CHAPTER -4 केन्द्रीय इस्लामी प्रदेश CLASS 11 HISTORY

 

CHAPTER -4 केन्द्रीय इस्लामी प्रदेश

इस्लाम से पूर्व अरब की स्थिति

सातवीं शताब्दी ई० में इस्लाम के उदय से पूर्व अरब में जाहिलिया (Jahiliya) अथवा अज्ञानता के युग का बोलबाला था। उस समय अरब में बदू (Bedouins) लोगों की प्रमुखता थी। बद्दू खानाबदोश कबीले चरागाह की खोज में एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते रहते थे। लूटमार करना एवं आपस में झगड़ना उनके जीवन की एक प्रमुख विशेषता थी। उस समय अरब समाज में स्त्रियों की स्थिति अत्यंत शोचनीय थी। उन्हें केवल एक भोग-विलास की वस्तु समझा जाता था। समाज में अन्य अनेक कुप्रथाएँ भी प्रचलित थीं। उस समय अरब के लोग एक अल्लाह को अपेक्षा अनेक देवी-देवताओं की उपासना करते थे। प्रत्येक कबीले का अपना अलग देवी-देवता होता था। उस समय के लोग अनेक प्रकार के अंधविश्वासों एवं जादू-टोनों में भी विश्वास रखते थे। क्योंकि अब का अधिकाँश क्षेत्र बंजर, वनस्पति रहित एवं दुर्गम था इसलिए अरबों का आर्थिक जीवन भी बहुत पिछड़ा हुआ था। अरबों का कोई व्यवस्थित राजनीतिक संगठन भी नहीं था। उनमें एकता एवं राष्ट्रीयता को भावना बिल्कुल नहीं थी।

 

 

I. सामाजिक जीवन

2 आर्थिक जीवन

3 धार्मिक जीवन

4 राजनितिक जीवन

 

I. सामाजिक जीवन

सातवीं शताब्दी ई० में इस्लाम के उदय से पूर्व अरब के सामाजिक जीवन की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं--

 

1. परिवार (Family) अरबों के समाज का मूल आधार परिवार था। उस समय संयुक्त परिवार प्रणाली प्रचलित थी। परिवार पितृतंत्रात्मक होते थे। परिवार का सबसे वयोवृद्ध व्यक्ति इसका मुखिया होता था। वह समल परिवार का मार्ग निर्देश करता था। परिवार के सभी सदस्य उसके आदेशों का पालन करते थे। परिवार में पुत्र का होना आवश्यक माना जाता था। मुखिया की मृत्यु के पश्चात् परिवार का दायित्व उसके ज्येष्ठ पुत्र पर आता था। "पिता को अपने परिवार पर निरंकुश शक्ति प्राप्त थी तथा वह उनके जीवन एवं मौत का स्वामी था।

2. स्त्रियों की स्थिति --- पैगंबर मुहम्मद के जन्म से पूर्व अरब समाज में स्त्रियों स्थिति अत्यंत दयनीय थी। पुत्री के जन्म को परिवार के लिए अपशगुन एवं अपमान का स्त्रोत  समझाता जाता था | इसलिए अधिकाँश लड़कियों को जन्म लेते ही जिंदा ही जमीन में दफन कर दिया जाता था। निस्संदेह यह एक समझा जाता था। अत्यंत ही रौंगटे खड़े कर देने वाली कुप्रथा थी। समाज में जो अधिकार पुरुषों को दिए गए थे स्त्रियों को उन सभी अधिकारों से वंचित रखा गया था। उनकी शिक्षा की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता था। उनका विवाह बहुत कम उम्र में ही कर दिया जाता था। उस समय समाज में बहुविवाह प्रथा प्रचलित थी। इसके अतिरिक्त एक व्यक्ति अनेक रखलें भी रखता था। वास्तव में उस समय समाज में स्त्री को केवल एक भोग-विलास की वस्तु समझा जाता उस समय अनैतिक संबंध स्थापित करने का प्रचलन बहुत व्यापक था। यहाँ तक कि विधवा का विवाह उसके मोतले पुत्र एवं बहनों का विवाह उनके भाइयों के साथ कर दिया जाता था। पति की मृत्यु के पश्चात् विधवा उसके किटतम संबंधियों के साथ अनैतिक संबंध स्थापित करने से नहीं हिचकिचाती थी। उस समय स्त्रियों को संपत्ति के अधिकार से वंचित रखा गया था। इससे समाज में उनकी स्थिति अधिक बदतर हो गई थी। प्रोफेसर के० अली. का यह कहना उचित है कि

3. शिक्षा (Education)    -----उस समय शिक्षा के क्षेत्र में अरब लोग पिछड़े हुए थे। अधिकाँश अरब अनपढ़ थे। स्त्रियों की शिक्षा की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता था। इसके बावजूद उस समय अरब ने कविता के क्षेत्र में  उल्लेखनीय प्रगति की थी।

 

4. लोगों का नैतिक स्तर---) उस समय अरब समाज में अनैतिकता का बोलबाला था। लूटमार करना तथा लोगों के साथ धोखा करना उस समय एक सामान्य बात थी। लोगों में शराब मीने, अन्य नशीले पदार्थों का सेवन करने तथा जुआ खेलने का प्रचलन बहुत था। स्त्रियों के साथ अनैतिक संबंध स्थापित करना एक गर्व की बात मानी जाती थी। ऐसा करते समय आपसी रिश्तों को भी ताक पर रख दिया जाता था। निस्संदेह यह अरव समाज के पतन का संकेत था।

 

5. मनोरंजन------) उस समय अरब के लोग विभिन्न साधनों से अपना मनोरंजन करते थे। नृत्य एवं गान उनके मनोरंजन का प्रमुख साधन था। वे बाँसुरी एवं गिटार के बहुत शौकीन थे। उस समय जुआ भी काफी लोकप्रिय था। वे पशुओं की लड़ाइयाँ भी देखते थे। वे शिकार खेलने में भी दिलचस्पी लेते थे।

6. वेश-भूषा एवं भोजन ---- उस समय बदू लोगों में लंबे कुर्ते एवं पजामा पहनने का प्रचलन था। वे कुर्तों के ऊपर ऊँट की खाल से बना एक ढीला-ढाला चोगा (cloak) पहनते थे। इसके अतिरिक्त सिर पर पगड़ी बाँधते थे। उच्च वर्ग के लोगों के वस्त्र बहुत कीमती होते थे। स्त्रियाँ सलवार एवं कमीज पहनती थीं। इसके ऊपर वे बुर्का पहनती थीं। उनका प्रमुख भोजन खजूर एवं दूध था। इसके अतिरिक्त वे गेहूँ, बाजरा, अंगूर, खुमानी, सेव, बादाम एवं केले आदि का भी प्रयोग करते थे। वे ऊँट, भेड़ एवं बकरियों का माँस खाते थे। उच्च वर्ग के लोगों में मंदिरापान का बहुत प्रचलन था।

 

7. दास प्रथा (Slavery) उस समय अरब समाज में दास प्रथा का व्यापक प्रचलन था युद्ध में बंदी बनाए गए लोगों को दास बना लिया जाता था। दासों के साथ बहुत क्रूर व्यवहार किया जाता था। वे अपनी इच्छा से विवाह नहीं कर सकते थे। ऐसा करने वाले दासों की कठोर दंड दिया जाता था।

