CHAPTER -7 CLASS 12TH HISTORY नई वास्तु कला हंपी OR एक साम्राज्य की राजधानी विजयनगर


 (लगभग चौदहवीं से सोलहवीं सदी तक)


विजयनगर अथवा "विजय का शहर" एक शहर और एक साम्राज्य, दोनों के लिए प्रयुक्त नाम था। इस साम्राज्य की स्थापना चौदहवीं शताब्दी में की गई थी। अपने चरमोत्कर्ष पर यह उत्तर में कृष्णा नदी से लेकर प्रायद्वीप के सुदूर दक्षिण तक फैला हुआ था। 1565 में इस पर आक्रमण कर इसे लूटा गया और बाद में यह उजड़ गया। हालाँकि सत्रहवीं-अठारहवीं शताब्दियों तक यह पूरी तरह से विनष्ट हो गया था, पर फिर भी कृष्णा- तुंगभद्रा दोआब क्षेत्र के निवासियों की स्मृतियों में यह जीवित रहा। उन्होंने इसे हम्पी नाम से याद रखा। इस नाम का आविर्भाव यहाँ की स्थानीय मातृदेवी पम्पादेवी के नाम से हुआ था। इन मौखिक परंपराओं के साथ-साथ पुरातात्विक खोजों, स्थापत्य के नमूनों, अभिलेखों तथा अन्य दस्तावेजों ने विजयनगर साम्राज्य को पुनः खोजने में विद्वानों की सहायता की ।

हंपी

 विजय नगर साम्राज्य की राजधानी का नाम हंपी था। इस की खोज कर्नल कालिन मैकेंजी ने की। वह ईस्ट कंपनी में नौकरी करता था वह एक प्रसिद्ध इंजीनियर, सर्वेक्षक और मानचित्रकार था। 1800 ई० में उसने पहला सर्वेक्षण मानचित्र तैयार किया। शुरू में इसकी जानकारियों विरूपाक्ष मन्दिर और पंपादेवी के पूजास्थल के पुरोहितों की यादगार पर आधारित थी। 1875 ई० में भारत का प्रथम सर्वेयर जनरल बनाया गया। 1827 ई० में अपनी मृत्यु तक इस पद पर रहा। उसने भारत के अतीत को समझने और उपनिवेश के प्रशासन को आसान बनाने के उद्देश्य से ऐतिहासिक स्थानों का सर्वेक्षण करना और स्थानीय परंपराओं का संकलन शुरु किया। 1836 ई० से अभिलेख कर्त्ताओं ने विरुपाक्ष एवं हंपी के अन्य मन्दिरों से अभिलेखों को इकट्ठा करना शुरु कर दिया। 1856 ई० में अलेक्जेंडर ग्रीनलो ने हंपी के पुरातात्विक अवशेषों के पहले विस्तृत चित्र लिए यह विद्वानों के लिए बड़े लाभकारी हुए। इतिहासकारों ने इन विद्वानों द्वारा इकट्ठे किए स्रोतो का, विदेशी यात्रियों के वृतांतों का तेलुगु, कन्नड़, तामिल तथा संस्कृत में लिखे गए साहित्य के साथ मिलान करके इस शहर और विजयनगर साम्राज्य के इतिहास की एक झांकी उपस्थित करने का प्रयत्न किया।


 विजयनगर साम्राज्य 


विजयनगर साम्राज्य की स्थापना :- विजयनगर राज्य की स्थापना दो भाइयो हरिहर और बुक्का ने -1336 ई० में की। 1327 ई० में मुहम्मद बिन तुगलक ने जब दक्षिण के कांपिली पर आक्रमण किया तो इन भाइयों को बन्दी बना कर दिल्ली ले आया और उन्हें इस्लाम धर्म कबूल करना पड़ा इस पर दक्षिण के शासकों ने दिल्ली सल्तनत के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। राज्य में अराजकता और अशान्ति फैल गई। मुहम्मद बिन तुगलक ने हरिहर और बुक्का को विशाल सेना सहित दक्षिण में कांपिली में विद्रोह को कुचलने के लिए भेज दिया। वापिसी पहुंचने पर हिन्दुओं ने दोनों भाइयों का स्वागत किया। इन दोनों ने अपने गुरु की आज्ञा के अनुसार इस्लाम धर्म को छोड़ कर फिर हिन्दु धर्म ग्रहण कर लिया। उनके गुरु विद्याराणा ने उन्हें हिन्दु राज्य की स्थापना के लिए उत्साहित किया इसमें उन्होंने 1336 ई० मे तुंगभद्रा नदी के किनारे पर एक नया नगर वसाया जिसे विजयनगर राज्य कहा जाता है इस के शासक संगम वंश से सम्बन्धित थे।

