गईं। महात्मा गाँधी को गिरफ्तार कर लिया गया। गॉलेट एक्ट तथा गाँधी जी की गिरफ्तारी के रोष स्वरूप 13 अप्रैल, 1919 ई० को जलियाँवाला बाग (अमृतसर) में एक शांतिपूर्ण जलसा हुआ। जनरल डायर ने गोलियों की वर्षा करके सैकड़ों लोगों को मौत की नींद सुला दिया और हजारों अन्य को घायल कर दिया। इस
खूनी हत्याकांड के कारण लोगों की आत्मा काँप उठी। सारे देश में हाहाकार मच गयी।
महात्मा गाँधी जैसे नेता जिन्होंने पहले संसार युद्ध वर्ल्ड वार के समय अंग्रेज़ों को पूरा सहयोग दिया
था। इस घटना के कारण अंग्रेज़ों के विरुद्ध हो गए। रोष स्वरूप उन्होंने असहयोग आंदोलन
चलाया। वास्तव में जलियाँवाले बाग़ की दुःखदायी घटना ने भारत में अंग्रेज़ी राज्य के कफन में कील गाढ़ने का कार्य किया।
. जलियाँवाला बाग़ की दुःखद घटना कैसे घटी ? इस घटना का भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन पर क्या प्रभाव पड़ा ?
-13 अप्रैल, 1919 ई० को जलियांवाला बाग में एक ऐसा भयंकर हत्याकांड हुआ जिसके भारतीय इतिहास पर दूरगामी प्रभाव पड़े।

जलियाँवाला बाग हत्याकांड के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है-
1. गदर आंदोलन का प्रभाव (Impact of the Ghadar Movement) -

गदर पार्टी की स्थापना
21 अप्रैल, 1913 ई० को सानफ्रांसिस्को (अमेरिका) में की गई थी। इस पार्टी का उद्देश्य सशस्त्र विद्रोह के द्वारा भारत में अंग्रेज़ों के अन्यायपूर्ण राज्य का अंत करके भारत के लिए स्वतंत्रता प्राप्त करना था। इसने 21 फरवरी, 1915 ई० को अंग्रेज़ों के विरुद्ध विद्रोह करने की योजना बनाई। सरकार को इस योजना का पहले ही पता चल गया। उसने शीघ्र ही कार्यवाही करके गदर पार्टी के अनेक नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। इनमें से 42 को फाँसी का दंड दिया गया तथा शेष को लंबी अवधि के लिए कारागार में डाल दिया गया। इस प्रकार गदर आंदोलन अपने उद्देश्य को प्राप्ति के लिए विफल रहा परंतु उसने अपनी गतिविधियों द्वारा तथा उसके नेताओं द्वारा दी गई कुर्बानियों ने भारतीचे में नया उत्साह उत्पन्न किया।

2. होम रूल आंदोलन का प्रभाव (Impact of the Home Rule Movement) - 1916 ई० में बाल गंगाधर तिलक तथा श्रीमती एनी बेसेंट ने होम रूल आंदोलन की पूना तथा मद्रास (चेन्नई) में स्थापना की।
🟠 लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक
वे भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी, राष्ट्रवादी नेता, लेखक और समाज सुधारक थे।
उन्हें “लोकमान्य” की उपाधि जनता ने दी थी।
उनका प्रसिद्ध नारा था:
“स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।”
उन्होंने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध उग्र राष्ट्रवाद का समर्थन किया।
तिलक ने होमरूल आंदोलन (1916) की शुरुआत की।
वे ‘केसरी’ और ‘मराठा’ नामक समाचार पत्रों के संपादक थे।
🟠 श्रीमती एनी बेसेंट
वे मूल रूप से इंग्लैंड की रहने वाली थीं, लेकिन भारत आकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई।
वे एक समाज सुधारक, शिक्षाविद् और राष्ट्रवादी नेता थीं।
उन्होंने भी होमरूल आंदोलन (1916) में तिलक के साथ नेतृत्व किया।
वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष (1917) बनीं।
उन्होंने भारत में शिक्षा और स्वशासन के लिए कार्य किया।
 इसआंदोलन का मुख्य उद्देश्य होम रूल अथवा स्वराज्य प्राप्त करना था। तिलक का कहना था, "स्वराज्य जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।" इस आंदोलन को प्रभावशाली बनाने के उद्देश्य से श्रीमती बेसेंट ने देश के अनेक भागों का भ्रमण किया। परिणामस्वरूप होम रूल की माँग सारे देश में गूंजने लगी। इस आंदोलन के तेज़ी से बढ़ते हुए प्रभाव को देख कर सरकार ने इसे कुचलने का निर्णय किया।
3. सेना में बलपूर्वक भर्ती (Forcible Recruitment in the Army)- प्रथम विश्व युद्ध1914 से 1918 के समय अंग्रेजी सरकार द्वारा की जाने वाली सैनिकों की बलपूर्वक भर्ती ने समस्त देश तथा विशेष रूप से पंजाब में भारी असंतोष उपन कर दिया था। पंजाब के सिख अपनी बहादुरी के कारण बहुत विख्यात थे। अतः अंग्रेजों ने उन्हें सेना में अधिक-से-अधिक भर्ती करने के उद्देश्य से शक्ति से काम लिया। गाँव के जागीरदार तथा नंबरदार युवकों को पकड़ कर भर्ती केंद्रों में ले जाते।

