CLASS 12 HISTORY CH-5
Class 12 History Notes Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ
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अल-बिरुनी 11वीं शताब्दी में मध्य एशिया का सबसे महान् विद्वान् था। वह महमूद गजनवी के साथ भारत आया था। वह हिंदू दर्शन से बहुत प्रभावित हुआ। उसने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ किताब-उल-हिंद में भारतीय सभ्यता
एवं संस्कृति के संबंध में विस्तृत प्रकाश डाला है। इस ग्रंथ को मध्यकालीन भारतीय इतिहास का एक बहुमूल्य स्रोत माना जाता है।
अल्-बिरूनी (Al-Biruni) मध्यकालीन इस्लामी जगत का एक महान विद्वान, वैज्ञानिक, गणितज्ञ, भूगोलवेत्ता, खगोलशास्त्री और भारतविद् था। उसका पूरा नाम अबू रायहान मुहम्मद इब्न अहमद अल-बिरूनी था। उसे भारत का "विदेशी यात्री" और "प्रथम वैज्ञानिक पर्यटक" भी कहा जाता है। उसका जीवन संक्षेप में इस प्रकार है:
अल-बिरूनी का जीवन
1. जन्म
अल-बिरूनी का जन्म 4 सितम्बर 973 ई. में ख़्वारिज़्म (वर्तमान उज्बेकिस्तान क्षेत्र) में हुआ।
वह ख़्वारिज़्म साम्राज्य के बिरून नामक गाँव का निवासी था, इसी कारण उसका नाम अल-बिरूनी पड़ा।
2. शिक्षा
उसने प्रारम्भ से ही विज्ञान, गणित, खगोलशास्त्र, ज्योतिष और चिकित्सा जैसे विषयों में गहरी रुचि दिखाई।
यूनानी, संस्कृत, फारसी, अरबी, सीरियाई और तुर्की भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया।
3. भारत आगमन
जब महमूद ग़ज़नी ने भारत पर आक्रमण किया, तब अल-बिरूनी भी उसके साथ 1017 ई. के आसपास भारत आया।
यहाँ उसने कई वर्षों तक निवास किया और भारतीय समाज, संस्कृति, धर्म और दर्शन का गहन अध्ययन किया।संस्कृत सीखी और प्राचीन ग्रंथों का अनुवाद किया।
4. प्रमुख कृतियाँ
“तहकीक-ए-हिंद” (Kitab fi Tahqiq ma li’l-Hind) – इसमें भारत की सामाजिक व्यवस्था, धर्म, जाति प्रथा, दर्शन, विज्ञान, भूगोल और संस्कृति का विस्तार से वर्णन है।
“अल-कानून अल-मसूदी” – खगोलशास्त्र और ज्योतिष पर आधारित पुस्तक।
“किताब-उल-हिंद” – भारतीय जीवन का विश्वकोशीय विवरण।
5. व्यक्तित्व और योगदान
वह धार्मिक सहिष्णुता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का समर्थक था।
उसने भारतीय गणितज्ञों, आयुर्वेदाचार्यों और विद्वानों से संवाद किया।
खगोलशास्त्र, भूगोल, गणित और चिकित्सा में उसके योगदान को आधुनिक विज्ञान की नींव माना जाता है।
6. मृत्यु
अल-बिरूनी का निधन 1048 ई. में हुआ। 75वर्ष की आयु।
अल-बिरूनी द्वारा लिखी गई ‘किताब-उल-हिंद’ भारत के जीवन और संस्कृति का विश्वकोशीय ग्रंथ है। इसका मूल नाम ‘किताब-उल-हिंद फी तहकीक मा लिल-हिंद’ था और यह अरबी भाषा में 11वीं शताब्दी में लिखी गई। अल-बिरूनी महमूद ग़ज़नी के साथ भारत आया और यहाँ लंबे समय तक रहकर भारतीय समाज, धर्म, दर्शन, विज्ञान और परंपराओं का गहन अध्ययन किया। उसने संस्कृत भाषा सीखी और वेदों, पुराणों, आयुर्वेद तथा गणित-खगोल से जुड़े ग्रंथों को पढ़कर उनका तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया। इस पुस्तक में भारत के धर्मों, जाति-व्यवस्था, सामाजिक रीति-रिवाजों, विवाह-संस्कारों, त्योहारों, भूगोल, नदियों, चिकित्सा-विज्ञान और खगोलशास्त्र का निष्पक्ष और वैज्ञानिक वर्णन मिलता है। अल-बिरूनी ने भारतीय ज्ञान परंपरा की तुलना यूनानी और इस्लामी ज्ञान परंपरा से भी की। किताब-उल-हिंद का सबसे बड़ा महत्व यह है कि यह भारत पर लिखा गया पहला शोधपूर्ण और व्यवस्थित ग्रंथ है, जिसे इतिहासकार भारत का सांस्कृतिक नृवंशशास्त्र भी मानते हैं। यह ग्रंथ उस समय के भारतीय समाज की सजीव झलक प्रस्तुत करता है और आज भी भारतीय इतिहास के अध्ययन के लिए अमूल्य स्रोत है।