 2 आर्थिक जीवन

अरब में इस्लाम के उदय से पूर्व यहां का आर्थिक जीवन पिछड़ा हुआ था । इसका कारण यह था कि यहां की अधिकांश भूमि बंजर थी यहां वर्षा बहुत कम होती थी। यहां जनसंख्या बहुत विरल थी यहां यातायात और संचार के साधन बहुत कम थे ।इसके बावजूद अरब के लोगों ने आर्थिक क्षेत्र में प्रगति की जिसका उल्लेख निम्नलिखित है

1 कृषि 

अरब की अधिकांश भूमि रेतीली है अतः यह अन उपजाऊ है यहां वर्षा बहुत कम होती है कई बार तो लगातार तीन-चार वर्षों तक वर्षा नहीं होती यहां नदियां बहुत कम है इन नदियों में कोई भी एक नदी सदैव नहीं बढती सिंचाई के साधन की बहुत कमी है इन कारणों से चलते यहां पैदावार कम होती है फसलों का उत्पादन केवल उन्हीं क्षेत्र में होता है जहां सिंचाई के साधन उपलब्ध है यहां की मुख्य फसलें खजूर है अरब में जौ का उत्पादन भी बड़े पैमाने पर किया जाता है इसका चारा घोड़ों को खिलाया जाता है तथा आटा मनुष्यों के काम आता है ।

2 पशुपालन 

अरब लोगों का दूसरा प्रमुख व्यवसाय पशुपालन था ऊंट घोड़ा भेड़ बकरी इनकी प्रमुख पालतू जानवर थे इन जानवरों में ऊंट को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता था उसी रेगिस्तान का जहाज कहा जाता है उसके बिना रेगिस्तान में जीवन के बारे में सोचा नहीं जा सकता । ऊंट उच्च तापमान पर भी भर बोझा उठा सकता है वह कई दिनों तक बिना पानी पिए रह सकता है यह बद्दू लोगों का यातायात का प्रमुख साधन था लोग उटनी का दूध पीते थे तथा मांस खाते थे इसकी खाल का तंबू बनाते थे और इसके गोबर का आग के लिए प्रयोग करते थे । बददु लोग इसे विवाह के अवसर पर दहेज़ के रूप में देते थे।

3 धार्मिक जीवन 

इस्लाम के उदय से पूर्व अरब निवासी धार्मिक रूप से भी बहुत पिछड़े हुए थे। वे एक अल्लाह की अपेक्षा अनेक देवी-देवताओं की उपासना करते थे। प्रत्येक कबीले का अपना अलग देवी-देवता होता था। एक कबीले के लोग दूसरे कबीले के देवी-देवता से घृणा करते थे। वे अपने देवी-देवता को सर्वोच्च सिद्ध करने का प्रयास करते रहते थे। वे इन देवी-देवताओं की स्मृति में विशाल मस्जिदों का निर्माण करते थे तथा उनमें इनकी मूर्तियाँ रखी जाती अकेले मक्का में 360 देवी-देवताओं की मूर्तियाँ थीं। इसे अरब का सबसे पवित्र स्थान माना जाता था। प्रत्येक अर्थ अरब के विभिन्न भागों से बड़ी संख्या में लोग यहाँ लगने वाले उक्ज (ukaj) मेले के अवसर पर एकत्र होते थे। अरब लोग अपने देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए जानवरों की बलियाँ (sacrifices) देते थे। कभी-कभी मानव बलि भी दी जाती थी। हुबल (Hubal) अरबों का सबसे प्रसिद्ध देवता था अल-उज्जा (al-Uzza), अल लत(al-Lat) एवं अल-मना (al Manah) को अल्लाह की तीन पुत्रियाँ माना जाता था। अतः इनकी उपासना विशेष श्रद्धा के साथ की जाती थी।

 4 राजनीतिक जीवन

इस्लाम उदय से पूर्व अरब के लोगों का राजनीतिक जीवन भी बहुत पिछड़ा हुआ था उनका कोई व्यवस्थित राजनीतिक ढंग नहीं था केंद्रीय सत्ता के अभाव के कारण जिसकी लाठी उसकी भैंस का बोलबाला था और वह में पशुओं चौरा गांव भूमि तथा पानी के लिए जाती है लड़ाइयां चलती रहती थी बद्दू लोग लूटपाट में लीन रहते थे ।उस समय अरब लोग अनेक कबीलों में बँटे हुए थे। प्रत्येक कबीला राजनीतिक दृष्टि से स्वतंत्र होता था। उस समय अरबों में राष्ट्रीय भावना का अभाव था। वे केवल अपने कबीले के प्रति वफ़ादार होते थे। प्रत्येक कबोले का अपना मुखिया होता था जिसे शेख (sheikh) कहा जाता था। उसका चुनाव व्यक्तिगत साहस, बुद्धिमत्ता एवं उदारता के आधार पर किया जाता था। कबीले के लोग उसका बहुत सम्मान करते थे। वह अपने कबीले के लोगों की देखभाल करता था तथा उनके झगड़ों का निपटारा करता था देश में कोई एक कानून नहीं था। प्रत्येक कबीले के अपने अलग कानून थे। उस समय 'खून का बदला खून' का नियम बहुत प्रचलित था। शेख कबीले के लोगों की प्रसन्नता तक अपने पद पर बना रह सकता था।

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि इस्लाम के उदय से पूर्व अरब के लोग सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं राजनीतिक दृष्टिकोणों से पिछड़े हुए थे। निस्संदेह इसने अरब में इस्लाम के उदय का आधार तैयार किया।


 पैगंबर मुहम्मद 

–पैगंबर मुहम्मद इस्लाम के संस्थापक थे। उनका जन्म 570 ई० में कुरैश कबीले में हुआ। उनके माता पिता की शीघ्र मृत्यु हो गई थी। अतः उनका बचपन अनेक कठिनाइयों में व्यतीत हुआ। उनका 595 ई० में खदीजा के साथ विवाह हुआ। 610 में पैगंबर मुहम्मद को मक्का की हीरा नामक गुफ़ा में नया ज्ञान प्राप्त हुआ। यह ज्ञान उन्हें महादूत जिबरील द्वारा दिया गया। 612 ई० में पैगंबर मुहम्मद ने मक्का में अपना प्रथम सार्वजनिक उपदेश दिया। इस अवसर पर उन्होंने एक नए समाज का गठन किया जिसे उम्मा का नाम दिया गया। मक्का के लोग पैगंबर मुहम्मद के विचारों से सहमत न थे। अतः उसके कट्टर विरोधी बन गए। विवश होकर 622 ई० में पैगंबर मुहम्मद ने मक्का से मदीना को हिजरत की। उन्होंने 630 ई० में मक्का पर विजय प्राप्त की। यह उनके जीवन की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी। पैगंबर मुहम्मद ने लोगों को एक अल्लाह, आपसी भाईचारे, सादा एवं पवित्र जीवन व्यतीत करने एवं स्त्रियों का सम्मान करने का संदेश दिया। उनकी सरल शिक्षाओं से बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हुए एवं वे इस्लाम में सम्मिलित हुए। 632 ई० में पैगंबर मुहम्मद जन्नत (स्वर्ग) चले गए।

: पैगंबर मुहम्मद ने हिजरत क्यों की?