संगम वंश के शासक 

1. हरिहर और बुक्का :- (1336-1377 ई० ) (Harihar and Bukka) विजयनगर साम्राज्य को स्थापना हरिहर और बुक्का ने 1336 ई० में की इन का पिता संगम राजवंश से सम्बन्ध रखता था। दोनो भाई बड़े योग्य और प्रतापी थे। 1356 ई० में हरिहर की मृत्यु के बाद बुक्का सिंहासन पर बैठा। वह बड़ा दूरदर्शी शासक था। उसने मदुरई पर अधिकार कर लिया उसका वहमनी साम्राज्य के साथ लम्बा संघर्ष चलता रहा। उसने चीन और श्रीलंका के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाए। वह धार्मिक सहनशील व्यक्ति था। उसने बहुत से मन्दिरों का निर्माण किया।

2. हरहिर द्वितीय  (Harihar-II 1377-1405) :- बुक्का की मृत्यु के बाद हरिहर द्वितीय शासक बना वह संगम वंश के महान शासको में से एक था उसने 'महाराजाधिराज' की उपाधि धारण की। उसने अनेक क्षेत्रों को जीता बहमनी राज्य से शोआ, चोल, दमोल की बन्दरगाहें छीन ली। हरिहर-II वीरूपक्ष (शिव) का भक्त था।

3. देवराय प्रथम (Dev Rai 1406-1422) :- बहमनी शासक फिरोजशाह ने देवराय प्रथम को हराकर तुंगभद्रा के दोआब पर अधिकार कर लिया देवराय प्रथम को अपमानित सन्धि करनी पड़ी। दोनों ने कुछ समय शान्ति बनाए रखी परन्तु देवराय प्रथम ने वारंगल से मित्रता स्थापित करके फिरोजशाह को पराजित कर तुंग भद्रा के दोआब परफिर से अधिकार कर लिया।

4.देवराय द्वितीय (Dev Rai-II 1422-1446) :- देवराय द्वितीय संगम वंश का सबसे महान शासक था उसने अपनी सेना का आधुनिकीकरण किया और इसे बहुत शक्तिशाली बनाया उसने तुंगभद्रा और कृष्णा नदियों के बीच मध्य उपजाऊ क्षेत्र रायचूर दोआब को अपने साम्राज्य में मिला लिया। देवराय द्वितीय के काल में इटली के यात्री निकोली कोन्ती ने 1420 मे और फारस देश के यात्री अब्दुर रज्जाक ने 1443 ई० में यात्रा की।

5. संगमवंश के अन्तिम शासक (Last Rulers of Sangam Dynasty) :- देवराय द्वितीय की मृत्यु के बाद उसके बेटों मलिक अर्जुन और विरूपाक्ष ने राज्य किया। वहमनी शासकों ने उनसे तुंगभद्रा और कृष्णा नदियों के बीच के दोआब पर अपना अधिकार कर लिया उड़ीसा के शासक ने भी विजयनगर के बहुत से इलाके छीन लिए। अन्त में विरुपाक्ष की हत्या कर तेलगांना के सामन्त ने नरसिंह सुल्लव ने 1485 ई० राजगद्दी छीन ली।


सलुव वंश (Suluva Dynasty ) 1485-1505

1. नरसिंह 1485-90 (Narsimha) :- 1485 ई० नरसिंह ने सलुब वंश की स्थापना की उसने पांच वर्ष तक राज्य किया।

2. नरसा नायक (Narsa Nayaka 1490-1503) :- नरसिंह ने अपने सेनापति नरसा नायक को अपने अवयस्क पुत्र तीमा के संरक्षक के रूप में नियुक्त किया 1490 से 1503 तक राज्य की वास्तविक शक्ति नरसा नायक के हाथों में रही उसने चेर, चोल, पांडया और उड़ीसा के शासकों को पराजित किया। तीमा की मृत्यु के बाद उसके दूसरे बेटे इमादी को सिहांसन पर बैठा कर उसका संरक्षक बन गया 1503 ई० मे नरसा नायक की मृत्यु हो गई।


