HISTORY 12TH CHAPTER -4
"विचारक, विश्वास और इमारतें (600 ई. पू. – 600 ई.)"। यह अध्याय भारतीय उपमहाद्वीप में धार्मिक और दार्शनिक विचारों के विकास, आस्थाओं में बदलाव और स्थापत्य के माध्यम से उनकी अभिव्यक्ति का अध्ययन कराता है।
🔍 पूर्वावलोकन (Overview of Chapter 4):
🕉️ 1. नए विचारों का जन्म (600 ई.पू. के बाद):
वैदिक धर्म की आलोचना और धार्मिक पुनर्जागरण।
महावीर (जैन धर्म) और गौतम बुद्ध (बौद्ध धर्म) के विचार और शिक्षाएँ।
श्रमण परंपरा का विकास और समाज में उसका प्रभाव।
📜 2. बौद्ध धर्म और जैन धर्म का विकास:
बौद्ध संघ और विहारों की स्थापना।
त्रिपिटक और अंगों जैसे जैन ग्रंथों का निर्माण।
मोक्ष, अहिंसा, आस्तेय आदि सिद्धांत।
🏛️ 3. धर्म, भक्ति और सामाजिक परिवर्तन:
बौद्ध धर्म का राजा अशोक द्वारा संरक्षण।
भगवती परंपरा और पुराणों का विकास।
भक्ति आंदोलन की प्रारंभिक झलकियाँ।
🛕 4. स्थापत्य और धार्मिक स्थान:
स्तूपों (सांची स्तूप), मंदिरों, विहारों और मठों का निर्माण।
स्थापत्य में प्रतीकवाद – जैसे स्तूप का गुंबद, हरमिका, चक्र आदि।
अजंता, एलोरा, नागार्जुनकोंडा आदि स्थानों के चित्र और मूर्तियाँ।
🗿 5. धार्मिक अभिव्यक्तियाँ और कला:
मूर्तिकला और चित्रकला में धार्मिक विषय।
देव प्रतिमाओं का निर्माण और उनमें भाव अभिव्यक्ति।
धर्म और कला का गहरा संबंध।
🧘♂️ 6. धार्मिक बहुलता और सहअस्तित्व:
विभिन्न धार्मिक परंपराओं का सह-अस्तित्व।
एक-दूसरे से संवाद, विवाद और प्रभाव।
📘 मुख्य स्रोत (Sources):
सांची स्तूप: स्थापत्य और धार्मिक प्रतीकों का उत्कृष्ट उदाहरण।
बौद्ध ग्रंथों के अंश: जैसे धम्मपद, विनयपिटक।
जैन ग्रंथों के उद्धरण।
🎯 इस अध्याय से आप क्या सीखेंगे:
धार्मिक और दार्शनिक विचारों का ऐतिहासिक विकास।
समाज पर धार्मिक आस्थाओं और आंदोलनों का प्रभाव।
कला, स्थापत्य और धार्मिक विश्वासों के बीच का संबंध।
ऐतिहासिक स्रोतों की व्याख्या करने की क्षमता।
🛕 सांची स्तूप – विस्तृत विवरण
📍 परिचय (Introduction):
सांची स्तूप भारत के मध्यप्रदेश राज्य के रायसेन जिले में स्थित है। यह बौद्ध स्थापत्य कला का एक अद्भुत उदाहरण है और भारत में स्थित सबसे प्राचीन और सबसे भव्य स्तूपों में से एक है। सांची स्तूप को न केवल धार्मिक महत्व प्राप्त है, बल्कि यह कला, शिल्प, मूर्तिकला, स्थापत्य और प्रतीकात्मकता का भी एक उत्कृष्ट प्रतीक है।
🕰️ निर्माण का इतिहास (History of Construction):
🔹 मूल निर्माण – मौर्य काल:
सांची स्तूप का मूल निर्माण सम्राट अशोक महान ने करवाया था, जो मौर्य वंश के महान सम्राट थे और बौद्ध धर्म के संरक्षक माने जाते हैं।
प्रारंभ में यह ईंटों से बना हुआ एक छोटा स्तूप था, जिसे बुद्ध के अवशेषों को रखने के लिए निर्मित किया गया था।
🕉️ वैदिक धर्म – धार्मिक जीवन का विकास (ऋग्वैदिक और उत्तर वैदिक काल,)
🗓️ वैदिक काल का समय विभाजन:
चरण कालावधि मुख्य ग्रंथ
ऋग्वैदिक काल लगभग 1500 ई.पू. – 1000 ई.पू. ऋग्वेद
उत्तर वैदिक काल लगभग 1000 ई.पू. – 600 ई.पू. यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद
I. ऋग्वैदिक काल का धार्मिक जीवन
(Religious Life of the Rigvedic Period)
ऋग्वैदिक काल के लोगों के धार्मिक जीवन की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं-
1. प्रकृति की उपासना (Worship of Nature) - ऋग्वैदिक आर्यों का धार्मिक जीवन बहुत पवित्र तथा
सादा था। वे प्राकृतिक शक्तियों को देवता मानकर उनकी पूजा करते थे। वे कई देवी-देवताओं की पूजा करते थे। देवियों की संख्या तथा उनका महत्त्व भी देवताओं की तुलना में कम था। ऋग्वेद में 33 देवताओं का वर्णन किया गया है। इन देवी-देवताओं का भूमि से संबंधित, वायु से संबंधित तथा स्वर्ग से संबंधित तीन वर्गों में विभाजन किया गया है। पृथ्वी, अग्नि, सोम, बृहस्पति तथा नदियाँ प्रथम वर्ग से संबंधित हैं। इंद्र, रुद्र, वायु तथा अपाह (जल) द्वितीय वर्ग से तथा वरुण, सूर्य, ऊषा तथा अश्विन तीसरे वर्ग से संबंधित हैं। वरुण उनका सबसे बड़ा देवता था जो कि संसार के सब रहस्य जानता था। उसे आकाश का देवता कहते थे। वह पापियों को दंड देता था। उससे आर्य लोग अपने अपराधों की क्षमा माँगते थे। आर्यों का दूसरा बड़ा देवता इंद्र था। उसे युद्ध तथा वर्षा का देवता समझा जाता था। आर्य युद्ध में विजय तथा समय पर वर्षा के लिए उसकी पूजा करते थे। ऋऋग्वेद में सर्वाधिक मंत्र उसकी स्तुति में हैं। इनकी संख्या 250 है। ऋग्वेद में अग्नि से संबंधित 200 मंत्र दिए गए हैं। अग्नि को पृथ्वी तथा स्वर्ग के मध्य एक दूत के समान समझा जाता था। सोम आर्यों का एक अन्य महत्त्वपूर्ण देवता था। सोमरस को एक ऐसा अमृत समझा जाता था जिसे पीकर देवता अमर हो जाते थे। इसका हवन में प्रयोग किया जाता था। इसे देवताओं को भेंट किया जाता था। इनके अतिरिक्त आर्य सूर्य, आंधी-तूफान के देवता मारुत, मृत्यु के देवता यम, पवन देवता वायु आदि की पूजा भी करते थे। वे कई देवियों जैसे कि प्रातः की देवी ऊषा, रात की देवी रात्रि, धरती की देवी पृथ्वी, वन देवी आरण्यी आदि की भी पूजा करते थे। ऋग्वैदिक काल में उन्हें प्रमुखता प्राप्त नहीं थी। आर्य एक ईश्वर में विश्वास रखते थे। आर्यों का विश्वास था कि सभी देवता एक ही हैं। केवल ऋषियों ने उनका विभिन्न रूपों में वर्णन किया है।
