CHAPTER-7बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ CLASS11TH HISTORY
पुनर्जागरण से क्या अभिप्राय है? इसके उदय के क्या कारण थे ?
उत्तर - 1. पुनर्जागरण से अभिप्राय- पुनर्जागरण से अभिप्राय है पुनर्जन्म इसने लोगों में एक नई जागृति उत्पन्न की।
2. पुनर्जागरण का आरंभ- पुनर्जागरण का आरंभ इटली से हुआ।
3. पुनर्जागरण के उदय के कारण पुनर्जागरण के उदय के लिए निम्नलिखित प्रमुख कारण उत्तरदायी थे (i) सामंतवाद का पतन -सामंतवाद का पतन पुनर्जागरण के उत्थान के लिए महत्त्वपूर्ण कारणों में से एक
था। मध्यकालीन समाज की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता सामंती प्रथा थी। परंतु 14वीं शताब्दी के पश्चात् इसका पतन होना आरंभ हो गया था। इसका पतन मध्य वर्ग की शक्ति के कारण हुआ। इसी मध्य वर्ग ने अपने-अपने सम्राटों को सेना के संगठन के लिए आवश्यक धन राशि प्रदान की थी जिस कारण सम्राट् सामंतों पर निर्भर न रहे।
(ii) धर्मयुद्ध धर्मयुद्धों ने यूरोप को नवीनता प्रदान की। धर्मयुद्धों के माध्यम से ही यूनान के वैज्ञानिक ग्रंथ, अरबी अंक, बीजगणित, नवीन दिग्दर्शक यंत्र और कागज़ पश्चिमी यूरोप में पहुँचे। अतः स्पष्ट है कि धमयुद्धों ने नवीन विचारों तथा धारणाओं का प्रसार किया और पुराने विचारों, विश्वासों तथा संस्थाओं पर प्रहार किया। फलस्वरूप पुनर्जागरण का प्रारंभ हुआ।
(iii) व्यापारिक समृद्धि - पुनर्जागरण का एक प्रेरक तत्त्व था-व्यापार का उदय एवं विकास। धर्मयुद्धों के कारण जहाँ नवीन विचारधाराएँ पनपीं, वहाँ यूरोप के पूर्वी देशों के साथ व्यापारिक संबंध स्थापित हुए। अनेक यूरोपीय व्यापारी जेरुसलम तथा एशिया माइनर के तटों पर बस गये। इनके कारण व्यापार में पर्याप्त वृद्धि हुई।
व्यापारिक समृद्धि के कारण यूरोपीय व्यापारी विभिन्न देशों में पहुँचे। उन्हें नये विचारों तथा प्रगतिशील तत्त्वों की
जानकारी हुई। स्वदेश वापस लौटने पर ये व्यापारी नये विचारों को अपने साथ लाए।
(iv) छापेखाने का आविष्कार - 1455 ई० में जर्मनी के जोहानेस गुटेनबर्ग ने एक ऐसी टाइप मशीन का आविष्कार किया जो आधुनिक प्रेस की अग्रदूत कही जा सकती है। मुद्रण यंत्र के इस चमत्कारी आविष्कार ने बौद्धिक विकास का द्वार खोल दिया। कैक्सटन ने 1477 ई० में ब्रिटेन में छापाखाना स्थापित किया। धीरे-धीरे इस यंत्र का प्रयोग इटली, जर्मनी, स्पेन, फ्राँस आदि देशों में आरंभ हो गया। कागज़ और मुद्रण यंत्र के आविष्कार से स्थिति में क्रांतिकारी परिवर्तन आए।
पुनर्जागरण का आरंभ इटली में क्यों हुआ,,?