 तुलुव वंश ( Tuluva Dynasty )


1.वीर नरसिंह (Vir Narsingh 1505-09) :- वीर नरसिंह ने 1505 ई० इमादी नरसिंह का वध करके सता पर अधिकार कर लिया इस प्रकार उसने तुलुव वंश की नींव रखी। उसने राज्य में शान्तिव्यवस्था कायम की 1509 ई० में उसकी मृत्यु हो गई। 
2 कृष्ण देव राय (Krishna Deva Ray) 1509-1529 ई० :- कृष्ण देव राय तुलुब वंश अर्थात् विजय नगर राज्य का सबसे शक्तिशाली और महान शासक था। 


 कृष्ण देव राय की उपलब्धियाँ 


1. कृष्ण देव राय एक महान योद्धा था उसने कई युद्धों में विजय प्राप्त की।
2.. कृष्ण देव राय ने बहमनी और बीजापुर के सुल्तान को भी पराजित किया। 
3.उसने उमातूर के नायक गंगाराय को पराजित कर उमातूर पर अपना अधिकार कर लिया।
4.उसने उड़ीसा और गोलकुण्डा के शासको को भी पराजित किया।
5. कृष्ण देव राय एक महान योद्धा और सेनापति के साथ-साथ एक अच्छा शासक प्रबन्धक भी था।
6. कृष्णदेव राय हिन्दु धर्म में विश्वास रखता था परन्तु दूसरे धर्मों के प्रति उसकी आदर की नौति थो।
7. वह कला और साहित्य का महान संरक्षक था।
8 उसने वैभवशाली महलों और मन्दिरों का निर्माण करवाया।.
9. उसके द्वारा बनाए गए हजार राम मन्दिर और विठुल स्वामी के मन्दिर प्रसिद्ध है। 
10. कृष्ण देव राय तेलुगु और संस्कृत भाषा का महान विद्वान था।

 कृष्ण देव राय के उत्तराधिकारी 


कृष्ण देव राय की मृत्यु के बाद विजय नगर राज्य का पतन शुरु हो गया उसके उत्तराधिकारी अच्युत और सदाशिव राय अयोग्य निकले। अहमदनगर, बीजापुर, गोलकुण्डा और वीदर के सुल्तानोकी संयुक्त सेनाओं ने विजय नगर पर आक्रमण कर दिया 23 जनवरी 1565 ई तलीकोटा के स्थान पर हिन्दु और मुसलमान शासकों के बीच युद्ध हुआ जिसमे विजय नगर की पराजय हुई। कुछ इतिहासकार इसे राक्षसी तांगड़ी का युद्ध भी कहते हैं।

तलीकोटा का युद्ध ( War of Talikota 23 Jan. 1565)

23 जनवरी 1565 ई० को तलीकोटा के स्थान पर हिन्दुओं और मुसलमानों में घमासान युद्ध हुआ इसमे हिन्दुओं की हार हुई। इसमें मुसलमानों ने विजयनगर राज्य में भारी विनाश लीला को। वास्तव में इस लड़ाई ने विजयनगर साम्राज्य के पतन का डंका बजा दिया।

अराविद वंश ( Aravidu Dynasty )


अरविंदु वंश की स्थापना 1570 ई० में तिकमल्ल ने की। वह रामराय का भाई था। उसने हॅपी के स्थान पेनुकोंडा को अपनी नई राजधानी बनाया। 1670 ई० तक इस वंश के कई शासकों ने शासन किया 1674 ई० में इस वंश के अन्तिम शासक श्री रंगा तृतीय की मृत्यु के साथ ही विजयनगर साम्राज्य का अन्त हो गया।