2. उपासना विधि (Mode of Worship) आर्यों की उपासना विधि बहुत सरल थी। वे खुले वायुमंडल में
एकाग्रचित होकर मंत्रों का उच्चारण करते थे। वे अपने देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए कई प्रकार के यज्ञ करते थे। ये यज्ञ बहुत ध्यानपूर्वक किए जाते थे क्योंकि उन्हें यह भय होता था कि थोड़ी-सी भूल से उनके देवता रुष्ट न हो जाएँ। सबसे पहले यज्ञ के लिए अग्नि प्रज्वलित की जाती थी। फिर उसमें घी, दूध, चावल और सोमरस डाला जाता था। इन यज्ञों में कई पशुओं की बलि भी दी जाती थी। ये यज्ञ कई प्रकार के होते थे। सबसे छोटा यज्ञ पारिवारिक स्तर पर होता था। बड़े यज्ञों की तैयारी बहुत पहले से आरंभकर दी जाती थी और धनवान् लोग इन यज्ञों में भारी दान देते थे। इन यज्ञों तथा बलियों का मुख्य उद्देश्य देवताओं को प्रसन्न करना था। वे समझते थे कि इसके बदले में उन्हें लड़ाई में विजय प्राप्त होगी, धन प्राप्त होगा, संतान वृद्धि होगी तथा सुखमय दीर्घ जीवन मिलेगा। आर्य यह समझते थे कि प्रत्येक यज्ञ से संसार की फिर से उत्पत्ति होती है और यदि ये यज्ञ न कराए जाएँ तो संसार में अंधकार फैल जाएगा। इन यज्ञों के कारण गणित, खगोल विद्या तथा जानवरों की शारीरिक संरचना के ज्ञान के संबंध में वृद्धि हुई।
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(2) उत्तरवैदिक धर्म-1000 ई. पू. से 600 ई. पू. के बीच यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद आदि वैदिक साहित्य की रचना हुई। अतः यह काल उत्तरवैदिक काल कहलाता है।
ऋग्वेदकालीन प्राकृतिक देवताओं का स्थान अब त्रिदेव अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने ले लिया। ऋग्वेदकालीन पशुओं का देवता रुद्र अब एक प्रमुख देवता बन गया। ऋग्वेदकालीन गौरक्षक देवता पूषण अब शूद्रों का देवता बन गया। ऋग्वेदिक काल की तुलना में उत्तरवैदिक काल में यज्ञ व कर्मकाण्डों में जटिलता आ गयी।
यजुर्वेद में यज्ञ सम्बन्धी मंत्रों का संग्रह है। इसमें यज्ञ एवं हवन सम्बन्धी नियम विधान हैं। सामवेद में पुजरियों एवं ग्रन्थियों द्वारा, यज्ञ एवं हवन के समय गाये जाने वाले मंत्रों का संग्रह है। अथर्ववेद में तंत्र-मंत्र, जादू-टोना एवं आयुर्वेदिक औषधियों का विवरण मिलता है। (उक्त चारों वेदों में हमें आर्यों के सामाजिक राजनैतिक, धार्मिक एवं आर्थिक जीवन की जानकारी मिलती है।)
वैदिक धर्म की जानकारी हमें अन्य इन तीन वेदों के अलावा अन्य वैदिक साहित्य ब्राह्मण, अरण्यक, उपनिषद् एवं वेदांग से भी मिलती है।
ब्राह्मण-ब्राह्मण ग्रन्थों में वेद मंत्रों के अर्थ एवं सार की सरल टीकाएँ मिलती हैं। प्रत्येक वेद के उपवेद एवं ब्राह्मण ग्रन्थ निम्न प्रकार हैं-
वेद। उपवेद। ब्राह्मण
1.ऋग्वेद। आयुर्वेद। एतरेय, कौशीतकी
2.यजुर्वेद। धनुर्वेद। शतपथ, वाज सनेय
3.सामवेद। गंधर्ववेद। ताण्डय, पंचविंश
4.अथर्ववेद। शिल्पवेद। गोपथ ब्राह्मण
अरण्यक ---इनमें कर्मकाण्ड की अपेक्षा आध्यात्मिक
रहस्यों का विवेचन किया गया है। वनों में रहने वाले संन्यासियों के मार्गदर्शन के लिए तथा वैदिक ज्ञान को समझने में सहायता देने के लिए इन्हें लिखा गया था।
उपनिषद्- उपनिषदों को वेदांत भी कहा जाता है उपनिषद तीन शब्दों से मिलकर बना है उप से भाव है नजदीक नि से भाव है श्रद्धा और षद से भाव है बैठना इस तरह उपनिषद से भाव है श्रद्धा भाव से नजदीक बैठाना। उपनिषद भारतीय दर्शन के मूल स्रोत हैं, इनमें जीवन
के असंख्यों रहस्यों को समझाने का प्रयास किया गया है। आत्मा व परमात्मा के बीच सम्बन्धों को समझाने, तथा कर्म, माया व मुक्ति के सिद्धान्तों को अच्छी तरह जानने के लिए इनमें टीकाएँ लिखी गई हैं। उपनिषदों की संख्या लगभग 108 है। इनमें प्रसिद्ध उपनिषद 'छान्दोग्य', 'ब्रहअरण्यक', 'एतरेय' तथा 'तैतृय' है। वैदिक साहित्य का अन्तिम भाग होने के कारण ये वेदान्त कहलाते हैं। आध्यात्मिक विधा के ये श्रेष्ठ ग्रन्थ हैं। जिस रहस्य विधा का ज्ञान गुरु के समीप बैठकर प्राप्त किया जाता था उसे उपनिषद् कहते हैं।
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पुराण-पुराणों की संख्या 18 है। प्रत्येक पुराण के पाँच भाग हैं। ऐतिहासिक महत्व की दृष्टि से केवल पाँचवें भाग को ज्यादा उपयोगी माना गया है क्योंकि इसमें राजाओं एवं उनके वंशों का जिक्र मिलता है। विष्णु पुराण में मौर्य काल, वायु पुराण में गुप्त काल, मत्स्य पुराण में आन्ध्रवंश की जानकारी मिलती है।
