HISTORY CLASS 12 CHAPTER -3
परिवार(FAMILY)
मनुष्य एक पारिवारिक प्राणी है। वह परिवार में जन्म लेता है। परिवार उसकी प्रथम पाठशाला होती है जहाँ मातृभाषा, सामाजिक विश्वास, आदर्श, मूल्य तथा व्यवहार के तरीके सीखता है। परिवार प्राथमिक सामाजिक संस्था तथा समाज की मौलिक इकाई है। यह एक ऐसी संस्था है जो मनुष्य को समाज में पहचान प्रदान करती है। इसके व्यवहारों को नियमित, निर्देशित तथा नियंत्रित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अभिनीत करती है। निस्संदेह परिवार के बिना मानव समाज की कल्पना करना मुश्किल है।
I. परिवार का अर्थ (Meaning of Family)
साधारण शब्दों में परिवार का संबंध विवाहित स्त्री व पुरुष से है। अनेक विचारकों ने परिवार को अनेक आधारों पर परिभाषित किया है।
भावाते हैं तथा एक सामान्य संस्कृति का निर्माण तथा देख-रेख करते हैं।
II. परिवार के प्रकार (Types of Family)
परिवार अनेक प्रकार के होते हैं। प्रमुख प्रकार के परिवारों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है-
1. एक विवाही परिवार (Monogamous Family)- एक विवाही परिवार वह होता है जिसमें एक समय में पुरुष केवल एक ही स्त्री से विवाह कर सकता है। विश्व के अधिकाँश एवं सभ्य समाजों में एक विवाही परिवार व्यवस्था पाई जाती है।
2. बहुपति विवाही परिवार (Polyandrous Family)- ऐसे परिवार में एक समय में एक स्त्री के अनेक पति अर्थात् दो या दो से अधिक पति होते हैं। यदि स्त्री के सभी पति आपस में सगे भाई हैं तो इसे भ्रातृ बहुपति विवाह (Fraternal Polyandry) कहते हैं और यदि स्त्री के सभी पति सगे भाई न होकर अर्थात् सब पति जब आपस में रक्त संबंधी न हों इसे अधातू बहुपति विवाह (Non-Fraternal Polyandry) की संज्ञा दी जाती है।
3. बहुपत्नी विवाही परिवार (Polygynous Family)- बहुपत्नी विवाही प्रथा में एक पति व अनेक पल्लियाँ पाई जाती हैं। मुसलमान समाजों में ऐसे परिवार देखने को मिलते हैं। ऐसे परिवारों में बहनें तथा गैर-बहनें एक पुरुष की पत्नियाँ हो सकती हैं।
4. रक्त संबंधी परिवार (Consanguineous Family)- रक्त संबंधी परिवारों में विवाह संबंध रक्त संबंधियों से स्थापित किये जाते हैं अर्थात् विवाह संबंध निकट संबंधियों के बीच स्थापित किए जाते हैं। चचेरे, ममेरे व फुफेरे भाई-बहनों के विवाह इसी श्रेणी में आते हैं।
5. पितृवंशीय परिवार (Patrilineal Family)- पितृवंशीय परिवार वह परिवार होता है जिसमें वंश पूर्वज पुरुष के नाम से चलता है। इन परिवारों में वंश परंपरा पिता के नाम से चलती है। संपत्ति के ऊपर पुत्रों का अधिकार होता है तथा बच्चे पिता के नाम से ही समाज में जाने जाते हैं। हिंदू समाज में पितृवंशीय परिवार ही पाये जाते हैं।
6. मातृवंशीय परिवार (Matrilineal Family)- इन परिवारों में स्त्री या माता को घर का मुखिया माना जाता है। इन परिवारों में वंश स्त्री के नाम से चलता है। बच्चों को स्त्री के वंशज के रूप में जाना जाता है। संपत्ति के ऊपर अधिकार भी स्त्री का ही होता है।
7. नव स्थानी परिवार (Neolocal Family)- जब स्त्री-पुरुष विवाह के पश्चात् अपने माता-पिता का घर छोड़ कर नये घर में रहना प्रारंभ करते हैं तो इस प्रकार से स्थापित नये परिवार को नवस्थानी परिवार कहते हैं।
8. ग्रामीण परिवार (Rural Family) ग्रामीण परिवार कृषि व्यवसाय पर आधारित होते हैं। इन परिवारों का आकार बड़ा होता है। इन परिवारों में परंपरागत आदर्श व नियमों का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। इन परिवारों में व्यक्ति के संबंध प्राथमिकता के होते हैं।
9. नगरीय परिवार (Urban Family) नगरीय परिवारों का आकार छोटा या सीमित होता है। यह परिवार नगर समुदाय में पाये जाते हैं। इन परिवारों में सदस्यों के बीच व्यक्तिवादिता की भावना पाई जाती है। नगरों में मुख्यतः एकाकी परिवार पाये जाते हैं।
10. संयुक्त परिवार (Joint Family) संयुक्त परिवारों में सदस्यों की संख्या अधिक होती है। इन परिवारों