 विजय नगर साम्राज्य के पतन के कारण



1. कमज़ोर व अयोग्य उत्तराधिकारी :- कृष्णदेव राय की मृत्यु के बाद शासक कमजोर व अयोग्य निकले। वे विजय नगर साम्राज्य को संभाल न सके जिससे विजय नगर राज्य का पतन होने लगा।
2. राज्य सिहांसन के लिए युद्ध :- विजयनगर राज्य के शासक राज्य प्राप्ति के लिए आपस में लड़ते झगड़ते रहते थे नरसिंह ने संगम वंश शासक को पराजित कर सलुव वंश की नींव रखी इस प्रकार नरसा नायक ने सुलुव वंश की नींव रखी आपस मे लड़ कर उन्होंने अपनी शक्ति को क्षीण कर लिया 
3. कमजोर सेना :- विजयनगर राज्य की सेना बड़ी कमजोर निकली। शासक अपनी सैनिक शक्ति के लिए सामंतों पर निर्भर रहते थे। वे शासक की अपेक्षा सामन्त के प्रति ज्यादा वफादार होते थे। इस प्रकार विजय नगर का पतन स्वाभाविक ही था। 
4. बहमनी राज्यके विरूद्ध संघर्ष :- विजयनगर राज्य का बहमनी के साथ लगातार लम्बा युद्ध चलता रहा जिससे इस की शक्ति को काफी धक्का लगा और धन का भी अभाव हो गया। लगातार युद्ध से उनकी शक्ति कमजोर हो गई। 
5.लोगो का विलासी जीवन-: विजय नगर राज्य धनवान होने के कारण लोग बड़े विलासी थे राज्य 
में वेशयाओं की कमी नहीं थी। विलासी समाज से विजय नगर का पतन होने लगा।

6. तलीकोटा की लड़ाई : विजयनगर के विरूद्ध अहमदनगर, बीजापुर, गोलकुण्डा और वोदर के शासकों ने एक संघ बनाकर उनके विरूद्ध आक्रमण करदिया। यह युद्ध 23 जनवरी 1565 ई० में हुआ इस मे विजयनगर राज्य की हार हुई। मुसलमानों ने विजयनगर को खूब लूटा और समस्त शहर को नष्ट भ्रष्ट कर दिया जिससे इस राज्य का पतन हो गया।


 विजयनगर और बहमनी शासकों के बीच संघर्ष के कारण

1. तुंगभद्रा के दोआब के क्षेत्र पर संघर्ष :- तुंगभद्रा और कृष्णा नदियों के बीच का क्षेत्र दोआब का क्षेत्र कहलाता था। यह उपजाऊ था। दोनों की आर्थिकता इसी पर निर्भर करती थी। इसलिए दोनों के बीच संघर्ष का कारण बना।
2. कृष्णा-गोदावरी डेल्टा के विषय पर संघर्ष :- कृष्णा-गोदावरी डेल्टा उपजाऊ होने के साथ-साथ इस पर बहुत सी बन्दरगाहें भी थी। जिनका दूसरे देशों के साथ व्यापार हो सकता था इसलिए दोनों इन क्षेत्रों को अपने अधिकार में लेना चाहते थे।
3 पश्चिमी साम्राज्य का मैदान या कोंकण :- भारत का पश्चिमी समुद्र तट का मैदान भी बड़ा उपजाऊ है। उन दिनों गोआ प्रसिद्ध बन्दरगाह थी। जिससे व्यापार को बहुत प्रोत्साहन मिलता था। कोकण से पश्चिमी देशों के साथ व्यापार ही महत्वपूर्ण नहीं था बल्कि ईरान और इराक से घोड़े आयात करने के लिए प्रसिद्ध था।
4. युद्ध में यश प्राप्ति के उद्देशय से :- दोनों साम्राज्यों में कई बार सिर्फ युद्ध में गर्व हासिल करने के लिए भी युद्ध हो जाता था। केवल युद्ध जीतकर यश प्राप्ति के लिए ही मात्र दोनों में युद्ध हो जाता था।

विजयनगर साम्राज्य का प्रशासन


1. राजा-: राजा देश का सबसे बड़ा अधिकारी होता है। वह सैनिक और असैनिक शक्तियों का स्वामी होता है। उसके मुख से निकला हुआ शब्द ही कानून होता था वह निरकुंशवादी होता था परन्तु प्रजा की भलाई के लिए कार्य करता था।

2. मन्त्रि परिषद: राजा को सलाह देने के लिए एक मन्त्रिपरिषद बनाई होती थी। राजा इन मन्त्रियों की सलाह मानने के लिए वाध्य नहीं होता था। वह मन्त्रियों की नियुक्ति करता था उन के कामों का बंटवारा करता था किसी मन्त्रि को बनाना या हटाना राजा का ही कर्तव्य था।