आश्श्रम व्यवस्था-वैदिककाल में आश्रम धर्म का विशेष महत्व था। इसके तहत मानव को चार आश्रमों में रहना चाहिये। मनुस्मृति में इनका वर्णन इस प्रकार से है।
(1) ब्रह्मचर्य आश्रम- 25 वर्ष तक व्यक्ति को इस आश्रम
में रहना होता था। इस समय वह गुरु के पास कड़े अनुशासन में रहकर शिक्षा प्राप्त करता था।
(2) गृहस्थ आश्रम - 25 से 50 वर्ष तक व्यक्ति को इस
आश्रम में रहना होता था। इसमें वह विवाह कर संतान उत्पन्न करता था। धन कमाकर परिवार का पालन-पोषण करता था।
(3) वानप्रस्थ आश्रम-50 से 75 वर्ष की आयु तक
व्यक्ति को इस आश्रम में रहना होता था। इसके तहत व्यक्ति घर-परिवार को छोड़कर वनों में जाकर आध्यात्मिक दार्शनिक शिक्षा ग्रहण करता था।
(4) संन्यास आश्रम- जीवन के अन्तिम समय 75 से
100 वर्ष तक व्यक्ति को इस आश्रम में रहना होता था। अब वह सभी सम्बन्धों को त्यागकर वन में जाकर तप करता था।
वैदिक काल के अन्त में वैदिक धर्म में कर्मकाण्ड बढ़ गये थे। कर्मकाण्ड के नाम पर व्यक्ति उनकी जटिलताओं से परेशान हो गया था। अतः कुछ नवीन धर्मों का उदय हुआ जिनमें लोगों ने राहत की साँस Li
. स्वामी महावीर का जीवन
1. महावीर का जन्म तथा बाल्यकाल-महावीर का जन्म 599 ई० पू० में वैशाली (बिहार) के निकट कुंडग्राम में हुआ। महावीर के बचपन का नाम वर्धमान था। उनके पिता का नाम सिद्धार्थ था और वह एक क्षत्रिय कबीले के मुखिया थे। महावीर की माता का नाम त्रिशला था। वह लिछवी वंश के शासक चेटक की बहन थी। महावीर की शिक्षा-दीक्षा के लिए विशेष व्यवस्था की गई थी। महावीर को बचपन से ही सांसारिक बातों से कोई लगाव नहीं था। वे अपने ही विचारों में मग्न रहते थे।
2. विवाह-महावीर जी का ध्यान सांसारिक कार्यों में लगाने के लिए उनके पिता ने महावीर का विवाह एक सुन्दर राजकुमारी यशोधरा से कर दिया। विवाह के समय महावीर जी की कितनी आयु थी, इस संबंध में हमें कोई निश्चित जानकारी प्राप्त नहीं है। कुछ समय के पश्चात् महावीर जी के घर एक पुत्री ने जन्म लिया। उसका नाम प्रियदर्शना अथवा अनोजा रखा गया।
3. महान् त्याग तथा ज्ञान प्राप्ति-गृहस्थ जीवन भी महावीर जी की धार्मिक रुचियों में किसी प्रकार की बाधा न बन सका। अपने माता-पिता की मृत्यु के पश्चात् वे अपने बड़े भाई नंदीवर्मन से आज्ञा लेकर, घर-बार त्याग कर ज्ञान की खोज में वनों में चले गए। उस समय उनकी आयु 30 वर्ष की थी। उन्होंने 12 वर्षों तक घोर तपस्या की। अंततः उन्हें ऋजुपालिका नदी के निकट जरिमबिक ग्राम में कैवल्य ज्ञान (सर्वोच्च सत्य) प्राप्त हुआ। इस ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् वर्धमान, जिन (इंद्रियों का विजेता) तथा महावीर (महान् विजेता) कहलवाए। ज्ञान प्राप्ति के समय महावीर जी की आयु 42 वर्ष थी।
4. धर्म प्रचार-ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् महावीर जी ने लोगों में फैले अंध-विश्वासों को दूर करने के लिए उन्हें सत्य के मार्ग पर लाने के लिए अपना अभियान आरंभ किया। उनके उपदेशों से बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हुए और वे उनके अनुयायी बन गए। महावीर जी के विख्यात प्रचार केंद्र राजगृह, वैशाली, कोशल, मिथिला, विदेह और अंग थे। जैन परंपराओं के अनुसार मगध के शासक बिंबिसार तथा उसके पुत्र अजातशत्रु ने जैन धर्म को अपना लिया था।
5. निर्वाण-स्वामी महावीर ने लगभग 30 वर्षों तक अपना प्रचार किया। 72 वर्ष की आयु में पावा (पटना) में 527 ई० पू० में उन्होंने निर्वाण (मुक्ति) प्राप्त किया। उस समय महावीर जी के 14,000 अनुयायी थे।
स्वामी महावीर की शिक्षाएँ- स्वामी महावीर अथवा जैन धर्म की प्रमुख शिक्षाएँ निम्नलिखित हैं-
1. त्रिरत्न-जैन धर्म के अनुसार मानव जीवन का परम उद्देश्य निर्वाण प्राप्त करना है। इसे प्राप्त करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को त्रिरत्न का पालन करना आवश्यक है। ये तीन रत्न थे-सत्य श्रद्धा, सत्य ज्ञान और सत्य आचरण। प्रथम रत्न के अनुसार मनुष्य को 24 तीर्थकरों में दृढ़ विश्वास होना चाहिए। दूसरे रत्न के अनुसार उन्हें 24 तीर्थकरों द्वारा दिए गए उपदेशों से सच्चा ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। तीसरे रत्न के अनुसार मनुष्य को सदैव सत्य बोलना चाहिए और पवित्र जीवन व्यतीत करना चाहिए।
2. अहिंसा-जैन धर्म में अहिंसा पर विशेष बल दिया गया है। अहिंसा का अर्थ है किसी की हत्या नहीं करना। जैन धर्म के अनुसार संपूर्ण विश्व प्राणवान है। यह माना जाता है कि पत्थर, चट्टान, पशुओं, पेड़-पौधों एवं जल में भी जीवन होता है। इसलिए हमें किसी भी जीव अथवा निर्जीव को कष्ट नहीं देना चाहिए।