-पैगंबर मुहम्मद की बढ़ती हुई लोकप्रियता के कारण मक्का के अनेक प्रभावशाली लोग उनसे ईर्ष्या करते लगे। इसके दो प्रमुख कारण थे। प्रथम, पैगंबर मुहम्मद मूर्ति पूजा के कटु आलोचक थे। उस समय मक्का में काबा नामक स्थान पर 360 देवी-देवताओं की मूर्तियाँ थीं। इनके दर्शनों के लिए प्रत्येक वर्ष लाखों लोग मक्का की यात्रा पर आते थे। यह काबा पर नियंत्रण करने वाले पुजारी वर्ग तथा कुरैश कबीले के लोगों के लिए आय का एक प्रमुख स्रोत था। अतः पैगंबर मुहम्मद द्वारा मूर्ति पूजा की आलोचना उनके लिए एक गंभीर खतरे की चेतावनी थी। दूसरा, पैगंबर मुहम्मद अरब समाज में प्रचलित अंधविश्वासों को दूर कर इसे एक नई दिशा देना चाहते थे। इसे मक्का के रूढ़िवादी लोग पसंद नहीं करते थे। अतः उन्होंने अपने स्वार्थी हितों को देखते हुए लोगों को पैगंबर मुहम्मद के विरुद्ध भड़काना आरंभ कर दिया। इन लोगों ने अनेक बार पैगंबर मुहम्मद को जान से मारने का प्रयास किया तथा उनके अनुयायियों को कठोर यातनाएँ दीं। अतः बाध्य होकर पैगंबर मुहम्मद 28 जून, 622 ई० को मक्का से मदीना कूच कर गए। वह 2 जुलाई, 622 ई० को मदीना पहुँचे। इस घटना को मुस्लिम इतिहास में हिजरत कहा जाता है। यह घटना पैगंबर मुहम्मद के जीवन में एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई। इस वर्ष से मुस्लिम कैलेंडर का आरंभ हुआ।

 बद्र की लड़ाई 

 – मुसलमानों जो कि पैगंबर मुहम्मद के अनुयायी थे तथा मक्का के कुरैशों के मध्य 13 मार्च, 624 ई० को मदीना के निकट एक निर्णायक लड़ाई हुई। यह लड़ाई इतिहास में बद्र की लड़ाई के नाम से प्रसिद्ध है। इस लड़ाई के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे। प्रथम, मदीना में पैगंबर मुहम्मद के बढ़ते हुए प्रभाव को मक्का के कुरैश सहन न कर सके। कुरैश पैगंबर मुहम्मद को एक सबक सिखाना चाहते थे। दूसरा, मदीना का अब्दुला इब्न उबय्या काफी समय से वहाँ का शासक बनने का स्वप्न देख रहा था। पैगंबर मुहम्मद के मदीना आने से उसकी सभी इच्छाएँ धूल में मिल गई। अतः वह अपने अपमान का बदला लेने के लिए किसी स्वर्ण अवसर की तलाश में था। तीसरा, कुरैशों ने मदीना की सीमा पर लूटमार करनी आरंभ कर दी थी। पैगंबर मुहम्मद इसे सहन करने को तैयार न थे। अतः उन्होंने कुरैशों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। बद्र नामक स्थान पर हुई लड़ाई में पैगंबर मुहम्मद के अधीन लगभग 300 सैनिक थे। दूसरी ओर कुरैशी सैनिकों की संख्या लगभग 1000 थी। इनका नेतृत्व अबू सूफयान कर रहा था। इस युद्ध में पैगंबर मुहम्मद के सैनिकों ने रणक्षेत्र में वे जौहर दिखाए कि कुरैशी सैनिकों को कड़ी पराजय का सामना करना पड़ा। यह पैगंबर मुहम्मद की प्रथम निर्णायक विजय थी। इस विजय से मुसलमानों में नई आशा का संचार हुआ।

इस्लाम की प्रमुख शिक्षाओं का वर्णन  

इस्लाम की प्रमुख शिक्षाएं निम्नलिखित हैं


1. अल्लाह एक है-पैगंबर मुहम्मद ने अपनी शिक्षाओं पर बार-बार इस बात पर बल दिया। कि अल्लाह एक है। वह सर्वोच्च एवं सर्वशक्तिमान है। वह जो चाहे कर सकता है। वह संसार की रचना करता है। वह इसकी पालना करता है। वह जब चाहे इसे नष्ट कर सकता है। संसार की सभी वस्तुएं उसके नियंत्रण में हैं। उसकी अनुमति के बिना संसार का पत्ता तक नहीं हिल सकता। वह अत्यंत दयावान् है। वह गरीबों एवं अनाथों की पुकार सुनता है । वह सदैव रहने वाला है। कोई भी अन्य देवी-देवता उसके सामने तुच्छ है। इस कारण हमें केवल एक अल्लाह की उपासना करनी चाहिए।


2. इस्लाम के पांच स्तंभ-इस्लाम में पांच सिद्धांतों को विशेष महत्त्व प्राप्त है। इनका पालन करना प्रत्येक मुसलमान का कर्तव्य है। इसलिए इन्हें इस्लाम के पांच स्तंभ कहा जाता है। ये पांच स्तंभ हैं-

 (i) कलमा पढ़ना 

(ii) दिन में पांच बार नमाज़ पढ़ना 

(iii) रमजान के माह में रोजा (व्रत) रखना 

(iv) जकात (दान) देना एवं 

(v) हज की यात्रा करना।

3. कर्म सिद्धांत में विश्वास इस्लाम में कर्म सिद्धांत को विशेष महत्त्व प्राप्त है। इसके अनुसार जैसा बीजोगे वैसा काटोगे। यदि कर्म अच्छे होंगे तो अच्छा फल प्राप्त होगा, यदि बुरा करोगे तो बुरा होगा। कर्म मनुष्य का उसकी परछाईं की तरह पीछा करते हैं। कुरान के अनुसार - कयामात के दिन स्वर्ग एवं नरक का निर्णय व्यक्ति के किए गए कर्मों के अनुसार ही होगा।

4. नैतिक सिद्धांत-कुरान में अनेक नैतिक नियमों पर विशेष बल दिया गया है। इसमें कहा गया है कि- (i) हमें सदैव सत्य बोलना चाहिए।

 (ii) हमें किसी की निंदा नहीं करनी चाहिए। 

(iii) हमें सदैव पापों से दूर रहना चाहिए। 

(iv) हमें कभी भी लालच नहीं करना चाहिए। 

(v) हमें किसी से नफ़रत नहीं करनी चाहिए। 

(vi) हमें किसी से धोखा नहीं करना चाहिए। 

(vii) हमें अपने माता-पिता का सदैव सम्मान करना चाहिए।

5. मूर्ति पूजा का खंडन–इस्लाम द्वारा मूर्ति पूजा का जोरदार शब्दों में खंडन किया गया है। पैगंबर मुहम्मद के समय में अरब देश में मूर्ति पूजा का बहुत प्रचलन था। केवल काबा में ही सैंकड़ों मूर्तियां स्थापित की गई थीं। पैगंबर मुहम्मद ने मूर्ति पूजा का जोरदार शब्दों में खंडन किया। उन्होंने मक्का पर अधिकार करने के पश्चात् काबा में सभी मूर्तियों को नष्ट कर डाला। पैगंबर मुहम्मद का कथन था कि हमें केवल एक अल्लाह की उपासना करनी चाहिए।