उत्तर – (i) इटली महानू रोमन साम्राज्य का केंद्र रहा था। अपनी विशिष्ट भौगोलिक स्थिति के कारण व्यापार एवं ज्ञान का एक प्रसिद्ध केंद्र था। 1453 ई० में कुस्तुनतुनिया के पतन के पश्चात् वहाँ से अनेक बनाने विद्वान् पलायन कर इटली आ बसे थे। इससे इटली में पुनर्जागरण आंदोलन का आधार तैयार हुआ।
(ii) इटली के पूर्वी देशों से बढ़ रहे व्यापार के कारण यहाँ के व्यापारियों को काफ़ी धनी बना दिया था। इ धनी व्यापारियों ने कलाकारों एवं साहित्यकारों की खुले दिल से सहायता की। निस्संदेह इससे इटली में पुनर्जागरण को प्रोत्साहन मिला। (iii) इटली प्राचीन रोमन सभ्यता का केंद्र था। इटली के लोग अपने प्राचीनकाल के गौरव को पुनः स्थापित करना चाहते थे। इससे इटली में पुनर्जागरण की एक नई प्रेरणा मिली।
(iv) इटली में एक लंबे समय तक शाँति का वातावरण रहा। इससे कला तथा साहित्य के विकास को प्रोत्साहन प्राप्त हुआ
(v) रोम के कुछ पोप भी विद्वानों एवं कलाकारों का सम्मान करते थे। उन्होंने कुछ प्रसिद्ध यूनानी पाँड्डुलिपियों का लातीनी भाषा में अनुवाद करवाया। पोप निकोलस पंचम (1447-1455 ई०) ने वैटिकन पुस्तकालय की स्थापना की एवं संत पीटर का गिरजाघर भी बनवाया। निस्संदेह पोप के इन कार्यों ने इटली में पुनर्जागरण आंदोलन के लिए महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
.मानवतावाद से आपका क्या अभिप्राय हैं ?
उत्तर- मानवतावाद पुनर्जागरण काल की एक प्रमुख विशेषता थी इसका उदय सर्वप्रथम 14वीं शताब्दी में इटली में हुआ। इसका कारण यह था कि इटली में शिक्षा के प्रसार के कारण लोगों में एक नई जागृति उत्पन्न हो गई थी। इटली के लोग आर्थिक दृष्टिकोण से बहुत खुशहाल थे। उनके विदेशों से बढ़ते हुए संपर्क ने मानवतावादी विचारधारा को जन्म दिया। मानवतावाद का अर्थ है मानव जीवन में रुचि लेना, मानव की समस्याओं का अध्ययन करना, मानव का आदर करना, मानव जीवन के महत्त्व को स्वीकार करना तथा उसके जीवन को सुखी, समृद्ध एवं उन्नत बनाना। मानवतावादी धर्म द्वारा मनुष्य पर लगाए गए अनुचित बँधनों को समाप्त करके उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता के पक्ष में थे। इसलिए मानवतावादी धर्मशास्त्र के अध्ययन के स्थान पर मानवतावादी अध्ययन पर अधिक बल देते थे। 15वीं शताब्दी के आरंभ में मानवतावादी शब्द उन अध्यापकों के लिए प्रयुक्त होता था जो व्याकरण, अलंकारशास्त्र, कविता, इतिहास एवं नीतिदर्शन विषय पढ़ाते थे। फ्राँसिस्को पेटार्क को मानवतावाद का पिता कहा जाता है।
. यथार्थवाद से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर- यथार्थवाद से अभिप्राय है वह विचारधारा जो तथ्यों पर आधारित है। इस विचारधारा का प्रचार 17व शताब्दी में प्रसिद्ध डच दार्शनिक भारूच स्पीनोजा ने अपनी पुस्तक 'एथिक्स' में किया था। यह सिद्धांत आदर्शवादी विचारधारा के विरुद्ध था। यथार्थवाद ने साहित्य एवं कला में रोमांसवाद की भी आलोचना की।
साहित्य के क्षेत्र में विकास
पुनर्जागरण काल में साहित्य के क्षेत्र में अद्वितीय विकास हुआ। इस काल में यूरोप में अनेक ऐसे विद्वान हुए जिन्होंने साहित्य के विकास में चार चाँद लगा दिए। उन्होंने न केवल लातीनी एवं यूनानी अपितु इतालवी, फ्रांसीसी अंग्रेजी, स्पेनी, जर्मन एवं डच भाषाओं में साहित्य की रचना की। इस काल में जिस साहित्य की रचना की गई उसमें धर्म निरपेक्षवाद एवं मानवतावाद पर बल दिया गया था। दूसरी ओर मध्यकाल में साहित्य का मुख्य विषय धर्म या अब धर्म के स्थान पर मानव के वर्तमान जीवन एवं भलाई को प्राथमिकता दी जाने लगी।
[ कला के क्षेत्र में विकास