3. पाँच व्रत-जैन धर्म के अनुसार मनुष्य को अपने जीवन में पाँच व्रतों का पालन करना चाहिए। इसके अनुसार (1) मनुष्य को हमेशा सत्य बोलना चाहिए। (ii) उसे अहिंसा की नीति पर चलना चाहिए। (iii) उसे कोई भी ऐसी वस्तु अपने पास नहीं रखनी चाहिए जो उसे दान में प्राप्त न हुई हो। (iv) उसे अपने पास धन नहीं रखना चाहिए। (v) उसे ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। इनमें से प्रथम चार व्रतों का प्रचलन पार्श्वनाथ ने किया जबकि पाँचवां व्रत स्वामी महावीर जी ने सम्मिलित किया।
4. आवागमन तथा कर्म सिद्धाँत में विश्वास-स्वामी महावीर आवागमन तथा कर्म सिद्धाँत में पूर्ण विश्वास रखते थे। उनका कहना था कि मनुष्य अपने कर्मों का स्वयं निर्माता है। मनुष्य जैसे कर्म करता है, वैसा ही फल उसे प्राप्त होता है। बुरे कर्मों से मनुष्य आवागमन के चक्र में फंसा रहता है। निर्वाण प्राप्त करने के लिए मनुष्य को सदा सत्य कर्म करने चाहिएँ।
5. शुद्ध आचरण-स्वामी महावीर ने शुद्ध आचरण को विशेष महत्त्व दिया। उन्होंने कहा कि हमें चोरी, झूठ, चुगली, घृणा, लालच आदि बुराइयों से दूर रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमें सादा और पवित्र जीवन व्यतीत करना चाहिए। मनुष्य को पापी से नहीं अपितु पाप से घृणा करनी चाहिए।
6. यज्ञों और बलियों आदि में अविश्वास-जैन धर्म यज्ञों, बलियों और अन्य मिथ्या रीति-रिवाजों को एक ढोंग मात्र समझता है। उनके अनुसार कोई भी मनुष्य धार्मिक आडंबरों से निर्वाण प्राप्त नहीं कर सकता। इसलिए जैन धर्म ने लोगों को इन अंध-विश्वासों से दूर रहने के लिए कहा।
7. निर्वाण-स्वामी महावीर के अनुसार, मनुष्य के जीवन का मुख्य उद्देश्य निर्वाण प्राप्त करना है। जैन धर्म में निर्वाण से अभिप्राय आवागमन के चक्कर से मुक्ति है। निर्वाण प्राप्ति के पश्चात् मनुष्य का इस संसार में जन्म-मृत्यु का चक्कर समाप्त हो जाता है और उसे शाँति प्राप्त हो जाती है।
सांप्रदायिक विकास
(Sectarian Development)
चंद्रगुप्त मौर्य के समय जैन धर्म दो मुख्य संप्रदायों-दिगंबर तथा श्वेतांबर में विभाजित हो गया था। इस विभाजन के लिए उस समय मगध में लंबी अवधि तक पड़ने वाला भयंकर अकाल उत्तरदायी था। इस अकाल के कारण प्रमुख जैन भिक्खु भद्रबाहु अपने बहुत-से अनुयायियों के साथ दक्षिण भारत चला गया। वे स्वामी महावीर जी के उपदेशों पर चलते हुए वस्त्र धारण नहीं करते थे। इसीलिए उन्हें दिगंबर (नग्न रहने वाले) कहा जाने लगा। जो जैनी मगध में ही रह गए थे, उन्होंने श्वेत वस्त्र धारण करने आरंभ कर दिए थे जिससे उन्हें श्वेतांबर कहा जाने लगा। श्वेतांबर मत वाले जैनियों ने स्थूलभद्र के नेतृत्व में पाटलिपुत्र में एक सभा का आयोजन किया। इसमें जैन धर्म के सिद्धाँतों पर आधारित 12 अंग लिखे गए। दिगंबर मत वालों ने इन्हें स्वीकार नहीं किया। उन्होंने अपने अलग ग्रंथों की रचना की। ऊपरी तौर पर इन दोनों संप्रदायों में कोई विशेष अंतर नहीं था। दोनों का महावीर जी की शिक्षा में विश्वास था। उनका परस्पर मतभेद केवल मठों के सिद्धांतों तक सीमित था। यह औपचारिक विभाजन अब तक दोनों संप्रदायों में चला आ रहा है।
I. महात्मा बुद्ध का जीवन
1. जन्म तथा माता-पिता महात्मा बुद्ध का जन्म 567 ई० पू० में कपिलवस्तु के निकट लुंबिनी के स्थान पर हुआ। उनकी माता का नाम महामाया था। उनके पिता शुद्धोधन शाक्य गणराज्य के प्रमुख थे। उनकी राजधानी का नाम कपिलवस्तु था। महात्मा बुद्ध का आरंभिक नाम सिद्धार्थ था।
उनकी राजधानी का नाम कपिलवस्तु था। महात्मा बुद्ध का आरंभिक नाम सिद्धार्थ (Siddartha) था। उनके जन्म के समय आसित (Asita) नामक ऋषि ने भविष्यवाणी की थी कि यह बालक या तो संसार का एक महान् सप्ताट् बनेगा या एक महान् धार्मिक पुरुष। सिद्धार्थ के जन्म से सात दिन पश्चात् उनकी माता का देहाँत हो गया। इसलिए सिद्धार्थ का पालन-पोषण महामाया की छोटी बहन तथा शुद्धोधन की दूसरी महारानी महाप्रजापति गोतमी ने किया।
2. बाल्यकाल तथा विवाह (Childhood and Marriage)- सिद्धार्थ का पालन-पोषण बहुत लाड-प्यार से हुआ था। उन्हें शिक्षा देने के लिए हर प्रकार के प्रबंध किए गए। वह आरंभ से ही कुछ गंभीर स्वभाव के थे। वह एकांत में रहना पसंद करते थे। शुद्धोधन ने सिद्धार्थ के मनोरंजन के लिए विशेष प्रबंध किए थे परंतु वह सिद्धार्थ को संतुष्ट न कर सके। सिद्धार्थ के पिता चाहते थे कि उनका पुत्र एक महान् सम्राट् बने, इसलिए वह सिद्धार्थ का ध्यान आध्यात्मिक विचारों से हटाना चाहते थे। अतः उन्होंने 16 वर्ष की आयु में सिद्धार्थ का विवाह एक अति सुंदर राजकुमारी यशोधरा के साथ कर दिया। उनके घर एक पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम राहुल (बंधन) रखा गया। सिद्धार्थ सदैव उदासीन तथा विचारमग्न रहते थे। गृहस्थ जीवन भी उन्हें सांसारिक कार्यों की ओर आकर्षित नहीं कर सका।