4. मूल्यों तथा करों में वृद्धि (Rise in Prices and Taxes) - प्रथम विश्व युद्ध के समय देश भर में आवश्यक वस्तुओं के मूल्य आसमान को छूने लगे। सरकार ने इनको कम करने का कोई प्रयास न किया। दूसरी तरफ उसने युद्ध के लिए धन एकत्र करने हेतु भारतीयों पर कई नए कर लगा दिए थे तथा पहले से लगे हुए करों में वृद्धि कर दी थी। क्योंकि अधिकाँश भारतीय निर्धन वर्ग से संबंधित थे, इसलिए मूल्यों तथा करों में हुई भारी वृद्धि ने उनकी कमर तोड़ कर रख दी थी। अतः भारतीयों के दिलों में अंग्रेजों के प्रति रोष उत्पन्न होना स्वाभाविक था।

5. रॉलेट एक्ट (Rowlatt Act)- प्रथम विश्व युद्ध के समय अंग्रेज भारतीयों से सहयोग प्राप्त करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने भारतीयों को युद्ध की समाप्ति पर कुछ सुविधाएँ देने का वचन दिया। परिणामस्वरूप विश्व युद्ध के समय भारतीयों ने अंग्रेजों को पूर्ण प्रोत्साहन के साथ सहयोग दिया। परंतु युद्ध के पश्चात् अंग्रेज अपने वचन से फिर - गए। अतः भारतीयों में असंतोष फैला। इस स्थिति से निपटने के लिए सरकार ने भारतीयों के घोर विरोध के बावजूद 18 मार्च, 1919 ई० को रॉलेट एक्ट पास कर दिया। इस एक्ट के अधीन सरकार किसी भी व्यक्ति को बिना कारण बताए बंदी बना सकती थी तथा बिना मुकद्दमा चलाए अनिश्चित समय के लिए बंदीगृह में डाल सकती थी। उन्हें 'दलील, अपील तथा वकील' का कोई अधिकार न था। इस प्रकार रॉलेट एक्ट ने स्थिति को अधिक विस्फोटक बना दिया। 
6. महात्मा गाँधी द्वारा हड़ताल का आह्वान (Strike call given by Mahatma Gandhi)-रॉलेट एक्ट के कारण सारे भारत में क्रोध की लहर फैल गई थी। महात्मा गाँधी ने अपनी पूर्व घोषणा के अनुसार रॉलेट एक्ट का
विरोध करने का निश्चय किया। उन्होंने लोगों को पहले 30 मार्च तथा बाद में 6 अप्रैल, 1919 ई० को देशव्यापी ने मिलकर भाग लिया। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे पूरे देश में एक बिजली की लहर दौड गई हो। 30 मार्च, 1919 ई० करने तथा मुसलमानों को आर्य समाज के नेता स्वामी श्रद्धानंद जब एक प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे थे तो सरकार ने उन्हें कड़ी चेतावनी दी। इस पर स्वामी जी ने सीना खोल कर कहा, "हिम्मत है तो मारो गोली ।" यद्यपि गाँधी जी के आदेशानुसार यह हडताल अहिंसापर्ण रही परंतु दिल्ली तथा पंजाब के कुछ भागों में दंगे हो गये। इस कारण गाँधी जी तुरंत ही बंबई (मुंबई) से दिल्ली तथा पंजाब की ओर रवाना हुए परंतु 9 अप्रैल को उन्हें पलवल के निकट गिरफ्तार करके पुनः बंबई (मुंबई) भेज दिया गया। इस घटना ने अग्नि में तेल डालने का काम किया।


खिलाफत आंदोलन

- विश्व भर के मुसलमान तुर्की के सुल्तान का बहुत सम्मान करते थे। तह उसको अपना खलीफा मानते थे। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन तुर्की के विरुद्ध युद्ध कर रहा था। उस समय भारतीय मुसलमानों ने अंग्रेजों को इस शर्त पर समर्थन दिया था कि वे युद्ध की समाप्ति के पश्चात अपनी तुर्की विरोधी नीतियों को छोड़ देंगे तथा खलीफा के साथ अच्छा व्यवहार किया जाएगा। परंतु युद्ध की समाप्ति के पश्चात् ब्रिटिश सरकार ने अपने वचनों की उपेक्षा की। उसने न केवल तुर्की को कई भागों में बांट दिया, अपितु खलीफा को भी गिरफ्तार कर लिया। इससे भारतीय मुसलमान भड़क उठे। इसलिए 1919 ई० में अली भाइयों शौकत अली तथा मुहम्मद अली ने खिलाफ़त या खलीफा के लिए आंदोलन चलाने का निर्णय किया। हकीम अजमल खाँ, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद तथा हसरत मोहानी इस आंदोलन के अन्य महान् नेताओं में से थे। इस आंदोलन में सर्वप्रथम महात्मा गाँधी सम्मिलित हुए। 31 अगस्त, 1920 ई० को खिलाफ़त कमेटी ने असहयोग आंदोलन में सम्मिलित होने की घोषणा की।