पुनर्जागरण काल में कला के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई। मध्यकाल में कला का अपना स्वतंत्र स्थान नहीं था। इसमें मौलिकता एवं सुंदरता का अभाव था। पुनर्जागरण काल में कला धार्मिक बँधनों से मुक्त हो गई तथा यह यथार्थवादी (realistic) बन गई। यथार्थवाद में शरीर विज्ञान (anatomy), रेखागणित (geometry), भौतिको (physics) तथा सौंदर्य (beauty) पर बल दिया गया। यथार्थवाद की यह परंपरा 19वीं शताब्दी तक चलती रही। वास्तव में कला ने पुनर्जागरण काल में एक नए युग में प्रवेश किया।
. चित्रकला (Painting) मध्यकाल में चित्रकला धर्म की जंजीरों से जकड़ी हुई थी। उस समय केवल ईसाई धर्म से संबंधित चित्र ही बनाए जाते थे। ये चित्र बिल्कुल सादा होते थे। इनमें केवल कुछ निश्चित रंगों का हो प्रयोग किया जाता था। इस प्रकार चित्रकला का क्षेत्र सीमित था। पुनर्जागरण काल में चित्रकला के क्षेत्र में एक नई क्राँति आई। इस काल में चित्रकारों ने धार्मिक नियमों का त्याग कर दिया। उन्होंने मानव जीवन एवं प्राकृतिक दृश्यों से संबंधित अत्यंत सुंदर चित्र बनाए। अब ये गिरजाघरों के लिए नहीं अपितु व्यक्तिगत भवनों की सजावट के लिए बनाए जाने लगे। इनमें मानवतावाद एवं धर्मनिरपेक्षता की झलक स्पष्ट दिखाई पड़ती है। इन चित्रों को पूर्व की तुलना में अधिक रंगीन एवं चटख बनाया गया। अब चित्रकारी के लिए तेल रंगों (oil painting) का प्रयोग किया जाने लगा। ये रंग पक्के होते थे। अब त्रि-आयामी चित्र बनाए जाने लगे। इस काल की चित्रकारी पर चीनी एवं फ़ारसी चित्रकला का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।
लियोनार्डो दा विंसी कौन था ? वह क्यों प्रसिद्ध था ? उत्तर – लियोनार्डो दा विंसी बहुमुखी प्रतिभा का व्यक्ति था। वह न केवल एक महान् चित्रकार अपितु एक कुशल इंजीनियर, वैज्ञानिक, मूर्तिकार एवं संगीतकार भी था। वह विश्व में एक चित्रकार के रूप में अधिक लोकप्रिय हुआ। उसका जन्म इटली के फ्लोरेंस नगर में 1452 ई० में हुआ था। उसे बचपन से ही चित्रकला में विशेष रुचि थी। उसने अपने जीवनकाल में अनेक चित्र बनाए। इन चित्रों को देख कर उसकी प्रतिभा का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। उसके चित्रों में प्रकाश एवं छाया, रंगों का चयन एवं मानव शरीर के विभिन्न अंगों का प्रदर्शन बहुत सोच समझ कर किया गया है। उसके बनाए चित्रों मोना लीसा एवं दि लास्ट सपर ने विश्व ख्याति प्राप्त की। ये चित्र देखने में बिल्कुल सजीव लगते हैं। मोना लीसा एक साधारण स्त्री का चित्र है। इस चित्र को बनाने में लियोनार्डो को चार वर्ष लगे। इस चित्र में मोना लीसा की मुस्कान इतनी मधुर है कि इसे देखने वाला व्यक्ति आज भी चकित रह जाता है।
. वैज्ञानिक क्रांति क्या थी ?
उत्तर- पुनर्जागरण काल में विज्ञान के क्षेत्र में जो आविष्कार हुए उसे वैज्ञानिक क्रांति कहा गया है। इसके समाज पर दूरगामी प्रभाव पड़े। इसने मानव जीवन को सुखमय बनाया। वह भीष्ण सर्द एवं गर्म प्रदेशों में रहने के योग्य हुआ। परिवहन साधनों के विकास से वह एक स्थान से दूसरे स्थान पर सुगमता एवं तीव्रता से आ जा सका। विज्ञान के कारण जल यात्रा एवं हवाई यात्रा भी विकसित हुई। औषधियों के नए आविष्कार के कारण मानव अनेक अयंकर बीमारियों पर विजय पा सका। डॉक्टरों के लिए अनेक असंभव ऑप्रेशनों को करना संभव हुआ। मानव को ब्राह्मांड का ज्ञान हुआ। विज्ञान के कारण अनेक हथियारों का निर्माण हुआ। इसके विनाशकारी परिणाम निकले। विज्ञान के कारण मानव ईश्वर से दूर होने लगा।
प्रश्न . निकोलस कोपरनिकस कौन था ? वह क्यों प्रसिद्ध था ?