3. चार महान् दृश्य तथा महान् त्याग (Four Major Sights and Renunciation)- सिद्धार्थ को अति सुंदर महलों में रखा गया था परंतु उनका मन बाहरी संसार को देखने के लिए व्याकुल था। एक दिन वह अपने सारथि चन्न को लेकर बाहर निकले। रास्ते में उन्होंने एक बूढ़ा, एक रोगी, एक व्यक्ति की अर्थी तथा एक साधु को देखा। इन दृश्यों का सिद्धार्थ के मन पर गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने जान लिया कि संसार दुःखों का घर है। इसलिए सिद्धार्थ ने घर त्याग देने का निश्चय किया। आखिर एक रात वह अपनी पत्नी तथा पुत्र को सोते हुए छोड़ कर सत्य की खोज में निकल पड़े। इस घटना को महान् त्याग कहा जाता है। उस समय सिद्धार्थ की आयु 29 वर्ष की थी।
4. ज्ञान की प्राप्ति (Enlightenment) घर का त्याग करने के पश्चात् सिद्धार्थ पहले मगध की राजधानी राजगाह पहुँचे। वहाँ उन्होंने दो गुरुओं (अलारकलाम तथा उदरक) से शिक्षा प्राप्त की परंतु उनके मन को शाँति न मिली। वह अपने पाँच साथियों को लेकर ऊरवेला के जंगलों में चले गए। यहाँ उन्होंने 6 वर्ष तक कठोर तप किया परंतु उन्हें ज्ञान की प्राप्ति न हुई। इसलिए उनके पाँच साथी उन्हें छोड़कर चले गए। अब सिद्धार्थ बोध गया गए। यहाँ उन्होंने एक पीपल के वृक्ष के नीचे समाधि लगाई। 48 दिन की समाधि के पश्चात् वैशाख की पूर्णिमा के दिन उन्हें सर्वोच्च ज्ञान की प्राप्ति हुई। इस ज्ञान के कारण वे बुद्ध (प्रज्ञावान्) एवं तथागत (जिसने सत्य को पा लिया हो) कहलाए। जिस वृक्ष के नीचे बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था वह महाबोद्धि वृक्ष के नाम से विख्यात हुआ। ज्ञान प्राप्ति के समय महात्मा बुद्ध की आयु 35 वर्ष थी।
5. धर्म प्रचार (Religious Preaching)- ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् महात्मा बुद्ध सर्वप्रथम बनारस के निकट सारनाथ पहुँचे। यहाँ महात्मा बुद्ध ने अपना पहला उपदेश अपने पुराने 5 साथियों को दिया। वे बुद्ध के अनुयायी बन गए। इस घटना को धर्म चक्र प्रवर्तन कहा जाता है। महात्मा बुद्ध इसी प्रकार लगातार 45 वर्ष तक स्थान-स्थान पर जाकर अपने उपदेशों का प्रचार करते रहे। उनके सरल उपदेशों का लोगों पर गहरा प्रभाव पड़ा और वे बुद्ध के अनुयायी बनते चले गए। बुद्ध के अनुयायियों में मगध के शासक बिंबिसार व अजातसत्तु, कोशल का शासक प्रसेनजित, कौशांबी का शासक उदयन, वैशाली की प्रसिद्ध वेश्या आम्रपाली और कपिलवस्तु के शासक शुद्धोधन (बुद्ध के पिता), रानी महाप्रजापति गोतमी, बुद्ध की पत्नी यशोधरा तथा उनका पुत्र राहुल भी शामिल थे।
6. महापरिनिर्वाण (Mahaparnirvana) महात्मा बुद्ध ने अपने उपदेशों द्वारा भटकी हुई मानवता को ज्ञान का मार्ग दिखाया। 80 वर्ष की आयु में 487 ई० पू० जब महात्मा बुद्ध कुशीनगर पहुँचे तो उन्होंने वैशाख की पूर्णिमा के दिन अपना शरीर त्याग दिया। इस घटना को बौद्ध धर्म में महापरिनिर्वाण कहा जाता है। बौद्ध परंपरा के अनुसार महापरिनिर्वाण से पूर्व महात्मा बुद्ध ने अपने शिष्यों को यह अंतिम संदेश दिया,
"तुम सब अपने लिए खुद ही ज्योति बनो क्योंकि तुम्हें खुद ही अपनी मुक्ति का रास्ता ढूँढना है
महात्मा बुद्ध की आयु 35 वर्ष थी।
II. महात्मा बुद्ध की शिक्षाएँ
महात्मा बुद्ध की शिक्षाएं सरल एवं प्रभावशाली थीं। उनकी शिक्षाओं को सुत पिटक में दी गई कहानियों के आधार पर पुनर्निर्मित किया गया है। इन्हें लोगों की आम भाषा पालि में रचा गया था।
महात्मा बुद्ध की प्रमुख शिक्षाओं का वर्णन निम्नलिखित अनुसार है-
1. चार महान (आर्य )सत्य-महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं का सार चार महान सत्य हैं। ये चार सत्य हैं-
(i) संसार दुःखों से भरा हुआ है-महात्मा बुद्ध के अनुसार संसार दुःखों से भरा हुआ है। जन्म से लेकर मृत्यु तक मानव के जीवन में दुःख ही दुःख हैं। क्षणिक सुखों को सुख मानना मानव की मूर्खता है।
(ii) दुःखों का कारण है-महात्मा बुद्ध के अनुसार दुःखों का कारण मानव की तृष्णा है। अज्ञानता के कारण मानव इंद्रिय सुखों के पीछे लगा रहता है। इस कारण वह तमाम उत्स दुःखों को भोगता है।
(iii) दुःख निवारण-महात्मा बुद्ध के अनुसार मानव तृष्णा का त्याग कर दुःखों का निवारण कर सकता है।
(iv) दुःख निवारण मार्ग-महात्मा बुद्ध के अनुसार मानव अष्ट मार्ग पर चलकर दुःखों से निवारण प्राप्त कर सकता है।
से मनुष्य के कष्ट दूर हो सकते हैं। (iv) इन इच्छाओं का अंत अष्ट मार्ग पर चलकर किया जा सकता है।
2. अष्ट मार्ग (Eightfold Path)- महात्मा बुद्ध ने लोगों को अष्ट मार्ग जिसे अष्टांग मार्ग भी कहा जाता है. पर चलने का उपदेश दिया। अष्ट मार्ग को मध्य मार्ग भी कहा जाता है क्योंकि यह कठोर तप तथा ऐश्वर्य के मध्य का मार्ग था। अष्ट मार्ग के सिद्धांत निम्नलिखित थे-
(1) सत्य कर्म (Right Action)- मनुष्य के कर्म शुद्ध होने चाहिएँ। उसे चोरी, ऐश्वर्यं तथा जीव हत्या से दूर रहना चाहिए। उसे समस्त मानवता से प्रेम करना चाहिए।