असहयोग आंदोलन 
महात्मा गाँधी द्वारा शुरू किए गए असहयोग आंदोलन (1920-22) का वर्णन करें। उत्तर-1920 ई० में गाँधी जी ने असहयोग आंदोलन आरंभ कर दिया। अंदोलन आरंभकरने से पूर्व गाँधी जी ने जनता को अहिंसा एवं अनुशासन से काम लेने का आदेश दिया
महात्मा गाँधी समकालीन दृष्टि से आंदोलन के प्रोग्राम के अनुसार सर्वप्रथम गाँधी जी ने ब्रिटिश सरकार से प्राप्त 'केसर-ए-हिंद' की उपाधि तथा अन्य पदक लौटा दिए। यह उपाधि तथा पदक उन्हें प्रथम महायुद्ध में ब्रिटिश सरकार की सहायता करने के उपलक्ष्य में प्रदान किए गए थे। उनका अनुकरण करते हुए सैंकड़ों देशभक्तों ने अपनी उपाधियों का त्याग कर दिया। अध्यापकों तथा नेताओं ने विधानसभाओं से त्याग-पत्र दे दिए। छात्रों ने सरकारी स्कूलों तथा कॉलेजों को छोड़ दिया। वकीलों ने अदालतों को त्याग दिया। साधारण जनता ने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया। खिलाफत आंदोलन के बड़े-बड़े नेताओं ने भी असहयोग आंदोलन में पूरा भाग लिया। अनेक स्थानों पर राज्य पदाधिकारियों का स्वागत हड़तालों से किया गया। नवंबर, 1920 ई० में इंग्लैंड का युवराज भारत आया। भारतीयों ने उसका स्वागत भी हड़तालों से ही किया। इसे युवराज का अपमान समझा गया। अतः अंग्रेज सरकार क्रोधित हो उठी और उसने गाँधी जी सहित असहयोग आंदोलन के सभी बड़े-बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। कुछ ही महीनों में बंदी व्यक्तियों की संख्या तीस हजार तक जा पहुँची। गाँधी जी यह आंदोलन बड़े शांतमय ढंग से चलाना चाहते थे। लगभग दो वर्ष तक वे अपने उद्देश्य में सफल भी रहे। परंतु 1922 ई० में उत्तर प्रदेश के एक गांव चौरी-चौरा में आंदोलनकारियों ने एक पुलिस चौकी को सिपाहियों सहित आग लगा दी। इस दुर्घटना से गाँधी जी बहुत दुःखी हुए। उन्होंने तुरंत आंदोलन वापस ले लिया।

चौरी-चौरा की घटना 
-जिस समय असहयोग आंदोलन अपनी पूरी चरम सीमा पर था तो अचानक चौरी-चौरा की घटना के कारण महात्मा गाँधी ने असहयोग आंदोलन को स्थगित करने का निर्णय किया। घटना इस प्रकार थी-5 फरवरी, 1922 ई० को उत्तर प्रदेश के जिला गोरखपुर के एक गांव चौरी-चौरा में 3000 किसान एक प्रदर्शन में भाग ले रहे थे। कुछ पुलिस वालों ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियाँ चलाकर उन्हें डराने का प्रयत्न किया। इस कारण आंदोलनकारी भड़क उठे। उन्होंने क्रोधित होकर पुलिस थाने पर आक्रमण कर उसे आग लगा दी। परिणामस्वरूप 22 पुलिस कर्मचारियों की मृत्यु हो गई। गाँधी जी को इस घटना से बहुत दुःख हुआ। क्योंकि उन्हें यह भय था कि इस कारण आंदोलन एक हिंसक मोड़ ले सकता है इसलिए 12 फरवरी, 1922 ई० को बारदोली (गुजरात) में महात्मा गाँधी ने असहयोग आंदोलन को स्थगित करने की घोषणा की। महात्मा गाँधी के असहयोग आंदोलन को स्थगित करने के निर्णय की सुभाष चंद्र बोस, जवाहर लाल नेहरू, लाला लाजपत राय तथा अन्य युवक राष्ट्रवादियों ने कटु आलोचना की। इस कारण महात्मा गाँधी की लोकप्रियता में कुछ कमी हुई। इसका लाभउठाकर सरकार ने 10 मार्च, 1922 ई० को उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उन पर देशद्रोही का मुकद्दमा चला कर 6 वर्षों की सज़ा दी गई। सरकार ने उन्हें दो वर्षों के पश्चात् रिहा कर दिया।
 चरखे को राष्ट्रवाद का प्रतीक क्यों चुना ?
उत्तर-चरखे को राष्ट्रवाद का प्रतीक इसलिए चुना गया था क्योंकि चरखा गाँधी जी एवं जनमानस में प्रिय था। गाँधी जी मानते थे कि आधुनिक युग में मशीनों ने मानव को गुलाम बनाकर श्रमिकों के हाथों से काम एवं रोज़गार छीन लिया है। उन्होंने मशीनों की घोर आलोचना की। उन्होंने चरखा को एक ऐसे मानव समाज के प्रतीक रूप में देखा, जिसमें मशीनों और प्रौद्योगिकी को बहुत महिमामंडित नहीं किया जाएगा। इससे भी अधिक चरखा ग़रीबों को पूरक आमदनी प्रदान कर सकता था तथा उन्हें स्वावलंबी बना सकता था। उनका विचार था कि खद्दर मशीनरी को नष्ट नहीं करना चाहता बल्कि यह इसके प्रयोग को नियमित करता है और इसके विकास को नियंत्रित करता है। यह मशीनरी का प्रयोग सर्वाधिक ग़रीब लोगों के लिए उनकी अपनी झोपड़ियों में करता है। पहिया अपने आप में ही मशीनरी का एक उत्कृष्ट नमूना है।

