AUTOBIOGRAPHY of Tej Ram Verma
विषय AUTOBIOGRAPHY. जीवन वृतान्त
Written by T.R.V.
Retired Teacher
Date of Birth: 15-09-1934
Date of First Appointment: 16-4-1953 As a Laboratory Assistant
Date of Passing Examination:
Matric: 6-5-1962
Date of First Appointment
as a Teacher. 2-7-1962
तेज राम वमा (सेवानिवृत अध्यापक)
सम्पादकीय..
"मुझे इस पुस्तक को आप सभी को समर्पित करते हुए हार्दिक प्रसन्नता हो रही है। पुस्तक को श्री तेज राम जी की प्रेरणा तथा प्रयासों से प्रकाशित किया गया है। पुस्तक में सुनाल परिवार के लगभग दो सौ वर्ष से लम्बे इतिहास को कागज के पन्नों पर चित्रार्थ करने का प्रयास किया गया है। पुस्तक में यदि कोई कमी रह गई हो तो मैं आप सभी से क्षमा चाहूंगा"
10 July 2016
आपका
जीवन
(1) Dadi ji ki kalam se
मेरा नाम भन्ती देवी है। मैं समझती हूं कि लेखक ने मुझे ही इस लेख का महान पात्र बनाया है। इस लेख में यह दर्शाया गया है कि माता के भाग्य में घी नहीं और घी के भाग्य में माता नहीं। दोनों का भाग्य अलग-अलग होता है। माता के भाग्य में ६-७ बाल-बच्चे हो जाते हैं। जबकि उसकी लड़की की कोई भी सन्तान नहीं होती है। इस लेख में माता जी का भाग्य देखो, कहां जन्म हुआ, कहां तरुणी हुई, उस की खानदानी में परिवार कहां से कहां तक, शिक्षा के क्षेत्र में पहुंचकर वर्तमान अपनी आजीविका कमा रहे हैं। बच्चे अच्छी पोस्ट में कार्यरत हैं। पोते-पोतियां भी अच्छी पोस्ट में कार्य कर रहे हैं। पोते के लड़के भी अच्छी डिग्री लेकर अभी तक सरकारी नौकरी के इन्तज़ार में हैं। हरेक भाग मे रहन-सहन, खान-पान, रस्म-रिवाज, समाज में कैसा परिवर्तन आया देखोः
(2)
PART (1)भाग प्रथम
मेरा नाम भन्ती देवी है। मेरा जन्म 1901 में जलूग्राम खोड़ा छानी में हुआ था। और खोड़ा छानी गांव में तरुणी हुई। मेरे पिता ने मेरा रिश्ता दूरदराज जगह पर कर दी थी। मैंने अपने पिता श्री रतुराम जी से कहा, मुझे ऐसा रिश्ता पसन्द नहीं है। और मेरी तरफ से इन्कारी है। यह आप अच्छी तरह सोच लो ।
जब मैं 15-16 वर्ष की हुई तो एक सुशील लड़के के साथ सुदामा नाम के व्यक्ति के साथ गांव खोड़ा छानी से इलोप (Elope) कर गई और गांव कसान ईलाका तुंगल में पहुंच कर यहीं रहने लगी। यही पर बुढ़ी हो गई। इधर बाल-बच्चे होने के बाद 84 वर्ष की अवस्था में मेरा देहान्त हो गया।
PART (II)
Brief Charactoer of Smt. Bhanti Devi
श्रीमति भन्ती देवी का संक्षिप्त चरित्र (N.S.)
नारी नारी में अन्तर, कोई हीरा कोई कंकर ।
(3)
श्रीमति भन्ती देवी उपरोक्त लिखित कहावत; पर चरितार्थ होती है। वह एक सुशील स्त्री थी। विवेकशील थी। सबके साथ प्रेम से रहना पसन्द करती थी। शिक्षा की ओर इसका बड़ा झुका था। और धार्मिक विचारों वाली स्त्री थी।
ईसकी छत्र-छाया में बच्चे रहकर और पढ़कर (मिल्ट्री) (Miltary) में चले गए और सुबेदार और हवलदार बन कर 25-30 वर्ष देश की सेवा कर के सेवानिवृत हो कर घर आ गए हैं। श्रीमति भन्ती देवी धार्मिक पूजा-पाठ में लगी रहती थी। भगवान के सिवाय वह किसी से नहीं डरती थी। (She Fear none but God)। बेकार की बातें असत्य बोलना उसे पसन्द नहीं था। पूर्ण आयु तक वह शाकाहारी ही रही।
गांव के लोग उस से बड़ा प्रेम करते थे। सुबह शाम ईश्वर की स्तुति करती थी। उस का कथन था, प्यारे बच्चो प्रेमपूर्वक सबके साथ रहो। किसी के साथ लड़ाई झगड़ा मत करना और बुरी संगति से दूर रहना ईश्वर पर विश्वास रखना, उसे प्रति दिन याद करना। 84 वर्ष की आयु होने पर ईश्वर को प्यारी हो गई।
ईश्वर उसे अच्छा जन्म दे यही हमारे सम्पूर्ण परिवार की अभिलाषा है।
(4)Part III
मामा नेसू राम के भाई और बहिनें सम्बन्धी विशेष लेख जो इस प्रकार दर्शाया गया है:
१. सर्व प्रथम श्री नेसूराम पुत्र श्री रतुराम गांव खोड़ा छानी कामक 1989
२. श्रीलच्छीराम पुत्र श्री रतुराम गांव खोड़ा छानी कामक 1986
३. श्री मोतीराम (करोड़पति) पुत्र श्री रतुराम गांव खोड़ाछानी कामक 1992
४. श्रीमति भन्ती देवी पुत्री श्री रतुराम गांव खोड़ा छानी कामक 1984
५. श्रीमति धर्मा देवी पुत्री श्री रतुराम गांव खोड़ा छानी Now alive
६. मामी जी का स्वर्गवास हो गया है।
Part (IV)
श्री नेसू राम के परिवार का लेखः
सर्व श्री तेज प्रताप सिंह पुत्र नेसू राम गांव खोड़ा छानी B.A. (A.D.O.
श्री प्यारे लाल पुत्र नेसू राम गांव खोड़ा छानी बगिया का काम Matric
(5)Part V
तेज प्रताप सिंह के परिवार के सदस्यः
जीवन लाल पुत्र तेज प्रताप सिंह गांव खोड़ा छानी (Post Graduate)
लाल सिंह पुत्र तेज प्रताप सिंह गांव खोड़ा छानी (Matric)
श्रीमति वंदना देवी पुत्री तेज प्रताप सिंह गांव खोड़ा छानी
(Post Graduate in Science, P. W.D.)
Part (VI)
प्यारे लाल के परिवार का परिचयः
प्यारे लाल पुत्र श्री नेसू राम गांव खोड़ा छानी (Matric)
दो प्यारे लाल के लड़के हैं। दोनों मैट्रिक पास हैं। और बगीचे का कार्य करते हैं तथा सब्जियां उगाते हैं।
Part (VII)
लच्छी राम के परिवार का संक्षिप्त परिचय
१. श्री लच्छीराम पुत्र श्री रतु राम गांव खोड़ा छानी (Died)
२. लड़का मान सिंह पुत्र लच्छी राम गांव खोड़ा छानी
Retired from Judiciary
लड़की श्रीमति शकुन्तला देवी Matric and now in service Mistress
(6) Part (VIII)
मोती राम मामा के परिवार का संक्षिप्त परिचयः
१. श्री मोती राम पुत्र रतुराम गांव खोड़ा छानी (Died)
२. श्री हरि सिंह पुत्र मोतीराम गांव खोड़ा छानी (Matric)
३. श्री श्याम लाल पुत्र मोतीराम गांव खोड़ा छानी (+2 Reading)
४. प्रिया देवी पुत्री मोतीराम गांव खोड़ा छानी (+2 Married)
५. विमला देवी पुत्री मोतीराम गांव खोड़ा छानी (Now alive)
Part (IX
मामा नेसूराम का कैसा व्यवसाय था (Profession)
मामा नेसूराम के पास 100 बिघा जमीन है। 50 प्रतिशत जमीन में सेब, आखमानी, प्लम, का बगीचा लगा रखा है और प्रति वर्ष 2, अढाई लाख रुपये की आय हो जाती है। घर के दोनों मकान सलैब के हैं। खेतीबाड़ी उनके पोते करते हैं। दुकान भी है, एक ट्रक भी है। नेसू राम के दोनो पुत्र पुरानी जगह पर नहीं रहते, अलग-अलग मकान बनाया है और बगीचे का कार्य करते हैं। सब्जियां उगाते हैं और अच्छा कार्य चल रहा है।
(7)
Part (X)
सड़क सम्पर्क :National Highway Nh21
Bhuntar to Manikaran 30 K.m.
Bhuntar5 to Khor Chhani 20 Km.
आईये मामा जी का कुल्लू जिले गांव खोड़ा छानी में कैसा प्रभुत्व था इस के विषय में ज्ञान प्राप्त करें। मामा जी कुल्लू जिले में एक प्रसिद्ध व्यक्ति थे। वे स्कूलों में S.B. अध्यापक के रूप में स्कूलों में अंग्रेजी-उर्दू-हिन्दी के प्रख्यात व्यक्ति थे। जन्मजात तो उनकी कुल्लू भाषा थी। अधिकतर वे कुल्लू भाषा में बोलते थे। जो सबको बड़ी ''प्यारी लगती है। पढ़ाई सम्बन्धी उन के अन्दर बड़ा ज्ञान था। जब कभी ईधर गांव कसाण में अपनी दीदी के पास मिलने आते तो मामा जी के भानजे उनका बड़ा अभिनन्दन करते। फिर दोपहर का भोजन (Lunch) खाकर जो भानजे शिक्षा ग्रहण कर रहे होते, उनको अपने पास बुलाकर और पढ़ाई सम्बन्धी प्रश्न पूछते, यदि बच्चों को न आये तो स्वयं उत्तर दे देते। आज तक हमारी Family कहां से कहां पहुंच गई है। यह सब माता-पिता, मामा-मामी का बड़ा आशीर्वाद है। कोटी-कोटी प्रणाम उनको, आपको याद होगा एक बार भारत वर्ष के प्रधानमन्त्री श्री पण्डित ज्वाहर लाल ग्रीष्म कालीन के समय कुल्लू में आये थे। (1955-56) कुल्लू की भोली-भाली जनता ने उनका हार्दिक स्वागत किया। सार्वजनिक स्थानों पर विशेष रूप से गेट (Gate) स्वागत करने के लिए लगाये गए। सौभाग्यवश से मेरे मामा जी को एक भाषण (Speech) देना था। एक घण्टा तक उन्होंने भाषण दिया, उनका विषय था कि कुल्लू भाषा में उस रामायण के पाठ का प्रतिपादन (Translation) किया जिससे पंडित जी बड़े प्रभावित हुए। पण्डित जी ने मामा जी को उपहार (Gift) दिया और मामा जी की भूरी-२ प्रशंसा (Every Good Praise) की
कुल्लू भाषा में शिमला से रेडियो स्टेशन से उनके कार्यक्रम प्रसारित होते रहते थे। जिन्हें हम गांव कसाण में भी रेडियो द्वारा सुनते रहते थे।
Part (XI)
(Brief Charater of Shri Nesu Ram) (नेसू राम)संक्षिप्त से श्री नेसूराम का चरित्र :
श्री नेसूराम एक कर्मठ कर्मशील, शान्तिप्रिय, सुशील, दयावान, विवेकशील और मिलनसार (Amicable) व्यक्ति थे। शिक्षा की ओर उन का बड़ा ध्यान था। वे उर्दू के बड़े विद्वान थे। उनका ध्येय थाः पढ़ो और आगे बढ़ो। गांव के अन्दर उनका बड़ा सम्मान था। जहां पर वी.आई.पी. व्यक्ति आते तुरन्त उन्हें बुलाते या भाषण (Speech) तैयार करवाते। हमारे परिवार की यही इच्छा है कि ईश्वर उन्हें अच्छे कुल में जन्म दे।
Part (XII)
आइये हम अपने वंशावली चार्ट के विषय में प्रकाश डालें Pedigree
हमारे पूर्वजनों की जन्म भूमि (Birth Place and land) सैण नामक जगह पर थी। जो कसाण से २५-३० किलोमीटर दूर है। सैण चोपड़ा में है। सैण चोपड़ा से एक व्यक्ति भौरा (Migrate) करके वहां से गांव कसाण में बस (Settle here) गया। हमारा गोत्र काश्व है।
All Brothers are living separate from 1982 and their houses are also separate now.
1. तेजराम ने अलग मकान का निर्माण कर दिया है।
२ सेवकराम ने भी अलग मकान का निर्माण किया है।
3. रेलूराम ने भी अलग मकान का निर्माण किया है।
4. मनीचन्द ने भी अलग मकान का निर्माण किया है।
5. नेकराम पुराने घर के सारे मकान में रहता है।
Part (XIII)
श्री सेवकराम के लड़कों का व्यवसाय (Profession Qualification)
श्री सेवकराम सर्विस से रिटायर
श्री योग राज मिलटरी में सर्विस करता था और घर में आया हुआ था।अचानक अटैक पड़ा, मर गया। (मैट्रिक)
श्री नरेश कुमार कारपेन्टर का काम (मैट्रिक)
श्री गिरधारी टेलर मास्टर (+२)
All Girls has been married
(10)
Part (XIV)
As you know that Sudama was the son of Poshu. At that time Sudama was the Chief of the family and Shrimati Bhanti Devi was his wife of Sudama. Shrimati Bhanti Devi gave to Birth of Four Children as:
Sh Shiv ram(Died)
Girls Domni Devi (Died)
Dashi Devi, Kala Devi (Both girls are still alive)
Part (XV)
Now Shiv Ram's families are the following:
अब शिवराम का परिवार इस प्रकार है:
लड़के: श्री जालम राम- लाला, भाग चन्द Married
3-बहिनें : Still all children are alive and they are live separate now.