(ii) सत्य विचार (Right Thought)- सभी मनुष्यों के विचार सत्य होने चाहिएँ। उन्हें सांसारिक बुराइयों तथा व्यर्थ के रीति-रिवाजों से दूर रहना चाहिए।
(iii) सत्य विश्वास (Right Belief)- मनुष्य को यह सच्चा विश्वास होना चाहिए कि इच्छाओं का त्याग करने से दुःखों का अंत हो सकता है। उन्हें अष्ट मार्ग से भटकना नहीं चाहिए।
(iv) सत्य रहन-सहन (Right Living)- सभी मनुष्यों का रहन-सहन सत्य होना चाहिए। उन्हें किसी से कोई हेरा-फेरी नहीं करनी चाहिए।
(v) सत्य वचन (Right Speech)- मनुष्य के वचन पवित्र तथा मृदु होने चाहिएँ। उसे किसी की निंदा व चुगली नहीं करनी चाहिए तथा सदा सत्य बोलना चाहिए।
(१) सत्य प्रयत्न (Right Efforts)- मनुष्य को बुरे कर्मों के दमन तथा दूसरों के कल्याण हेतु सत्य प्रयत्न करने चाहिएँ।
(vii) सत्य ध्यान (Right Recollection)- मनुष्य को अपना ध्यान पवित्र तथा सादा जीवन व्यतीत करने में लगाना चाहिए।
(viii) सत्य समाधि (Right Meditation)- मनुष्य को बुराइयों का ध्यान छोड़कर सत्य समाधि में लीन होना चाहिए।
3. कर्म सिद्धांत में विश्वास (Belief in Karma Theory)- महात्मा बुद्ध कर्म सिद्धाँत में विश्वास रखते थे। उनका विचार था कि मनुष्य स्वयं अपना भाग्य विधाता है। जैसे कर्म मनुष्य करेगा, उसे वैसा ही फल मिलेगा। हमें पिछले कर्मों का फल इस जन्म में मिला है और अब के कर्मों का फल अगले जन्म में मिलेगा।
4. अहिंसा (Ahimsa)- महात्मा बुद्ध अहिंसा में विश्वास रखते थे। उनका विचार था कि मनुष्य को सभी जीवों अर्थात् मनुष्य, पशु-पक्षियों तथा जीव-जंतुओं से प्रेम तथा सहानुभूति रखनी चाहिए। वह जीव हत्या तो दूर, उन्हें सताना भी बहुत बुरा समझते थे। इसलिए उन्होंने जीव हत्या करने वालों के विरुद्ध प्रचार किया।
5. नैतिकता पर बल (Stress on Morality) महात्मा बुद्ध नैतिकता पर बहुत बल देते थे। उनके विचार में नैतिकता के बिना धर्म एक ढोंग मात्र रह जाता है। नैतिकता के मार्ग पर चलने के लिए महात्मा बुद्ध ने मनुष्यों को यह आचार संहिता अपनाने पर बल दिया (1) सदा सत्य बोलो। (ii) चोरी न करो। (iii) नशीले पदार्थों का सेवन न करो। (iv) स्त्रियों से दूर रहो। (v) ऐश्वर्य के जीवन से दूर रहो। (vi) नृत्य-गान में रुचि न रखो। (vii) धन से दूर रहो। (viii) सुगंधित वस्तुओं का प्रयोग न करो। (ix) झूठ न बोलो और (x) किसी
को कष्ट न पहुँचाओ। महात्मा बुद्ध के अनुसार, "कोई भी चाहे हजारों युद्ध जीत ले परंतु महान् विजेता वही है जो स्वयं पर विजय प्राप्त कर ले।"
6. परस्पर भ्रातृभाव (Universal Brotherhood) - महात्मा बुद्ध ने लोगों को भ्रातृभाव का उपदेश दिया। वह चाहते थे कि लोग परस्पर झगड़े छोड़ कर प्रेम पूर्वक रहें। उनका विचार था कि संसार में घृणा का अंत प्रेम से किया जा सकता है। महात्मा बुद्ध ने अपने धर्म में प्रत्येक वर्ण तथा जाति के लोगों को सम्मिलित करके समाज में प्रचलित ऊँच-नीच की भावना को पर्याप्त सीमा तक दूर किया। महात्मा बुद्ध ने दुःखी तथा रोगी व्यक्तियों को अपने हाथों सेवा करके लोगों के सामने एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत किया।
7. यज्ञों तथा बलियों में अविश्वास (Disbelief in Yajnas and Sacrifices)- उस समय हिंदू धर्म में अनेक अंध-विश्वास प्रचलित थे। वे मुक्ति प्राप्त करने के लिए यज्ञों तथा बलियों पर बहुत बल देते थे। महात्मा बुद्ध ने इन अंध विश्वासों को ढोंग मात्र बताया।
8. वेदों तथा संस्कृत में अविश्वास (Disbelief in Vedas and Sanskrit)- महात्मा बुद्ध ने वेदों की पवित्रता को स्वीकार न किया। उन्होंने इस बात का भी खंडन किया कि धर्म ग्रंथों को केवल संस्कृत भाषा में पढ़ने से ही फल की प्राप्ति होती है। उन्होंने अपना प्रचार जन-भाषा पालि में किया।
9. जाति प्रथा में अविश्वास (Disbelief in Caste System)- महात्मा बुद्ध ने हिंदू समाज में व्याप्त जाति प्रथा का कड़ा विरोध किया। उनके अनुसार मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार छोटा अथवा बड़ा हो सकता है न कि जन्म से। उन्होंने अपने धर्म में प्रत्येक वर्ग के लोगों को सम्मिलित करके सामाजिक असमानता को दूर किया।
10. तपस्या में अविश्वास (Disbelief in Penance)- महात्मा बुद्ध का कठोर तपस्या में विश्वास नहीं था। उनके अनुसार व्यर्थ ही भूखा-प्यासा रह कर शरीर को कष्ट देने से कोई लाभ नहीं। उन्होंने स्वयं भी 6 वर्ष तक तपस्वी का जीवन व्यतीत किया था। परंतु कुछ प्राप्ति न हुई। वह समझते थे कि गृहस्थ जीवन व्यतीत करते हुए अष्ट मार्ग पर चलकर निर्वाण प्राप्त किया जा सकता है।
11. ईश्वर के संबंध में विचार (Views about God)- महात्मा बुद्ध जान बूझ कर ईश्वर के अस्तित्व के संबंध में चुप रहे। वह इस संबंध में किसी विवाद में नहीं पड़ना चाहते थे। परंतु वह यह अवश्य मानते थे कि संसार के संचालन में कोई शक्ति अवश्य काम करती है। इस शक्ति को उन्होंने धर्म का नाम दिया।