में एक समय में तीन-चार पीढ़ियों के लोग इकट्ठे रहते हैं। वे एक सामान्य रसोई में बना भोजन करते हैं। इन परिवारों के सदस्य अपनी आय को साझा रखते हैं तथा साझे रूप से एक-दूसरे के सहयोग के साथ अपनी आवश्यकता को पूरा करते हैं।
11. एकाकी परिवार (Nuclear Family)- यह परिवार आकार में छोटे या सीमित होते हैं। इन परिवारों में सदस्यों की संख्या कम होती है। इन परिवारों में पति-पत्नी और उनके अविवाहित बच्चे साथ रहते हैं। नगरीय समुदायों में इस तरह के परिवार पाये जाते हैं।
विवाह
(MARRIAGE) विवाह आठ प्रकार के होते हैं।
प्राचीन काल भारत में चार प्रकार के विवाह प्रचलित थे ब्रह्म विवाह, दैव विवाह, आर्ष विवाह, गन्धर्व विवाह । विवाह प्राचीनतम सामाजिक संस्थाओं में से एक है विवाह एक स्वीकृत सामाजिक प्रणाली है जिसकी अनुसार दो या अधिक व्यक्ति परिवार की स्थापना करते हैं। मानवसभायता के विकास में विवाह की उल्लेखनीय भूमिका है। विवाह के माध्यम से परिवारों की स्थापना होने लगी एवं नातेदारी (kinship) का विकास हुआ। विवाह का उद्देश्य
(i) मनुष्य की लैंगिक इच्छाओं की पूर्ति को मान्यता देना है।
(ii) विवाह से व्यक्ति को मानसिक संतुष्टि प्राप्त होती है। (iii) इससे बच्चों को सामाजिक सुरक्षा प्राप्त होती है। (iv) यह परिवार की आर्थिक आवश्यकताओं
की पूर्ति करता है।
(v) इससे वंश परंपरा आगे बढ़ती है। दूसरी ओर हिंदू विवाह को एक सामाजिक समझौता ना मानकर धार्मिक संस्कार माना जाता है। हिंदू विवाह को अटूट माना जाता है क्योंकि इसे परमात्मा द्वारा पूर्व निश्चित माना जाता है। इस विवाह को मौलिक सुख का नहीं अपितु आध्यात्मिक सुख का साधन माना जाता है। हिंदू विवाह को धर्म के पालन तथा संतानोत्पत्ति के लिए आवश्यक मानते हैं।
# धर्मसूत्र एवं धर्मशास्त्र क्या हैं ?
उत्तर - धर्मसूत्र एवं धर्मशास्त्र हिंदुओं के प्राचीन ग्रंथ हैं। इनमें समाज के लिए विस्तृत आचार संहिताएँ दी गई हैं। ब्राह्मणों के लिए इनका पालन करना आवश्यक था। बाकी समाज से भी यह आशा की जाती थी कि वह इसका अनुसरण करे।
मनुस्मृति क्या थी ? इसका संकलन कब हुआ ?
- (i) मनुस्मृति धर्मशास्त्रों में सर्वाधिक प्रसिद्ध ग्रंथ था।
(ii) इसका संकलन 200 ई० पू० से 200 ई० के मध्य हुआ।
स्त्री का गोत्र
(THE GOTRA OF WOMEN)
1000 ई० पू० के बाद लोगों को गोत्रों के अनुसार वर्गीकृत करने की एक ब्राह्मणीय पद्धति का प्रचलन हुआ। इसमें प्रत्येक गोत्र एक वैदिक ऋषि के नाम पर होता था। उस गोत्र के सभी सदस्यों को ऋषि का वंशज माना जाता था। गोत्रों के दो नियमों को विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण माना जाता था। प्रथम, विवाह के पश्चात् स्त्रियों को पिता की अपेक्षा पति के गोत्र का माना जाता था। दूसरा, एक ही गोत्र के सदस्य आपस में विवाह नहीं करवा सकते थे।
प्राचीन भारतीय सामाजिक संगठन में प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने वर्ण के अनुसार कार्य करता था। धर्मसूत्रों एवं धर्मशास्त्रों के अनुसार वर्ण चार हैं। ये हैं ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र। वर्ण व्यवस्था में समाज के कार्यों को इन चार वर्षों अथवा वर्गों (categories) में बाँटा गया है। इसका उद्देश्य यह था कि समाज के सभी कार्य सुचारु रूप से चलते रहें। इस व्यवस्था में समाज में दर्जा जन्म के अनुसार निर्धारित माना जाता था। ब्राह्मण इसे एक दैवीय व्यवस्था (divinely ordained) मानते थे। धर्मसूत्रों एवं धर्मशास्त्रों में चारों वर्णों के लिए आदर्श जीविका से जुड़े अनेक नियम भी दिए गए हैं। इन नियमों का पालन करना प्रत्येक वर्ण के लिए आवश्यक था।
1. ब्राह्मण के कार्य (Functions of Brahmanas) ब्राह्मणों को समाज में सर्वोच्च स्थान प्राप्त था। उन्हें