Part (XVI)
As you know that the Sudama was the son of Poshu and Smt. Bhanti Devi was the wife of Sudama. After some time Sudama has died. According to the customs of society
Smt. Bhanti Devi has to settle, And relationship with Late Sh. Paras Ram. During the Paras Ram times Smt. Bhanti Devi gave to birth of five children named as Sh. Tej Ram, Relu Ram, Mani Ram, Nek Ram and one sister Lata Devi it was the period of 1930.
And all the children were illiterate (अनपढ़) up to 1945. Some children were sent to school. But I was not sent to school (Tej.Ram.) and became illiterate person.
Part (XVII) सामाजिक जीवन उस समय
''आईये 1950 का समय कैसा था इसके विषय में आप को बतलायें, सारे बुजुर्ग बड़े दुःख तकलीफ में रहकर इस संसार से विदा हो गए। उन्होंने जिन्दगी का आनन्द नहीं लिया। अच्छा खाया पिया नहीं, अच्छे वस्त्र नहीं पहने, रात-दिन मेहनत मजदूरी करते। उस समय राजों का प्रभुत्व था, और बड़ा डरपोक जमाना था जब कभी सरकार के बड़े हाकिम या राजा गावं के दौरे पर आते तो पटवारी तहसीलदार जेलदार उनके मनोरंजन के लिए गांव के अन्दर आकर जिस के पास भेड़-बकरियां होती थीं बिना पूछे काटने के लिए ले जाते थे। कोई पैसा नहीं देते थे। (मालिक को)रजवाड़ों का भूमि के उपर पूरा अधिकार था, काश्तकारों ने सारी साल बड़ी मेहनत से खेतों में कार्य किया होता, फसल आने पर बझिये किसान के घर में आकर 50 प्रतिशत अनाज को कर के रुप में ले जाते थे। हमारी माता जी ने कर का विरोध किया कि काश्त हम करें और अनाज आप ले जायें. यह कहां की इन्सानियत है। और लोगों ने भी माता जी का समर्थन किया। लेकिन कौन सुने? विवश थे। भारतवर्ष अंग्रेजों के अधीन था खतरी लोगों को बोलबाला था। उस समय कभी-कभी सार्वजनिक स्थानों पर जलसे भी होते रहते थे। (कर बन्द करो) काश्तकार अपना हक मांगते थे। जो काश्त करते हैं, उन की जमीन होनी चाहिए। और कर नहीं देंगें। यह आन्दोलन 1970 तक चलता रहा आज कल जो काश्त करते हैं। उनकी जमीन है। 1988 में चकबन्दी हो गई है। लोग आजकल अच्छी फसल पैदा करते हैं। और किसान अब अनाज का आयत-निर्यात भी करते हैं।
Part (XVIII)
तेजराम के परिवार का विवरण इस प्रकार से है:
तेजराम वर्मा घर का मुखिया है। उम्र 76
लड़के : श्री हुकम चन्द्र (मैट्रिक) Now he is JE in P.W.D. Mandi
श्री नरेन्द्र कुमार M.Sc. (Ph.D.) forestry in Solan District
लड़की : श्रीमती नर्वदा देवी (Matric) B/Com Mistress in P/S
श्रीमती प्रभी देवी पत्नी तेज राम (73) (Domestic Wife) बिलकुल अनपढ़ है।
श्री रेलू राम का परिवार इस प्रकार से है :
श्री रेलू राम घर का मुखिया है Retired from Military Sup/Died
श्रीमती सितला देवी पत्नी श्री रेलू राम (अनपढ़) Died
लड़के :
१. संतोष कुमार पुत्र रेलु राम दुकान करता है। Married
२. केशर सिंह + २ पुलिस विभाग में कार्यरत है। Married
लड़कियां:
श्रीमती रुकमणी देवी (Matric)Service in Medical Deptt (M)
श्रीमती हिमाली देवी (Matric) Domestic Wife Married
श्रीमती भवना देवी (B.A. Domestic Work (Married)
Part (XX)
नेकराम का परिवार इस प्रकार से है:
नेकराम घर का मुखिया है (Matric) Retired from Education Deptt.
श्रीमती माचली देवी पत्नी श्री नेकराम (4th) Domestic work
लड़के : जीत राम पुत्र नेक राम (B.Sc.) Teacher in Education Deptt.
सोमदत्त : (M.Sc.) Teacher Math
खेम चन्द M.Com., Private Sr Sec. School Kotli Working 10 years.
श्री मनीराम का परिवार इस प्रकार से हैः
श्री मनीराम घर का मुखिया था (6th) Died
श्रीमती भागो देवी पत्नी मनीराम Domestic work (Alive) अनपढ़ है
लड़के :
1. भीम सैन पुत्र मनी राम +2Service in Medical Deptt. Kinour
2.हुकम चन्द पुत्र मनी राम +2, Service in Military
3.भीष्म +2, Service in Military Deptt.
लड़कियां :
1. सावित्री देवी illiterate domestic work at home
2. सरोज कुमारी Illiterate died
श्री परसराम के पांचो पुत्र के लड़कों ने (परस राम के पोते) अपने अपने लड़कों और लड़कियों की शादी अच्छे खाते-पीते सम्पन्न परिवार से कर रखी है। और उनके सब बच्चे (परस राम के पोते) 62 प्रतिशत सरकारी नौकरी पर कार्यरत हैं।
मैं तेजराम आशा करता हूं कि इन सब का परिवार भविष्य में दिन दुगनी, रात चौगुनी तरक्की करे और सब के परिवार में सुख शान्ति बनी रहे, यही मेरी अभिलाषा है।
Part(XXIII) 1950-60 का सामाजिक परिवेश
आइये 1950 से 1960 तक समाज के विषय में बतलायेंगे कि उस समय समाज के अन्दर रहन-सहन, खाना-पीना, समाज के अन्दर क्या-क्या रसम रिवाज थे? लोगों का व्यवहारिक जीवन कैसा था? समाज के अन्दर गरीबी कैसी थी? इस के विषय में मैं चन्द एक शब्द प्रस्तुत कर रहा हूं, ध्यान से पढ़ो !
क्योंकि हमारे माता-पिता जी भी इसी स्थिति में थे। उस समाज की तुलना वर्तमान समाज से करो देखो कितना फर्क है। मैं तेजराम वर्मा पुत्र स्वर्गीय श्री परस राम माता स्वर्गीय श्रीमती भन्ती देवी, श्री परस राम की दूसरी पत्नी श्रीमती भन्ती देवी का प्रथम पुत्र हूं। मेरा जन्म 15 सितम्बर 1934 में एक निर्धन परिवार गांव कसाण में हुआ, माता-पिता जी की अधिक संतान होने के कारण बच्चों का लालन-पालन बड़ी कठिनाई से होता था। जिससे मैं शिक्षा ग्रहण नहीं कर सका। परिणाम स्वरूप घर में ही रहना पड़ा। खेती-बाड़ी करना, भेड़-बकरियों को चराना, लकड़ी-पानी, घराट से आटा लाना यह सब कार्य मुझे ही करने पड़ते थे।
यदि किसी समय दिन में कार्य नहीं होता तो मैं अपने यार-दोस्तों के साथ खड में जाकर मछली मारता, यही मेरा दिनचर्या थी। कभी कभी ठीक तरह से कार्य न करना, जिस की वजह से माता-पिता जी से मार भी खानी पड़ती थी। मुझे लिखना-पढ़ना बिल्कुल नहीं आता था। मेरे लिए काला अक्षर भैंस बराबर था। अनपढ़ था घर में भाई-बहिनें अधिक थी जिसकी वजह से खाना-पीना भी पूर्ण मात्रा में नहीं मिलता था। कभी-कभी तो दूसरों के घरों से अनाज लाकर भोजन सारे परिवार को खाना पड़ता था। बरसात के दिनों में जंगल नजदीक होने के कारण जंगल के जानवर रात के समय खेत की फसल को खा जाते थे। बहिनें बड़ी होती जा रही थी। इनकी शादियां दिन-प्रतिदिन माता-पिता जी को बड़ी चिन्ता लग रही थी। कि इन की शादियां कैसे करें? आय का कोई भी साधन नहीं है। कभी-कभी तो बच्चे बिना भोजन किए सो जाते थे। आलू और वननाल के पतरोड़े खा कर सो जाते थे। सहकारिता की प्रथा थी। गांव के 10-20 आदमी इकट्ठे होकर खेतों में कार्य करते थे। घास काटते थे। शादी के लिए चावल माह और गेहूं तथा पैसा मांग कर लाते थे। फिर लड़के-लड़कियों की शादी करते थे। पैसे का अभाव था। बड़ी मुश्किल से पैसा मिलता था। गांव में गरीब जनता रहती थी। दूर-दूर जाकर अनाज और पैसा मांग कर लाते थे।
इधर सारी जमीन बझियों की थी। फसल आने पर आधा भाग फसल का वे अपने घरों को ले जाते थे। काश्तकारों से बझिये बहुत सी चीजें बसूलते थे। जैसे काफल, अरबी, घण्डयाली, मिर्च, दालें पदियां दूध दहीं और वसी के रुप में रुपये 20-30-50 रुपये प्रति वर्ष लेते थे। यदि किसी बझिये के घर में शादी लगी हुई हो तो गांव से दूध-दहीं और काम करने के लिए 5-6 दिन मंडी में लगते थे। बगार का कार्य भी करवाते थे। यदि बझियो के सामान उठाने के लिए घोड़ा नहीं मिलता तो वे किसान लोगों से बगार का कार्य करवाते थे। या जिस व्यक्ति ने कर लिया होता था उसे स्वयं पीठ पर उठाकर उनके घर छोड़ना पड़ता था। गर्मी के दिनों में द्रंग में जाकर पशु के लिए काला नमक पीठ पर उठाकर लाना पड़ता था। और अपने लिए डानू में नमकीन पानी भी लाना पड़ता था। गांव के अन्दर गाय-बकरी भेड़-भैंस बड़ी मैंहगी नहीं होती थी। 10-20-40-100-150-200-500 रुपये तक बड़े जानवर मिल जाते थे। अनाज गेहूं चावल, मक्की, घी, दूध बहुत ही सस्ता मिलता था।
चावल 16 कि. 20/-
मक्की 16 कि. 6/-
आटा 16 कि. 10/-
घी 1 कि. 10*/-
दूध 1 कि. 8-
मीट 1 कि. 15/-
सोना तोला 400-500/-
चान्दी 1 कि. 60-70/-
फल 1 कि. 0-50/- सेब 1 कि. 1/-
अनार 1 कि. 0-50/-
कपड़ा 1 मीटर 0-75/-
पितल 1 कि. 10-12/-
तांबा 1 कि. 20-25/-
लोहा 1 कि. 0-60/-
यातायात के साधन
आने जाने के साधन पैदल थे। गरीब लोग लकड़ी पीठ में लादकर मंडी में बेचते थे। फिर आधे पैसे का सामान घर को लाते थे। कपड़े की सिलाई लोग हाथ से करते थे। मोटे कपड़े का अधिक रिवाज था। किसान लोग चमड़े के जुते पहनते थे। कपड़े की बूट बहुत ही सस्ते थे। 10-12, 15 रु० प्रति जोड़ा मिल जाता था। यदि गांव के अन्दर शादी लगी हुई हो तो लोगों का वर्तन इस प्रकार का था। शादी के घर में लोग पटारु-ट्रंक, गिलास, कौलियां, थाली लोटा इत्यादि का अधिक रिवाज था। कपड़े के सूट बड़े सस्ते मिलते थे। स्त्रियों के आभूषण अधिकतर चान्दी के होते थे। चान्दी के कडु व पातरु वाला बालू (नथ) सिर के उपर कोका लगाया जाता था। स्त्रियां अच्छा समझती थी।
धार्मिक
लोग मन्दिर में जाकर मानता करते थे। पुजारी बाद में उन्हें आशीश प्रदान करते थे। और एक जंत्र (Amulet प्रदान भी करते थे। यह जंत्र दुःख तकलीफ को दूर कर देता था। ऐसा लोगों का विश्वास था।
रहन सहन
लोग सोने के लिए धान के कटले की मांजरियां इस्तेमाल करते थे। बैठने के लिए कटले के बिने बनाते थे। चक्की-पिसना, धान कुटना, घराट पिसना यह आम बात थी। रोशनी के लिए मिट्टी का तेल इस्तेमाल करते। लालटैन होती थी। लोग खेतीबाड़ी बड़ी मेहनत से करते थे।
फसल
लोग खेतों में मक्की, धान, कोदरा, सौंख, सरयारा कागदी माह, भरठ, कोलथ बिजते थे।
लोग अधिकतर संयुक्त परिवार में रहते थे। मकान के दरवाजे 4-5' के होते थे। हमारे दोनों गांव में केवल 20 घर थे। आज कल 300 घर हो गए हैं। गांव के अन्दर कोई भी स्कूल नहीं था। साईगलू में एक लोयर मिडल स्कूल था (6th) गांव में 99% अनपढ़ता थी।