12. निर्वाण (Nirvana)- महात्मा बुद्ध के अनुसार मनुष्य का सबसे बड़ा उद्देश्य निर्वाण प्राप्त करना है। निर्वाण के कारण मनुष्य को सुख, आनंद और शाँति की प्राप्ति हो जाती है। उसे आवागमन के चक्कर से सदा के लिए मुक्ति मिल जाती है।
बौद्ध संघ
(Buddhist Sangha)
महात्मा बुद्ध ने अपने अनुयायियों को संगठित करने के लिए बौद्ध संघ की स्थापना की थी। संघ से भाव बौद्ध भिक्खुओं/भिक्खुनियों के संगठन से था। धीरे-धीरे ये संघ एक शक्तिशाली संस्था का रूप धारण कर गए थे। प्रत्येक पुरुष अथवा स्त्री, जिसकी आयु 15 वर्ष से अधिक थी, बौद्ध संघ का सदस्य बन सकता था। अपराधियों, रोगियों तथा दासों को सदस्य बनने की अनुमति नहीं थी। सदस्य बनने से पूर्व घर वालों से अनुमति लेना आवश्यक था। नए भिक्खु/भिक्खुनी को संघ में प्रवेश के समय मुंडन करवा कर पीले वस्त्र धारण करने पड़ते थे और यह शपथ लेनी पड़ती थी "मैं बुद्ध की शरण लेता हूँ, मैं धम्म की शरण लेता हूँ, मैं संघ की शरण लेता हूँ।" संघ के सदस्यों को बड़ा अनुशासित जीवन व्यतीत करना पड़ता था। प्रत्येक सदस्य को इन नियमों का पालन करना आवश्यक था। ये नियम थे- (i) ब्रह्मचर्य का पालन करना। (ii) जीवों को कष्ट न देना। (iii) दूसरों की संपत्ति की इच्छा न करना। (iv) सदा सत्य बोलना । (v) मादक पदार्थों का सेवन न करना। (vi) नृत्य-गान में भाग न लेना । (vii) सुगंधित वस्तुओं का प्रयोग न करना। (viii) गद्देदार बिस्तर पर न सोना। (ix) अपने पास धन न रखना तथा (x) निश्चित समय को छोड़कर किसी अन्य अवसर पर भोजन न करना।
आरंभ में केवल पुरुषों को ही संघ में सम्मिलित होने की अनुमति थी। महात्मा बुद्ध के प्रिय शिष्य आनंद के आग्रह पर स्त्रियों को भी संघ में सम्मिलित होने की अनुमति दे दी गई। संघ में सम्मिलित होने वाली प्रथम भिक्खुनी महात्मा बुद्ध की उपमाता (foster mother) महाप्रजापति गोतमी (Mahaparjapati Gotami) थी। इसके पश्चात् अनेक अन्य स्त्रियाँ संघ में सम्मिलित हुईं। आगे चलकर वे थेरी (theris) बनीं। इससे अभिप्राय उन स्त्रियों से था जिन्होंने निर्वाण प्राप्त कर लिया था।
बौद्ध धर्म के शीघ्र प्रसार के कारण
भारत में बौद्ध धर्म के शीघ्र प्रसार एवं पतन के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे।
इसका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है-
1. बौद्ध धर्म का शीघ्र प्रसार
1. सरल शिक्षाएँ-बौद्ध धर्म की शिक्षाएँ अत्यंत सरल थीं। इसके चलते यह धर्म शीघ्र ही लोकप्रिय हो गया। बौद्ध धर्म में आत्मा-परमात्मा तथा स्वर्ग-नरक आदि जटिल प्रश्नों के लिए कोई स्थान नहीं था। इसके अतिरिक्त धर्म अंध-विश्वासों से कोसों दूर था। इस धर्म का मूल तत्त्व यह था कि लोगों को अष्ट मार्ग के अनुसार अपना जीवन व्यतीत करना चाहिए। बौद्ध धर्म की सरल शिक्षाओं के कारण लोग बड़ी संख्या में बौद्ध धर्म में सम्मिलित हुए।
2. महात्मा बुद्ध का व्यक्तित्व-बौद्ध धर्म के विकास में महात्मा बुद्ध के अपने व्यक्तित्व का उल्लेखनीय योगदान था। उनका जीवन पवित्र था। वह नम्रता, त्याग, सत्य और परोपकार का जीवित उदाहरण थे। उन्होंने जिस बात का भी प्रचार किया, उसे पहले खुद अपनाया। उन्होंने अपने शाही ऐश्वर्य, सुंदर पत्नी और पुत्र आदि को त्याग कर लोगों के सम्मुख उदाहरण प्रस्तुत किया। बुद्ध के तर्क सुनकर बड़े-बड़े विद्वान् भी उनका लोहा मान गए। इस प्रकार बुद्ध के व्यक्तित्व का सभी पर चमत्कारी प्रभाव पड़ा तथा वे बौद्ध धर्म में सम्मिलित होते चले गए।
3. समानता का सिद्धांत-बौद्ध धर्म में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तया शूद्र सभी को एक समान दर्जा प्राप्त था। बुद्ध के अनुसार मनुष्य के कर्म ही उसके ब्राह्मण अथवा शूद्र होने के संबंध में सूचित करते हैं। जन्म के आधार पर सभी मनुष्य एक समान हैं। बौद्ध धर्म में स्त्रियों तथा पुरुषों को समान अधिकार दिए गए। उस समय हिंदू समाज में स्त्रियों तथा शूद्रों की दशा बहुत दयनीय थी। उन्होंने भारी संख्या में बौद्ध धर्म में सम्मिलित होना आरंभ कर दिया। इस प्रकार बौद्ध धर्म के समानता के सिद्धाँत ने उसे बहुत लोकप्रिय बनाया।
4. बौद्ध संघ के प्रयत्न- बौद्ध धर्म के विकास में बौद्ध संघों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन संघों में बौद्ध भिक्खुओं को दीक्षा तथा बौद्ध धर्म के संबंध में शिक्षा दी जाती थी। धीरे-धीरे ये संघ शिक्षा के विख्यात केंद्र बन गए। इनमें बौद्ध धर्म के प्रसार के संबंध में महत्त्वपूर्ण निर्णय लिए जाते थे। इन संघों का संगठन प्रजातंत्रीय सिद्धांतों पर आधारित था। इन संघों में कार्य करने वाले भिक्खु तथा भिक्खुनियों ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए कोई प्रयास न छोड़ा। उनका अपना जीवन बड़ा पवित्र तथा सादा था। इसलिए लोगों पर उनके प्रचार का जादुई प्रभाव पड़ा।