3. प्रान्तीय व्यवस्था :- राजा ने प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए में राज्य को प्रान्तों में बांटा था। इन्हें मंडलम कहा जाता था प्रान्तपति को अपने प्रान्त में असोमित अधिकार प्राप्त थे। वे अपना दरबार लगाते थे। वे अपनी अलग सेना रखते थे। वे नए कर लगाते थे पुराने कर हटा सकते थे। प्रान्तपति अपने प्रान्त में शान्ति व्यवस्था बनाए रखने के लिए उत्तरदायी होता था।
4.  स्थानीय स्वशासन :- मण्डलम आगे जिलों में विभक्त थे। इन्हें नाडु कहा जाता था। जिले आगे परगनों में बटे होते थे। इन्हें स्थल कहा जाता था। प्रशासन को सबसे छोटी इकाई गांव होती थी गांव की देखभाल का काम एक सभा के अधीन होता था। गांव में कई सरकारी अधिकारी भी होते थे। 
5भूमि कर: राज्य की आय का मुख्य साधन भूमि कर था। भूमि को तीन भागों में बांटा था। उपजाऊ भूमि, ऊसर भूमि और उपवनों व जंगलों से ढकी हुई भूमि भूमि कर कुल उपज का 1/6 से 1/4 भाग तक होता था।  भूमि कर के अतिरिक्त अन्य कर भी लगाए होते थे।
6. न्याय प्रबन्ध : विजयनगर राज्य का प्रबन्ध बहुत अच्छा था राजा निष्पक्ष न्याय करता था उसका अन्तिम निर्णय होता था न्याय हिन्दू धर्म शास्त्रों और रीति रिवाजों के अनुसार किया जाता था। अपराधियों को कठोर दण्ड दिए जाते थे। सामान्य अपराधियों के लिए हाथ-पांव काट दिए जाते थे। घोर अपराधियों के लिए मृत्यु दण्ड था। देश-द्रोहियों को हाथियों के आगे फेंक दिया जाता था।

7.सैनिक प्रबन्ध :- राजा के पास विशाल सेना होती थी। परन्तु वे लड़ाई के समय प्रान्तीय गवर्नरों से: बढ़िया किस्म के घोड़े थे। तोपखाना और समुद्री सेना भी सेना का एक महत्वपूर्ण अंग थे। सैनिकों की भर्ती योग्यता के आधार पर की जाती थी। उन्हें अनुशासन में रहना पड़ता था। सैनिकों को जागीरों के रूप में वेतन दिया जाता था। सैनिकों की भलाई के लिए पूरा ख्याल रखा जाता था।

 विजयनगर की सामाजिक और आर्थिक दशा 

सामाजिक दशा (Social Condition )

1. जाति प्रथा: (Caste System) विजयनगर समाज में कई जातियाँ और उपजातियाँ थी। समाज में ब्राह्मणों को ऊँचा स्थान प्राप्त था। ब्राह्मण सादा व पवित्र जीवन व्यतीत करते थे। समाज में शुद्रों को निम्न समझा जाता था। परन्तु छुआछूत की भावना नहीं थी जैसे कि उत्तरी भारत में हिन्दु समाज में प्रचलित थी।
2. स्त्रियों की दशा :- (Position of Women) विजयनगर में स्त्रियों का बड़ा सम्मान था वे पढ़ी लिखी होती थी साहित्य के क्षेत्र में उनका बड़ा योगदान प्रशंसनीय था। गंगा देवी बहुत प्रसिद्ध विदुषी थी वे तलवार चलाना, कुश्तियां लड़ना, नृत्य व संगीत की शिक्षा प्राप्त करती थी। 
3.भोजन (Diet) :- लोग मांसाहारी व शाकाहारी दोनो ही थे। वे हर प्रकार के फलों, सब्जियों तथा मांस का प्रयोग करते थे। ब्राह्मण शाकाहारी होते थे वे मांस का प्रयोग नहीं करते थे।
4.वेशभूषा (Dress) :- विजयनगर में अमीर व्यक्ति एक छोटी कमीज और सिर पर सुनहरे रंग के वस्त्र धारण करते थे किन्तु पैर मे कुछ नहीं पहनते थे। साधारण लोग कमर में कपड़ा पहनते थे। 
5. मनोरंजन के साधन (Means of Entertainment) :- लोग मनोरंजन के बड़े शौकीन थे। राजा और दरबारियों का कुश्ती देखना, जानवरों की लड़ाइयाँ देखना मनोरंजन का प्रमुख साधन था। इसके अतिरिक्त जुआ, घुड़ दौड़, मुर्गी और भेड़ो की लड़ाई आदि थे। लोग त्योहारों का खूब आनन्द लेते थे महानवमी उनका प्रमुख त्योहार था जो 9 दिन चलता था। 