हिमाचल मे 'टेरी टोरियल (Teritorial Government) थी (सरकार) थोड़े पढ़े लिखे लोगों को नौकरी शीघ्र मिल जाती थी। अधिक लोग मिलट्री (Military) में भर्ती हो जाते थे। सरकारी कर्मचारी से लोग अपना कार्य पैसे देकर करवाते थे। लुगड़ी का विवाह शादी में बड़ा रिवाज था। लोग मंडी जाकर लाईसेंस बनाते थे। लोग गुप्त रूप से शराब भी निकालते थे। गांव के अन्दर पटनाल में एक शराब की भट्टी थी, वहां से लोग 0-75/0.50 पैसे देकर एक शराब की बोतल लाते थे। लड़ाई-झगड़े बहुत कम देखने को मिलते थे। नौ तोड़ जमीन 1-2 वर्ष में मिल जाती थी। मैंने भी लमैर में नौ-तोड़ जमीन ले रखी है। (5-12-12)
लड़की वाले अपने कुड़म से अधिक पैसा वसूल करते थे। उसे ब्रिणा कहते हैं 6-7 वर्ष तक कुड़म के घर का काम करना पड़ता था। तब वे लड़की देते थे। (Engagement) बटे-सटे का रिवाज था। लड़कियों को कोई शिक्षा नहीं दी जाती थी। 14-15-16 वर्ष की लड़कियों की शादी माता-पिता कर देते थे। सास-ससुर बहू को लाड़ी कह कर पुकारते थे। गांव में अधिकतर घर मोटे चाके के होते थे और गऊशाला घास की होती थी। फिर स्लेट आई, फिर सलैब के बने। 7-10 प्रति सैकड़ा चाके मिलते थे। शादी में 3-4 मन आटा और 14-15 मन चावल लगते थे। विवाह शादी में। लोग मौज तथा स्त्रियां लाहण कुड़म को देती थी या उसके रिश्तेदार को देती (लाहण)। लोग सुनकर बहुत खुश होते थे। शादी में व कार्य करने के लिए 10-12 लोग करते थे। उन्हें पनहारी कहते है। पनहारी लोग गुड़-- खंड का हलवा बनाकर खाते थे। आटा भंडारी (Butler) से मांगते थे। मकान के लिए पत्थर 5-10-15 रु० प्रति सैकड़ा थे। बुजुर्ग लोग रात के समय गिठे के पास बैठकर कथा देते थे। सुनने वाले बड़े खुश होते। बहुए सोने से पूर्व अपने सास ससुर के पैर अवश्य धुलाती, पति के पैर धुलाती फिर उनके लिए बिस्तरा बिछाती। अधिकतर लोग जमीन पर सोते थे।
चारपाई का रिवाज कम था, हमारे घरम (T.R.) 1960 से पहले कोई चारपाई नहीं थी (देवता नराज होता है) प्रत्येक घर की बहुए 5-6 बजे उठकर बाउड़ी से या नजदीक के स्त्रोत से पानी लाती, प्रतिदिन गाय, बैल, बकरी, भैंस, भेड़ गांव के अन्दर बडा रिवाज था शादी में वेद तोरन मामा तैयार करता था। फिर शादी के घर लाता था।
लुहार 4-5 रु० वेद की कीमत लेता था। शादी के समय मामा जी का स्थान महत्वपूर्ण होता था। मामा की तरफ से वर को कमीज. पटकू, लैहंगा-सूट छोटा मोटा सामान लाकर देता था। लड़के की शादी में टिका 0-25, 0-50, 1-00 रु० था। शादी में पडिंत 30-40-60 ले जाते थे। पंडित लोग 1-2 दिन पहले घर में आकर शादी का सामान लिखवाकर मंगवाते थे। शादी में कांसे का थाल अवश्य देते।
विवाह शादी लोग पजामा-पैंट-वास्कट कुलफनावा साफा लगाते थे। वास्कट में सागली लगाते थे। शादी में बरात के समय ढोली ढफाली रंसिगा यही होते थे। बरात का डेरा शादी के घर से तकरीबन 50-60 मीटर दूर देते। 1-2 घंटे विश्राम के बाद लग्न के लिए बुलाते और लग्न करवाते, दूसरे दिन नाश्ता देना जिसमे बड़ी-चूड़-दहीं होता और चपाती गेहूं की होती थी। सबसे पहले बरात वालों को भोजन करवाते, भोजन के दौरान, भात को पर्ट के द्वारा भात को बाध देते थे। फिर कोई बराती पर्ट का प्रति उत्तर दे कर भात को खाते। स्त्रियां लाहणा देती, यह सारा कार्य मखौल के रूप में होता था। जस्ट फॉर जोक
बोटी का स्थान बड़ा महत्वपूर्ण होता थ। कोई भी व्यक्ति अजली देकर नहीं चल सकता था। एक मन कच्चे चावल का रेट 4-5 रु० प्रति मन होता था। कुल देवता को बली देते, जातर देते, गाय के साथ 4-5 आदमी बहू को लेकर उसके ससुराल में छोड़ते। लडद्यकी ससुराल वाले उन आदमी की बड़ी सेवा करते। रास्ते में किसी रिश्तेदार के घर हो तो लड़की वाले 2-3 भले स्वाली शकुन के रूप में देते बरात को रास्ते में मौहक मिलता था। 1-2-3 रु० मौहक वाले को दे देते। बड़ा खुश होता था। मुद्रा, टका, आना, दो आना पितल के होते थे। और तांबे के ० पैसे होते थे।
एक अप्रैल 1957 में 16 आने को नये पैसे में बदल दिया था। जो वर्तमान यही सिक्का है।
मलका का रुपया 1950-51 तक चलता रहा। अब इसका बाजारी मूल्य 120, 130 रु० है। एक रुपया, पांच रुपया, सौ रुपया का नोट था। एक रुपये पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का चित्र भी था। खाद के लिए गाय, बकरी, भैंस, बैल का गोवर खेतों में डालते थे। जिससे फसल अच्छी होती थी। मेले के लिए लोग मंडी में पैदल जाते थे। और छोटा-मोटा सामान लेकर घर को वापिस आते थे। गरीब लोग लकड़ी बेचकर गुजारा करते थे।
बरसात के दिनों में गरीब लोग चावल की कणियां लाकर बच्चों का लालन-पालन करते थे। कोदरे का झोल बनाते थे। बड़े जिमीदार को दरा चावल 8-10 वर्ष तक बेचने के लिए घर में रखते थे। आप के दादा जी ने तीन बच्चों की इकट्ठी शादी की थी। पिता जी ने सुराड़ी निचली से 11 मन चावल लाये थे। @ 11 रु० मन यह चावल पीले रंग वाले थे। जो बहुत ही फारे थे। (१० वर्ष के) लोग कुल देवता, ग्राम देवता, भूमि में थान को अधिक मानते थे।
शिकारी, शिकार करने का बड़ा शौक रखते थे। जंगल में जाकर काकड़, घोरड़, कलेशा, साहील, तीतर, भटेर अन्य पक्षियों का शिकार करते थे। यदि गांव में किसी व्यक्ति की मृत्यु होती तो 40-50 आदमी उस का संस्कार करने के लिए व्यासा नदी तक ले जाते थे। पूजा-पाठ, हवन, देव-देवी की पूजा बड़े शौक से करते थे। मेले में टमक बजाना अच्छा समझते थे। आना-जाना गांव के अन्दर पैदल था। गांव के घर चौकी के रूप में थे। 2-3 भाई इकट्ठे चौकी में रहते थे। घर का मुखिया माता-पिता होता था। प्रत्येक घर में हुक्का अवश्य होता था। तम्बाकू खुद पैदा करते थे। मिस्त्री बहुत सस्ते थे। 10-15 रु० में गोशाला तैयार कर देते थे। शिक्षा का अभाव था। लोग लड़कियों को बहुत ही कम पढ़ाते थे। अधिकतर लड़कियां अनपढ़ होती थी। लड़के 3-4 जमाती ही पढ़ते थे। क्योंकि गांव में स्कूल बहुत दूर थे। यहां तक यदि कोई चिट्ठी आती तो उस आदमी को बहुत दूर पढ़ाने के लिए जाना पड़ता था।
हिन्दुस्तान उस समय अंग्रेजों के अधीन था, अंग्रेज का सख्त राज था। लोग इस सरकार से भयभीत होते थे। लम्बरदार, जेलदार, राजा और वजीर का सन्देश लाकर गांव के लोगों को इकट्ठा कर के फिर उन से कार्य करवाते थे। डर के मारे लोगों की जुबान बन्द होती थी। यदि गांव के अन्दर कोई बड़ा अधिकारी का आगमन होता, जैसे पटवारी, तहसीलदार, जंगलात का बड़ा आफिसर आता तो 20-25 व्यक्ति इकट्ठे हो जाते थे। और उनका बड़ा अभिनन्दन करते। खाना-पीना, सोना चाय का अच्छा प्रबन्ध करते। देश को आजाद कराने के लिए लोगों ने अपनी कुरबानियां दी थी।
15 अगस्त 1947 को भारत वर्ष परतंत्र की बेड़ियों से मुक्त कराया गया। तत्पश्चात् महात्मा गांधी जी को भारत वर्ष का राष्ट्रपिता का दर्जा दिया गया। स्वतन्त्रता के बाद मेरी माता जी के कैसे विवेक जागृति हुए, आईये इस के विषय में प्रकाश डालें। माता जी का कहना था कि बिना शिक्षा से मनुष्य का जीवन अधूरा है। अतः शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनिवार्य है। माता जी के आशीर्वाद से सनवाल की फैमिली आगे बढ़ रही है। इस का विवरण अगले लेख में आयेगा, ध्यान से चिंतन करें।
PART XXIV
15 अगस्त 1947 को भारत ने स्वतन्त्रता प्राप्त की। स्वर्गीय माता भन्ती देवी का झुकाव शिक्षा की ओर अग्रसर बढ़ता गया। क्योंकि माता जी साक्षात लक्ष्मी स्वरुप थी। उसने धीरे-धीरे एक दो बच्चों को मदरशा में भेजना शुरु कर दिये। जैसे रेलूराम, नेकराम व लज्जा देवी saigaloo स्कूल में पढ़ने के लिए जाने लगे। लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में तेजराम को वंचित रहना पड़ा। बड़ा लड़का होने के कारण स्कूल नहीं भेजा गया। घर की चार दिवारों की अन्दर ही रहा। लेकिन मेरे अन्दर पढ़ने की बड़ी जिज्ञासा (Curiosity) थी। एक तख्ती जो सब बच्चों को पाचंवी तक सुलेख के रुप में इस्तेमाल होती थी। सब बच्चे समय-समय पर इस तख्ती का प्रयोग करते रहे। 0-50 पैसे वाली तख्ती की बड़ी देन है। जब मेरी आयु 10-11 वर्ष की थी (T.R.) एक दिन मण्डी से मेरा प्रिय भैया श्री सेवकराम जी घर आया। क्योंकि वो मण्डी में एक सरदार के पास नौकरी करते थे। शाम को जब सारा परिवार गिठे के पास अग्नि सेक रहे थे। तो सेवकराम भैया ने मुझ से विनम्र होकर कहा, अनुज भ्राता तेजराम जी क्या आप किसी जगह पर नौकरी करेंगे? तो मैं आप से बात करूं। मुझे बहुत अच्छा लगा। मैनें फौरन कह दिया अच्छे काम में देरी क्यों? हां में नौकरी करूंगा। फिर उसने पिता जी से बात बात की, माता-पिता जी की सहमती मिल गई।
दूसरे दिन मैं अपने भाई सेवकराम के साथ मण्डी को चले गए। माघ का महीना था। वर्षा से सर्दी बहुत लग रही थी।। एक पजामा और एक मलेसी की कमीज तन पर थी। जाती बार माता-पिता जी को बुरा भी लगा। लेकिन क्या करें, गरीबी पैसे कमाने के लिए विवश कर रही थी। राम और लक्षमण की तरह दूर-२ करके मण्डी पहुंच गए। भाई जी ने मुझे अपनी नौकरी दे दी। और स्वयं ठाकुर चेतराम जज के पास चला गया। मुझे घर की याद आने लगी। सारा दिन रोता रहता था, 7 रु० प्रति मास वेतन मिलता था। उस सरदार का नाम हरनाम सिंह था। उसके 3-4 लड़के और एक लड़की थी। कुल छः व्यक्ति थे। लेकिन सारा दिन कार्य करते-करते थक जाता था। लेकिन क्या करे? घर से आ गया हूं, अब तो तकलीफ सहनी ही पड़ेगी।
एक दिन किसी काम के लिए पिता जी मण्डी में आये जब मैंने उन्हें देखा तो मैं रो पड़ा, और घर को जाने के लिए तैयार हो गया। लेकिन पिता जी ने अपने भरी हुई आंखों से कहा, बेटा अगर आप घर को चले जांएगे तो मण्डी में खतरी अमर सिंह का तथा गांव के कुछ लोगों के पैसा कैसे वापिस होगा?