 कुरान

- कुरान अरबी भाषा का शब्द है। इससे अभिप्राय है पुस्तक कुरान इस्लाम की पवित्र पुस्तक है। इसे सम्मान से कुरान शरीफ़ कहा जाता है। इसकी रचना अरबी भाषा में की गई है। इसमें 114 अध्याय हैं। इनकी लंबाई क्रमिक रूप से घटती जाती है। इसका आखिरी अध्याय सबसे छोटा है। इसमें इस्लाम की शिक्षाओं एवं नियमों का वर्णन किया गया है। मुस्लिम परंपरा के अनुसार कुरान उन संदेशों का संग्रह है जो खुदा ने अपने दूत जिवरील द्वारा पैगंबर मुहम्मद को 610 ई० से 632 ई० के मध्य मक्का में एवं मदीना में दिए। इसका संकलन 650 ई० में किया गया। आज जो सबसे प्राचीन कुरान हमारे पास है वह 9वीं शताब्दी से संबंधित है। कुरान शरीफ़ का विश्व की अनेक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। मुसलमान कुरान को ख़ुदा की वाणी मानते हैं एवं इसका विशेष सम्मान करते हैं।

शिया संप्रदाय 

-पैगंबर मुहम्मद की मृत्यु के पश्चात् इस्लाम दो वर्गों में बँट गया। वे लोग जो पैगंबर मुहम्मद के अनुयायी रहे वे सुन्नी कहलाए, दूसरी ओर जो लोग अली के समर्थक थे वे शिया कहलाए। पैगंबर मुहम्मद की मृत्यु के पश्चात् अली के समर्थक उन्हें खलीफ़ा बनाना चाहते थे। किंतु ऐसा न हो सका तथा अबू बकर ने खलीफ़ा पद संभाला। 656 ई० में अली के समर्थकों ने खलीफ़ा उथमान का वध कर दिया तथा अली को खलीफ़ा बना दिया। 661 ई० में खलीफ़ा अली तथा उसके दोनों पुत्रों हसन तथा हुसैन की हत्या कर दी गई। इस घटना के चलते सुन्नी एवं शिया मुसलमानों में कट्टर दुश्मनी उत्पन्न हो गई।

उलेमा से अभिप्राय -उलेमा मुसलमानों के धार्मिक विद्वान थे। वे अपना समय कुरान पर टीका लिखने और प्रामाणिक उक्तियों को लेखबद्ध करने में लगाते थे। वे लोगों को शरीआ के अनुसार जीवन व्यतीतप्रेरित करते थे।

 खलीफा

- (i) पैगंबर मुहम्मद के उत्तराधिकारी खलीफ़ा कहलाए।

(ii) प्रथम चार खलीफ़ों का शासनकाल 632 ई० से 661 ई० तक था।खलीफ़ा हज़रत मुहम्मद साहिब के उत्तराधिकारियों को कहा जाता था। उनका प्रमुख कार्य रक्षा एवं प्रसार करना था।प्रथम चार खलीफ़ाओं के नाम –  अबू बकर, उमर, उथमान एवं अली थे। 

खलीफ़ाओं के कार्य 

i) इस्लाम की रक्षा एवं प्रसार करना। 

(ii) कबीलों पर नियंत्रण कायम रखना।

(iii) राज्य के लिए संसाधन जुटाना।

प्रथम चार खलीफे

                           1अबू बकर

 - अबू बकर खलीफ़ा के पद पर नियुक्त होने वाले प्रथम व्यक्ति थे। वह इस पद पर 632 ई० से 634 ई०

तक रहे। जिस समय वह खलीफ़ा के पद पर निर्वाचित हुए तो उस समय उन्हें अनेक विकट समस्याओं का सामता करना पड़ा। अबू बकर इन समस्याओं से घबराने वाला व्यक्ति नहीं था। उसने अपनी योग्यता एवं अथक प्रयासों से इन समस्याओं पर नियंत्रण पाया। अबू बकर ने सर्वप्रथम नकली पैगंबरों के विद्रोहों से निपटने के लिए एक शक्तिशाली संघ का गठन किया। इसका नेतृत्व खालिद इब्न-अल-वालिद को सौंपा। खालिद ने 6 माह के दौरान हो इन नकली पैगंबरों को एक ऐसा सबक सिखाया कि उन्होंने पुनः विद्रोह करने का कभी साहस नहीं किया। इससे मुसलमानों में जहाँ एक ओर नव-स्फूर्ति का संचार हुआ वहीं दूसरी ओर अरब में शाँति स्थापित हुई। इसके पश्चात् अबू बकर ने मुस्लिम साम्राज्य के विस्तार की योजना बनाई। अतः उसने शीघ्र ही सीरिया, इराक, ईरान एवं बाइजेंटाइन साम्राज्यों पर विजय प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की। इन विजयों में खालिद ने उल्लेखनीय योगदान दिया। इसलिए उसे अल्लाह की तलवार की उपाधि से सम्मानित किया गया। उन्होंने मदीना को अपनी राजधानी बनाए रखा। 634 ई० में अबू बकर की मृत्यु हो गई। अपनी मृत्यु से पूर्व उन्होंने उमर को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया।

          II. उमर 634-644ईo

उमर आरंभिक चार खलीफ़ाओं में से सबसे महान थे। वह कुरैश कबोले से संबंधित थे तथा उनकी नियुक्ति अबू बकर द्वारा की गई थी। वह खलीफ़ा के पद पर 634 ई० में नियुक्त हुए। वह इस पद पर 644 ई० तक रहे। वह एक महान खलीफ़ा प्रमाणित हुए। उन्होंने अपनी दूरदृष्टि से जान लिया था कि उम्मा को केवल व्यापार और साधारण करो कि बल पर संगठित नहीं रखा जा सकता इसके लिए उन्हें अधिक धन की आवश्यकता थी यह धन उन्हें केवल विजय अभियानों के रूप में मारे जाने वाले छापों से प्राप्त लूट से मिल सकता था। इस उद्देश्य मे तथा इस्लाम के प्रसार के लिए उन्होंने अबू बकर की विस्तारवादी नीति को जारी रखा। 


खलीफा उमर न केवल एक महान् विजेता था अपितु एक कुशल प्रशासक भी था। उन्होंने अपने इस्लामी साम्राज्य को 8 प्रांतों में विभाजित किया। प्रत्येक प्राँत एक गवर्नर के अधीन होता था। उसे अमीर अथवा बली कहा जाता था। उसे अनेक शक्तियाँ प्राप्त थीं तथा वह अपने कार्यों के लिए खलीफ़ा के प्रति उत्तरदायी था। प्रांतों आगे जिलों में विभाजित किया गया था। जिले का अध्यक्ष आमिल कहलाता था। खलीफा उमर ने केंद्रीय राज्यकोष जिसे बैत अल-माल (Baital-mal) कहा जाता था, को सुदृढ़ करने के लिए अनेक पग उठाए। उसने कृषि में अनेक उल्लेखनीय सुधार किए। उसने शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक स्कूल खुलवाए। उसने साम्राज्य के विभिन्न भागों में अनेक मस्जिदों का निर्माण भी करवाया। उसकी आय के प्रमुख साधन ये थे