किताब-उल-हिंद में भारतीय समाज का विवरण
1. जाति-प्रथा
अल-बिरूनी ने लिखा कि भारत में समाज मुख्यतः चार वर्णों में बँटा हुआ है — ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। ब्राह्मण धर्म, ज्ञान और शिक्षा के संरक्षक थे, क्षत्रिय शासन और रक्षा के कार्य में लगे थे, वैश्य व्यापार और कृषि में सक्रिय थे और शूद्र सेवा कार्य करते थे। यह व्यवस्था जन्म आधारित थी और सामाजिक स्थान तय करती थी। वर्ण व्यवस्था का पालन कड़ा था और जाति के भीतर विवाह व अन्य सामाजिक गतिविधियाँ होती थीं।
2. आश्रम-व्यवस्था
उसने चार आश्रमों का विवरण दिया —
ब्रह्मचर्य : जीवन का प्रारंभिक चरण, जिसमें शिक्षा और आत्म-नियंत्रण होता है।
गृहस्थ : विवाह और परिवार के साथ सामाजिक और आर्थिक जिम्मेदारियाँ निभाना।
वानप्रस्थ : गृहस्थ जीवन से संन्यास की ओर अग्रसर होना, साधना और तपस्या।
संन्यास : पूर्णतया सांसारिक जीवन से अलग होकर मोक्ष की प्राप्ति के लिए साधना।
यह व्यवस्था जीवन को चार चरणों में बाँटकर अनुशासन और धर्म पालन सुनिश्चित करती थी।
3. विवाह
विवाह भारतीय जीवन का एक महत्वपूर्ण संस्कार था। अल-बिरूनी ने लिखा कि विवाह धार्मिक कर्तव्य है और इसे बहुत पवित्र माना जाता है। विवाह के कई प्रकार प्रचलित थे, जैसे प्रेम विवाह, अरेंज मैरिज, आदि। विधवाओं को पुनर्विवाह की अनुमति नहीं थी। विवाह में कन्यादान और अन्य संस्कार अत्यंत महत्वपूर्ण थे।
4. स्त्रियों की स्थिति
अल-बिरूनी ने भारतीय स्त्रियों की स्थिति का गहराई से वर्णन किया। उसने लिखा कि महिलाएं घर और परिवार की संरक्षक होती थीं, लेकिन सामाजिक रूप से पुरुषों के अधीन थीं। विधवाओं की स्थिति कठिन थी और उन्हें कई सामाजिक प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता था। सती प्रथा का उल्लेख भी किया गया है, जिसमें विधवा अपने पति के अग्नि संस्कार में स्वयं को समर्पित करती थी।
5. धार्मिक दशा
भारत में धार्मिक जीवन बहुत विविध था। यहाँ अनेक देवी-देवताओं की पूजा होती थी। वेद, उपनिषद, पुराण और महाकाव्य धार्मिक आस्था के मुख्य आधार थे। अल-बिरूनी ने हिंदू धर्म के सिद्धांतों, पूजा पद्धतियों और धार्मिक अनुष्ठानों का विस्तृत वर्णन किया। उसने लिखा कि धर्म भारतीय जीवन का केंद्र था।
6. राजनीतिक दशा
उस समय भारत में एक सम्राट का शासन नहीं था, बल्कि कई छोटे-छोटे राज्यों में अलग-अलग शासक राज करते थे। शासक प्रायः अपने क्षेत्र में स्वतंत्र होते थे, लेकिन सामरिक कारणों से गठबंधन भी बनाते थे। अल-बिरूनी ने विभिन्न राज्यों और उनकी शासन-प्रणालियों का विवरण प्रस्तुत किया।
7. न्याय-प्रबंध
न्याय व्यवस्था धर्मशास्त्रों पर आधारित थी। कानून और न्याय का पालन करने के लिए ब्राह्मण वर्ग को विशेष अधिकार प्राप्त थे। न्याय के निर्णय में धर्मग्रंथों का पालन किया जाता था और सामाजिक मर्यादा का ध्यान रखा जाता था।
8. आर्थिक दशा
भारत उस समय आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न था। कृषि अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार थी। सिंचाई, पशुपालन और वस्त्र निर्माण प्रमुख उद्योग थे। भारत की भूमि उपजाऊ थी और यहाँ सोना, चाँदी, मसाले, रत्न, कपड़ा आदि अत्यधिक प्रसिद्ध थे। व्यापार नदियों, समुद्री मार्गों और कारवां मार्गों के द्वारा होता था।