यह बात 1949 की है। फिर पिता जी ने मुझे मण्डी में ही छोड़ दिया। दूर तक पिता जी को देखता रहा और अपने आप रोता रहा। फिर मैं अपने काम पर पुनः आ गया। बजार को जाता तो सरदार की लड़की को गोद में (3-4) वर्ष की थी) उठाकर कर घूमने घुमाने के लिए प्रति दिन ले जाना पड़ता था। कभी-कभी मैं उस लड़की को डांट भी चढ़ता था। ताकि वह मेरे पास आने से इनकार कर दे, लेकिन वह शायद मुझ से बड़ा स्नेह करती थी। कार्य करते वक्त वह दौड़ कर आ जाती, घुमाने के लिए कहती। जब मैंने उसके भाईयों से पता किया वह शादी कर के अपने पति के साथ विदेश में चली गई है। हरनाम सिंह के लड़के श्री स्वर्ण सिंह ने कहा कि मेरे दो भानजे और एक भानजी है जो उच्च शिक्षा ग्रहण करके वहीं विदेश में सरकारी नौकरी में कार्यरत है। स्वरण सिंह के माता-पिता का देहान्त हो गया। बाकी चारों भाई जीवित हैं। (Still alive)
आइये, हरनामसिंह के घर चलें, पहले दर्जनों के हिसाब से वर्तन राख (Ash) के साथ साफ करना फिर कपड़े से साफ करना यह बड़ा सूचा काम था। इस प्रकार सरदार के पास मैंने 10-11 मास तक कार्य किया। पति-पत्नी का व्यवहार मेरे साथ बहुत अच्छा था। दोनों धार्मिक विचार वाले व्यक्ति थे। जब कभी मैं उन से मिलता, वे मेरे माता-पिता जी के बारे में अवश्य पूछते, मुझे कहते, चलो खाना खा लो, धन्यवाद !
1950 में नौकरी छोड़ कर घर आ गया। केवल पजामा और मलेसी की कमीज मेरे तन पर ही होती थी शायद उस समय मेरी आयु 12-13 वर्ष की हुई होगी। घर में कार्य की अधिकता से मेरा स्वास्थ्य गिरने लगा। घर में तो काम करना पड़ता था जिससे दिन-प्रतिदिन स्वास्थ्य और भी गिरने लगा। घर में कोदरे की रोटी-साग-माह की दाल मिलती थी। कभी-कभी दूध, घी भी माता जी दे देती थी। तीसरे दिन ज्वर आने लगा। घर में काढ़ा बनाकर पीने के लिए देते। 30-40 दिन घर में रहा। पिता जी के साथ जमीन का कार्य करता। घास-पानी, लकड़ी लाना, बकरी चराना, घराट से आटा लाना, यह मेरा घर में रहकर कार्य करना होता । जब भाई पुनः घर में आये तो मुझे उनके साथ भेज दिया गया और पुनः सरदार के पास नौकरी लग गया। एक दिन पिता जी मण्डी में आये, उन्हें देखकर मैं रोने लगा। पिता जी ने कहा, बेटा! क्यों रो रहे हो। क्या कारण है? क्या आप को घर की बुरी लग रही है। हां पिता जी ने फिर सरदार से कहा, लड़के का स्वास्थ्य ठीक नहीं है। अभी लड़का बीमार है। मैं पुनः इसे घर ले जाऊंगा। इसे कुछ दिन तक नौकरी नहीं कराऊंगा। सरदार ने एक मलेसी का सूट देकर पिता जी के साथ घर भेज दिया। इस तरह मैं घर में 2-3 मास तक रहा। अस्वस्थ होने के कारण माता-पिता जी अधिक काम नहीं कराते थे।
PART XXVI
किसान का पुत्र हूं, मुझे घर मे रह कर तो कुछ कार्य करना ही पड़ेगा माता-पिता जी की सेवा से स्वास्थ्य कुछ सुधार, हुआ फिर खेती बाड़ी के कामों में लगभग घर में सब इकट्ठे रहते थे। एक बार प्रिय भैया श्री सेवकराम घर में आया। जब गिठे के पास आग सेक रहे थे। भाई जी ने पिता जी से निवेदन किया, पिताजी गरीबी दिन प्रति दिन हमारे को जकड़ रही है। 1-2 बच्चे पाठशाला को जाते हैं। बहिनों की शादी भी करनी है। आय का कोई भी साधन नहीं है। 200-250 रु० लोगों का कर्ज है। मुझे 20 रु० प्रति मास ठाकुर चेतराम जज मुझे देते हैं। मण्डी में उस के पास काम करता हूं। मैं पुनः सोचता हूं कि भैया तेजराम को फिर नौकरी करने के लिए मण्डी ले जाये, परिवार की अनुमति शीघ्र मिल गई। मेरा स्वास्थ्य भी ठीक था। दूसरे दिन में और प्रिय भैया सेवकराम मण्डी के लिए चल पड़े। जाने से पहले माता जी ने खाने के लिए खिचड़ी और दूध दिया था। माता जी ने अपने पलू की गाठ से खोलकर दोनों लड़कों को एक-एक रुपया भी दिया, आशीर्वाद भी दिया। माता जी की आंखों में आंसू थे। लेकिन दर्शा नहीं सकी।
PART XXVII
माघ का महीना था, सर्दी अधिक भी मेरे पास केवल एक कमीज और दो मलेसी के पजामे थे। दोनों भैया राम और लछमन की तरह रोते-२ मण्डी की ओर पैदल जा रहे थे। मण्डी में पहुंच कर एक-दो दिन भाई जी के खलैर में अपने पास रखा, फिर नौकरी की तलाश में लग गए। फिर पता लगा कि कालिज में एक प्रिसींपल (Principal) है। उस का नाम G.L. शर्मा है। उसे खाना बनाना और घर के कार्य के लिए एक नौकरी की आवश्यकता है। सम्पर्क किया और चले गए, और मुझे 16 रु० पर G.L. शर्मा ने नौकर रख लिया। उस की पत्नी और स्वयं बड़े खराब थे। जा भी मुझे विश्राम नहीं करने देते। सारा दिन काम पर लगा रहता था। घर की सफाई, कपड़े प्रैस करना, धोबी के पास से कपड़े लाना, वर्तन साफ करना, बाहर की क्यारियां साफ करनी, बिस्तरे साफ कर के ठीक करना लगाने इत्यादि कार्य थे। रात को 11 बजे सोना पड़ता था। क्योंकि 9-30 P.M. Dinner करते थे। कालिज के अन्य व्यक्ति भी आते-जाते थे। दिन में 5-6 बार चाय उन्हें पिलानी पड़ती थी। रात 7-8 बजे खाना बनाना फिरशेष भोजन बचता, रुखा-सूखा भोजन से पेट भरना पड़ता। था। मुझे बहुत तकलीफ थी। यदि कार्य करने में जरा सी गलती होती तो दोनो मारने के लिए तत्पर हो जाते। एक दो थप्पड़ अवश्य लगाते। मैं रोता भी था अगर मैं नौकरी छोड़ दूं तो भैया क्या कहेंगे? डर लगता था फिर पुनः कार्य करता। इस तरह एक वर्ष G.L. शर्मा के पास नौकरी करता रहा। सर्दी से मेरा स्वास्थ्य गिर गया था। और हाथ पैर भी फट गए थे।
PART XXVIII
शिवरात्री के दिन थे। पिता जी मेरी देख-रेख के लिए मण्डी में आये। मैं उन्हें देखकर मेरी आंखों में आंसू आ गए। पिता जी ने कहा, बेटा, ठीक से तो है? मैंने कहा, हां पिता जी ठीक से हूं। पिता जी ने फिर पूछा, आपकी आंखों में आंसू कैसे? सचमुच मेरी आंखों में आंसू भर आए थे। पिता जी ने फिर पूछा, नौकरी तो अच्छी तरह से कर रहे हो? मैने कहा, हां परन्तु इधर कार्य अधिक है। काम से मेरे हाथ-पैर फट गए हैं। मैं क्या करूं पिता जी। पिता जी ने दुःखी मुड (Mood) में कहा-कोई बात नहीं, घर का कार्य मुझसे भी नहीं चलता। 1-2 बच्चे पाठशाला में जाते हैं। चलो घर चलें। प्रिंसीपल (Principal) से बात की, प्रिंसीपल साहिब जी यदि आप बुरा न माने तो, मैं इस लड़के को घर ले जाना चाहता हूं। क्योंकि घर में खेतीबाड़ी का कार्य अधिक होने के कारण मुझ से नहीं चलता। मैं इसे आज ही घर ले जाना चाहता हूं। परन्तु (Principal) साहिब ने लड़ाई का मुड (Mood) बना लिया। पिता जी भी उसके प्रश्न का उत्तर प्रति उत्तर देते रहे थे। फिर प्रिंसीपल ने बड़े गुस्से में कहा, ले जाओ इसे, हम किसी और को रखेंगे। मेरी नौकरी का पैसा 191 रु० बनता था। लेकिन पिताजी को प्रिंसीपल जी ने 150 रुपये ही दिए थे। शेष पैसा नहीं दिया। बस फिर पिता जी और मैं घर आ गए।
PART XXIX
कालिज के Principal का और D.E.O. स्कूल का Quarter टारना में एक ही Building में था। और दोनों उसी मकान में रहते थे। Sh. Prem Singh D.E.O. मेरा परिचित था। क्योंकि मैं बजार से उसके लिए सामान भी लाया करता था। एक दिन प्रेम सिंह D.E.O. ने Principal से पूछा? कि आज कल तुम्हारा नौकर कहां है? मैं उसे कई दिनों से नहीं देख रहा हूं। G.L. शर्मा जी ने कहा, वह नौकरी छोड़ उसका पिता उसे घर ले गया। लड़का अच्छा था, काम भी अच्छा करता था। लेकिन कुछ बीमार था। अतः उसका पिता उसे घर ले गया। क्या वह अब ठीक होगा? Prem Singh D.E.O. ने कहा, शायद अब ठीक होगा, Principal G.L. शर्मा ने कहा।
PART XXX
मैं घर में आकर घर के कार्य में लग गया। एक दिन खड में अपने दोस्तों के साथ मछलियां (Fish) मार रहा था। पिता जी ने आवाज़ लगाई, शीघ्र घर को आओ, जरुरी काम है। । किलो मछली के साथ घर शीघ्र पहुंच गया। (T.R.) मैंने पिता जी से पूछा, पिता जी क्या बात है? आप ने मुझे शीघ्र क्यों बुलाया? सामने मैंने देखा एक आदमी पराल की बिनी पर बैठा हुआ है। पिता जी ने कहा, यह आदमी मण्डी से आया हुआ है। और चतुर्थ श्रेणी का कर्मचारी है। Prem Singh D.E.O. द्वारा मण्डी से भेजा है। चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी ने शीघ्र कहा, क्या आपका नाम तेजराम है? दिल में डर लगा हुआ था, हां मेरा नाम तेजराम है। क्या बात है, श्रीमान जी, उस व्यक्ति ने कहा आप को D.E.O. मण्डी वाले ने आपके बुलाया है। आप मेरे साथ मण्डी को चलें। मैं डर गया, क्या कारण है? चतुर्थ श्रेणी के व्यक्ति ने मुझ से पूर्व पिता जी को सब कुछ बतला दिया था कि प्रेम सिंह अपनी मासी के लड़के के पास शिमला में भेजना चाहते हैं। फिर पिता जी ने मुझ से कह दिया था। ऐसी बात है आप का क्या विचार है? (तेजराम) उस दिन वह व्यक्ति हमारे घर में ही रहा। घर में अनाज का अभाव था, गेहूं का आटा नहीं था। केवल कोदरे का 1-2 किलो आटा था, माता जी ने पड़ोसी से मक्की का आटा लाया, माह की दाल बना दी गई, मक्की की रोटी और जो मछलियां मैं लाया था, रस वाली बना दी। और कुछ मछलियां कोदरे का आटा लगाकर तवे के ऊपर बनाई जो बहुत ही स्वादिष्ट होती है, बनाई गई। मेहमान के लिए खाना परोसा गया, एक आधा घंटा बात चीत करते रहे। फिर पैर धोने के लिए पानी दिया गया। अच्छा बिस्तरा लगा दिया गया। सवेरे उसे चाय भी दी उस समय चारपाई की जरुरत थी। लेकिन हमारे पास नहीं थी। अतः मेहमान को पराल की मांजरी के उपर सोना पड़ा। ओढ़ने के लिए एक खेस और एक 3-4 टाली वाली खिंध ओढ़ने के लिए दी गई। सवेरे स्नान के लिए पानी दिया, दूध पीने के लिए, माह की खिचड़ी बनाई गई, खाने के लिए घी भी दिया, यह कार्यक्रम माता और पिता के द्वारा सम्पन्न हुआ। माता जी ने विचार किया होगा लड़का बाहर जा रहा है उसे क्या दिया जाए? हां उसने महात्मा गांधी के फोटो वाला एक २ रुपये वाला नोट निकाक कर मुझे और उस व्यक्ति को दिए। फिर 40-50 मीटर साथ चलकर कर हमारे को विदा किया (मण्डी के लिए)। आइये, आपको प्रेम सिंह के बारे में बतायें वह कौन था?
D.E.O. Q.No.I Who was Prem Singh?
Ans: Sh. Prem Singh was the district Education Officer in Mandi District. He was a good administrator and amicable person in his time. By his ordered I went to Shimla to do some work in the house of Sh. S.N. Sagal. He was the director of Education Officer in Himachal Pradesh. He was a mother's sister son of Sh. Prem Singh.
May he live long!