 (i) जकात  – यह एक धार्मिक कर था जो कि मुसलमानों से प्राप्त किया जाता था। यह उनकी आय का 21 प्रतिशत होता था। 

(ii) जज़िया - यह कर केवल ग़ैर-मुसलमानों पर लगाया जाता था। इसके बदले सरकार उनके जीवन एवं सम्पत्ति की सुरक्षा का आश्वासन देती थी। ऐसे लोगों को धिम्मीस (dhimmis) अर्थात् संरक्षित लोग कहा जाता था। 

(iii) खराज- यह वह भूमि कर था जो ग़ैर-मुसलमानों से प्राप्त किया जाता था। 

(iv) फे –यह मुसलमानों से प्राप्त किया जाने वाला भूमि कर था। खलीफ़ा उमर एक न्यायप्रिय शासक था। यहाँ तक कि उसने अपने पुत्र को मौत की सजा देने में भी संकोच नहीं किया था। उसने अपनी सेना को भी अच्छी प्रकार संगठित किया था। निस्संदेह खलीफ़ा उमर की उपलब्धियाँ महान थीं।

                        III. उथमान 644-656 ई०

उद्यमान मुसलमानों का तीसरा खलीफा था। उसकी नियुक्ति 6 सदस्यों की एक समिति द्वारा 644 ई० में को गई थी। वह इस पद पर 656 ई० तक रहा। उसका संबंध उमय्यद वंश के कुरेश परिवार से था। उथमान भी अन्य खलीफाओं की तरह महत्त्वाकांक्षी एवं साम्राज्यवादी व्यक्ति था। अतः सिंहासन पर बैठते ही उसने सर्वप्रथम इस्लामी साम्राज्य के विस्तार की ओर ध्यान दिया। इस उद्देश्य से उसने अपनी सेना को संगठित किया। उसने अपने शासनकाल में साइप्रस, खुरासान, काबुल, गजनी, हेरात, ट्यूनीशिया तथा लीबिया आदि प्रदेशों पर विजय प्राप्त की। परिणामस्वरूप उसके शासनकाल में इस्लामी पताका मोरक्को से काबुल तक फहराने लगी। उसने प्रजा की भलाई के लिए भी अनेक कार्य किए। उसने कुरान को एक ग्रंथ में संग्रहित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उसने प्रशासन पर अधिक नियंत्रण रखने के उद्देश्य से अपने निकट संबंधियों को राज्य के उच्च पदों पर नियुक्त किया। इससे लोगों में उनके शासन के विरुद्ध असंतोष फैला। इस असंतोष को खलीफ़ा पद के इच्छुक तीन दावेदारों अली (Ali), सलहा (Talha) एवं जुबैर (Zubair) द्वारा भड़काया गया। इससे प्रेरित होकर 17 जून, 656 ई० को उथमान की हत्या कर दी गई।

                                                  IV. अली: 656-661 ई०


खलीफ़ा उथमान की हत्या के पश्चात् 24 जून, 656 ई० को अली मुसलमानों के चौथे खलीफ़ा बने। वह 661 ई० तक इस पद पर रहे। वह कुरैश कबीले के बानू हाशिम परिवार से संबंधित थे। वह पैगंबर मुहम्मद के चाचा अबू तालिब के पुत्र थे। खलीफ़ा बनने के शीघ्र पश्चात् अली ने अपनी राजधानी मदीना से बदल कर कुफा (Kuta) बना ली। अली के शासनकाल में मुसलमान दो संप्रदायों में विभाजित हो गए। उसके समर्थक शिया कहलाए जबकि उसके विरोधी सुन्नी। 9 दिसम्बर, 656 ई० को अली एवं उसके विरोधियों के मध्य ऊँटों की लड़ाई (Battle of Camels) हुई। इस लड़ाई में अली के विरोधियों का नेतृत्व पैगंबर मुहम्मद की पत्नी आयशा (Aishah) ने किया। इस लड़ाई में यद्यपि अली विजित हुआ किंतु इससे उसकी समस्याएँ कम न हुई।अली के शासनकाल में सीरिया का गवर्नर मुआविया था। वह उथमान का संबंधी था तथा वह उसकी हत्या के लिए अली को उत्तरदायी समझता था। अली ने उसका दमन करना चाहा। अतः दोनों के मध्य 28 जुलाई, 657 ई० को सिफ्फिन की लड़ाई  हुई। इस लड़ाई में अली पराजित हुआ तथा उसे संधि के लिए बाध्य होना पड़ा। इस कारण उसके अनुयायी दो धड़ों में बँट गए। एक धड़ा उसके प्रति वफ़ादार रहा। दूसरा घड़ा उसके विरुद्ध हो गया। यह धड़ा खरजी  कहलाया। खरजी धड़े के एक सदस्य द्वारा 24 जनवरी, 661 ई० को कुफा (इराक) की एक मस्जिद में अली की हत्या कर दी गई। इस प्रकार खलीफ़ा अली का दुःखद अंत हुआ।

उमय्यदों का उत्थान एवं पतन

 

उमय्यद वंश की गणना इस्लाम के इतिहास के महत्त्वपूर्ण राजवंशों में की जाती है। इस वंश की स्थापन 661 ई० में मुआविया ने की थी। इस वंश के शासकों ने 750 ई० तक शासन किया। उनकी राजधानी का दमिश्क (Damascus) था। इस वंश के शासकों ने खलीफ़ा के चुनाव की अपेक्षा वंशगत उत्तराधिकारी की परमा आरंभ की। वे पूर्व खलीफ़ाओं की अपेक्षा बड़े-बड़े महलों में रहने लगे तथा ऐश्वर्यपूर्ण जीवन व्यतीत करने लगे। अब्द-अल-मलिक (Abd-al-Malik) तथा वालिद (Walid) प्रथम उमय्यद वंश के दो सबसे प्रसिद्ध खलीफ़ा थे। उनके शासनकाल में उमय्यद वंश ने उल्लेखनीय प्रगति की। सुलेमान (Sulayman) के पश्चात् उसके सभी उत्तराधिकारी अयोग्य सिद्ध हुए। परिणामस्वरूप उमय्यद वंश का पतन हो गया।I.