देवता समान माना जाता था। पुरुषसूक्त के अनुसार वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न हुआ। अतः ब्राह्मण को श्रेष्ठ कार्य दिए गए हैं। उसके प्रमुख कार्य यज्ञ करना एवं करवाना, वेदों का अध्ययन करना, शिक्षा देना, दान देना एवं लेना तथा शासकों को परामर्श देना था। ब्राह्मण के बिना कोई भी धार्मिक कार्य अधूरा समझा जाता था। समाज में ब्राह्मण का विशेष सम्मान किया जाता था। लोग अपनी समर्था अनुसार उन्हें दान देते थे। यदि ब्राह्मण का अपने व्यवसाय से गुजारा नहीं होता था तो वह क्षत्रिय अथवा वैश्य का कार्य अपना सकता था।
2. क्षत्रिय के कार्य (Functions of Kshatriyas) वर्ण व्यवस्था में क्षत्रिय का स्थान ब्राह्मण के बाद दूसरा था। क्षत्रिय की उत्पत्ति ब्रह्मा की भुजाओं से हुई मानी गई है। उसके प्रमुख कार्य राज्य का शासन, रक्षा तथा संचालन करना थे। राजा क्षत्रिय होता था। वह ब्राह्मण की सलाह से राजकाज चलाता और दंड व्यवस्था को लागू करता था। इसके अतिरिक्त क्षत्रिय साम्राज्य की सुरक्षा के लिए उत्तरदायी होता था। किसी भी आक्रमण के समय उसे अपने शत्रुओं से दो-दो हाथ करने पड़ते थे। धर्मशास्त्रों में क्षत्रिय को ब्राह्मणों का आदर करने तथा विलासी जीवन से दूर रह कर अपने कर्त्तव्यों का पालन करने को कहा गया है। आवश्यकता पड़ने पर वे वैश्य के कार्य अपना सकते थे।
3. वैश्य के कार्य (Functions of Vaishyas) वैश्यों को वर्ण-व्यवस्था
इनकी उत्पत्ति ब्रह्मा को जांघ से हई मानी जाती है। वैश्यों के प्रमुख कार्य वेदों का अध्ययन करना, दान देना. -व्यवस्था में तीसरा स्थान दिया गया है। यज्ञ करना, कृषि, व्यापार तथा ब्याज पर ऋण देना थे। वैश्य वर्ण भी आवशकता पर दूसरे वर्षों का व्यवसाय अपना सकता था।
4. शुद्र के कार्य (Functions of Shudras) शूद्र की उत्पत्ति ब्रह्मा के पैरों से हुई मानी जाती है। जो स्थिति शरीर में पैरों की है वही स्थिति प्राचीन काल भारतीय समाज में शूद्रों की मानी जाती थी। समाज की सेवा का सारा भार उन पर ही होता था। उनका प्रमुख कर्त्तव्य द्विज़ों अथवा तीनों उच्च्च वर्णों की सेवा करना था। उसे कोई धार्मिक और सामाजिक अधिकार प्राप्त नहीं थे। उच्च जाति के लोग शूद्रों पर घोर अत्याचार करते थे। शूद्रों को वेद पढ़ने अथवा सुनने का अधिकार नहीं था। आगे चलकर उन्हें बढ़ईगिरी, चित्रकारी, पच्चीकारी, रंगसाजी आदि व्यवसाय करने का अधिकार मिल गया। महाभारत में शूद्रों को शिल्प, कृषि तथा पशुपालन आदि व्यवसाय अपनाने का अधिकार दिया गया।
ब्राह्मणों ने उपरोक्त नियमों का पालन करने पर विशेष बल दिया। इस संबंध में उनका कथन था कि वर्ण व्यवस्था एक दैवीय व्यवस्था है। दूसरा, वे शासकों को यह उपदेश देते थे कि वे इस व्यवस्था के नियमों को अपने राज्यों में लागू करवाएँ। तीसरा, उन्होंने लोगों को यह विश्वास दिलाया कि उनका दर्जा जन्म घर आधारित है। अतः इनका उल्लंघन एक दंडनीय अपराध एवं पाप माना जाएगा। इस संबंध में महाभारत एवं अन्य अनेक ग्रंथों में वर्णित कहानियों पर बल दिया जाता था।
जाति
उत्तर- जाति शब्द से हमारा अभिप्राय उस सदस्यता से है, जो जन्म पर आधारित है। जाति को योग्यता के आधार पर नहीं बदला जा सकता। प्रत्येक व्यक्ति को जाति के आधार पर समाज में उच्च अथवा निम्न स्थान प्राप्त होता था।
जाति प्रथा की विशेषताएं
1) जाति की सदस्यता जन्म पर आधारित होती थी।
(ii) जाति में व्यवसाय जन्म से ही निर्धारित किए जाते थे।
(iii) प्रत्येक जाति के व्यक्ति को अपनी जाति के नियमों का पालन करना पड़ता था।
प्र. जाति से जुड़े प्रमुख प्रतिबंध
(i) प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जाति से संबंधित व्यवसाय अपनाने पड़ते थे।
(ii) उसे खान-पान संबंधी प्रतिबंधों का पालन करना पड़ता था।
(iii) इसे अपनी जाति के अंदर ही शादी करवानी पड़ती थी
(iv) शूद्रों को पढ़ने अथवा मंदिरों में जाने की आज्ञा नहीं थी।
(v) शूद्रों को उच्च जाति के लोगों के साथ छूने तथा सार्वजनिक कुओं से जल भरने की आज्ञा नहीं थी।
. जाति को एक बंद समूह क्यों है ?