PART XXXI
उसी दिन 3-4 बजे हम दोनों मण्डी पहुंच गए। मैंने D.E.O. प्रेम सिंह जी को नमस्कार किया, उसने नीचे से उपर तक मुझे निहारा (Look) ठीक है, मुझे लड़का शारीरिक तौर पर चुस्त लगता है। D.E.O. ने एक व्यक्ति से सम्पर्क किया और अपने पास बुलाया। वह आ गया, आप शीघ्र इस लड़के को मेरे मासी के लड़के जो S.N. सैगल है शिमला में Director of Schools Education Officer है। तेजराम को उनके पास ले जाओ। आज ही, और मुझे S.N. सैगल के पास नौकर रख दिया गया। 20 रुपये प्रतिमास वेतन मिलता था। S.N. सैगल की एक लड़की और एक लड़का था। सैगल की पत्नी जम्मु कश्मीर के किसी बड़े अमीर घराने की लड़की थी। जो S.N. सैगल की शादीशुदा पत्नी है। वह बहुत ही नेकवान स्त्री थी। उस के दोनों बच्चे भी Higher Education ग्रहण कर रहे थे। वे भी बड़े Amicable प्रेमभाव में थे। मैं तो बिल्कुल अनपढ़ था। लड़के ने मुझ से पूछा, क्या आप पढ़े लिखे हैं? मैंने कहा श्रीमान जी, मैं तो बिल्कुल अनपढ़ हूं। मेरे लिए तो काला अक्षर भैंस बराबर है। श्रीमान जी हमारे गांव में स्कूल नहीं है। एक है वह बड़े दूर है। माता-पिता जी पढ़ाने के लिए असमर्थ थे। परिवार अधिक है। गरीब परिवार है। नौकरी करने के लिए इधर शिमला में आ गए। लड़के ने कहा, मैं कल कालिज से आती बार आपके लिए हिन्दी और इंगलिश की दोनों पुस्तकें ले आऊंगा। फिर मुझे आधा घंटा गिनती व्यंजन स्वर का ज्ञान देते थे। क्योंकि मेरा मांइड परिपक्व था। शीघ्र ही याद हो जाता था। लेकिन समय की कमी थी। चाय का समय होने पर बड़ी दीदी स्वयं चाय बनाती और लड़का मुझे पढ़ाता रहता था। दोनों बच्चे मुझ से बड़े प्रेम करते थे। मैं भी उन के काम पर तत्पर रहता था। घर की बुरी तो थोड़े दिन तक लगी रही। परन्तु आहिस्ता-२ खत्म हो गई। शायद उस समय मेरी आयु 14-15 वर्ष की होगी। मुझे पढ़ने लिखने का बड़ा आनन्द आने लगा। गिनती और वर्णमाला का ज्ञान मुझे अच्छा हो गया था। एक दो कापियां और पुस्तकें लेकर रख ली, दिन-प्रतिदिन पढ़ाई में अच्छा होने लगा। 5 बजे सुबह उठता, आग जलाता, पानी गर्म करता-फिर चाय बनाकर बिस्तर पर देता। यह रोज मर्रा का कार्य था। सब्जी काटना, लाना, विवी (सैगल की पत्नी) के साथ किचन में सहायता करना, वर्तन साफ करना, रात को बिस्तर साफ करना और लगाना, टेबल पर खाना लगाना, उठाना, टेबल साफ करना Dinner का पूरा काम करना, इस तरह रात के 10-30 P.M. बज जाते थे। अपने कमरे में एक घंटा तो मैं अवश्य पढ़ता था। जो कुछ लड़कों ने सिखाया होता याद करना यह रोजाना काम था। 12 बजे दिन को Director शिमला से 3-4 किलोमीटर चलकर साहिब के लिए खाना ले जाना होता (Daily) प्रति दिन। किलोमीटर चल कर दूध भी लाना पड़ता था। यदि देर हो जाए तो विवी झिड़का भी देती थी।
यह बात ठीक है, कि आराम मनुष्य को घमण्डी और विवेकहीन बना देता है। इसी वजह से साहिब की पत्नी घमण्डी और तंग विचार वाली हो गई थी। घर का सारा कार्य मुझे ही करना पड़ता था। सैगल की पत्नी तो पड़ोसियों के साथ बैठकर सारा दिन गप्पे ही मारती रहती थी। 3-4 बजे शाम को घर आती, फिर धीरे-२ मुझे डांटती रहती थी। ये भी ठीक है, कि बुरी संगती का असर बुरा ही होता है। विचारहीन व्यक्ति के हृदय में कभी अच्छे विचार नहीं होते। कभी कभी S.N. सैगल और पत्नी के मध्य में झगड़ा भी होता था।
साहिब मेरी फेवर करते, तब तो वह ज्यादा ही गुस्से में लाल पीली हो जाती थी। मेरा दिल उदास हो गया था परन्तु क्या करूं गरीबी को देखकर फिर शान्त हो जाता था। दमाग (Mind) मेरा परिपक्वा (Mature) था जो भी पढ़ता लिखता शीघ्र याद हो जाता था। इस तरह एक वर्ष तक उनके पास काम किया। S.N. सैगल की बदली हो गई, मुझे साथ जाने के लिए कहा, परन्तु मैने इन्कार कर दिया।
S.N. सैगल की बदली से पूर्व मैने एक पत्र G.L. शर्मा (Principal) मण्डी को लिखा कि मैं आपके पास एक वर्ष तक नौकर रहा, मेरा पैसा आप के पास 42 रु० शेष रहते हैं। कृपया आप इन पैसों को D.E.O. के घर छोड़ दें। पिता जी गांव से आकर ले लेंगे। पता, उसने प्रति उत्तर में क्या लिखा, "आप जाती बार हमारे घर से एक छाता (Umbrella) ले गए थे। उस छाते के पैसे हमरे काट दिये हैं। अब आपका पैसा हमारे पास बिल्कुल नहीं है। Principal ने यह सब कुछ झूठ लिखा था। मैं कोई भी छाता नहीं ले गया था। आइए, अब मैं S.N. सैगल के विषय में चन्द एक शब्द प्रस्तुत करता हूं।
. Who was S.N. Segal?
Ans: - Sh. S.N. Segal was the director of Education Officer in the Himachal Pradesh (Schools) He belonged to a noble family Jammu & Kashmir from royal family. He was a Good administrator at that time. S.N. Segal was the son of mother Prem Singh's sister. S.N. Sons caught me Alphabet. They may live long!
PART XXXII
ठाकुर चेतराम जज की बदली मण्डी से नाहन को हो गई थी। भैया श्री सेवक राम उनके साथ नाहन को चला गया था। मैं अब शिमला में नौकरी की तलाश में ईधर-उधर घूम रहा था। एक व्यक्ति मेरा परिचित था। रात को उसके पास ठहरने के लिए चला गया। मेरे पास 30 रुपये थे। उस आदमी के पास रखने के लिए दे दिये। बचपन था, इन्सान को हरेक चीज का शौक भी होता है। रात के शो के लिए हम दोनों व्यक्ति सिनेमा देखने के लिए रिज में चले गए। जब रात को हम क्वाटर में आये तो देखा कि तेजराम के 30 रु० किसी दूसरे नौकर ने चुरा लिए हैं। उस के मालिक से चोरी की शिकायत की। साहिब जी ने एक नौकर को डांट चढ़ाई, डर के मारे शीघ्र उसने अपनी गलती मान ली और मेरे 30 रु० वापिस कर दिए। गलती के लिए मैंने उसे 5 रु० दे दिए अब मेरे पास 25 रु० शेष थे।
(34)
PART XXXIII
नालसन साईगलू जिला मण्डी का श्री मेम सिंह सुपुत्र श्री परमा श्री कृष्णु का पिता पुलिस चौकी शिमला में कार्यरत था। एक दिन मैं उसके पास चला गया था। उसने मेरा बड़ा सम्मान किया। ६ दिन तक उसके पास रहा। खाना-पीना फ्री था। एक दिन मैंने विचार किया। क्यों न में भी नाहन को चला जाऊं। श्री हेम सिंह भाई ने मुझे रेलवे रोशन तक छोड़ा और में नाहन के लिए रवाना हो गया। मै। अनपढ़ होने के कारण श्री हेम सिंह जी ने रुजेशनों की लिस्ट बना कर मेरी जेब मे डाल दी। जब में काला बाग के स्टेशन पर उतरा। एक पुलिस कर्मचारी और S.H.O. मेरे पास आया और कहने लगा, ये लड़के तुम कहां जा रहे हो? यह सामान किसका है? इस में क्या है? उसने अपने पुलिस कर्मचारी को कहा, खोलो इस गठरी में क्या है? आती बार हेम सिंह जी ने 30 रु० दिये थे 25 रु० मेरे पास थे। इस तरह 5/- मेरे पास थे। S.H.O. के कर्मचारी ने मेरी तलाशी ली। सब सामान ठीक पाया गया। अब खर्च करके मेरे पास 30 रु० शेष थे। फिर मैंने नाहन की बस ली और ६ बजे शाम को नाहन के चौगान में पहुंच गया। फिर मैंने भाई सेवकराम के क्वाटर का पता किया। उसका क्वाटर नाहन फौडरी के ठीक पिछली तरफ मिला। नाहन में 10-15 दिन तक रहा। श्री चेत राम जज के साथ भी मुलाकात हुई। वहीं पर खाना खाता रहा। भाई सेवकराम का एक दोस्त था। एक दिन में उसके साथ उसके घर चला गया। दोस्त बड़ा शिकारी भी था। एक दिन शिकार के लिए जंगल में चले गए। छोटा-मोटा शिकार भी किया, शाम को घर आए गए। दोस्त के घर तीन दिन रहा, फिर नाहन आ गया था। ठाकुर चेतराम चाहता था कि सेवकराम को पक्की Post में लगाया जावे।
एक दो मास के बाद ठाकुर श्री चेतराम ने भाई सेवकराम जी को प्यादे की Post में पक्का लगा दिया। भाई सेवकराम ने ठाकुर चेतराम जज का शुक्रिया अदा किया। 5-6 वर्ष तक भाई जी नाहन में नौकरी करते रहे। कुछ समय के बाद ठाकुर चेतराम Retired हो गए। फिर 1966-67 में मण्डी को सेवकराम की बदली हो गई। 60 वर्ष पूरे होने पर 1994 में Retired हो गए इस समय भाई जी घर में ईश्वर जी की दया से कुशल हैं। परिवार का का छोटा-मोटा कारोबार अच्छा चल रहा है। मकान भी नया बना दिया है। खाना-पीना भी अच्छा है।
May he live long
PART XXXIV
Career and Progress through life start