 स्वराज्यवादी 
1923 ई० में पंडित मोती लाल नेहरू और सी० आर० दास ने स्वराज्य पार्टी की नींव रखी। इस पार्टी का मुख्य उद्देश्य चुनावों में भाग लेना और कौंसिलों के भीतर स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करना था। 
सफलताएं 
नवंबर 1923 ई० के चुनावों में स्वराज्य पार्टी को केंद्रीय और प्राँतीय असेंबलियों में भारी सफलता मिली। इन असेंबलियों में स्वराज्य पार्टी का योगदान बहुत महत्त्वपूर्ण था। इसने अंग्रेज़ों द्वारा अपनाई जाने वाली भारत विरोधी नीतियों की आलोचना की। पार्टी ने प्रत्येक यत्न किया कि सरकार भारत के हितों के विरुद्ध कोई कार्य न करे। पार्टी के यत्नों से 1910 ई० का प्रैस एक्ट और 1919 ई० का रॉलेट एक्ट को रद्द कर दिया गया। सेना में भारतीयों को अधिक अफ़सर पद देने का निर्णय किया गया। कारखानों, खानों और कृषि श्रमिकों की भलाई के लिए कानून पास किए गए। किसानों को जमींदारों के
अतयाचारों से बचाने के लिए कुछ कानून बनाए गए। शिक्षा के क्षेत्र में सुधार लाने के लिए महत्त्वपूर्ण पग उठाए गए।

 साइमन कमीशन
-1919 ई० के सुधारों की समीक्षा के लिए ब्रिटिश सरकार ने नवंबर 1927 ई० में सर जॉन साइमन की अध्यक्षता में एक 7 सदस्यीय आयोग नियुक्त करने का निर्णय लिया। यह कमीशन 1928 ई० में भारत पहुँचा। कमीशन में कोई भी भारतीय सदस्य नहीं था। इसलिए वह जहाँ कहीं भी गया, भारतीयों ने काली झंडियों और 'साइमन वापस जाओ' के नारों से उसका विरोध किया। अंग्रेज़ों ने इन आंदोलनकारियों के प्रति कठोर नीति अपनाई। यह कमीशन 30 अक्तूबर, 1928 ई० को लाहौर पहुँचा। यहाँ कमीशन का बहिष्कार करने के लिए लाला लाजपत राय के नेतृत्व में एक शान्तिमय जुलूस निकाला गया, परंतु सरकार इन निहत्थे लोगों पर लाठीचार्ज करवा दिया। इस कारण लाला लाजपत राय घायल हो गए और 17 नवंबर, 1928 ई० को उनकी मृत्यु हो गई। इससे भारतीयों में अंग्रेजों के प्रति घरीणा और बढ़ गई। साइमन कमीशन ने अपनी रिपोर्ट 1930 ई० में ब्रिटिश संसद् को प्रस्तुत
की। इसे भारतीय दलों द्वारा अस्वीकार कर दिया गया। 

नेहरु रिपोर्ट 
28 फरवरी, 1928 ई० को दिल्ली में एक सर्वदलीय सम्मेलन बुलाया गया। इसमें भारत के 29 राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि सम्मिलित हुए। इसमें भारतीय संविधान का प्रारूप तैयार करने के लिए पंडित मोती लाल नेहरू के नेतृत्व में 9 व्यक्तियों की एक कमेटी बनाई गई। इस कमेटी ने 10 अगस्त, 1928 ई० को अपनी रिपोर्ट पेश की। यह रिपोर्ट नेहरू रिपोर्ट के नाम से प्रसिद्ध हुई। दिसंबर, 1928 ई० में कलकत्ता (कोलकाता) में हुए इंडियन नेशनल कांग्रेस के वार्षिक सम्मेलन में इस रिपोर्ट की पुष्टि की गई। इस रिपोर्ट की मुख्य सिफ़ारिशें निम्नलिखित थीं-

(1) भारत को पूर्ण औपनिवेशिक राज्य का दर्जा दिया जाए।

(2) केंद्र और प्रांतों में जिम्मेदार सरकार की स्थापना की जाए।

(3) मंत्रिमंडल अपनी नीतियों और कार्यवाहियों के लिए विधान मंडल के प्रति उत्तरदायी होना चाहिए।

(4) केंद्रीय संसद् के दो सदन' होने चाहिए। निम्न सदन का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से पांच वर्ष के लिए किया जाए। इसमें 21 साल की आयु के पुरुष और स्त्री को, यदि उसे कानून मत डालने का अधिकार दिया जाए। उच्च सदन का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से किया जाये।

(5) केंद्रीय कार्यकारी परिषद् अपने सभी कार्यों के लिए सामूहिक रूप से केंद्रीय संसद के प्रति उत्तरदायी हो।

(6) संयुक्त चुनाव प्रणाली की व्यवस्था की जाए परंतु अल्पसंख्यकों के लिए केंद्रीय और प्रांतीय विधान मंडलों में स्थान आरक्षित किये जाएं।

(7) सर्व भारतीय संघ की स्थापना की जाए और केंद्र तथा प्रांतों में शक्तियों का स्पष्ट तौर पर विभाजन किया जाए।