                    1. उमय्यदों का उत्थान

उमय्यदों के उत्थान एवं विकास में निम्नलिखित खलीफ़ों ने प्रशंसनीय योगदान दिया— 

1. मुआविया 661-680:-उमय्यद वंश का संस्थापक मुआविया था। खलीफ़ा बनने से पूर्व वह सीरिया का गवर्नर था। वह 661 ई० से 680 ई० तक खलीफ़ा के पद पर रहा। जिस समय वह खलीफ़ा बना उस समय उसके समक्ष अनेक चुनौतियाँ थीं।  उसने इन चुनौतियों का साहसपूर्ण सामना किया। उसने सर्वप्रथम दमिश्क को अपनी राजधानी बनाया। उसने 663 ई० में खरिजाइटों जिन्होंने खलीफ़ा के विरुद्ध कुफा में विद्रोह कर दिया था, का सख्ती के साथ दमन किया। लगभग इसी समय खलीफ़ा अली के समर्थकों ने इराक में विद्रोह कर दिया। ये लोग बहुत शक्तिशाली थे। इसके बावजूद मुआविया ने अपना धैर्य न खोया। उसने एक विशाल सेना भेजकर उनके विद्रोह का दमन किया। इस प्रकार मुआविया की एक बड़ी सिरदर्दी दूर हुई। 667 ई० में मुआविया के प्रसिद्ध सेनापति उकाबा ने उत्तरी अफ्रीका के अधिकाँश क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। मुआविया बाइजेंटाइन साम्राज्य को अपने अधीन करना चाहता था किंतु उसकी यह इच्छा अनेक कारणों से पूर्ण न हो सकी। मुआविया के सैनिक तुर्किस्तान पर अधिकार करने में सफल रहे। मुआविया न केवल एक महान् विजेता अपितु एक कुशल शासन प्रबंधक भी सिद्ध हुआ। उसने बाइजेंटाइन साम्राज्य की राजदरबारी रस्मों तथा प्रशासनिक संस्थाओं को अपनाया। उसने खलीफ़ा पद के गौरव में बहुत वृद्धि की। करने में सफल रहे। मुआविया न केवल एक महान् विजेता अपितु एक कुशल शासन प्रबंधक भी सिद्ध हुआ। उसने बाइजेंटाइन साम्राज्य की राजदरबारी रस्मों तथा प्रशासनिक संस्थाओं को अपनाया। उसने खलीफ़ा पद के गौरव में बहुत वृद्धि की।

2. याजिद 680-683 ई० :-680 ईसवी में मुआविया की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र याजिद उसका उत्तराधिकारी बना। मुआविया ने उसे अपने जीवनकाल में ही अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया था। वह 683 ई० तक खलीफ़ा के पद पर रहा। उसके खलीफ़ा बनते ही पूर्व खलीफा अली के पुत्र हुसैन  ने उसका विरोध किया। अतः उसका सामना करने के लिए याजिद ने उमर-बिन-सेद  के नेतृत्व में 4000 सैनिक भेजे। दोनों के मध्य 10 अक्तूबर, 680 ई० को करबला की लड़ाई  हुई। इस लड़ाई में हुसैन पराजित हुआ। उसे गिरफ्तार कर उसका सिर धड़ से अलग कर दिया गया। इससे शिया मुसलमान उमय्यद वंश के कट्टर विरोधी बन गए। 

 3. मुआविया द्वितीय एवं मारवान 683-685 ई० (Muawiyah II and Marwan 683685 CEL 683 ई० में याजिद की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र मुआविया द्वितीय नया खलीफ़ा बना। वह एक नम्र स्वभाव का व्यक्ति था। कुछ माह के शासन के पश्चात् 684 ई० में उसकी मृत्यु हो गई। अतः मारवान को 684 ई० में नया खलीफ़ा बनाया गया। वह मुआविया प्रथम का चचेरा भाई था। उसकी भी एक वर्ष पश्चात् मृत्य हो गई। अतः उसके शासनकाल को इस्लाम के इतिहास में कोई विशेष महत्त्व प्राप्त नहीं है।

 4. अब्द-अल-मलिक 685-705 ई० 

 अब्द-अल-मलिक की गणना उमय्यद वंश के महान् खलीफ़ाओं में की जाती है। वह मारवान का पुत्र था। वह 685 ई० में खलीफ़ा के पद पर नियुक्त हुआ। वह 705 ई० तक इस पद पर रहा। उसे अपने शासनकाल के आरंभ में घोर समस्याओं का सामना करना पड़ा था। अब्द-अल-मलिक इन समस्याओं से घबराने वाला व्यक्ति नहीं था। उसने न केवल इन समस्याओं पर नियंत्रण पाया अपितु मुस्लिम साम्राज्य को संगठित करने में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। अब्द-अल-मलिक की शक्ति को सर्वप्रथम इराक में अल-मुख्तियार बिन अबू उबैद (Al-Mukhtiar bin Abu Ubayed) ने चुनौती दी। उसने अल-हुसैन की हत्या का बदला लेने के लिए लोगों को उकसाया। अब्द-अल मलिक ने बड़ी कुशलता से इस विद्रोह का दमन किया। इसके पश्चात् उसने अपना ध्यान एक अन्य प्रमुख शत्रु इब्न जुबैर (Ibn Zubayr) की ओर किया। इब्न जुबैर ने मक्का में अपने खलीफ़ा होने की घोषणा कर दी थी। वह 692 ई० में अब्द-अल-मलिक के साथ हुई एक लड़ाई में मारा गया था। अब्द-अल-मलिक ने बाइजेंटाइन साम्राज्य के अनेक क्षेत्रों पर अधिकार करने में सफलता प्राप्त की। इसके पश्चात् अब्द-अल-मलिक के सेनापति हसन इब्न नूमैन (Hasan Ibn Numan) ने पश्चिमी अफ्रीका के कुछ क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार अब्द-अल-मलिक के शासनकाल में इस्लामी साम्राज्य का खूब विस्तार हुआ।अब्द-अल-मलिक न केवल एक महान् विजेता अपितु एक कुशल शासन प्रबंधक भी था। उसने इस्लामी साम्राज्य को संगठित करने के लिए अनेक उल्लेखनीय उपाय भी किए। उसने अरबी (Arabic) को राज्य की भाषा घोषित किया। उसने इस्लामी सिक्कों को जारी किया। इनमें सोने के सिक्के को दीनार एवं चाँदी के सिक्के को दिरहम कहा जाता था। ये सिक्के रोमन सिक्के दिनारियस (denarius) तथा ईरानी सिक्के द्राख्मा (drachm) को नकल थे। इन सिक्कों पर अरबी भाषा लिखी गई थी।

 5. वालिद प्रथम 705-715 ई०  वालिद प्रथम उमय्यद वंश का एक अन्य प्रसिद्ध एवं शक्तिशाली शासक था। वह अब्द-अल-मलिक का पुत्र था। वह 705 ई० में खलीफ़ा के पद पर नियुक्त हुआ था। वह इस पद पर 715 ई० तक रहा। उसने इस्लामी साम्राज्य के विस्तार एवं इसके संगठन में प्रशंसनीय योगदान दिया। वालिद प्रथम ने सर्वप्रथम मध्य एशिया के अनेक प्रदेशों बुखारा (Bukhara), समरकंद (Samarkand) आदि में इस्लामी झंडा फहराया। इस कार्य में उसे इराक के गवर्नर हज्जाज-बिन-युसूफ (Hajjaj-bin-Yusuf) ने उल्लेखनीय योगदान दिया। 711-12 ई० में वालिद प्रथम के सेनापति मुहम्मद बिन कासिम (Muhammad bin-Qasim) ने सिंध के शासक दाहिर को पराजित कर सिंध पर अधिकार कर लिया। वालिद प्रथम के समय मित्र के गवर्नर मूसा-इब्न-नूसैर (Musa-ibn Nusayr) ने पश्चिमी अफ्रीका के अनेक प्रदेशों पर अधिकार करने में सफलता प्राप्त की। 711-12 ई० में वालिद प्रथम के दो सेनापतियों तारिक (Tariq) एवं मूसा (Musa) ने स्पेन पर अधिकार कर लिया। निस्संदेह इसे वालिद प्रथम के शासनकाल की सबसे महत्वपूर्ण सफलता माना जाता है। चालिद प्रथम ने इस्लामी साम्राज्य को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से अनेक प्रजा हितकारी कार्य किए। उसने अनेक सड़कों, अस्पतालों, स्कूलों एवं मस्जिदों का निर्माण करवाया।