15-16 दिन के पश्चात् भाई जी ने मुझे पठानकोट के रास्ते घर को भेज दिया। घर पहुंच गया, रेलूराम शायद छठी में पढ़ता था। नेकराम प्रथम में और कोई नहीं पढ़ता था। गरीबी थी, कैसे पढ़ाई हो सकती थी। एक दो मास मैं घर रहा, फिर एक व्यक्ति के साथ पुनः शिमला चला गया Director Education Office में चला गया। वहां का Head Clerk मेरा S.N. सैगल के वक्त का बड़ा परिचित था। अप्रैल मास में स्कूलों में चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों की खाली जगह का पता लगा। फिर मैंने Head Clerk जी से बात की उसने पढ़े लिखे के विषय में मुझसे बात की, मैनें तो साफ इन्कार कर दिया कि मैं तो बिल्कुल अनपढ़ हूं। कलर्क ने कहा फिर कैसे हो सकता है? मैंने उस क्लर्क के पास लगभग 25-30 दिन फ्री काम किया। कोई पैसा नहीं लिया। दो वक्त उसे खाना बनाना, कपड़े धोना, क्वार्टर की सफाई करनी। उसका क्वाटर समरहील शिमला में था। केवल मुझे अक्षर ज्ञान था। बेकार होने की वजह से चिन्ता भारी थी। दिल बड़ा उदास था। एक दिन उस क्लर्क नेएक तरकीब मुझे दी। चलो आज आप को मैं बेरोजगार के कार्यालय में (Unemployment Office) में चलेंगे। और आप का नाम नौकरी के लिए प्रस्तुत करेंगें, क्लर्क ने कहा। मुझे सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि वहां पर तो पढ़े लिखे लोग आवेंगे, भला में किस बाग की मूली। मैं तो निरक्षर हूं सर ! आप की मर्जी आप मुझे पुरा Address लिखाओ। अपना नाम-पता- डाक-तहसील-जिला-गांव इत्यादि मैंने सब कुछ लिखवा दिया। हम दोनों 10 बज बेरोजगार के कार्यालय में पहुंच गए। क्लर्क जी ने कहा, तेजराम जी आप चूप रहना, सारे प्रश्नों के उत्तर मैं (Clerk) खुद दूंगा। सारे कागजात की पूर्ति तो क्लर्क जी ने स्वयं कर दी। मैं तो दरवाजे के बाहर ही खड़ा रहा।
(All the documents filled up by the Clerk, But I stood out side of the door)
चलो employment में नाम तो दर्ज हो गया। ईश्वर करे वह Clerk जुग जुग जीवे। मैंने दिल में प्रण कर लिया कि अवश्य पांचवी जमात पास करूंगा। मेरे लिए सूचना हेतू Information Address समरहिल के पते पर भरा था।
6 दिन बाद सूचना मिली कि तेजराम को मण्डी जिले में द्रंग नामक स्कूल में जो Middle है। वहां पर उसे As Laboratory Assistant की Post पर Appointment किया गया। मैं खुशी के मारे फूले नहीं समाया। बहुत खुशी हुई मुझे। एक दो दिन के बाद मैंने पक्का Order ले लिया और मण्डी के लिए रवाना हो गया। आती बार Clerk जी ने मुझे 50 रु० खर्च करने के लिए भी दिए।
PART XXXV
16-4-1953 को मैंने Laboratory Assistant के रुप में कार्यभार सम्भाला। कहते हैं कि अच्छी संगति का इनसान को कहां से कहां तक ले जाती है। शिक्षा विभाग में स्टाफ Staff अच्छा था। सब अध्यापक वर्ग बहुत ही विद्वान थे तथा कर्मशील थे। पढ़ाई का स्तर भी काफी ऊंचा था। सब स्कूल बच्चे अध्यापक वर्ग का बड़ा सम्मान करते थे। मेरा भी इन बच्चों के साथ बड़ा प्रेम हो गया। बच्चे मुझे खाली समय में थोड़ा बहुत पढ़ाते भी थे। श्री किशोरी लाल हमीरपुर का यहां पर मुख्याध्यापक (Headmaster था। एक दिन मुध्याध्यापक जी ने मुझसे पुछा, आप अपना जन्म पत्र और शिक्षित होने का प्रमाण पत्र दो मैने भयभीत स्वर में कहा, 'सर मैंने शिमला के एम्पलाई मैन्ट के कार्यालय में झूठ लिखा कि मै। पूर्णतया से पांच जमाती पास हूं। जब कि मैं बिल्कुल अनपढ़ हूं। मैं डर गया अब नौकरी चली गई। हैडमास्टर (Headmaster) जी बड़े दयालु थे। बच्चा आप चिंता मत करो। शिक्षा विभाग में रहकर आप अशिक्षित रह जाये यह असम्भव है। हैडमास्टर जी ने कहा कि तुम पढ़ोगे, बुद्धिमान बनोगे। कर्मशील हो, परिपक्व भी हो, तुम शाम को हमारे घर कार्य करना, फिर वहीं खाना खाना, दोनो समय, फिर दिन को स्कूल का कार्य करना। हैडमास्टर जी ने कहा, एक बात और है आप प्रतिदिन पाचंवी कक्षा में बैठना, जो बच्चे पढ़ते हैं, उसे तुम भी सिखोगे। यदि जो प्रश्न आप को नहीं आवे, हम शाम को आप को बतलायेंगे। बच्चा होनहार है। उसे पढ़ने के लिए समय अवश्य दो। ऐसा हैडमास्टर जी ने अपने बच्चों से कहा। A.B.C. अंग्रेजी Math-Hindi गिनती लिखाई की ओर विशेष ध्यान देना था। 3-4 वर्तन आधा किलोमीटर दूर जाकर उनके लिए पानी लाता था। दिन को स्कूल का कार्य भी करना पड़ता था। H.M. के किचन में खाना बनाने का काम करना कम से कम एक घण्टा पढ़ाई करना H.M. के तीन परिवार थे। बड़ा लड़का मण्डी कालिज में पढ़ता था। लड़की दंग में Middle स्कूल में पढ़ती थी श्री किशोरी लाल इसी स्कूल में H.M. थे। H.M. की पत्नी का स्वर्गवास हो गया था। H.M. जी का परिवार बड़ा ही Amicable वाला था। यह बात सन् 1954-55 की है।
PART-XXXVI
घटना : ट्रंग से घर के लिए पैदल चला खडकल्याणे के रास्ते से, रास्ते में हमारी ब्यास नदी पड़ती थी। जनवरी का महीना था। 3-4 दिन पूर्व वर्षा भी हुई थी। नदी में बहुत पानी था। और बहुत ही ठण्डा था। कपड़े-घड़ी-पैसे बैग में डाल दिए, और स्वयं पालकु में बैठ गया। पालकु आकर नदी के मध्य में रुक गया। मेरे बाजु आगे चलने के लिए विवश हो गए। मैं व्यासा नदी में गिर गया। 10-15 फुट नीचे गहरे पानी में चला गया। शरीर का खून ठण्डे पानी से जमने (Freeze) लगा। मैंने देखा पानी का बहाव (Speed) 40-50 मीटर नीचे की तरफ ले जा रहा है। But I know how to swimming? इस तरह में नदी के किनारे (Edge) लग गया। बैग और कपड़े लेकर घर की ओर चल दिया।
It was the fearful travel to coming home. By the grace of God. I reached the home safe and sound. Thanked God.
इतवार के दिन मैं घर आया, माता-पिता का चेहरा खुशी से खिल गया कि बच्चा पक्की नौकरी में लग गया है। शाम को घी खिचड़ी खाने को दी। और सोती वक्त एक पटवारी गिलास दूध का पिने के लिए मिल गया था। (बहुत बड़ा गिलास) जब मैंने शिक्षा का प्रमाण पत्र और जन्म तिथि के विषय में कहा, तब तो मता पिता जी का हृदय बैठ गया। ये Document हमने कहां से लाने? माता जी ने अपनी कुलजा (सैण वाली) की स्तुति की और कहा, माँ अच्छा रास्ता बता, हम प्रमाण पत्र और जन्म तिथि बच्चे की कहां से लायें? फिर पिता जी ने कहा शायद तेजराम का नाम तो साईगलू पंचायत में दर्ज होगा। लेकिन पंचायत के कार्यालय में कुछ साल पहले आग लग गई थी। सारा रिकार्ड (Record) जल कर राख (Ash) हो गया। अब क्या करना है?
बड़ी मुश्किल से बच्चे को सरकारी नौकरी मिली थी। शायद चले न जाये। पिताजी दूसरे दिन मण्डी गए, टारना में मणी पंडित जी थे, के पास चले गए। दो रुपये देकर मन घड़ना 18 वर्ष की आयु बनाकर 15 सितम्बर 1934 का जन्म प्रमाण पत्र तैयार किया और मेरे लाकर दे दिया। अगले दिन ट्रंग में जाकर H.M. को जन्म प्रमाण पत्र दे दिया। H.M. जी जन्म पत्र की चित्रकारी को देखकर बड़ा प्रभावित हुआ फिर उसके लड़के की भी जन्मकुण्डली मेरे द्वारा मण्डी में उसी पंडितजी से तैयार करवाई। अब मेरा दिल जन्म पत्र से शान्त हुआ। अब रही शिक्षा का प्रमाण पत्र, आइये इस के बारे में आगे पढ़ें क्योंकि जिन्दगी का विकास यही से शुरु होता है
PART XXXVII
मुख्यध्यापक श्री किशोरी लाल जी की छत्र-छाया में हैडमास्टर जी की अनुमति से पांचवी कक्षा के लड़कों के साथ बैठता था। उस समय मेरी आयु पिता जी के कहने के अनुसार 16 वर्ष की थी या 17 वर्ष की थी। पाचंवी कक्षा की परीक्षा हेतू हैडमास्टर जी ने D.I.S. मण्डी को लिखा कि हमारे स्कूल का एक व्यक्ति पांची की Private परीक्षा देना चाहता है। उसे परीक्षा देने की अनुमति प्रदान करें। अनुमति मिल गई। मार्च 1955 को मैंने चौंतड़े Middle स्कूल में 5th की परीक्षा दी और अच्छे अंक लेकर उत्तीर्ण हो गया। 5th पास करने के पश्चात् मेरा पढ़ाई की तरफ दिन प्रतिदिन लग्न बढ़ती गई। फिर 1958 में Middle की परीक्षा दी। अच्छे अंकों के साथ पास हुआ। अच्छे अध्यापक जी के मेल मिलाप से मेरा दिल बहुत खुश हुआ। फिर मेरा विचार हुआ कि अब 10 वीं कक्षा का चरण पकडूं। 1962 में मैंने 10 वीं कक्षा 317 अंक लेकर परीक्षा उत्तीर्ण की। 317 x 100 = 63% 500 Punjab University से Hindi, English, Math, S.S. Sanskrit etc. Total Five Subjects.
उसी वर्ष जे.बी.टी. के लिए लड़के फॉर्म भर रहे थे। गुरूजनो के आशीर्वाद से फॉर्म मैंने भी भर दिया। ईश्वर ने मेरी प्रार्थना सुन ली। मुझे साक्षात्कार के लिए कार्ड आ गया। साक्षात्कार विजय हाई स्कूल मण्डी में था। अब मुझे पढ़ाई सम्बन्धी किसी चीज का फिकर नहीं था। क्योंकि 10 वीं कक्षा का परिणाम पत्र मेरी जेब में था। साक्षात्कार में 5-6 निरीक्षक थे। उस समय मेरी आयु लगभग 24-25 वर्ष की होगी। उस बैच में Head Clerk D.I.S. और तीन अन्य व्यक्ति बैठे हुए थे। साक्षात्कार ठीक 10 बजे शुरु हुआ। मैं भी समय पर पहुंच गया था। क्योंकि मैं शाम को घर पर था। सुबह ६ बजे पैदल चलकर मण्डी पहुंच गया। माता-पिता जी ने सब देवी-देवताओं का स्मरण किया और मुझे आशीर्वाद दिया, "जा बेटा आप सफल होंगे। मुझसे तो खेल, फसल, फल सम्बन्धी घर-गांव-स्कूल के विषय में पूछा, कहां कार्य करते हो? अपना परीक्षा प्रमाण दिखाओ। सब प्रश्नों का उत्तर शीघ्र देता था। क्या फल मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए अच्छे है?
Q धन कमाने के लिए मनुष्य रात-दिन कार्य करता है? क्या उसकी सेहत के लिए अच्छा है? No
प्र०२. लोग घरों में, खेतों में सब जगह में सिगरेट पीते हैं। क्या उसकी सेहत के लिए अच्छा है? No
All questions has been quick in answering
Health is preferable to wealth.
Smoking is injurious to health.
Food is necessary to life.
iv) Have exercise every day, and keep the doctor away.
First appointment as a teacher in Govt. High School Saigaloo, 1962.