पूरा नाम: अबू अब्दुल्ला मुहम्मद इब्न अब्दुल्ला अल-लायथी अल-तंज़ी (Ibn Battuta)
जन्म: 24 फ़रवरी 1304 ई. मोरक्को के प्रसिद्ध शहर तेजीयर में हुआ था।(तंज़ानिया का फ़ेस शहर)
मृत्यु: 1369–1377 ई. (ठीक तारीख निश्चित नहीं)
इब्न बतूता एक महान मुसलमान यात्री, इतिहासकार और भूगोलवेत्ता थे। उन्होंने 14वीं शताब्दी में दुनिया भर की यात्राएँ कीं और अपने अनुभवों को एक पुस्तक में संकलित किया।
यात्रा और जीवन यात्रा का सार
1. प्रारंभिक जीवन
इब्न बतूता एक धर्मनिष्ठ मुसलमान और न्यायशास्त्र का छात्र था। उन्होंने अपनी यात्रा की शुरुआत 1325 ई. में हज (मक्का की यात्रा) करने के लिए की।
2. यात्रा का विस्तार
हज यात्रा के बाद उन्होंने 30 वर्षों तक यात्रा की। उन्होंने लगभग 75,000–120,000 किलोमीटर की दूरी तय की, जो उस समय की दुनिया के व्यापक हिस्सों में फैलती थी। उनकी यात्रा में शामिल थे:
अरब देश (मक्का, मदीना, मक्का और सीरिया)
अफ्रीका (मोरक्को, मिस्र, सूडान)
एशिया (तुर्की, ईरान, इराक, भारत)
भारत (दिल्ली, बंगाल, दक्षिण भारत)
चीन और इंडोनेशिया तक यात्रा।
3. भारत यात्रा
इब्न बतूता भारत आए और यहाँ दिल्ली सल्तनत के दौर में लगभग 8 साल रहे। उन्होंने दिल्ली के सुल्तान मोहम्मद बिन तुगलक के दरबार में न्यायाधीश (क़ादी) के रूप में कार्य किया। उन्होंने भारत के राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक जीवन का विस्तृत वर्णन अपनी पुस्तक में किया।
4. प्रमुख कृति
उनकी यात्रा विवरण की पुस्तक “रिहला” (Rihla) है, जिसका अर्थ है “यात्रा”।
इसमें उन्होंने अपने यात्रा अनुभव, यात्रा के दौरान देखी गई सभ्यता, रीति-रिवाज, राजनीति, भूगोल और संस्कृति का विस्तार से वर्णन किया।
II. रिला(Rihla)
इब्न बतूता के 1354 ई० में मोरक्को पहुँचने पर वहाँ के सुल्तान अबू ईनान (Abu Inaan) ने उसका भव्य स्वागत किया। सुल्तान ने उसे समस्त यात्रा विवरण को लिपिबद्ध करने का आदेश दिया। इसे लिखने के लिए इब्न जुताई (Ibn Juzayy) को नियुक्त किया गया। इस कार्य को 1354 ई० में आरंभ किया गया तथा यह 1355 ई० में संपूर्ण हुआ। इसे अरबी (Arabic) भाषा में लिखा गया था।
इब्न बतूता की “रिहला” में भारतीय समाज का वर्णन
इब्न बतूता ने लिखा कि भारत में नारियल और पान बहुत अधिक उपयुक्त और लोकप्रिय हैं। नारियल का उपयोग भोजन और पेय में होता है, जबकि पान का सेवन सांस्कृतिक और धार्मिक रूप से भी महत्वपूर्ण था। पान को खाने की प्रथा भारतीय समाज में गहरी है और यह सामाजिक आदान-प्रदान का एक प्रतीक है।
2. भारतीय शहर
उन्होंने भारतीय शहरों का विस्तृत वर्णन किया। दिल्ली, बंगाल, मलबार और दक्कन के शहर उनके यात्रा विवरण में शामिल हैं। उन्होंने शहरों की साफ-सफाई, सड़क व्यवस्था, इमारतों, मस्जिदों और बाजारों का वर्णन किया। भारतीय शहर आर्थिक, सांस्कृतिक और धार्मिक केन्द्र थे।
3. बाज़ार
इब्न बतूता ने कहा कि भारतीय बाजार जीवंत और व्यवस्थित थे। यहाँ तरह-तरह के वस्त्र, मसाले, आभूषण, फल-फूल और अन्य वस्तुएँ मिलती थीं। व्यापार में नयी-नयी वस्तुओं और विदेशी व्यापारियों की उपस्थिति भारतीय बाजारों को आकर्षक बनाती थी।
4. कृषि और व्यापार