5. राजकीय संरक्षण-बौद्ध धर्म को अनेक भारतीय शासकों से संरक्षण प्रदान हुआ था। इस कारण बौद्ध धर्म दिन-प्रतिदिन प्रगति करता गया। महात्मा बुद्ध के काल में ही मगध, कोशल तथा लिच्छवी राजवंशों ने बौद्ध धर्म के प्रचार में अपना सहयोग दिया। महात्मा बुद्ध के पश्चात् अशोक, कनिष्क और हर्ष ने अपने अथक प्रयत्नों से बौद्ध धर्म को न केवल भारत में अपितु विदेशों में भी फैला दिया। इन शासकों के प्रयत्नों के बिना बौद्ध धर्म का इतना प्रसार संभव नहीं था।
II. बौद्ध धर्म का पतन
1. बौद्ध धर्म में फूट-महात्मा बुद्ध की मृत्यु के पश्चात् बौद्ध धर्म परस्पर फूट का शिकार हो गया। यह न केवल महायान और हीनयान बल्कि कई अन्य छोटे-छोटे संप्रदायों में बँट गया। इन्होंने बौद्ध धर्म के संबंध में अलग-अलग व्याख्या करनी आरंभ कर दी। इनके परस्पर मतभेदों और विवादों के कारण बौद्ध धर्म की प्रतिष्ठा को भारी आघात पहुँचा। बौद्धों की बज्रयान शाखा जादू-टोनों में विश्वास रखती थी। इसने हर प्रकार के नशे करने, माँस भक्षण तथा पर-स्त्री गमन की खुली छूट दे दी थी। इसने बौद्ध धर्म की नैया को डुबो दिया।
2. बौद्ध संघों में भ्रष्टाचार आरंभ में बौद्ध संघों ने बौद्ध धर्म के प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उस समय इनमें कार्यरत भिक्खुओं तथा भिक्खुनियों का जीवन बड़ा पवित्र होता था। बाद में राजकीय सहायता के कारण बौद्ध संघ धन से मालामाल हो गए। परिणामस्वरूप भिक्खु भ्रष्टाचारी और विलासी हो गए। वे अब अपना समय बौद्ध धर्म के प्रचार की अपेक्षा सुरा तथा सुंदरी के संग व्यतीत करने लगे। इसने बौद्ध धर्म के पतन को अवश्यंभावी बना दिया।
3. हिंदू धर्म की पुनर्स्थापना-समय के साथ-साथ ब्राह्मणों ने हिंदू धर्म के पुराने गौरव को पुनः स्थापित करने के प्रयत्न आरंभ कर दिए थे। उन्होंने हिंदू धर्म में प्रचलित बुराइयों को दूर करने का प्रयत्न किए। कुमारिल भट्ट और शंकराचार्य ने अपने अथक प्रयत्नों से हिंदू धर्म में नवप्राण फेंके। हिंदू धर्म की पुनः स्थापना से बौद्ध धर्म का गौरव जाता रहा।
4. राजकीय संरक्षण की समाप्ति बौद्ध धर्म को लोकप्रिय बनाने में महाराजा अशोक, कनिष्क और हर्षवर्धन ने कोई कोशिश नहीं छोड़ी थी परंतु इन शासकों को छोड़ कर भारत के अधिकाँश शासकों ने हिंदू धर्म को अपना संरक्षण दिया था। उत्तर में गुप्त और राजपूत वंशों ने और दक्षिण में चोल और चालुक्य राजवंशों ने हिंदू धर्म के प्राचीन गौरव को पुनः स्थापित करने में अत्यधिक सफलता प्राप्त की। दूसरी ओर राजकीय संरक्षण न मिलने से बौद्ध धर्म का प्रभाव दिन-प्रतिदिन कम होता चला गया।
5. हूणों के आक्रमण-हूणों के आक्रमणों से बौद्ध धर्म को एक गहरा आघात लगा। हूण मध्य एशिया की एक बहुत ही अत्याचारी जाति थी। उनके नेता मिहिरकुल ने भारत में हजारों बौद्धों की हत्या करवा दी। बौद्धों के बहुत-से मठों को नष्ट कर दिया गया। परिणामस्वरूप पंजाब और राजपूताना में बौद्धों का नामो-निशान मिट गया।
6. मुसलमानों के आक्रमण-11वीं तथा 12वीं शताब्दी में मुसलमानों ने भारत पर आक्रमण आरंभ कर दिए थे। बौद्ध अहिंसा की नीति के कारण इन मुस्लिम आक्रमणों का सामना न कर सके। मुसलमानों ने बड़ी संख्या में बौद्धों की हत्या कर दी। उन्होंने भारत में बहुत-से बौद्ध विहारों तथा मठों को ध्वस्त कर दिया। नालंदा विश्वविद्यालय को पूरी तरह जला दिया गया। वास्तव में ये मुस्लिम आक्रमण बौद्धों के लिए विनाशकारी प्रमाणित हुए।
हीनयान और महायान
(1) हीनयान से अभिप्राय था छोटा यान एवं महायान से अभिप्राय था बड़ा यान।
(ii) हीनयान बोधिसत्तों में विश्वास नहीं रखता था जबकि महायान उनमें विश्वास रखता था।
(iii) हीनयान मूर्ति पूजा के विरुद्ध था जबकि महायान इसके पक्ष में था।
बौद्ध साहित्य
- बौद्ध साहित्य के महत्त्वपूर्ण ग्रंथ बुद्धचरित, नाटक, त्रिपिटिक, कयावधु, महाविभास, दीपवंश तथा महावंश हैं। अधिकांश बौद्ध साहित्य पालि भाषा में लिखा गया।
. त्रिपिटक क्या हैं ?
-त्रिपिटक प्रसिद्ध बौद्ध ग्रंथ हैं। इनके नाम हैं- विनय पिटक, सुत्त पिटक तथा अभिधम्म पिटक। इन्हें टोकरियों में संभाल कर रखा जाता था।
बौद्ध धर्म का इतिहास : साँची स्तूप
जातक कथाएँ क्या हैं ?
-(1) जातक कथाएँ बौद्ध कथाओं को कहा जाता है।
(ii) इसकी संख्या 549 है तथा इन्हें पालि भाषा में लिखा गया है।
(iii) इनमें महात्मा बुद्ध के पूर्व जन्मों के बारे में बताया गया है।
देशों के नाम बताइए जहाँ बौद्ध धर्म फैला ;;;;;;;;
-बौद्ध धर्म चीन, श्रीलंका, तिब्बत, कंबोडिया, इंडोनेशिया, थाईलैंड, बर्मा एवं जावा में फैला।

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