PART XXXVIII
ईश्वर का धन्यवाद मेरी कठिन जिन्दगी इस सुख रुपी सागर से पार हुई। 30 जुलाई 1962 द्रंग के पोस्ट ऑफिस में अध्यापक की नियुक्ति सम्बन्धी आर्डर द्रंग के स्कूल में पहुंच। सारा स्कूल खुशी से खिल उठा। सब स्कूल के बच्चों ने और अध्यापक वर्ग ने मुझे शुभकामनाएं दी। मैं, लक्ष्मीस्वरुप श्रीमती भन्ती देवी का पुत्र तेजराम वर्मा फूला नहीं समा रहा था। बहुत खुश था। हे जगत नियता, हे अन्तर्यामी, हे पालन हार स्वामी आपको मेरा कोटी कोटी प्रणाम। ऐसा मैं अपने क्वाटर में ईश्वर की प्रतिमा के सामने विनय कर रहा था। उसी समय द्रंग गांव के नगरोटा निवासी के लोग मुझे भोजन का निमंत्रण देने के लिए दरवाजे के बाहर खड़े थे। उनका मैंने तहदिल से अभिनन्दन किया। हे महाशय आप लोगों का आगमन किस प्रयोजन से ईधर हुआ है। सेवक को सेवा करने का अवसर प्रदान करो। मिस्टर तेजराम वर्मा हमारी ओर से आप को शुभकामनाएं। आपने बड़ी मेहनत लग्न से और बड़ी निष्ठा से कार्य किया है और मैट्रिक की परीक्षा अच्छे अंक लेकर उत्तीर्ण की है। ईश्वर भविष्य में भी आप को ऐसा अवसर प्रदान करें। आज सब नगरोटे के निवासीगण आपसे अनुरोध करते हैं कि आज रात का भोजन (Dinner) श्री पडिंत सोमदत्त के गृह में होगा। वहां पर आप अवश्य आने की कृपा करें, धन्यवाद। मैंने भोजन के उपरान्त एक दो शब्दों का प्रयोग भी किया था जो उन लोगों के सम्मान के प्रति था।
PART XXXIX
2-7-1962 को मैं जे.बी.टी. अध्यापक बन कर उच्च माध्यमिक पाठशाला साईगलू में अध्यापक के रूप में कार्यभार सम्भाला। दो साल तक चौथी से पांचवी कक्षाएं को पढ़ाता रहा। 1965 को मुझे बेसिक (Basic) ट्रेनिंग के लिए सोलन जाना पड़ा। उस समय 75 रु० वेतन मिलता था। उस समय मेरा बड़ा लड़का हुक्म चन्द चौथी कक्षा का शिष्य था। घर का खर्च, गांव की रसम रिवाज आना-जाना विवाह शादी का खर्च पूरा करना मेरे लिए
बहुत ही कठिन था। हां रेलूराम और नेकराम Military में भर्ती हो गए थे। तीन-चार बार तो पुराने घर का जिर्णो उधार किया। निर्माण फिर नौतोड़ जगह ली, लगैर में, साईगलू में जगह ली। एक मकान भी वहां पर बनाया गया। इस में 10-11 हजार रुपया खर्च हुआ। अब यह मकान भाई सेवक राम को 1982 में दिया गया। 6-7 भानजे की बुजातर लगाई, भानजियों की शादी में बहुत पैसा लगा। मुझे पढ़ाई की तरफ अधिक लग्न लग चुकी थी। किताब मेरे हाथ से नहीं छुटती थी। मैंने +1, +2 की परीक्षा देनी थी। पुस्तकें भी ले रखी थी। लेकिन समाज के रस्म रिवाज नहीं पढ़ने देते थे। पारिवारिक कामों से समय ही नहीं मिलता था। खाली समय मेरे लिए बुरा लगता था। Math, Hindi, English विषयों पर मेरा ज्ञान अधिक था। गणित में Practice अधिक थी। Urdu और English का भयास भी अधिक था। प्रतिदिन एक दो घण्टे हरेक विषय का भयास करता रहता था। सुलेख की ओर अधिक ध्यान था।
PART XL
मई 1965 को मुझे Basic Training करने के लिए खलिफा लौज सोलन एक वर्ष के लिए जाना पड़ा। वहां पर गणित, हिन्दी, समाज, अंग्रेजी, ड्राईंग तथा उर्दू में मैंने सब विषयों का अच्छा अध्ययन किया। मैं सोलन में 4-5 घंटे प्रति दिन पढ़ता था। अध्यापकों के नजरों में अच्छा था। Good books of the teaching in the training school. I also respect them very much. द्रंग से एक मनीआर्डर 150 रुपये का मेरे नाम Training Centre सोलन में आया कि आप की बकाया राशि 150 रुपये आपको प्रेषित कर रहे हैं। कृपया पावती शीघ्र भेजें। ठीक हुआ उस समय मेरे पास पैसे भी नहीं थे। वेतन साईगलू से नहीं आया। 10-12 दिन के बाद 75 रुपये वेतन के आये। Training का समय समाप्त होने जा रहा था। प्रधानाचार्य ने सब Basic Training करने वालों को रोल नम्बर के अनुसार Speech देना अनिवार्य कर दिया था। Oral मेरा नम्बर 410 था। मुझे भी भाषण देने का अवसर प्राप्त हुआ। मेरा भाषण का विषय था स्वास्थ्य तथा व्यायाम, मैने इस भाषण को जबानी याद कर रखा था। (Learning Heart) भाषण की कुछेक पंक्तियां अगले पृष्ठ पर देखो।
PART XLI
गमिका स्वास्थ्य : अच्छा स्वास्थ्य श्रेष्ठ धन, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति अच्छे स्वास्थ्य पर निर्भर है। इसके बिना जीवन नीरस है। शास्त्रों में कहा गया है शरीर ही धर्म का प्रधान साधन है। अतः शरीर को स्वस्थ रखना व्यक्ति का प्रथम कर्तव्य है। स्वस्थ व्यक्ति ही सभी प्रकार की उन्नति कर सकता है। शरीर को स्वस्थ रखने का साधन व्यायाम है।
शरीर को हिलाना डुलाना ही व्यायाम है। यह कई प्रकार से किया जा सकता है। इससे शरीर निरोग व फुर्तिला बनता है। आयु बढ़ती, स्वास्थ्य ठीक से रहता है। शरीर के अंग पुष्ट होते हैं। दिन भर कार्य करने में दिल लगता है। साहस, धर्म, सहनशीलता, सहानुभूति आदि गुणों का विकास होता है।
प्रकार :- व्यायाम के अनेक प्रकार हैं। कुश्ती, कबड्डी, खो-खो, बैठकें निकालना, दौड़ना तैरना घुड़सवारी नौका विहार आदि अनेक प्रकार का व्यायाम होता है। स्कूलों में अब सरकार ने स्कूल भी इस का विषय अनिवार्य कर दिया है। वैसे तो पहले भी स्कूलों में P.T.I. हर विद्यार्थी करता था। अब स्कूलों में एक विषय इसके लिए दिया गया है। शारीरिक शिक्षा भी पुस्तक की पढ़ाई का आवश्यक अंग बन गई है। स्थानीय जिला राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर खेल मुकाबले का आयोजन किया जाता है। अच्छे खिलाड़ियों को अच्छे पुरस्कार दिये जाते हैं।
खेल का विषयः यह बड़े खेद का विषय है कि एक अरब दस करोड़ जनसंख्या वाला हमारा देश खेलों के मैदान में बहुत पिछड़ा हुआ है। अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में इस का स्थान न गव्य सा है। अतः बच्चों को खेलों में हिसा लेना चाहिए। यह 15-20 मिनट का भाषण था। (Speech) बड़े उत्साह के साथ बोला, परन्तु मेरे लिए बड़ा पहाड़ के समान था, फिर भी मैंने पूर्ण विश्वास के साथ बोला। (Full Confidence) सब Trainee वाले लड़कों ने तालियां बजाई, और Hostel में मुझे उस दिन का पैसा Diet नहीं देना पड़ा। वो दिन मेरे लिए Free छोड़ा गया। 3-4 दिन के पशत् सब Trainee अपनी-२ New Post में चले गए।
मैं भी मण्डी के लिए आ गया और मेरी Posting M/S कड़कोह को हो गई थी। 4 दिन वहां पर Service की फिर लिखा पढ़ी करने के पश्चात् पुनः साईगलू में Duty Join कर ली। अब मैंने पूर्णतया से पढ़ाई में निपुणता प्राप्त कर ली थी। जब मैं साईगलू आया और अपना कार्यभार सम्भाला तो मुझे Headmaster जी ने पूछा कि आप किस कक्षा को पढ़ायेंगे? मैंने उत्तर दिया सर जो कक्षा आप मुझे देंगे, मैं उस कर्तव्य का पालन करूंगा। ठीक है आप को मैं (H.M.) VI-VII-VIII का गणित, VI-VII-VIII का उर्दू वो विषय आपको पढ़ाने के लिए दिये जा रहे हैं।
क्योंकि मैंने उर्दू में अच्छे अंक प्राप्त किये थे। 817 x 100 = 54% 1500
This is the 54% of all aggregate of the subjects.
PART XLII
आईये, 1965 में 12 वर्ष पूर्व घर सम्बन्धी परिवार के विषय में प्रकाश डालें। सन् 1952-53 घर में लड़के और लड़कियां युवा अवस्था को पार करने जा रहे थे। माता-पिता जी लड़के और लड़कियों की शादी के विषय में सोच रहे थे। कहां इन बच्चों की शादी करवाई जाये? ईश्वर की कृपा से 5-6 किलोमीटर के दायरे में शादी करनी तय हो गई। सर्वप्रथम श्री सेवकराम, तेजराम व बहिन द्वारकू की शादी हुई। तीनों बच्चों की शादी एक मुहर्त में हुई। श्री परसराम जी की दोनों बहुयें एक गरीब घर से शादी करके लाई गई थी। और बहिन द्वारकू की भी एक गरीब घर में शादी करवाई गई थी। (She was married in the poor family) बाद में श्री रेलूराम, नेकराम, मनीचन्द की शादी करवाई गई। कुछ बहिनों की शादी हमारी शादी से पूर्व कर दी गई थी। जैसे शान्ती देवी, सेवकी देवी, मथरा देवी और लज्जा देवी। इस प्रकार शादी का Programme समाप्त हो गया था। लेकिन शादी का कर्ज आय से 70% बढ़ गया था। सब भाईयों ने मिलकर लोगों का कर्ज धीरे-२ दो-तीन वर्ष में ब्याज सहित अदा कर दिया। मण्डी में अमर सिंह खतरी के पैसे भी हमने (कपड़े के) ३ वर्ष के पश्चात् वापिस किये ब्याज सहित (600/-)
PART XLIV
हमारे बुजुर्गों की दो जगह थी या घर थे। एक मिहाड़े में एक हवाणी में, जो वर्तमान जगह में तेजराम रह रहा है। मिहाड़े में लक्ष्छमन जी रहते थे (पहले) गाय-भैंस पालते थे। दूध, घी बड़े-२ उत्सवों में लाकर हवाणी में पहुंचाते थे। हवाणी में केवल सुदामा और परसराम ही रहते थे। एक चौकी में दो भाई रहते थे। घर के 4-5 कमरे थे। दरवाजे केवल 4-5 फुट के होते थे। इकट्ठे खेती-बाड़ी का र्य करते थे। इस गांव में केवल सनवाल जाति का एक ही परिवार था। बाकि सब वैद थे। हमारी जमीन दूर-दूर तक होने के कारण कभी-कभार वैदों के साथ झगड़ा भी हो जाता था। रास्ते के लिए घास के लिए, मारपीट से मुकद्दमा बाजी हो जाती थी। प्रतिद्वन्दी को सजा भी मिलती थी। कभी-२ मामूली चीजों पर झगड़ा हो जाता था। फिर समाप्त भी हो जाता था। फिर सुदामा की मृत्यु के बाद परसराम और ताऊ का लड़का शिवराम इस चौकी में इकट्ठे रहने लगे।
कुछ समय के बाद शिवराम परसराम से अलग हो गया। 1950 में फिर इकट्ठे हुए, फिर अलग हुए। फिर पिता जी से थोड़ा बहुत झगड़ा होने लगा। परिवार में एकता का अभाव हो गया, कोई सोना, कोई काम करता, खाने-पकाने में रूचि बहुत कम लेने लगी। इस तरह चौकी का तीन बार बंटवारा हुआ। अंत में परसराम ने अपना मकान एक तरफ अलग बना दिया फिर पिता जी को विचार आया कि क्यों न दो मंजिल वाला मकान बनाया जावे।, बना दिया गया। घर सम्बन्धी कर्ज अधिक हो गया। Income का कोई भी साधन नहीं था। बच्चे की पढ़ाई का खर्च विवाह शादी का खर्च, अधिक पड़ गया। भाई सेवकराम मिहाड़े में रहने लगा। रेलूराम रछौड़े में मनीराम फेट में, तेजराम और नेकराम बड़े घर में रहने लगे।
15-20 वर्ष तक नेकराम भाई तेजराम के साथ इकट्ठे रहे परन्तु 1982 में अलग रहने लगे। बड़े घर का बंटवारा किया गया। एक तरफ तेजराम और दूसरी तरफ नेकराम रहने लगा। फिर तेजराम को विचार आया कि हम मकान अलग बनाएंगे। 3-4 कमरे नेकराम को छोड़ दिए, दो कमरे रेलूराम को दिए गए, उन्हें भी नेकराम इस्तेमाल करता है। अपने हिस्से के 3-4 कमरे पूर्णतय नेकराम को मैंने छोड़ दिए। Free खुश रहो, ऐ मेरे भाई !
PART XLIV
यह किस्सा 1960 का है। मण्डी में शिवरात्री के मेले लगे हुए थे। गांव के लोग अपने 3-4 परिवार के साथ मण्डी में मेला देखने के लिए जाते थे। मेरी (तेजराम) की और आपकी माता (प्रभी देवी) की तमन्ना भी मेला देखने की हुई। गरीबी तो पिछा नहीं छोड़ती, आय-व्यय तो चलता रहता है। यह जिन्दगी के मेले है हम भी शिवरात्री के मेले को अवश्य देखेंगे। मैं और श्रीमती प्रभी देवी हुकम चन्द बच्चे के साथ मेला देखने के लिए चल पड़े। यह 1960 का समय था। उस समय हुकम चन्द की आयु शायद एक वर्ष की होगी। सर्दी अधिक थी, हमारे पैर में प्लास्टिक के जुते थे। शरीर में पतले कपड़े थे। बच्चे को (हुकम चन्द) सर्दी लग रही थी। सबसे पहले चौहटे के बजार में गए एक पतला कपड़े वाला सूट बच्चे के लिए खरिदा, जिसका मूल्य 1.50 पैसे था। खरीद कर बच्चे को पहनाया गया। फिर मेले में 2-3 घंटे घूमे, शाम को बंझी के घर में रहना पड़ा। रात के समय बच्चे को जुलाब शुरु हो गए। ठंड कह वजह से पंडित घोपल ने माता का शेष लाकर बच्चे को चटाया, कुछ दवाई दी। ईश्वर जी की दया से आराम हो गया। दूसरे दिन घर को आना पड़ा। आती बार 1 रु० की मिठाई ली। एक गानी (Sugar cane) मिठाई जो काफी मात्रा में मिली थी। शाम को घर पैदल पहुंचे। 10-12 किलोमीटर सफर था। घर में खाने-पीने का अभाव भी था। थोड़ा बहुत खाकर आराम किया। बच्चा रात को फिर बीमार पड़ गया। 3-4 घंटे लगातार रोता रहा, हुकमचन्द की दादी को भी सोने से वंचित रहना पड़ा। दूसरे दिन देवस्थल में चले गए। पुजारी ने कहा बच्चे को छाया लगी, पड़ी है। इसका उपचार करो, उपचार किया। 1-2 दिन में ठीक हो गया।
PART 45
Brief introduction of Shrimati Prabhi Devi
श्रीमति प्रभी देवी का जन्म 1941 में गांव जलैस में एक निर्धन परिवार में श्री बदरुराम के घर हुआ। मै। अपने माता-पिता जी की सबसे छोटी संतान थी। मेरे से बड़ी ६ बहिने और थी, और एक भाई था। मेरे पिताजी गांव जलेस से Migrate करके गांव कलोथर में आबाद हो गये थे। जिस समय मेरा जन्म हुआ, उस समय देश अंग्रेजों के अधीन था। गरीबी तो उस समय चरम सीमा तक पहुंच चुकी थी। लोग ईधर-उधर जाकर मेहनत मजदूरी करते थे। रहन-सहन भी ठीक नहीं था। गांव में चांगे पतले घर थे।(बहुत कम) पंडित लोग ज्योतिषि के पास थोड़ा बहुत पत्री का काम सीख लेते थे। लेकिन विद्वान भी होते थे। लोग पंडित की वाणी पर विश्वास करते थे। जो बाद में सही होती थी। ऐसे समय में मेरा जन्म हुआ जो पहले ही घर में ६ कन्याएं और एक भाई है। 7 वीं कन्या आने पर माता-पिता जी को बड़ा दुःख हुआ। माता-पिता ने दिल में विचार किया कि इस 7 वीं कन्या को किसी रिश्तेदार के पास छोड़ दें। वहीं इस लड़की का पालन पोषण करेगा। हमारे से नहीं होगा। नामकरण का दिन रखा गया, उस समय उनके कुल का पंडित जी आये। ग्रह गोचर का उसने अध्ययन किया। देखकर उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि यह कन्या साक्षात् लक्ष्मी है। ऐसे गुण लक्ष्मी के होते हैं। यह लड़की बड़ी भाग्यवान है, सुशील, कर्मनिष्ठावान, गुणवान और सब के साथ सहानुभूति, विवेकशील वाली लड़की है। धार्मिक विचार वाली है। माइके वालों का और ससुराल वालों का वंशावली में अग्रसर बनेगी। अच्छी संतान देकर प्रतिष्ठा प्राप्त करेगी। भाई बहिनों से बड़ा करेगी। इस में अक्षर ज्ञान का बोध भी होगा। पारिवारिक ज्ञान अधिक होगा, ऐसा इस के ग्रह शो (Show) करते हैं। आप इसे क्यों त्याग रहे हैं? इस का पालन-पोषण स्वयं करो।
पडिंत जी के ऐसे विचार सुनकर पिता श्री बदरुनाम जी ने कहा, तब तो हम सरासर गलती कर रहे थे। यह लड़की तो मेरे लखते जिगर की टुकड़ी है। ठीक है इस का नामकरण करो। फिर नाम रख दिया प्रभी देवी। इस शब्द का अर्थ है दूसरों का उपकार करने वाली। प्रभी का उद्देश्य है पढ़ो और आगे बढ़ो, आप देखते हैं कि उस के आने से शिक्षा क्षेत्र में कैसा परिवर्तन आया? कहां परिवार अशिक्षित था, आज इसके बच्चे पढ़लिख कर स्कूटर-कारें रखी हुई हैं। और इसके लड़के लड़कियां और बहुएं सरकारी नौकरी में कार्यरत हैं। पोतों ने Higher Degree कर रखी है।
अतः प्यारे बच्चो, तुम पिता के ऋण से मुक्त हो सकते हो, लेकिन माता के ऋण से तुम कदापि मुक्त नहीं होंगे। ऐसा शास्त्र का विधान है। याद रखो, तुम किसी भी स्थिति में हो तब भी तुम्हे माता की याद आवेगी।
Bless = आशीर्वाद
Bliss = परमसुख (Great Joy)
Q.No. i) What is the bless2
ii) What my mother's gave bless to me?