(8) भारत में एक सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना की जाए जो अपील का अंतिम स्थान हो तथा प्रिवी कौंसिल को अपील करने की प्रथा बंद की जाए।

(9) भारतीयों को 19 मौलिक अधिकार दिए जाएं।

(10) भारतीय रियासतों के शासकों के अधिकार सुरक्षित रखते हुए भी उन्हें अपनी रियासतों में शीघ्रता से उत्तरदायी शासन प्रारंभ करने के लिए कहा गया।

(11) पृथक् प्रतिनिधित्व को अनावश्यक तथा हानिकारक बताया गया। अल्पसंख्यको में केवल मुसलमानों के लिए ही स्थान सुरक्षित रखे गए।

नेहरू रिपोर्ट क्योंकि बहुत प्रगतिवादी थी इसलिए सरकार ने इसे स्वीकार नहीं किया। कांग्रेस का युवक दल जिसमें जवाहर लाल नेहरू एवं सुभाष चंद्र बोस आदि सम्मिलित थे डोमिनियन स्टेट्स से संतुष्ट न थे। मुस्लिम लीग के प्रधान मुहम्मद शफी ने इसे मुस्लिम हितों के विपरीत बताया। मुहम्मद अली जिन्नाह ने इसे स्वीकार करने के लिए एक 14-सूत्रीय कार्यक्रम पेश किया जिसे कांग्रेस ने स्वीकार न किया। कुछ सिख भी इस रिपोर्ट के सांप्रदायिक अनुबंधों से संतुष्ट नहीं थे। इससे भारतीय नेताओं की आपसी फूट सामने आई। इन आलोचनाओं के बावजूद नेहरू रिपोर्ट को एक उच्चकोटि की रिपोर्ट माना जाता है। इसमें पहली बार कई राजनीतिक तथा अन्य समस्याओं पर विचार किया गया तथा उनको सुलझाने का प्रत्यन किया गया। इस रिपोर्ट को भारत के भावी संविधान के निर्माण की दिशा में पहला महान् कदम माना जाता है।

सविनय अवज्ञा आंदोलन 
-महात्मा गाँधी ने 1930-34 ई० के दौरान ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध सविनय अवज्ञा आंदोलन का आरंभ किया। इस आंदोलन का आधुनिक भारत के इतिहास में विशेष महत्त्व है।

1. कारण

1930 ई० में महात्मा गाँधी ने निम्नलिखित कारणों के चलते सविनय अवज्ञा आंदोलन को शुरू किया-

(1) 1928 ई० में साइमन कमीशन भारत आया था। भारतीयों ने इस कमीशन का जोरदार विरोध किया। इसके बावजूद इस कमीशन ने 1930 ई० में अपनी रिपोर्ट जारी की। यह रिपोर्ट भारतीयों को संतुष्ट करने में विफल रही।

(ii) 1928 ई० में दिल्ली में पंडित मोतीलाल नेहरू ने नेहरू रिपोर्ट को प्रस्तुत किया। सरकार ने इस रिपोर्ट को मानने से इंकार कर दिया। परिणामस्वरूप भारतीयों में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध निराशा फैली।

(iii) पंडित जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस ने 31 दिसंबर, 1929 ई० को पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पारित किया। इसके अनुसार 26 जनवरी, 1930 ई० को संपूर्ण भारत में स्वतंत्रता दिवस मनाने का निर्णय किया।

(iv) महात्मा गाँधी ने तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इर्विन के समक्ष 11 माँगे रखीं। लॉर्ड इर्विन ने इन माँगों की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया।

II. कार्यक्रम

सविनय अवज्ञा आंदोलन का कार्यक्रम निम्नलिखित प्रकार था-

(1) जहाँ तक हो सके नमक कानून का उल्लंघन करना।

(ii) शराब और विदेशी माल की दुकानों पर धरना लगाना।

(iii) विदेशी वस्तुओं को इकट्ठा करके उनको जलाना।

(iv) सरकारी शिक्षण संस्थाओं और सरकारी अदालतों का बहिष्कार करना।

(v) सरकार को किसी भी प्रकार का कर न देना।

III. आंदोलन की प्रगति

गाँधी जी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन का आरंभ दाँडी यात्रा से 12 मार्च, 1930 ई० को किया। साबरमति आश्रम से वह अपने 79 सहयोगियों सहित दाँडी के लिए निकल पड़े। उन्होंने दाँडी पहुँच कर 6 अप्रैल, 1930 ई० को समुद्र के किनारे जाकर नमक बनाया और नमक कानून का उल्लंघन किया। सरकार ने गाँधी जी तथा उनके साथियों को बंदी बना लिया। तत्पश्चात् सारे देश में सविनय अवज्ञा की लहर फैल गई। जो कार्यक्रम गाँधी जी ने पहले निर्धारित किए थे, लोगों ने उन्हें निष्ठा से अमल किया, जैसे विदेशी माल का बहिष्कार, करों की अदायगी रोकना, शराब की दुकानों पर धरने देना। प्रदर्शन और हड़तालें करना इत्यादि कार्य सारे देश में किए गए। महिलाओं ने इसमें बढ़-चढ़ कर भाग लिया। उधर पश्चिमी सीमा प्राँत में खान अब्दुल गफ्फार खाँ ने लाल कुर्ती नामक संगठन बना कर इस आंदोलन को एक नई दिशा प्रदान की। 5 मार्च, 1931 ई० को गाँधी-इर्विन समझौते के कारण महात्मा गाँधी ने इस आंदोलन को वापस ले लिया था। किंतु अगले वर्ष ही महात्मा गाँधी ने सरकार के रवैये में निराश होकर आंदोलन को पुनः आरंभ किया। यह आंदोलन 1934 ई० तक चलता रहा।