उत्तर – निकोलस कोपरनिकस पोलैंड का एक महान् वैज्ञानिक था। उसने खगोल विज्ञान के क्षेत्र में बहुमूल्य योगदान दिया। उसने उस समय प्रचलित इस सिद्धांत को असत्य सिद्ध किया कि पृथ्वी सभी ग्रहों का केंद्र है तथा सूर्य एवं अन्य ग्रह इसके इर्द-गिर्द चक्कर काटते हैं। कोपरनिकस ने सिद्ध किया कि पृथ्वी गोल है तथा यह अन्य ग्रहों की तरह सूर्य की परिक्रमा करती है। चर्च ने कोपरनिकस के इस सिद्धांत की कटु आलोचना की तथा इसे बाईबल की शिक्षा के विरुद्ध माना। यही कारण था कि कोपरनिकस के विचारों संबंधी पुस्तक दि रिक्ल्यूशनिवस का प्रकाशन उसकी मृत्यु के पश्चात् हुआ। निस्संदेह कोपरनिकस के इस सिद्धांत ने विज्ञान के क्षेत्र में एक नया तहलका मचा दिया था।
वो लिलियो गैलिलीकौन था? वह क्यों प्रसिद्ध था ? उत्तर— गैलिलियो गैलिली इटली का एक महान् वैज्ञानिक था। उसने कोपरनिकस के इस सिद्धांत का समर्थनकिया कि सूर्य ही ब्रह्मांड का केंद्र है तथा पृथ्वी एवं अन्य ग्रह इसकी परिक्रमा करते हैं। उसने 1609 ई० में एक दूरबीन तैयार की जिससे सूर्य तथा चाँद आदि ग्रहों को देखा जा सकता था। निस्संदेह यह एक महान् उपलब्धि थी। गैलिलियो ने दि मोशन नामक एक बहुमूल्य ग्रंथ की रचना की। इसमें उसने यह सिद्ध किया कि भारी एवं हल्की वस्तुएँ एक ही गति से पृथ्वी पर गिरती हैं। गैलिलियो को अपने विचारों के लिए चर्च की कटु आलोचना का शिकार होना पड़ा।
विलियम हार्वे कौन था ? वह क्यों प्रसिद्ध था ?
उत्तर- विलियम हार्वे (1578-1657 ई०) इंग्लैंड का एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक था। उसने 1628 ई० में यह सिद्ध किया कि रक्त हृदय से चलकर धमनियों तथा नाड़ियों से होता हुआ पुनः वापस हृदय में पहुँच जाता है। इसे रुधिर परिसंचरण कहा जाता है। निस्संदेह यह चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी देन थी। इससे स्वास्थ्य तथा रोग संबंधी समस्याओं का अध्ययन करने के लिए एक नए युग का सूत्रपात हुआ।
पुनर्जागरण से समाज पर पड़े प्रमुख प्रभाव बताएँ।
उत्तर – (i) जिज्ञासा की भावना- पुनर्जागरण का सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव यह पड़ा कि लोगों में विज्ञान भावना उत्पन्न हुई तथा उनका दृष्टिकोण वैज्ञानिक हो गया। अब उन्होंने शताब्दियों से प्रचलित अंधविश्वासों रीति-रिवाजों को त्याग दिया। वे अब प्रत्येक विचार को तर्क की कसौटी पर परखने लगे।
(ii) मानवतावाद की भावना- मानवतावाद की भावना का उत्पन्न होना पुनर्जागरण की एक अन्य महत्वपूर्ण देन है। इस के साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं में मनुष्य से संबंधित विषयों को प्रमुख स्थान दिया तथा म के कल्याण पर बल दिया। उन्होंने धर्म द्वारा मनुष्य पर लगाए गए अनुचित प्रतिबंधों की चोर आलोचना की। उन्होंने
मनुष्य की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का समर्थन किया।
(IIT) स्त्रियों की स्थिति में सुधार- पुनर्जागरण से पूर्व स्त्रियों की स्थिति बहुत बदतर थी। उन्हें समाज में कोई सम्मानजनक स्थान प्राप्त नहीं था। पुनर्जागरण काल में स्त्रियों की स्थिति में कुछ सुधार आया तथा उन्हें पुरुषों के समान स्थान प्राप्त हुआ। परिणामस्वरूप उनमें जागृति आई। अब वे शिक्षा ग्रहण करने लगीं साहित्य के अध्ययन
से उनका दृष्टिकोण विशाल हो गया।
(iv) साहित्य का विकास- पुनर्जागरण के कारण साहित्य के क्षेत्र में आश्चर्यजनक विकास हुआ। इस विकास
के परिणामस्वरूप अनेक नई पुस्तकों की रचना हुई। इतालवी, फ्रांसीसी अंग्रेजी, स्पेनी, जर्मन, डच आदि भाषाओं
में अनेकों विद्वानों ने अपनी रचनाएँ लिखीं। इस काल के साहित्यकारों में दाँते, पेटार्क, बोकासियो, मैज्यिावेली