 6. सुलेमान 715-717 ई० - 715 ई० में वालिद प्रथम की मृत्यु के पश्चात् उसका भाई सुलेमान नया खलीफ़ा बना। वह 717 ई० तक इस पद पर रहा। उसके शासनकाल का इस्लाम के इतिहास में कोई विशेष महत्त्व नहीं है। उसका केवल एक महत्त्वपूर्ण कार्य अपनी मृत्यु से पहले अपने पुत्र उमर द्वितीय को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करना था।

7. उमर द्वितीय 717-720 ई०

- उमर द्वितीय 717 ई० से 720 ई० तक खलीफा के पद पर रहा। अपने अल्प शासनकाल में उसने इस्लामी साम्राज्य के विस्तार की अपेक्षा इसके संगठन की ओर विशेष ध्यान दिया। उसने सवालियों (mawalis) के प्रति उदार नीति अपनाई एवं मुसलमानों के बराबर अधिकार दिए। मवाली वे ग़ैर अरबी मुसलमान थे जिन्होंने इस्लाम को ग्रहण कर लिया था। उसने इस्लाम के प्रसार के उद्देश्य से इसे ग्रहण करने वाले लोगों को विशेष सुविधाएँ प्रदान कीं। उसने साम्राज्य में फैले भ्रष्टाचार …

 II. उमय्यद वंश का पतन

उमय्यद वंश जिसको स्थापना 661 ई० में मुआविया ने की थी. का 750 ई० में पतन हो गया। उसय्यद के पतन के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे।

 (i) उमय्यद वंश के कुछ खलीफों को छोड़कर अधिकांश ख ने प्रशासन की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। ऐसे साम्राज्य का पतन निश्चित था। 

(ii) उमय्यद वंश के उत्तराधिकारी साम्राज्य के हितों की अपेक्षा अपने स्वार्थी हितों में अधिक व्यस्त रहते थे। ऐसे साम्राज्य के सूर्य को अस्त होने से कोई रोक नहीं सकता था। 

(iii) उमय्यद शासक गैर-अरबों के साथ बहुत मतभेद करते थे। इससे उनमें उमय्यद वंश के प्रति नफ़रत की भावना फैली। अतः वे उमय्यद वंश के विरोधियों के साथ जा मिले। 

(iv) उमय्यद के शासक अपनी सेना को नियमित तन्खवाह न दे सके। इस कारण सैनिक भी अपने शासकों से रुष्ट रहते थे। संकट के समय उन्होंने दुश्मनों को गले लगाया था 

(v) शिया वंश के लोग उमय्यदों के कट्टर दुश्मन थे। उन अली एवं उसके पुत्र हुसैन की हत्या के लिए जिम्मेदार मानते थे। अतः वे उमय्यदों से बदला लेने के लिए किसी स्वर्ण अवसर की प्रतीक्षा में थे। 

(vi) उमय्यद साम्राज्य में फैली अराजकता का लाभ उठाते हुए अब्बासियों (Abbasids) ने दवा (dawa) नामक एक सुनियोजित आंदोलन चलाया। इस आंदोलन ने उमय्यद वंश की मृत्यु की घंटी बजा दी।

अब्बासियों का उत्थान एवं पतन

750 ई० में अब्बासियों के आगमन ने इस्लाम के इतिहास में एक नए युग का सूत्रपात किया। उमय्यद वंश के खलीफ़ों ने प्रशासन की ओर अपना कोई ध्यान नहीं दिया। इसके अतिरिक्त मवालियों (mawalis) (यह ग़ैर अरबो मुसलमान थे) को अरबी मुसलमानों के तिरस्कार का शिकार होना पड़ा था। अतः वे उमय्यदों को सत्ता से बाहर निकालने के लिए किसी स्वर्ण अवसर की प्रतीक्षा में थे। उमय्यद साम्राज्य में फैली अराजकता का लाभ उठाते हुए अबू मुस्लिम (Abu Muslim) ने खुरासान में 747 ई० में उमय्यद वंश के विरुद्ध दवा (dawa) नामक आंदोलन आरंभ किया। 

I. अब्बासी का उत्थान

अब्बासियों के उत्थान में निम्नलिखित खलीफ़ों ने उल्लेखनीय योगदान दिया

1. अबू अल-अब्बास 750-754 ई०- अबू अल-अब्बास ने 750 ई० में अब्बासी वंश की स्थापना की। जिस समय वह सिंहासन पर बैठा उस समय अरब की राजनीतिक दशा बहुत शोचनीय थी। साम्राज्य के अनेक स्थानों पर विद्रोहियों ने उत्पात मचा रखा था। वे अबू-अल-अब्बास को खलीफ़ा स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। इस कारण नए खलीफ़ा ने सर्वप्रथम अपना ध्यान उमय्यद विद्रोहियों की ओर किया।  वह इतना क्रूर था कि उसने अल-सफा (Al-Saffah) (रक्तपात करने वाला) की उपाधि धारण की। 754 ई० में उसकी मृत्यु हो गई।

2. अल-मंसूर 754-775 ई० )- 754 ई० में अबू अल-अब्बास की मृत्यु के पश्चात् उसका भाई अल-मंसूर नया खलीफ़ा बना। उसका वास्तविक नाम अबू जफ़र (Abu Jafar) था। उसने अब्बासी वंश को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से अनेक उल्लेखनीय पग उठाए। उसने सर्वप्रथम अपना ध्यान सीरिया के गवर्नर अब्दुल्ला-बिन-अली (Abdullah-bin-Ali) की ओर दिया। उसने अब्बासी वंश की स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। अतः वह अब स्वयं खलीफ़ा बनने के स्वप्न देखने लगा था। यह अल-मंसूर के लिए एक गंभीर चुनौती थी। अब्बासी अल मंसूर ने न केवल अपनी योग्यता से साम्राज्य का विस्तार किया अपितु इसका कुशलतापूर्वक संगठन भी किया उसने कला के क्षेत्र में शिक्षा के क्षेत्र में अपना योगदान दिया अनेक महलों बबलू मस्जिदों और उद्योगों को सुसज्जित किया उसने अपने महल दरबार में अनेक विद्वानों को संरक्षण प्रदान किया कृषि तथा व्यापार को प्रोत्साहन किया