आर्थिक दशा (Economic Condition )


1. कृषि (Agriculture) :- लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था। जंगलो को काटकर कृषि योग्य बनाया गया। सिंचाई की सुविधा के लिए अनेक तालाब बनाए गए। नदियों के उपर बांध बनाए गए। वे चावल, गेहूँ, तेल निकालने वाले बीज, गन्ना, नील, कपास, गर्म मसाले, दालें व फल पैदा करते थे विदेशों में भारतीय कपड़े की मांग को पूरा करने के लिए कपास व नील का भारी मात्रा में उत्पादन किया जाता था।

2. उद्योग (Industries) :- उस समय उद्योग व्यवसाय काफी उन्नत था। वस्त्र तथा धातुओं के उद्योग प्रमुख थे। सूती और रेशमी वस्त्र बड़ी मात्रा में तैयार किया जाता था लकड़ी व चमड़े की अनेक वस्तुएँ बनाई जाती थी। गांव के लोग मिट्टी के बर्तन बनाने में बड़े निपुण थे। बाजारों में वस्तुओं की भरमार थी। इन उन्नत उद्योगों को देख कर विदेशी यात्री भी हैरान रह जाते थे।
3. व्यापार (Trade) :- विजयनगर राज्य की समृद्धि का कारण उन्नत व्यापार था। विजयनगर साम्राज्य में बहुत सी बंदरगाहें थी। कालीकट की बंदरगाह सबसे प्रसिद्ध थी। इन बंदरगाहों से दूसरे देशों के साथ व्यापार किया जाता था। वस्त्र, रत्न, चावल, चीनी, गर्म मसाले, नील शोरा, नारियल, लोहे तथा लकड़ी से बनी वस्तुएँ विदेशों को भेजी जाती थी। और विदेशी से बहुमूल्य रत्न, आभूषण, हाथी दान्त, मोती, ताँबा, पारा, रेशम तथा मलमल मंगवाए जाते थे। देश का आन्तरिक व्यापार भी उन्नत था।


 राजकीय केन्द्र (The Royal Centre )


1 राजा का भवन (King's Place) :



हॅपी से हमें जो विशिष्ट संरचनाओं के अवशेष मिले हैं उन में राजा का भवन सब से प्रसिद्ध हैं।

2. सभा मंडप (Audience Hall)

:- सभा मण्डप एक ऊंचा मंच है। जिस में पास-पास निश्चित दूरी पर लकड़ी के स्तम्भों के लिए छेद बने हैं इस में दूसरी मंजिल स्तम्भों पर टिकी हैं उस पर जाने के लिए सीढ़ी बनी है। स्तम्भ एक दूसरे के बहुत निकट थे इस लिए यह स्पष्ट नहीं है कि सभा मण्डल का प्रयोग किस उद्देश्य के लिए किया जाता था।

3.महानवमी डिब्बा (Mahanavami Dibba) :-

महानवमी डिब्बा हंपी में सबसे विशालकाय मंच था। इसका आधार 11000 वर्ग फीट था और ऊँचाई 40 फुट थी प्राप्त साक्ष्य के अनुसार इस पर लकड़ी को अत्यन्त सुंदर संरचना बनी थी। महानवमी (नवरात्रीय) नौ दिन त्यौहार चलता है इसे अनेक देवी देवताओं की पूजा की जाती है। इस अवसर पर नृत्य संगीत, कुश्तियां तथा लोगों के मनोरंजन के लिए कार्यक्रम किए जाते है। उत्तरी भारत में यह दशहरा व बंगाल में दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है। इस में सजे हुए घोड़ो, हाथियों तथा रथों पर सैनिकों की शोभा यात्रा निकाली जाती है। त्योहार के अन्तिम दिन राजा एक भव्य समारोह में सेना का निरीक्षण करता था तथा उपहार स्वीकार करता था।