मिरांदोला, जेफ्री चॉसर, टॉमस मोर तथा इरेस्मस आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। इन्होंने अपनी रचनाओं
में
मानवतावादी विचारों का प्रसार किया तथा साहित्य के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
[ प्रश्न धर्म-सुधार आंदोलन के मुख्य प्रभावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-धर्म-सुधार आंदोलन के मुख्य प्रभावों का वर्णन निम्नलिखित अनुसार है
1. चर्च में फूट-धर्म-सुधार आंदोलन का यूरोपीय लोगों के जीवन पर एक महत्त्वपूर्ण प्रभाव यह पहा कि चर्च में फूट पड़ गई। अतः ईसाई धर्म दो भागों कैथोलिक एवं प्रोटेस्टेंट में विभाजित हो गया। कैथोलिक शाखा वाले पोप की सर्वोच्चता में विश्वास रखते थे प्रोटेस्टेंट वालों का मानना कि पोप अथवा पादरी किसी व्यक्ति को मुक्ति प्राप्त करने में कोई सहायता नहीं कर सकते। व्यक्ति को मुक्ति केवल बाईबल के सिद्धांतों के अनुसार चल कर ही मिल सकती है।
2. नैतिकता पर बल-धर्म-सुधारक पोप तथा पादरियों में फैले भ्रष्टाचार के कारण उनके कटु आलोचक थे। विभिन्न देशों में प्रोटेस्टेंट चर्च स्थापित होने से पोप तथा पादरियों को आंखें खुल गई। अत: उन्होंने कैथोलिक चर्च में सुधार के प्रयास आरंभ कर दिए। परिणामस्वरूप यूरोप में फैला भ्रष्टाचार दूर हुआ एवं पादरी पवित्र जीवन व्यतीत करने लगे।
3. कला तथा साहित्य का विकास-मध्यकाल में कला तथा साहित्य पर चर्च का बहुत प्रभाव था। उस समय कलाकृतियां तथा चित्र केवल धर्म से संबंधित ही बनाए जाते थे। गिरजाघरों, ईसा मसीह तथा संतों के चित्रों का कार्य केवल पोप की देखरेख में ही किया जाता था। धर्म-सुधार आंदोलन के पश्चात् इस क्षेत्र में परिवर्तन आ गया। अब कला का विषय धार्मिक न होकर धर्म निरपेक्ष हो गया। अब साधारण मनुष्य के जीवन से संबंधित कलाकृतियां बनाई जाने लगीं। इसी प्रकार साहित्य के क्षेत्र में भी परिवर्तन आ गया। अनेक सुधारकों ने प्राचीन ग्रंथों को पढ़ने तथा देशी भाषाओं में अनुवाद करने की प्रेरणा दी। परिणामस्वरूप अनेक नवीन ग्रंथों की रचना हुई।
4. व्यापार तथा वाणिज्य का विकास पुरातन कैथोलिकों की यह विचारधारा थी कि अधिक धन संचित करना तथा उसे व्याज के लिए देना धर्म के विरुद्ध कार्य है। परंतु धर्म-सुधारक इस विचारधारा को गलत मानते थे। कैल्विन के अनुसार अधिक धन कमाना तथा ब्याज पर उधार देना उचित है। उसके इस विचार का व्यापारियों, उत्पादकों तथा बैंकरों ने स्वागत किया तथा व्यापार एवं वाणिज्य को विकसित करने के लिए प्रेरित हुए। परिणामस्वरूप विभिन्न यूरोपीय देशों में इसका बहुत विकास हुआ।
5. राष्ट्रीय राज्यों की शक्ति में वृद्धि राष्ट्रीय राज्यों का उदय धर्म-सुधार आंदोलन से पूर्व हो हो । चुका था। धर्म-सुधार आंदोलन के परिणामस्वरूप उनकी शक्ति में और वृद्धि हो गई। नवस्थापित प्रोटेस्टेंट देशों के शासकों ने पोप तथा चर्च की शक्ति को समाप्त करके राष्ट्रीय चर्च स्थापित किए और उन्हें अपने अधीन कर लिया। उन्होंने पोप को भेजी जाने वाली राशि भी बंद कर दी। इससे पोप की शक्ति को गहरा आघात लगा
6. धार्मिक सहनशीलता-धर्म-सुधार आंदोलन के बाद यूरोप में धार्मिक युद्धों तथा अत्याचारों का दौर आरंभ हो गया। कैथोलिक शासक प्रोटेस्टेंटों पर अत्याचार करते थे तो कैथोलिक प्रोटेस्टेंटों पर। परन्तु धीरे-धीरे यूरोप के शासक यह समझ गए कि असहनशीलता की नीति पर चल कर देश में शांति तथा सुरक्षा का वातावरण नहीं बनाया जा सकता। देश में शांति तथा सुरक्षा की भावना केवल सहनशीलता की नीति द्वारा ही पैदा की जा सकती है। निस्संदेह यह एक महान् उपलब्धि थी।
धर्म-सुधार आंदोलन के उदय के प्रमुख कारण क्या थे?