IV. महत्त्व

राष्ट्रीय आंदोलन में इस सविनय आंदोलन का विशेष महत्त्व है। इससे राष्ट्रीय भावना तेज हुई। पहली बार स्त्रियों ने बढ़-चढ़ कर इसमें हिस्सा लिया। किसानों, मजदूरों, विद्यार्थियों और अन्य सभी वर्गों ने भी इसमें सक्रिय भाग लिया। यह आंदोलन पूर्णतः शौतिपूर्ण चला। डॉ० तारा चंद के कथनानुसार, "वास्तव में यह आंदोलन अपने दोनों उद्देश्यों- लोगों के नैतिक मनोबल को ऊँचा उठाने और सरकार के राजसी गर्व को समाप्त करने में काफी सीमा तक सफल रहा।" 

भारत छोड़ो आन्दोलन 
उत्तर-1942 ई० में महात्मा गाँधी ने ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध भारत छोड़ो आंदोलन चलाया। यह आंदोलन भारत के स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास में विशेष स्थान रखता है। इस आंदोलन ने अंग्रेजी राज्य की नींवों को जड़ से हिला दिया था जिस कारण 1947 ई० में अंग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ा।

1. कारण

1. जापान के आक्रमण का भय- द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इंग्लैंड के विरोधी जापान ने एशिया के बहुत-से क्षेत्रों पर 1941-42 ई० में अधिकार कर लिया था। जापानी सेनाएँ बहुत शीघ्रता से भारत की ओर बढ़ रही थीं। उन्होंने सिंगापुर व रंगून पर अधिकार कर लिया था। ऐसी स्थिति में महात्मा गाँधी ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए कहा क्योंकि जापानियों के आक्रमण के कारण भारतवासियों को बिना किसी कारण भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता था।

2. क्रिप्स मिशन की असफलता अंग्रेजों ने भारतीयों से सहयोग प्राप्त करने के लिए व उनको कुछ सविधाएँ देने के लिए क्रिप्स मिशन की नियुक्ति की। यह मिशन 23 मार्च, 1942 ई० को भारत पहुँचा। उसने भारतीयों नेताओं के साथ बातचीत आरंभ की। मिशन ने युद्ध के पश्चात् भारत को डोमिनयन स्टेटस देने व संविधान सभा बनाने की पेशकश की। क्रिप्स मिशन के सुझावों को कांग्रेस और लीग ने रद्द कर दिया। इस कारण क्रिप्स मिशन अपने उद्देश्यों में असफल रहा।

3.  गांधी जी के व्यवहार में परिवर्तन 
14 जुलाई, 1942 ई० को कांग्रेस की कार्यकारिणी बैठक में यह कहा गया कि अंग्रेजों को जितनी शीघ्र हो सके भारत को छोड़ देना चाहिए। इस संबंधी मीरा बहन (जोकि अंग्रेज अफसर की पुत्री थी महात्मा गाँधी की शिष्या बन गई थी) को वायसराय लार्ड लिनलिथगो के साथ मिलने के लिए दिल्ली भेजा। वायसराय ने मीरा बहन को मिलने से इंकार कर दिया। इस कारण महात्मा गाँधी के व्यवहार में अंग्रेजों के प्रति काफी परिवर्तन आया। गाँधी जी को यह विश्वास हो गया कि अंग्रेज बातचीत द्वारा भारतीयों की किसी बात को स्वीकार नहीं करेंगे।

II. आंदोलन की प्रगति

भारत छोड़ो प्रस्ताव पर विचार करने के लिए 8 अगस्त, 1942 को बंबई में कांग्रेस की मीटिंग हुई। इस मीटिंग में भारत छोड़ो प्रस्ताव को स्वीकृति दी गई। यह निर्णय किया गया कि महात्मा गाँधी जी के नेतृत्व में अहिंसापूर्ण आंदोलन चलाया जाएगा। गाँधी जी ने 'करो अथवा मरो' (Do or Die) का नारा लगाया। 9 अगस्त की प्रातः को अंग्रेजी सरकार ने गाँधी, नेहरू, आजाद व कांग्रेस के अन्य प्रसिद्ध नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। सरकार ने कांग्रेस को गैर-कानूनी घोषित कर दिया।
कांग्रेस के प्रसिद्ध नेताओं की गिरफ्तारी के कारण भारतवासी आश्चर्यचकित रह गए।
उन्होंने अपने प्रिय नेताओं की रिहाई के लिए देशभर में हड़तालें, जलसे व जलूस निकाले और राष्ट्रीय गीत गाए। सरकार आंदोलन के इस बढ़ते हुए प्रभाव के कारण घबरा गई। इसलिए उसने दमनकारी नीति अपनाई। सरकार ने आंदोलनकारियों पर अमानवीय अत्याचार किए। उन पर लाठीचार्ज किया गया। कई स्थानों पर गोली चलाई गई। इस कारण हजारों आंदोलनकारी घायल हो गए व 10,000 से अधिक मारे गए। गिरफ्तार आंदोलनकारियों को बहुत कष्ट दिए गए। स्त्रियों के साथ बलात्कार किया गया। कई स्थानों पर उनको नंगा करके वृक्षों के साथ उलटा लटका दिया गया। लोगों के घरों को लूटा गया व आग लगा दी गई। देशभर में मार्शल लॉ लगा दिया गया।
भारतवासी इस अपमान को सहन नहीं कर सकते थे। वे भड़क उठे व उन्होंने सरकारी भवनों, रेलवे स्टेशनों व डाक-तार लाईन को भारी हानि पहुँचाई। कई स्थानों पर भारतीय तिरंगे झंडे को लहराया गया। विद्यार्थियों ने स्कूल और कॉलेजों को छोड़ दिया। मजदूरों ने भी काम करना बंद कर दिया। स्त्रियों ने भी बड़ी संख्या में आंदोलनकारियों का साथ दिया। पंजाब में यह आंदोलन लाहौर, अमृतसर, लुधियाना, लायलपुर आदि शहरों में फैला। अंत में सरकार इस आंदोलन को कुचलने में सफल रही।