उन्होंने लिखा कि भारत की कृषि समृद्ध थी और यहाँ की भूमि अत्यंत उपजाऊ थी। प्रमुख फसलें चावल, गेहूँ, गन्ना आदि थीं। व्यापार में मसाले, रेशम, कपड़े, रत्न और धातुएँ प्रमुख थे। भारत का व्यापार आंतरिक और बाहरी दोनों तरह का था, जिसमें समुद्री और स्थल मार्ग शामिल थे।
इब्न बतूता ने भारत की डाक प्रणाली का उल्लेख किया। उन्होंने लिखा कि यहाँ संदेश पहुँचाने की व्यवस्था अच्छी थी और राजा के शासन में डाक व्यवस्था सुव्यवस्थित थी। यह प्रशासनिक कार्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था।
6. दास प्रथा
इब्न बतूता ने लिखा कि भारत में दास प्रथा प्रचलित थी। दास और दासी समाज का हिस्सा थे और उनके अधिकार सीमित थे। उन्होंने इस प्रथा का विवरण करते हुए कहा कि यह उस समय सामाजिक व्यवस्था का एक अंग था।
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मूल्यांकन
इब्न बतूता का भारत वर्णन न केवल यात्रा का विवरण है बल्कि मध्यकालीन भारत की समाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है। उनके अनुभव तथ्यात्मक और व्यावहारिक दृष्टिकोण से लिखे गए हैं, लेकिन इसमें कुछ व्यक्तिगत विचार और मुस्लिम दृष्टिकोण भी शामिल हैं। उनका वर्णन इस बात का प्रमाण है कि उस समय भारत कृषि, व्यापार और संस्कृति में सम्पन्न था। साथ ही, यह हमें जाति, दास प्रथा और सामाजिक रीति-रिवाजों की गहरी समझ देता है।
जन्म – 25 सितंबर 1620 ई., फ्रांस में
मृत्यु – 1688 ई.
बर्नियर फ्रांस का प्रसिद्ध चिकित्सक, दार्शनिक और पर्यटक था। वह मुग़ल काल के भारत में आया और उसने यहाँ लगभग 12 साल (1656–1668 ई.) बिताए।
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भारत यात्रा
बर्नियर 1658 ई. में भारत आया और औरंगज़ेब के शासनकाल में दरबार से जुड़ा रहा।
वह दिल्ली, कश्मीर, बंगाल और अन्य प्रांतों की यात्रा पर गया।
उसने मुग़ल दरबार, शासन व्यवस्था, सामाजिक दशा और आर्थिक स्थिति का प्रत्यक्ष वर्णन किया।
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प्रमुख कृति
उसकी प्रसिद्ध पुस्तक का नाम है – “Travels in the Mughal Empire” (1670 ई.)।
इसमें उसने अपने अनुभवों और भारत के समाज-राजनीति का चित्रण किया।
मूल पुस्तक का नाम – “Travels in the Mughal Empire (1656–1668)”
यह पुस्तक फ्रांसीसी भाषा (French) में लिखी गई थी।
इसमें बर्नियर ने भारत की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक दशा का प्रत्यक्ष चित्रण किया।
उसने भारत के प्रशासन, किसानों की स्थिति, जाति प्रथा, व्यापार, शिल्प, शहरों और महिलाओं की दशा का विवरण दिया।
फ्रांसिस बर्नियर द्वारा भारतीय समाज का वर्णन
1. भूमि स्वामित्व (Land Ownership)
बर्नियर ने लिखा कि भारत की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यहाँ निजी भूमि स्वामित्व का अधिकार नहीं है।
सारी ज़मीन को सम्राट की संपत्ति माना जाता था। ज़मींदार और अमीर केवल “जागीर” के रूप में जमीन पाते और उनकी जागीरें अस्थायी होती थीं।
इस व्यवस्था के कारण किसान असुरक्षित रहते थे। वे जानते थे कि उनके पास स्थायी अधिकार नहीं है, इसलिए वे उत्पादन बढ़ाने या जमीन सुधारने की मेहनत नहीं करते।
बर्नियर का मानना था कि यही कारण है कि भारत की कृषि व्यवस्था यूरोप की तुलना में पिछड़ी हुई है और किसान गरीब रहते हैं।
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2. राजकीय कारखाने (Royal Karkhanas)