जाति व्यवस्था में व्यक्ति की सदस्यता उसके जन्म पर आधारित होती है। वह जिस जाति में जन्म लेता है सारी जिंदगी उसी जाति के घेरे में रहना पड़ता है। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जाति से संबंधित व्यवसाय ही अपनाने पड़ते थे। कोई भी व्यक्ति अपनी योग्यता के कारण किसी और जाति में प्रवेश नहीं कर सकता था। प्रत्येक जाति के व्यक्ति को अपनी जाति के नियमों का पालन करना पड़ता था। उसका उल्लंघन करने वाले को जाति में से निष्कासित कर दिया जाता है।
प्मज. जाति प्रथा के गुण
(i) यह अपनी जाति के सदस्यों को सामाजिक तथा मानसिक सुरक्षा प्रदान करती है।
(ii) एक जाति के सदस्य परस्पर एक-दूसरे की सहायता के लिए सदा तैयार रहते हैं। इससे आपसी सहयोग की भावना बढ़ती है।
(iii) इससे जाति व्यवसाय सुरक्षित रहते हैं तथा उनमें निपुणता आती है।
सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना
जाति अपने सदस्यों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करती है। प्रत्येक जाति के सदस्य अपनी जाति के सदस्यों की सहायता के लिए सदा तैयार रहते हैं। इसलिए किसी व्यक्ति को चिंता करने की आवश्यकता नहीं रहती। वह इस बात से अच्छी तरह अवगत होता है कि किसी भी संकट के समय उसे अपनी जाति के अन्य सदस्यों द्वारा पूर्ण सहयोग प्राप्त होगा।
जाति प्रथा के कोई दोष
(1) जाति छुआछूत की भावना को प्रोत्साहित करती है।
(ii) जाति सामाजिक एकता के मार्ग में बाधक होती है।
(iii) जाति व्यवस्था में श्रम और धन का असमान वितरण पाया जाता है।
वर्ग (CLASS)
विश्व के सभी समाजों में वर्ग पाए जाते हैं। कोई भी ऐसा समाज दिखाई नहीं पड़ता जो पूर्णतः वर्गहीन हो। ये वर्ग आयु, लिंग, शिक्षा, व्यवसाय तथा आय के आधार पर आदिकाल से बनते रहे हैं। वर्ग ऐसे व्यक्तियों का समूह है जो एक-दूसरे को समान समझते हैं। अन्य शब्दों में, सामाजिक वर्ग समान सामाजिक स्थिति वाले व्यक्तियों का समूह है जो जन्म के अतिरिक्त किसी अन्य आधार पर बनता है। सभी सामाजिक वर्गों की समाज में अपनी निश्चित स्थिति होती है जिसके अनुसार उन्हें समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।
I. वर्ग का अर्थ की(Meaning of Class)
"एक सामाजिक वर्ग समुदाय का वह भाग है जो सामाजिक स्थिति के आधार पर दूसरों से पृथक् किया जा सके।'
. जाति और वर्ग मे अंतर
-(i) जाति की सदस्यता जन्म पर और वर्ग की आर्थिक हैसियत पर आधारित होती है।
(ii) जाति में सामूहिक चेतना आवश्यक नहीं है, वर्ग के सदस्यों में वर्ग चेतना होती है।
(iii) जाति बंद और वर्ग खुली सामाजिक संरचना है।
🕉️ महाभारत: संक्षिप्त विवरण
✍️ रचना और भाषा
रचयिता: महाभारत की रचना महर्षि वेदव्यास ने की थी
500ईपू से 500ई रचना काल
भाषा: यह संस्कृत भाषा में लिखा गया था।
श्लोकों की संख्या: इसमें लगभग 1 लाख (100,000) श्लोक हैं, जो इसे संसार का सबसे बड़ा महाकाव्य बनाते हैं।
पुराना नाम****जय
महाभारत में परिवार का मुख्य गृहपति कहलाता था
कथा का सार
👑 कौरव और पांडव
कौरव: राजा धृतराष्ट्र के 100 पुत्र, प्रमुख दुर्योधन।
पांडव: राजा पांडु के 5 पुत्र—युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव।
धृतराष्ट्र अंधे थे, इसलिए राज्य युधिष्ठिर को मिलने की संभावना थी, पर दुर्योधन ने सत्ता हथियाने का षड्यंत्र रचा।
🔥 मुख्य घटनाएँ
1. लाक्षागृह षड्यंत्र: पांडवों को जलाने का प्रयास हुआ, पर वे बच निकले।
2. द्रौपदी स्वयंवर: अर्जुन ने मछली की आंख भेदकर द्रौपदी से विवाह किया। द्रौपदी बाद में सभी पांडवों की पत्नी बनीं।
3. इंद्रप्रस्थ की स्थापना: पांडवों ने अपना अलग राज्य बनाया।
4. जुए का खेल: युधिष्ठिर को छल से हराया गया। पांडवों को 13 वर्ष का वनवास और 1 वर्ष का अज्ञातवास भुगतना पड़ा।
5. द्रौपदी चीरहरण: दुर्योधन के दरबार में द्रौपदी का अपमान हुआ। श्रीकृष्ण ने उसकी लाज बचाई।
⚔️ कुरुक्षेत्र युद्ध
यह युद्ध कौरवों और पांडवों के बीच कुरुक्षेत्र नामक स्थान पर लड़ा गया।
यह युद्ध 18 दिनों तक चला।
दोनों पक्षों से भीष्म, द्रोण, कर्ण, अभिमन्यु, घटोत्कच जैसे वीर मारे गए।
🕊️ श्रीकृष्ण की भूमिका
कृष्ण स्वयं युद्ध में नहीं लड़े, परंतु अर्जुन के सारथी बने।
युद्ध से पूर्व जब अर्जुन मोह में पड़ गए, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें जीवन, धर्म, कर्म और आत्मा के बारे में उपदेश दिया — यही भगवद्गीता है।
📖 भगवद्गीता
श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया ज्ञान।
इसमें कुल 700 श्लोक हैं।
यह गीता आज भी जीवन और कर्म की एक महान शिक्षापुस्तक मानी जाती है।
🏆 युद्ध के बाद
युद्ध में पांडव विजयी हुए और युधिष्ठिर ने राज्य संभाला।
अंत में पांडवों ने राज्य त्यागकर स्वर्गारोहण के लिए हिमालय की यात्रा की।
🌟 महाभारत की शिक्षाएँ
धर्म बनाम अधर्म का संघर्ष
लोभ, ईर्ष्या और अहंकार का परिणाम
कर्म का महत्व – “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन”
सत्य, संयम, और कर्तव्य का मार्ग ।
. महाभारत काल में स्वियों की स्थिति कैसी थी ?