उत्तर - (i) चर्च में व्याप्त बुराइयाँ-धर्म-सुधार आंदोलन का मुख्य कारण चर्च में व्याप्त बुराइयाँ थीं। चर्च के संगठन में भ्रष्टाचार तथा दुराचार का बोलबाला था। उच्च अधिकारी से लेकर पादरी तक सभी का चरित्र पतित हो चुका था। चर्च के अधिकारी अपने कर्तव्यों की ओर कोई ध्यान नहीं देते थे तथा बड़े लालची हो गए थे। वे विलासी जीवन व्यतीत करने लगे थे तथा हर समय रंगरलियों में डूबे रहते थे। कई पादरियों ने शराब पीना, जुआ खेलना तथा शिकार करना आरंभ कर दिया था पादरियों के इन्हीं अनैतिक कार्यो के कारण जनसाधारण चर्च के विरुद्ध हो गया
के विरुद्ध हो गया।
(ii) राजनीतिक क्षेत्र में पोप का हस्तक्षेप- चर्च की संपत्ति के कारण भी कई बार पोप तथा सम्राटों में झगड़ा हो जाता था। पोप का यह विश्वास था कि चर्च की संपत्ति पर कर लगाने का अधिकार किसी सम्राट के पास नहीं है। परंतु कई सम्राटों ने पोप की इस धारणा को चुनौती दी इन सम्राटों ने पोप के आदेशों की कोई परवाह न की तथा चर्च पर कर लगा दिए। इससे पोप की प्रतिष्ठा तथा शक्ति को गहरा आघात पहुँचा। फलस्वरूप पोप की स्थिति दुर्बल हो गई और लोग धर्म सुधार के लिए प्रेरित हुए।
(iii) राष्ट्रीय राज्यों का उदय पुनर्जागरण से पूर्व यूरोप के कई देशों में सामंतवाद का प्रभुत्व था। सभी प्रशासकीय शक्तियों का प्रयोग अधिकतर सामंत ही करते थे। इस सामंती व्यवस्था में अनेकों दोष व्याप्त थे। इन दोषों को दूर करने के उद्देश्य से कई राज्यों में शासकों ने सामंतों को शक्तिहीन करने के सफल प्रयास किए। परिणामस्वरूप इंग्लैंड, फ्राँस, पुर्तगाल, स्पेन, हंगरी, पोलँड, हालँड, स्काटलैंड तथा डेनमार्क आदि राष्ट्रीय राज्य उदय हुए। ये राष्ट्रीय राज्य चर्च के प्रभाव से मुक्ति पाना चाहते थे।
(iv) तात्कालिक कारण-पोप द्वारा पाप स्वीकारोक्ति पत्रों की बिक्री धर्म-सुधार आंदोलन का तात्कालिक कारण बना। उन दिनों पोप को रोम में सेंट पीटर गिरजाघर के निर्माण के लिए धन चाहिए था। उसने धन इकट्ठा करने के लिए पाप स्वीकारोक्ति पत्रों को बेचना आरंभ कर दिया। इन पाप स्वीकारोक्ति पत्रों को खरीद कर कोई भी व्यक्ति अपने पापों से मुक्त हो सकता था। 1517 ई० में टेट्रोल नामक एक पादरी पाप स्वीकारोक्ति पत्रों को बेचने के लिए विटेनबर्ग पहुँचा। जब वह वहाँ यह पाप स्वीकारोक्ति पत्र बेच रहा था तो मार्टिन लूथर ने उसका विरोध किया।
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