4 कमल (लोटस) महल (Lotus Palace) :-

कमल महल राजकीय केन्द्र में स्थित भवनों में सर्वाधिक सुंदर और भव्य है। इस भवन की सुन्दरता से प्रभावित होकर 19वीं शताब्दी में भारत आने वाले अंग्रेज यात्रियों ने इसे कमल (Lotus) महल का नाम दिया। यह भवन किस उद्देश्य के लिए बना है इतिहासकारों के एक मत नहीं है। अधिकतर इसे परिषदीय सदन मानते हैं। यहाँ राजा अपने परामर्शदाताओं से मिलता था। कुछ इसे हाथियों के अस्तबल ही मानते है। इस भवन का निर्माण भारतीय मुस्लिम शैली के अनुसार किया गया था।
5.. हजारा राम मन्दिर (Hazara Rama Temple)

:- इसका निर्माण हंपी में कृष्णदेव राय ने 1520 ई० मे करवाया था। यह एक प्रकार से शाही प्रार्थना स्थल था। इस मन्दिर के निर्माण में पत्थर व ईंटों का प्रयोग किया गया था। इसमें चमकदार काले रंग की पालिश की गई है। इस मन्दिर की दिवारों एवं स्तम्भों पर उत्कृष्ट मूर्तियाँ बनाई गई हैं। ये मूर्तियों रामायण के दृश्यों को प्रदर्शित करती हैं।

 धार्मिक केन्द्र ( The Sacred Centre )

मन्दिरों की विशेषताएँ (Features of Temples) - विजयनगर के शासकों द्वारा अपनाई शैली को द्रविड़ शैली कहा जाता है।
1. मन्दिर का विमान पिरामिड आकार का होता था। इस का आकार ऊँचाई के साथ-साथ कम होता जाता था।

2.मन्दिर में कई मंजिलें होती थी और प्रत्येक अपने नोची वाली से छोटी होती थी।
3. गर्भगृह के सामने हाल होता था जिसके स्तम्भों पर बारीक खुदाई की जाती थी। यह श्रद्धालुओं के लिए सभागार का कार्य करता था।
4.यहाँ पारंपरिक नृत्य भी किए जाते थे। 
5.मन्दिर में श्रद्धालुओं के लिए गर्भगृह में एक प्रदक्षिणापथ भी बनाया जाता था।
6. मन्दिर प्रायः एक खुले प्रांगण में होता था।
7. मन्दिर में प्रवेश के लिए द्वार बनाए जाते थे जिन्हें गोपुरम कहा जाता था। इन गोपुरमों को अलंकृत किया जाता था। 
8.अब राजा की मूर्तियाँ मन्दिरों में प्रदर्शित की जाने लगीं और राजाओं द्वारा विभिन्न मन्दिरों की यात्रा को जाने लगो।

 विरूपाक्ष मन्दिर ( The Virupaksha Temple )


विरूपाक्ष मन्दिर हॅपी में स्थित है इसे पम्पा देवी के नाम से भी जाना जाता है। इस मन्दिर के निर्माण ने अनेक शासकों ने योगदान दिया था। विजयनगर शासक कृष्ण देव राय ने इस मंदिर में एक विशाल मंडप एक गोपुरम का निर्माण करवाया। इस मंदिर का गोपुरम 52 मी० ऊंचा है तथा इस पर बहुत खूबसूरत मूर्तियां बनाई गई है। राम मन्दिर की दीवारों एवं छतों पर महाभारत के दृश्यों को दर्शाया गया है इस मन्दिर में बनाई गई मूर्तियों की चित्रकला को देख कर व्यक्ति चकित रह जाता है।


 विटठल मन्दिर ( The Vitthala Temple )


विटठल मन्दिर विजयनगर साम्राज्य में स्थापित सभी मन्दिरों में सबसे अलंकृत है। विजयनगर के शासक कृष्ण देवराय ने हॅपी में इस का निर्माण कार्य 1513 ई० मे शुरु किया बाद में उसके उत्तराधिकारियों ने भी निर्माण कार्य जारी रखा। यह मन्दिर विटठल भान विष्णु देवता का ही एक रूप है। यह मन्दिर 152 94 मो० में बना है। इसमें तीन गोपुरम हैं इसमे मंडप और सुंदर स्तम्भ बने हुए हैं। इन स्तम्भों को चट्टानों को काट कर बनाया गया है। इन पर जो मूर्तियां बनाई गई है वह बड़ी सुन्दर हैं। इस मन्दिर के सामने एक रथ) बनाया गया है इस पर की गई शिल्पकारी मुख्य मन्दिर के सौंदर्य को चार चाँद लगा देती है।