उत्तर- महाभारत काल में स्त्रियों की स्थिति अच्छी न थी। इस काल में पुत्र को पित्तरों का उद्धार करने वाला
महाभारत में वर्णित जीवन
(LIFE AS DEPICTED IN THE MAHABHARATA
(क) राजनीतिक जीवन (Political Life)
१. गणराज्यों की स्थापना (Establishment of Vast Kingdoms महाभारत काल में आर्यों ने विशाल राज्यों की स्थापना कर ली थी। कुरु, पवार कौशांबी कौशल कामी, मगच तथा विदेह इस काल के विस्तृत राज्य थे। ये राज्य इतने विशाल थे कि इन्हें अनेक प्रशासनिक इकाइयों में विधाका किया गया था ताकि प्रशासन को कुशल ढंग से चलाया जा सके। इस काल में राजतंत्रात्मक तथा गणतंत्रात्यक दोनों प्रकार को प्रणालियाँ विद्यमान थीं।
2. राजा (The King) महाभारत काल में राजा का पद सर्वाधिक महत्वपूर्ण था। उसे देवतुल्य माना जाता था। वह बहुत शान-शौकत के साथ भव्य राजमहल में रहता था। राजा का पद सामान्यतः वंशानुगत होता था। राजा के पश्चात् उसका ज्येष्ठ पुत्र सिंहासन पर बैठता था। महाभारत काल में राजा के प्रमुख कर्तव्य ये थे-(1) प्रजा की सुरक्षा करना, (ii) राज्य में शांति स्थापित करना (iii) कृषि को पोल्पाहन देना (2) दान देना (1) सड़कों का निर्माण करना, (vi) प्रजा के भौतिक तथा नैतिक उत्थान में महायता देना।
3. मंत्रिपरिषद् (The Council of Ministers) महाभारत काल में राजा ने कुशल प्रशासन के उद्देश्य में एक मंत्रिपरिषद् का गठन किया था। महाभारत में मंत्रियों की संख्या 36 बताई गई है। राजा राज्य प्रशासन के महत्त्वपूर्ण विषयों में इनसे परामर्श लेता था। केवल नीतिकुशल, ईमानदार, चरित्रवान् तथा प्रतिभावान व्यक्तियों को ही मंत्री पद पर नियुक्त किया जाता था। राजा मंत्रियों के परामर्श के बिना कोई महत्वपूर्ण निर्णय नहीं ले सकता था। इस काल के महत्त्वपूर्ण मंत्री ये थे (1) पुरोहित, (2) युवराज (3) चमूपति (सेनापति),(iv) द्वारपाल, (v) प्रदेष्ठा (न्यायाधीश), (6) नगराध्यक्ष, (vii) दंडपाल (पुलिस अध्यक्ष), (viii) दुर्गपाल तथा, (ix) धर्माध्यक्ष। इन सभी मंत्रियों को तीर्थ की संज्ञा दी गई थी।
4. प्रशासनिक इकाइयाँ (Administrative Units) महाभारत काल में राज्य की कुशल शासन व्यवस्था के लिए इसे अनेक प्रशासनिक इकाइयों में विभाजित किया गया था। प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी। इसका मुखिया ग्रामिणी कहलाता था। प्रत्येक ग्राम लगभग आत्म निर्भर होता था। ग्राम से ऊपर दस ग्रामों का एक समूह होता था। इसका प्रमुख अधिकारी दशग्रामी कहलाता था। इसी प्रकार बौरा ग्रामों के प्रमुख अधिकारी को विषयपति, सौ ग्रामों के अधिकारी को शतग्रायी तथा हत्तार ग्रामों के अधिकारी को अधिपति कहा जाता था। ये सभी अधिकारी अपने अधीन क्षेत्र में शांति व्यवस्था स्थापित करने, अपराधियों को दंड देने तथा भू-राजस्व एकत्र करने के लिए उत्तरदायी थे।
5. वित्तीय व्यवस्था (Financial Administration)- महाभारत काल में कुशल वित्तीय व्यवस्था की स्थापना की गई थी। राज्य को आय का प्रमुख सोत भू-राजस्व था। यह उपज का 1/6 भाग होता था। व्यापारियों, खानों तथा वनों पर भी कर लगाए जाते थे। अपराधियों से जुर्माना वसूल किया जाता था। ब्राह्मणों, स्त्रियों तथा बच्चों को करों से मुक्त रखा गया था। महाभारत में राजा को वित्तीय व्यवस्था के संबंध में सतर्क रहने का परामर्श दिया गया है। कर का उद्देश्य प्रजा का सुख, समृद्धि तथा सुरक्षा माना गया था।
6. न्याय व्यवस्था (Judicial Administration)- महाभारत काल में न्याय व्यवस्था का उल्लेखनीय विकास हुआ। राजा को सर्वोच्च न्यायाधीश माना जाता था। वह प्रदेष्ठा नामक मंत्री के परामर्श से निर्णय देता था। उसका निर्णय अंतिम माना जाता था। राजा न्याय करते समय जाति तथा रीति-रिवाजों को ध्यान में रखता था। दोनों पक्षों के गवाह बुलाए जाते थे। निर्दोष प्रमाणित करने के लिए अग्नि तथा जल परीक्षाएँ प्रचलित थीं। अपराधियों को जुर्माना करने, उन्हें देश-निकाला दिए जाने तथा अंग भंग करने की सजाएँ प्रचलित थीं। इस काल में घोर अपराधियों को मृत्यु दंड दिया जाता था किंतु ब्राह्मण इस दंड से मुक्त थे।