III. आंदोलन का महत्त्व

इस आंदोलन में भारतवासियों ने बड़े पैमाने पर भाग लिया। उन्होंने अंग्रेजों के अत्याचारों का बहुत वीरता से सामना किया। इस आंदोलन को सफल बनाने के लिए लोगों ने हर कुर्बानी दी। इस आंदोलन ने भारत में अंग्रेजी शासन को झिंझोड़ कर रख दिया था। परिणामस्वरूप अंग्रेजों को 15 अगस्त, 1947 ई० को भारत छोड़ने के लिए विवश होना पड़ा।

. माऊंटबेटन योजना की प्रमुख धाराए
मार्च 1947 ई० में लॉर्ड वेवल के स्थान पर लॉर्ड माऊंटबेटन को भारत का वायसराय बनाया गया। उसने भारत के विभिन्न दलों से बातचीत करके 3 जून, 1947 ई० को एक योजना पेश की। इसकी प्रमुख धाराएँ निम्नलिखित थीं-

(1) भारत को दो भागों भारत और पाकिस्तान में विभाजित किया जाएगा।

(2) ब्रिटिश सरकार सत्ता हस्तांतरित करने के लिए 1948 ई० तक प्रतीक्षा नहीं करेगी अपितु वह 1947 ई० में ही सत्ता हस्तांतरित करने के लिए तैयार है।

(3) पंजाब एवं बंगाल की विधानसभाओं के सदस्य यदि विभाजन का समर्थन करेंगे तो भारत एवं पाकिस्तान की सीमा का निर्धारण करने के लिए एक आयोग की नियुक्ति की जाएगी।

(4) असम के जिले सिलहट जहाँ मुसलमानों का बहुमत था यह निर्णय किया गया कि वहाँ जनमत संग्रह करवाया जाएगा तथा यह निश्चित किया जाएगा कि यह क्षेत्र असम में रहेगा अथवा पूर्वी पाकिस्तान में।

(5) उत्तर-पश्चिमी सीमा प्राँत में जनमत संग्रह होगा कि वह भारत में सम्मिलित होना चाहता है अथवा पाकिस्तान में।

(6) देशी रियासतों को अपनी इच्छानुसार भारत अथवा पाकिस्तान में सम्मिलित होने की छूट होगी।
माउंटबेटन योजना को कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग दोनों ने स्वीकार कर लिया।
इस कारण भारत की स्वतंत्रता का मार्ग साफ ह गया।
उत्तर-राष्ट्र पिता महात्मा गाँधी विश्व के प्रसिद्ध नेताओं में से एक थे। उनका भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महत्त्वपूर्ण योगदान होने के कारण उनके समय 1919 ई० से 1947 ई० को "गाँधी युग" का नाम दिया है।

1. रॉलेट एक्ट-गाँधी जी 1915 ई० में दक्षिणी अफ्रीका से भारत लौटे थे। उस समय प्रथम विश्व युद्ध चल रहा था। इस नाजुक स्थिति में गाँधी जी ने भारतीयों को अंग्रेजों की हर प्रकार से सहायता करने की अपील की। परिणामस्वरूप भारतीयों ने अंग्रेजों को पूर्ण सहयोग दिया। उनका विचार था कि विश्व युद्ध की समाप्ति के पश्चात् अंग्रेज भारत को स्वतंत्र कर देंगे। परंतु अंग्रेजों ने 1919 ई० में रॉलेट एक्ट पास करके भारतीयों के घारों पर नमक छिड़कने का कार्य किया। इस कारण गाँधी जी व भारतवासियों में निराशा की लहर दौड़ गई।