Ans.: When I was going to Shimla in the second time at that time my mother said to me "Dear my son, you are going to out of the house. So I thank. Go and do the God Service. Then come to some with bliss.
This is the effect of bless.
Tej Ram Verma
PART 46
एक बार मुख्याध्यापिका ने VIII में प्रवेश किया। उस समय मैं VIII को गणित पढ़ा रहा था। आने से पूर्व Madam जी ने 2nd Master श्री पूर्ण चन्द जी से पूछा, "कि VIII को गणित कौन पढ़ाता है? उसने मेरा नाम लिया फिर Madam जी ने कहा कि एक Matric पास लड़का VIII को गणित पढ़ा रहा है। इधर बोर्ड की परीक्षा सिर पर है। मुझे Check करने के लिए वह VIII में आई। उस समय मैं साझा-पति वाली प्रश्नावली करवाई जा रही थी। Madam जी ने मुझ से गणित की पुस्तक ली और लड़कों को प्रश्न नोट करवाया। 10-15 लड़कों ने 8-10 मिनट के पश्चात् प्रश्न हल कर दिए। शेष लड़के करते रहे। कक्षा में 32 लड़के थे। Madam जी ने कहा, बच्चो खड़े हो जाओ। आप देर कर रहे हैं।
आईये, आपको बोर्ड पर मास्टर जी समझायेंगे। चलो आप इस प्रश्न को बोर्ड में हल करके बच्चों को समझाओ। मैं नें ईश्वर का ध्यान करके प्रश्न को हल करन शुरु कर दिया। 5 मिनट के पश्चारत् प्रश्न मेरे द्वारा हल हो गया। Madam जी का चेहरा कुछ खुश होने लगा। उसने मुझसे कहा, ठीक है। आप Office में चले आओ। मैं उनके साथ Office में चला गया। आईये, बैठिये ठीक है आपका
Teaching Method of Mathematics in the 8th class is good. But all the weak students come early in the school and take the extra time for those students who
they are weak in the mathematics. I said, yes Madam. She said to me, "How for your home is from the school? I replied with respectfully, My house is from here about 4 Kilometer from the school. Can you come to school early? She asked me. I replied in possibility. So I used to went the school daily and teach the weak students regularly.
PART 47
एक बार का जिकर है। मैनें बच्चों को 4-5 Math के प्रश्न (Home work) के रूप में घर को दिए थे। 50% लड़के करके ले आये थे। बाकी लड़कों ने Homework नहीं किया। मैंने लड़कों से पूछा कि जिन लड़कों ने Homework नहीं किया वे लड़के अपने हाथ ऊपर उठाओ (Raise up your hand quickly) हाथ उठाने वालों के बीच में मेरा लड़का हुकम चन्द भी था। एक-एक छड़ी उनको लगाई, और कमरे से बाहर निकाल दिया। जब तक 45 मिनट का Period समाप्त न हो जाये। उतने में Madam जी Round करती हुई VIIIe कक्षा के कमरे में आकर खड़ी हो गई और मुझे पूछा, क्या | ये लड़के देर से पाठशाला आये? मैंने प्रतिउत्तर में कहा, Madam नी उन्होंने Homework नहीं किया था। ठी है आप इन्हें Office में भेजो। उधर Madam जी ने प्रत्येक लड़के को २-२ छड़ियां लगाई और मुझे आदेश दिया कि इन के Parents को लिखो कि वे स्कूल का गृह कार्य नहीं करते हैं। मैंने विचार किया कि एक लड़का तो मेरा ही है। ठीक लड़कों के पिता जी को सूचना दी गई।घर आकर मैंने अपने लड़के को कहा, "आज तो मेरा बड़ा अपमान तुमने किया है। क्योंकि तुमने भी गृह कार्य नहीं किया था। फिर हुकमचन्द ने कोई भी गृह कार्य करने से नहीं छोड़ा। 8th class में 511 नम्बर लेकर - Merit में अपना नाम दर्ज करवाया।
Sh. Hukam Chand got scholarship 8th to 10th.
Sh. Som Dutt got scholarship 8th to 10th.
वार्षिक परीक्षा नजदीक आ गई। लड़कों ने बोर्ड की परीक्षाएं दी। उस वर्ष बोर्ड का परिणाम 63% और गणित का साईगलू 87% था। Madam जी का दिल खुश हो गया। इस तरह 7-8 वर्ष तक गणित VIIIe, VIIc, VI classes और उर्दू 6th to 8th class तक पढ़ाता रहा। मेरी बदली भरगांव को फिर सैण को फिर समराहन को तीन चार साल के अन्तराल में होती रही।
PART 48
1½ वर्ष तक B.P.E.O. के कार्यालय में एक Clerk के रुप में कार्य किया। फिर मुझे Urdu Teacher के रूप में पुनः उच्च माध्यमिक पाठशाला साईगलू में लगाया गया। उस समय मेरा बड़ा लड़का ओवर सिरी सुन्दरनगर में कर रहा था। कुल वेतन 2500/- P.M. था। घर-गांव में खर्च अधिक था। R.D. बच्चों की Free कपड़े रिश्तेदारों में वर्तना-बहुत कार्य करने पड़ते थे। साईगलू में जगह लेकर मकान तैयार कर रहे थे। साथ में भानजे की शादी साल में 1-2 बार अवश्य होती थी।
PART 49
यह किस्सा 1980 का है। उस समय मैं उच्चतर माध्यमिक पाठशाला साईगलू के स्कूल में कार्यरत था। अल्प विकास के समय (Recess Time) सब अध्यापक वर्ग श्री बुधि सिंह की दुकान में चाय पी रहे थे। उसी समय जनता पार्टी का आदमी श्री कन्हैया लाल दुकान पर आया। वह अहम जाति वाला था। (घुराणी) मैंने उसके लिए चाय का आर्डर दिया और उसने चाय पी फिर वह चाय के पैसे देने लगा मैंने इन्कार किया कि पैसे मैं स्वयं दूंगा। 0.75। पडिंत मकुन्दराम सुख राम का P.A. था। (Personal Assistant) उसके पास मेरी शिकायत कर दी (Complaint) फिर क्या था? 7-8 दिन के बाद मेरी तबदिली भाटकीधार को कर दी। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ।
यह क्या हो गया? मैं शीघ्र ही मुकुन्द जी के पाउस गया और अपना हाल बताया। पंडित श्री मुकुन्द जी ने कहा, 'मैं क्या कर सकता हूं? अगर आपने नौकरी करनी है तो आप भाटकी धार जाओ। पंडित जी ने साफ इन्कार कर दिया। फिर मैं Teacher Union के President के पास गया। (पंडित देवकीनन्दन के पास) उस ने मेरी Adjustment तान्दी स्कूल में कर दी। तान्दी स्कूल में 1980 से 1984 तक रहा। श्री हुकम चन्द किनौर में J.E. लग गया था। उस समय वह टापरी में कार्यरत था। तान्दी से मेरी बदली लहारडू स्कूल को हो गई थी। 1985 से 1992 तक कसाण स्कूल में कार्य किया।
30 सितम्बर 1992 को मैं साईगलू ब्लॉक से सेवानिवृत हो गया। उस समय मेरी Basic Pay 980/- थी। कुल मिलाकर 3800/- प्रति मास मिलते थे। Basic Pay कम होने से मेरी Pension 1400/- के करीब थी। इस तरह 16-17 वर्ष मुझे Retirement हुए हो गए हैं। अब मुझे 8000/-Pension मिल रही है। ईश्वर का धन्यवाद काफी Pension है आस्ता आस्ता बढ़ रही है।
PART 50
सन् 1992 में ईधर घर में श्री नदेन्द्र की शादी थी। घर का खर्च नये मकान का खर्च भी अधिक था। Retirement Pension के दौरान 1,30,000/- मिले थे। 1200/-/1400/-Pension लगी थी। 1-1½ वर्ष के बाद सारा पैसा खर्च हो गया था जो पैसा शादी के लिए लोगों से लिया था बड़ी मुश्किल से वापिस कर दिया गया था। मैनें लड़कों को पूछा कि मेरे पास बड़ी मुश्किल से 20,000/- शेष बचे हैं। जिस को आवश्यकता हो मुझ से ले लो, बच्चों ने इन्कार कर दिया। फिर मैंने 20,000/- रु० अपनी पोती दिव्य देवी के नाम पर F.D. खोल दी। 1993 से आज तक लगभग 80,90 हजार से उपर राशि हो गई है। यह उसकी शादी में खर्च होगी।
PART 51
आज से 50 वर्ष पूर्व की स्थिति देखें तो पता लगता है कि सनवाल का परिवार शिक्षा के लिए लिहाज से कितना बिछड़ा हुआ था। आज हम वर्तमान की स्थिति को देखते हैं। पढ़ाई-लिखाई और नौकरी में कितनी तरक्की कर ली है।
PART 52
"" प्यारे बच्चो ! पैतृक सम्पति (Heritage) का भी सब बच्चों को इस का ख्याल रखना चाहिए। यह नहीं सोचना चाहिए कि यह जगह-जमीन हमारे तक सीमित है। आप के आगे आने वाली पीढ़ियां इस का फायदा उठायेंगी। अतः आपने हरेक तरह की पैतृक सम्पति का ख्याल रखना होगा। न रखने पर अन्य व्यक्ति हड़प करने की कोशिश करेंगे। नाजाईज यह भी आपको देखना अनिवार्य होगा। आजकल ऐसा जमाना है कि धीरे-२ प्रत्येक व्यक्ति एक दूसरे से घृणा करने में नहीं चूकता। उसकी उन्नति या अच्छा कारोबार देखकर ईर्शालू बन गया है।
धन्यवाद
G1भौरा ----,> G2भवर सिंह,----,,> G3कादसु>>
>>>G4राम जी के तीन पुत्र
1शंकरू। (केवल एक लड़की) 2 लछमन (कोई नहीं )
G5--1 पौऊसु के दो पुत्र( सुदामा और परस राम)
G6---1, सुदामा के एक पुत्र शिव राम
,2परस राम के पांच पुत्र (सेवक राम ,तेज रम, रेलू राम , मनी राम,और नेक राम)
G-7
1 शिव राम के तीन पुत्र
(जालम राम,लाल सिंह, भाग चंद )
2 सेवक राम के तीन पुत्र
( योगराज,नरेश, गिरधारी)
3 तेज रम के दो पुत्र( हुक्म चंद,नरेंद्र,)
4. रेलू राम के दो पुत्र( संतोष,केसर ,)
5 मनी राम के तीन पुत्र( भीम सेन, हुक्म चंद भीष्म ,)
6नेक राम के तीन पुत्र( जीवन, सोम खेमचंद ,
G8 countinue
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