7. सेना व्यवस्था (Military Administration)- महाभारत काल में प्रत्येक राजा अपने साम्राज्य की सुरक्षा एवं इसके विस्तार के लिए एक विशाल सेना रखता था। सेना के चार पैदल सेना, हाथी सेना, घुड़सवार सेना तथा रथ सेना प्रमुख अंग थे। इस कारण सेना को चतुरंगिणी कहा जाता था। इन चार प्रमुख अंगों के अतिरिक्त जल सेना, गुप्तचर तथा यातायात विभाग भी थे। राजा ही सेना का सर्वोच्च सेनापति होता था तथा वह ही युद्ध के समय अपनी सेना का संचालन करता था। युद्ध में सैनिक ढाल, तलवार, गदा, भाला, बरछा, धनुष-बाण तथा अनेक प्रकार के अग्नि तथा जहरीले अस्त्रों का प्रयोग करते थे। इस काल में युद्ध संबंधी कुछ नियम बनाए गए थे जिनका पालन करना अनिवार्य था।
(ख) सामाजिक जीवन (Social Life)
1. परिवार (Family)-महाभारत काल में परिवार को समाज की मूल इकाई माना जाता था। इस काल में भी परिवार संयुक्त एवं पितृ प्रधान रहे। अब भी परिवार का सबसे वयोवृद्ध व्यक्ति जिसे गृहपति कहते थे, परिवार के कार्यों की देखभाल करता था। परिवार के सभी व्यक्ति उसके आदेशों की पालना करना अपना आदर्श समझते थे। परिवार में पुत्र का होना गर्व की बात समझी जाती थी क्योंकि वह ही वंश को आगे बढ़ा सकता था तथा अन्य धार्मिक अनुष्ठानों को पूर्ण कर सकता था।
2. स्त्रियों की स्थिति (Position of Women)- महाभारत काल में स्त्रियों की स्थिति अच्छी न थी। इस काल में पुत्र को पित्तरों का उद्धार करने वाला तथा पुत्री को घोर संकट का कारण समझा जाता था। इसके बावजूद महाभारत में अनेक ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहाँ पुत्रियों को अपने माता-पिता द्वारा असीम प्यार दिया गया था। कन्याओं की शिक्षा की ओर विशेष ध्यान दिया जाता था। वे गृह कार्यों में दक्ष होती थीं। उन्हें वेदों तथा दर्शन शास्त्रों की शिक्षा के अतिरिक्त संगीत तथा नृत्य की भी शिक्षा दी जाती थी। कुंती, दमयंती, देवयानी तथा द्रौपदी इस काल की प्रतिष्ठित स्त्रियाँ थीं। इस काल में विवाह को अनिवार्य समझा जाता था। महाभारत में अपनी कन्या का विवाह न करने वाले व्यक्ति को ब्रह्मघाती कहा गया है। इस काल में बाल विवाह जैसी कुप्रथा का प्रचलन नहीं था। कन्याओं के वयस्क होने पर उनका विवाह किया जाता था। उन्हें अपना पति चुनने की स्वतंत्रता थी। राजवंशों में विवाह प्रायः स्वयंवर प्रथा द्वारा होते थे। महाभारत काल में पर्दा प्रथा प्रचलित थी अथवा नहीं इस संबंध में इतिहासकारों में मतभेद हैं। इस काल में वेश्या प्रथा प्रचलित थी। इस काल में सती प्रथा का प्रचलन भी आरंभ हो गया था। इन प्रथाओं के कारण समाज में स्त्रियों के theसम्मान को अवश्य धक्का लगा था। डॉक्टर अरुण भट्टाचार्जी के अनुसार, "स्त्रियों की स्थिति दयनीय हो गई थी। उन्हें पुरुषों के बराबर नहीं समझा जाता था। उन्होंने समाज में अपना सम्मान खो दिया था।
3. जाति प्रथा (Caste System)- महाभारत काल में जाति प्रथा वैदिक काल की अपेक्षा अधिक कठोर हो गई थी। इस काल में भी समाज चार प्रमुख जातियों- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र में विभाजित था। समाज में ब्राह्मणों को सर्वोच्च स्थान प्राप्त था। वह राजा का प्रमुख परामर्शदाता तथा पथ प्रदर्शक होता था। उसका प्रमुख कार्य वेदों का अध्ययन करना, यज्ञ-हवन आदि करना, दान लेना तथा देना तथा समाज की बौद्धिक उन्नति में सहायता देना था। इस कारण उन्हें समाज में विशिष्ट सुविधाएँ प्राप्त थीं। उन्हें मृत्यु-दंड तथा करों से मुक्त रखा गया था। इस काल में अनेक ब्राह्मणों ने क्षत्रियों तथा वैश्यों के कार्यों को अपना लिया था। समाज में दूसरा महत्त्वपूर्ण स्थान क्षत्रियों को प्राप्त था। वे योद्धा तथा