बर्नियर ने मुग़ल दरबार के कारखानों (वर्कशॉप्स) का विस्तृत वर्णन किया।
इन कारखानों में कपड़े, आभूषण, फर्नीचर, हथियार, कालीन और विलासिता की वस्तुएँ तैयार की जाती थीं।
शिल्पकार और कारीगर इन कारखानों में राजकीय नियंत्रण के अधीन काम करते थे।
उसने लिखा कि यहाँ का शिल्प बहुत उच्च गुणवत्ता का है—विशेषकर बंगाल के मलमल और कश्मीर के शॉल।
लेकिन उसने आलोचना की कि कारीगरों को स्वतंत्रता नहीं थी, वे राज्य के आदेश पर ही उत्पादन करते थे। इस कारण निजी उद्योग और व्यक्तिगत पहल कम थी।
बर्नियर ने सती प्रथा को देखकर गहरी चिंता व्यक्त की।
उसने लिखा कि जब किसी पुरुष की मृत्यु होती है तो उसकी पत्नी को चिता पर जलाया जाता है।
कुछ स्त्रियाँ अपनी इच्छा से सती होती थीं, लेकिन कई बार यह सामाजिक दबाव या परिवार की प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए होता था।
उसने इस प्रथा को “क्रूर” और “अमानवीय” बताया और यूरोप की तुलना में भारतीय समाज की कमजोरी मानी।
फिर भी, उसने यह स्वीकार किया कि कई स्त्रियाँ इसे “धर्म और सम्मान” का हिस्सा मानकर स्वेच्छा से करती थीं।
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4. नगर (Cities)
बर्नियर ने भारत के बड़े नगरों जैसे दिल्ली, आगरा, लाहौर, अहमदाबाद, कश्मीर और बंगाल के शहरों का वर्णन किया।
उसने कहा कि ये नगर बहुत व्यस्त और व्यापारिक दृष्टि से समृद्ध हैं। बाज़ारों में विदेशी व्यापारी, कारीगर और विविध प्रकार की वस्तुएँ मिलती थीं।
लेकिन यूरोप के नगरों की तुलना में भारत के नगर उसे अव्यवस्थित लगे। यहाँ की गलियाँ सँकरी थीं, मकान कच्चे और अस्थायी लगते थे।
उसने यह भी लिखा कि नगरों की योजना और सफाई पर ध्यान नहीं दिया जाता, जिससे वे टिकाऊ और सुंदर नहीं लगते।
इसके बावजूद, दिल्ली और आगरा जैसे नगरों में विशाल किले, महल और मस्जिदें देखकर वह प्रभावित हुआ।
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✅ इस प्रकार, बर्नियर ने भारत के बारे में लिखा कि –
भूमि पर राजा का पूर्ण अधिकार है, किसानों के पास स्थायी हक नहीं।
राजकीय कारखाने विलासिता की वस्तुओं से भरे थे, लेकिन कारीगरों की स्वतंत्रता सीमित थी।
सती प्रथा को उसने असभ्य और अमानवीय बताया।
नगर व्यापारिक रूप से समृद्ध थे, परंतु यूरोपीय नगरों जितने योजनाबद्ध और साफ़-सुथरे नहीं।
विदेशी यात्री भारत क्यों आए ?
i) कुछ यात्री भारत की अपार समृद्धि को सुनकर यहाँ काम की तालाश में आए थे।
(ii) कुछ यात्री उनके देश में आई प्राकृतिक आपदाओं से बचने के लिए भारत आए थे।
(iii) कुछ यात्री भारत के साथ व्यापार करना चाहते थे।
(iv) कुछ यात्री भारत में अपने धर्म का प्रसार करना चाहते थे।
(v) कुछ यात्री भारत की सभ्यता एवं संस्कृति का अध्ययन करना चाहते थे
मध्यकालीन समाज में स्त्रियों की दशा कैसी थी?
उत्तर - (i) मध्यकालीन समाज में स्त्रियों की दशा अच्छी न थी।
(ii) उन्हें प्रत्येक प्रकार के अधिकारों से वंचित रखा गया था।
(iii) समाज में उनका दर्जा पुरुषों के बराबर नहीं समझा जाता था।
(iv) बाल विवाह, पर्दा प्रथा, सती प्रथा एवं देवदासी प्रथा के प्रचलन के कारण उनकी स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई थी।
(v) समाज में विधवा का बहुत अपमान किया जाता था। अतः अधिकाँश स्त्रियाँ सती हो जाना पसंद करती थीं।
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