2. जलियाँवाला बाग़ का हत्याकांड-रॉलेट एक्ट को वापिस लेने के लिए गाँधी जी ने

लोगों को 30 मार्च तथा 6 अप्रैल को देशभर में शांतिमय हड़तालें करने की अपील की। इन हड़तालों को देशभर में सशक्त समर्थन मिला। रॉलट एक्ट के विरुद्ध जब 13 अप्रैल, 1919 ई० को जलियाँवाला बाग अमृतसर में एक शांतिमय सभा चल रही थी तो जनरल डायर तथा उसके सैनिकों ने अंधाधुंध गोलियाँ चलाकर सैंकड़ों लोगों को मौत की नींद सुला दिया व हज़ारों अन्यों को घायल कर दिया। इस हत्याकांड के कारण सारा भारतवर्ष अंग्रेजों के विरुद्ध भड़क उठा। महात्मा गाँधी जी भी अंग्रेजों के कट्टर विरोधी बन गए।

3. असहयोग आंदोलन जलियाँवाला बाग़ के हत्याकांड के रोषस्वरूप महात्मा गाँधी जी ने 1920 ई० में अंग्रेजों के विरुद्ध असहयोग आंदोलन चलाने का निर्णय किया। इसके अतिरिक्त अंग्रेजी सामान, शिक्षा संस्थाएँ, न्यायालय तथा चुनावों का बायकाट करने की
THROUGH CONTEMPORARY EYES

समकालीन दृष्टि से

255 अपील की। इस आंदोलन का आरंभ गाँधी जी ने अपने सभी मैडल व उपाधियाँ वापिस करके दिया। इसने लोगों में एक नया जोश भर दिया। देश के प्रसिद्ध वकीलों ने अपनी कालत छोड़ दी। देश भर में शिक्षा संस्थाएँ स्थापित की गईं। लोगों ने घरों में चर्खा चलाकर बादी के वस्त्र पहनने आरंभ कर दिए। विदेशी सामान को एकत्रित करके स्थान-स्थान पर अलाया गया। 1922 ई० में जब चौरी-चौरा में कुछ हिंसा भड़क उठी तो गाँधी जी ने आंदोलन हो वापिस ले लिया क्योंकि वे हिंसा के विरुद्ध थे। फिर भी इस आंदोलन के महत्त्वपूर्ण परिणाम निकले। हिंदू और मुसलमान अंग्रेजों के विरुद्ध एक होकर लडे। स्त्रियों ने पहली बार इस आंदोलन में भाग लिया।

4. सविनय अवज्ञा आंदोलन- पूर्ण स्वराज्य की माँग को मनवाने के लिए महात्मा गाँधी जी ने अंग्रेजों के विरुद्ध 1930 ई० में सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाया। इस आंदोलन का आरंभ महात्मा गाँधी जी ने अप्रैल, 1930 ई० को दाँडी (गुजरात) में समुद्र से पानी लेकर समक कानून तोड़ कर किया। इस कारण गाँधी जी व अन्य आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर लिया। गाँधी जी की गिरफ्तारी की सूचना देश में वन में लगी आग की भाँति फैल गई। परिणामस्वरूप लोगों ने क्रोध में आकर अंग्रेजों के बनाए कानूनों का उल्लंघन करना आरंभ कर दिया। सरकार ने दमनकारी नीतियों को अपनाया। इससे आंदोलनकारियों का उत्साह किसी भी प्रकार कम न हुआ। सरकार ने गाँधी-इर्विन समझौते द्वारा जो 5 मार्च, 1931 ई० को हुआ था, भारतीयों को कुछ सुविधाएँ देने का वचन दिया। परिणामस्वरूप गाँधी जी ने आंदोलन वापिस ले लिया। अंग्रेज अपने दिए वचनों से फिर गए तो गाँधी जी ने आंदोलन पुनः आरंभ कर दिया। गाँधी जी व कुछ अन्य प्रसिद्ध नेताओं को पुनः गिरफ्तार कर लिया गया। यह आंदोलन 1934 ई० तक चलता रहा। इस आंदोलन के कारण लोगों में राष्ट्रीय भावना का बहुत प्रसार हुआ।

5. भारत छोड़ो आंदोलन 8 अगस्त, 1942 ई० को गाँधी जी ने अंग्रेजों के विरुद्ध भारत

छोड़ो आंदोलन चलाया। यह अब तक चलाए आंदोलनों में से सबसे महत्त्वपूर्ण था। सरकार ने आंदोलन आरंभ करने वाले दिन गाँधी जी को गिरफ्तार कर लिया। अब लोग नियंत्रण में न रहे। उन्होंने देशभर में हड़तालें कीं तथा जलूस निकाले। कई स्थानों पर लूटमार की घटनाएँ भी हुईं। कुछ स्थानों पर अंग्रेजों के झंडे जलाकर भारतीय झंडे लहराए गए। अंग्रेजों ने आंदोलनकारियों के प्रति बहुत कठोर नीति अपनाई। प्रदर्शनकारियों को कई स्थानों पर गोलियों से उड़ा दिया गया। अंत में सरकार ने इस आंदोलन पर नियंत्रण कर लिया। इस आंदोलन के बहुत दूरगामी परिणाम निकले।

6. भारत की स्वतंत्रता - अंग्रेजों ने भले ही भारत छोड़ो आंदोलन पर नियंत्रण कर लिया था परंतु वे भारतीयों में स्वतंत्रता के लिए भड़क रही ज्वाला को नियंत्रण में न रख सके। गाँधी जी के यत्नों से अंत में अंग्रेजों को 15 अगस्त, 1947 ई० को स्वतंत्रता देनी पड़ी। इस प्रकार लंबे अंधकारमय युग का अंत हो गया और एक नए युग का आरंभ हुआ।

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