प्रशासक थे। वैश्य प्रमुखतः कृषि, पशु-पालन तथा व्यापार का कार्य करते थे। शूद्र समाज का सबसे निम्न वर्ग था। उसका मुख्य कार्य द्विज जातियों की सेवा करना था। उन्हें वेदों तथा धर्मशास्त्रों के अध्ययन के अधिकार से वंचित कर दिया गया था। इस प्रकार जो भी व्यक्ति जिस जाति में जन्मता उसे उस जाति का ही कार्य करना पड़ता था। इस काल में इन चार प्रमुख जातियों के अतिरिक्त अनेक जातियाँ एवं उपजातियाँ भी प्रचलित थीं। ये जातियाँ यवन, शक, पहलव आदि विदेशी जातियों द्वारा भारतीयों के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित करने के कारण उत्पन्न हुई थीं।
4. पोशाक (Dress) महाभारत काल में जनसाधारण लोगों की पोशाक सादी थी। इस काल में सूती, ऊनी तथा रेशमी वस्त्रों का प्रयोग किया जाता था। इस काल में स्त्री एवं पुरुष दो प्रकार के वस्त्र- अधोवस्त्र (यह कमर के नीचे भाग में पहना जाता था) तथा उर्ध्ववस्त्र (यह कमर के ऊपरी भाग में पहना जाता था) पहनते थे। लोगों में रंगीन वस्त्र धारण करने की बहुत रुचि थी। कुछ वस्त्र विशेष अवसरों से संबंधित थे जैसे मंगलमय अवसरों पर श्वेत वस्त्र, मृत्यु के अवसर पर काले वस्त्र तथा युद्ध के अवसर पर लाल रंग के वस्त्र धारण किए जाते थे। कभी-कभी साधु कंबल, मृगचर्म तथा सन के बने हुए वस्त्र भी धारण करते थे। पुरुषों में पगड़ी अथवा मुकुट धारण करने की प्रथा प्रचलित थी। स्त्रियाँ भी अपना सिर ढकती थीं। कुछ पुरुष दाढ़ी-मूँछ रखते थे जबकि कुछ उन्हें कटवा लेते थे। स्त्रियाँ अपने बालों को विभिन्न प्रकार से संवारती थीं तथा उनमें फूल भी लगाती थीं। इस काल में स्त्री एवं पुरुष दोनों ही आभूषणप्रिय थे। वे सोने, चाँदी, हीरे, मोती, बहुमूल्य पत्थरों, पीतल तथा जानवरों की हड्डियों आदि से निर्मित विभिन्न प्रकार के आभूषण धारण करते थे।
5. भोजन (Diet)- महाभारत काल में जनसाधारण लोगों में शाकाहारी भोजन प्रचलित था। वे गेहूँ, जौ, चावल, दालों, सब्तियों, दूध, दही तथा घी आदि का प्रयोग करते थे। वे अपने भोजन को स्वादिष्ट बनाने के उद्देश्य से नमक, विभिन्न प्रकार के मसालों, गुड़, शक्कर आदि का प्रयोग करने लगे थे। इस काल में पूड़ी, हलवा तथा खीर का प्रचलन काफी बढ़ गया था। इस काल में लोग प्याज और लहसुन से परिचित थे किंतु उपयोग निंदनीय था।
आयोजित प्रीतिभोज के अवसरों पर विभिन्न प्रकार का माँस (गाय का माँस खाना वर्जित था) तथा मदिरापान का प्रचलन था।
6. मनोरंजन (Amusements)- महाभारत काल के लोग विभिन्न साधनों से अपना मनोरंजन करते थे। इस काल के लोगों के मनोरंजन के प्रमुख साधन शिकार, नृत्य तथा संगीत थे। इस काल में जुए का प्रचलन बहुत बढ़ गया था। युधिष्ठिर ने तो जुए में द्रौपदी को भी दाँव पर लगा दिया था। इनके अतिरिक्त मल्ल युद्ध तया हाथियों के युद्ध भी लोगों के मनोरंजन के महत्त्वपूर्ण साधन थे। लोगों के मनोरंजन के लिए सुंदर उद्यानों तथा जलकुंडों का भी निर्माण किया गया था।
(ग) आर्थिक जीवन (Economic Life)
1. कृषि (Agriculture)- महाभारत काल में लोगों का प्रमुख व्यवसाय कृषि था। कृषि के लिए हलों का मुख्य रूप में प्रयोग किया जाता था। ये हल लकड़ी तथा लोहे से बनाए जाते थे तथा उन्हें बैलों द्वारा खाँचा जाता था। इसके अतिरिक्त कुदाल तथा हंसिया का प्रयोग भी किया जाता था। राज्य की ओर से कृषि को प्रोत्साहन दिया जाता था। वह सिंचाई की समुचित व्यवस्था तथा कृषकों को तकावी कर्ज प्रदान करता था। किसी को भी कृषि को क्षति पहुँचाने की अनुमति नहीं थी। कृषक कृषि की उपज बढ़ाने के उद्देश्य से खाद का प्रयोग करते थे। इस काल की प्रमुख फ़सलें गेहूँ, जौ, चावल, तिल, गन्ना तथा आम थे। इनके अतिरिक्त विभिन्न प्रकार की दालें, सब्तियाँ तथा अन्य फल भी उपजाए जाते थे।