 बहमनी राज्य और उसके शासक (The Bahmani Kingdom )

दिल्ली की सल्तनत के पतन के बाद दक्षिण में बहमनी राज्य सबसे शक्तिशाली हो गया। इसकी स्थापना हसन गंगू ने की जो 1347 ई० में अलाऊद्दीन बहमन शाह के नाम से स्वतन्त्र शासक बन बैठा। बहमनशाह, मुहम्मदशाह, फिरोजशाह, अहमदशाह अलाऊद्दीन द्वितीय तथा मुहम्मदशाह- तृतीय आदि कुछ प्रसिद्ध बहमनी शासक थे।
हुमायूं तथा मुहम्मदशाह तृतीय के शासन काल मे बहमनी राज्य कमजोर होने लगा। महमूद गावां की मृत्यु के बाद राज दरबार में अनेक षडयन्त्र होने लगे। राज्य में अराजकता और अशान्ति फैल गई। कुछ ही  वर्षों में बहमनी साम्राज्य पांच भागों बीदर, बरार अहमदनगर, बीजापुर और गोलकुण्डा में बंट गया।

 सारांश

विजयनगर राज्य की राजधानी का नाम हॅपी था। इस राज्य को खोज कर्नल कालिन मैकेंजी ने की थी। विजयनगर साम्राज्य की स्थापना दो भाईयों हरिहर और बुक्का ने 1336 ई० में की। यह संगमवंश से सम्बन्धित थे। यह दूरदर्शी और महत्वकांक्षी थे। देवराय द्वितीय इस वंश का महान शासक था। कृष्ण देव राय तुलुब वंश का सबसे शक्तिशाली और महान शासक था। उसके शासन काल में विजयनगर राज्य ने काफी उन्नति की वह साहित्य और कला का महान संरक्षक था। कृष्णदेव राय के बाद विजयनगर राज्य का पतन शुरु हो गया। तलोकोटा के युद्ध में विजयनगर राज्य की हार के साथ इस का पतन हो गया। विजयनगर राज्य की शासन व्यवस्था बड़ी अच्छी थी। लोगों का सामाजिक और आर्थिक जीवन अच्छा था। हंपी में जो अवशेष मिले हैं उनमें राजा का भवन, सभा मंडप, महानवमी डिब्बा, कमल महल और हजार राम मन्दिर बड़े सुन्दर और भवनीय है। इन शासकों द्वारा अपनाई गई कला शैली को द्रविड शैली कहा जाता है। विरूपाक्ष मन्दिर इसे पम्पा देवी के नाम से भी जाना जाता है बहुत ही खूबसूरत तरीके के साथ बनाया गया है विटठल मन्दिर विजयनगर साम्राज्य में स्थापित सभी मन्दिरों में सबसे अलंकृत है। इन पर अनेक मूर्तियाँ बनाई गई है। वह बड़ी सुन्दर हैं। इस से पता चलता है विजयनगर राज्य ने हर क्षेत्र में बड़ी उन्नति को।

                               प्रश्न


1. कर्नल कालिन मैकेंजी कौन था ?
2. विजयनगर राज्य की स्थापना कब और किसने की ?
 3 बहमनी राज्य की स्थापना कब और किसने की ?
4. तलीकोटा की लड़ाई का वर्णन कीजिए।
5. कृष्ण देव राय की तीन उपलब्धियाँ लिखे।
6. मंडलम शब्द का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
7. पंपा देवी कौन थी ?
8.लोटस महल कहाँ स्थित है ? इसे यह नाम किसने और कब दिया ?
9. लोटस महल की तीन विशेषताएँ लिखिए।
10.हजारा राम मन्दिर पर टिप्पणी लिखिए।
11. विरुपाक्ष मन्दिर पर टिप्पणी लिखिए।।
12. विटठल मंदिर पर टिप्पणी लिखिए
13. द्रविड़ शैली की कोई तीन विशेषताएँ लिखिए। मन्दिरों के कोई तीन प्रमुख कार्य लिखें।
14. कृष्ण देव राय की उपलब्धियों का वर्णन करें।
15विजयनगर को शासन व्यवस्था का वर्णन करें।
16 विजयनगर साम्राज्य के पतन के क्या कारण थे ?






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