2. पशु-पालन (Domestication of Animals)- महाभारत काल में पशु-पालन भी लोगों का एक महत्त्वपूर्ण व्यवसाय था। इस काल में भी पशुओं को समृद्धि का माप माना जाता था अर्थात् जिसके पास जितने अधिक -पशु होते थे, उसे उतना ही धनवान् माना जाता था। इस काल में पाले जाने वाले प्रमुख पशु गाय, बैल, भेड़-बकरियाँ, घोड़े, हाथी, कुत्ते, गधे तथा ऊँट थे। इस काल में भी गाय की पूजा की जाती थी तथा
उसके वध पर निषेध था। लोग पशुओं के स्वभाव, उनके गुणों तथा रोगों आदि से भली-भाँति परिचित थे।राज्य की ओर से भी पशुओं की देखभाल की जाती थी तथा इस उद्देश्य से गोपाध्यक्ष नामक अधिकारी नियुक्त किए गए थे।
3. व्यापार (Trade)- महाभारत काल में व्यापार को प्रोत्साहन देने के लिए राज्य की ओर से विशेष पग उठाए F गए। प्रथम, प्रमुख नगरों को सड़क मार्गों से जोड़ा गया था। दूसरा, वस्तुओं के निर्यात तथा आयात पर कम चुंगी लगाई जाती थी। तीसरा, माल को ढोने के लिए समुद्री तथा नदी मार्गों का अधिक प्रयोग किया जाने लगा क्योंकि यह साधन सड़क मार्ग की अपेक्षा अधिक सस्ता था। चौथा, इस काल में शिल्पियों तथा वणिकों के संघ अधिक संगठित हो गए थे। इनके प्रधान को श्रेष्ठि अथवा जेठक कहा जाता था। इन संघों को राज्य की ओर से मान्यता प्राप्त थी। इन संघों ने व्यापार को प्रोत्साहन देने में प्रशंसनीय भूमिका अदा की। कुरु,
- पाँचाल, मगध, कोशल, कौशांबी, काशी, विदेह तथा अंग इस काल के प्रसिद्ध व्यापारिक नगर थे। 4. अन्य व्यवसाय (Other Occupations)- महाभारत काल में उपर्युक्त व्यवसायों के अतिरिक्त अनेक प्रकार के अन्य व्यवसाय भी प्रचलित थे। इनमें वस्त्र उद्योग सर्वाधिक उन्नत था। इस काल में सूती, ऊनी तथा रेशमी वस्त्र तैयार किए जाते थे। इस काल में आभूषण बनाने की कला भी बहुत उन्नत थी। ये आभूषण सोने, चाँदी, बहुमूल्य पत्थरों तथा हाथी दाँत आदि से निर्मित किए जाते थे। इनके अतिरिक्त इस काल में अनेक लोग कुम्हार, बढ़ई, रंगरेज, रथकार, खनिक, नट, ज्योतिषी, मणिकार, संगीतकार तथा वैद्य आदि का व्यवसाय भी करते थे।
(घ) धार्मिक जीवन (Religious Life)
1. नए देवता (New Deities)- महाभारत काल में वैदिक काल में प्रचलित प्राकृतिक देवी-देवताओं की पूजा लोप हो गई थी। इनका स्थान ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव ने ले लिया था। ब्रह्मा को सर्वोच्च देवता माना गया। उसे संसार का रचयिता माना जाता था। दूसरा स्थान विष्णु को मिला। उसे संसार का पालक तथा रक्षक माना जाता था। तीसरा स्थान शिव को प्राप्त हुआ। उसे संसार को नष्ट करने वाला माना जाने लगा। इस प्रकार त्रिदेव के सिद्धांत का प्रचलन हुआ। इनके अतिरिक्त इस काल में दुर्गा, काली तथा पार्वती आदि देवियों का महत्त्व बढ़ गया।
2. अवतारवाद (Incarnation)- महाभारत काल में अवतारवाद का सिद्धांत प्रबल हो गया। लोगों का यह मानना था कि ईश्वर समय-समय पर इस संसार में पापियों का नाश करने तथा धर्मियों का उत्थान करने के लिए अवतार धारण करता है। श्रीराम तथा श्रीकृष्ण को विष्णु का अवतार माना जाने लगा।
3. यज्ञ (Yajnas)- महाभारत काल में भी यज्ञों का प्रचलन था। राजसूय तथा अश्वमेध यज्ञों को अब भी महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। स्वयं श्रीराम, कौरवों तथा पांडवों ने अनेक यज्ञ किए थे। इस काल में यज्ञों में दी जाने वाली पशु बलि धीरे-धीरे लुप्त हो गई थी। लोगों में यह धारणा अधिक प्रबल हो गई थी कि सच्चा यज्ञ वह है जो अहिंसा तथा आत्मसंयम पर आधारित हो।
4. नए सिद्धांत (New Principles) महाभारत काल में आवागमन, मुक्ति तथा कर्म सिद्धांत पर अधिक बल दिया जाने लगा। इस काल में लोगों का विश्वास था कि मनुष्य मृत्यु के पश्चात् पुनर्जन्म धारण करता है। इस आवागमन के चक्र से मुक्ति पाने के लिए मोक्ष पाना आवश्यक समझा जाता था। उनका यह दृढ़ विश्वास था कि मनुष्य को उसके कर्मों के अनुसार फल मिलता है। श्रीकृष्ण ने गीता में निष्काम कर्म पर बल दिया है।
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