 3. अल-महदी 775-785 ई० - 775 ई० में अल-मंसूर की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र अल महदी अब्बासियों का नया खलीफ़ा बना। वह 785 ई० तक इस पद पर रहा। उसने अपने शासनकाल में लोक भलाई के अनेक कार्य किए। उसने अनेक सड़कों का निर्माण किया। उसने यात्रियों की सुविधा के लिए अनेक कुओं एवं सराओं का निर्माण करवाया। उसने शिक्षा को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से अनेक मकतब एवं मदरसे खुलवाए। उसने गरीबों, अपाहिजों एवं विधवाओं को धन द्वारा सहायता की। उसने बुजुर्गों के लिए पेंशन निश्चित की। उसने डाक-व्यवस्था का विकास किया। उसने अनेक भवनों एवं मस्जिदों का निर्माण करवाया। उसने कला तथा साहित्य को प्रोत्साहित किया। उसने कृषि तथा व्यापार के विकास के लिए अनेक पग उठाए। उसने सीरिया एवं खुरासान के विद्रोहों का दमन किया। 

4. अल-हादी 785-786 ई०-785 ई० में अल-हादी नया खलीफ़ा बना। वह अल महदी का पुत्र था। वह केवल एक वर्ष तक इस पद पर रहा। उसके शासनकाल का अब्वासियों के इतिहास में कोई विशेष महत्त्व नहीं है। 

5. हारुन-अल-रशीद 786-809 ई  ---हारुन-अल-रशीद अब्बासियों का सबसे महान् एवं शक्तिशाली खलीफ़ा था। वह खलीफ़ा अल-हादी का छोटा भाई था। वह 786 ई० से 809 ई० तक खलीफ़ा के पद पर रहा। उसने अब्बासी वंश के गौरव को पुनः स्थापित करने के उद्देश्य से अनेक उल्लेखनीय कार्य किए। उसने अपनी तलवार के बल पर न केवल आंतरिक विद्रोहों का दमन किया अपितु अब्बासी साम्राज्य का दूर-दूर तक विस्तार किया। उसने सर्वप्रथम अफ्रीका के लोगों द्वारा वहाँ अरब खलीफ़ा के गवर्नर के विरुद्ध भड़के विद्रोह का योग्यतापूर्वक दमन किया। इस विद्रोह के कारण अफ्रीका में तीन वर्षों तक अराजकता फैली रही थी।

 6. अल-अमोन 809-813 ई०- हारुत-अल-रशीद ने अपनी मृत्यु से पूर्व अपने सबसे बड़े पुत्र अल-अमीन को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था। इस अवसर पर अल-अमीन के पश्चात् हारुन के दूसरे पुत्र अल-मामुन (al-Mamun) के उत्तराधिकारी की घोषणा भी की गई। 809 ई० में अल-अमीन खलीफ़ा बना। वह 813 ई० तक इस पद पर रहा। वह एक अयोग्य एवं विलासी खलीफ़ा प्रमाणित हुआ। इसलिए वह जनसाधारण की सहानुभूति खो बैठा था। उसका भाई अल-मामुन खुरासान का गवर्नर था। वह एक योग्य एवं कुशल शासक था। उसको बढ़ती हुई लोकप्रियता के कारण अल-अमीन उससे ईष्र्यों करने लगा। इसके अतिरिक्त उसने अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध अपने पुत्र को अपना उत्तराधिकारी घोषित करने का प्रयास किया। इस कारण 809 ई० में अल-अमीन एवं उसके भाई अल-पासुन के मध्य गृह युद्ध आरंभ हो गया। यह गृह युद्ध 813 ई० तक चलता रहा। इस गृह युद्ध के अंत में अल-अमीन पराजित हुआ एवं वह मारा गया। इस प्रकार अल-अमीन के यशहीन शासन का अंत हुआ।

7. अल-मामुन 813833 ई० - 813 ई० में अल-मामुन अब्बासी वंश का नया खलीफ़ा बना। वह 833 ई० तक इस पद पर रहा। वह एक महान सेनापति एवं योग्य शासक प्रमाणित हुआ। जिस समय वह सिंहासन पर बैठा उस समय अब्बासी साम्राज्य के चारों ओर अराजकता एवं विद्रोह का वातावरण था। अल-मामुन इन समस्याओं से घबराने वाला व्यक्ति नहीं था। उसने ईरान, मिस्र, सीरिया, अर्मीनिया, खुरासान एवं यमन में खिलाफ़त के विरुद्ध उठने वाले विद्रोहों का दमन किया। उसने बाइसेंटाइन साम्राज्य के विरुद्ध अपनी सेना का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया। उसने अपने साम्राज्य में शांति स्थापित करने में सफलता प्राप्त की।

 8. बाद के खलीफ़े  - अल-मामुन की मृत्यु के साथ ही अब्बासी राजवंश का पतन आरंभ हो गया था। इसका कारण यह था कि उसके पश्चात् आने वाले सभी खलीफ़े अल-वधिक (al-Wathiq), अल-मुतव्वकिल (al-Mutawakkil) तथा मुनतासिर (Muntasir) आदि सभी अयोग्य एवं निकम्मे निकले। अब्बासी वंश का अंतिम खलीफ़ा अल-मुस्तासिम  था। 1258 ई० में चंगेज़ खाँ के पोते हुलेंगू ने बग़दाद पर आक्रमण कर अब्बासी राजवंश का अंत कर दिया।

II. अब्बासी वंश का पतन

अब्बासी वंश के खलीफ़ों ने 750 ई० से 1258 ई० तक शासन किया। इस वंश के पतन के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे - 

(i) अल-मामुन के सभी उत्तराधिकारी अयोग्य एवं निकम्मे निकले। उन्होंने प्रशासन की ओर अपना ध्यान नहीं दिया। ऐसे साम्राज्य का पतन निश्चित था 

(ii) 9वीं शताब्दी में बग़दाद का दूर के प्रांतों पर नियंत्रण कम हो गया। इससे विद्रोहों को प्रोत्साहन मिला। परिणामस्वरूप अब्बासी साम्राज्य में अराजकता फैली 

(iii) 9वीं शताब्दी में अब्बासी साम्राज्य में अनेक गुटों एवं छोटे-छोटे राजवंशों का उदय हो गया था। इनकी आपसी लड़ाइयाँ अब्बासी साम्राज्य के लिए घातक सिद्ध हुई।

 (iv) अब्बासी खलीफ़ों ने अपनी सेना को शक्तिशाली बनाने की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। ऐसे साम्राज्य के पतन को भला कौन रोक सकता था।

 (v) अरबों एवं ग़ैर अरबों के मध्य चलने वाले लगातार संघर्ष ने अब्बासी साम्राज्य को खोखला बना दिया।

 (vi) अब्बासी खलीफ़ों ने अपनी विलासिता के लिए लोगों पर भारी कर लगा दिए। इससे लोगों में असंतोष फैला एवं वे उनके विरुद्ध हो गए।

सल्तनतों का उदय

9वीं शताब्दी में अब्बासी साम्राज्य में विखंडन की प्रक्रिया आरंभ हो चुकी थी। इस स्वर्ण अवसर का लाभ कर 9वीं शताब्दी से 11वीं शताब्दी के दौरान अब्बासी साम्राज्य के विभिन्न भागों में अनेक स्वतंत्र सल्तनतों का उदय हुआ। इन सल्तनतों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. ताहिरी वंश :-ताहिरी वंश की स्थापना ताहिर ने 820 ई० में खुरासान में की थी। उसने निशापुर  को अपनी राजधानी घोषित किया। उसने खलीफ़ा अल-अमौन को पराजित कर बग़दाद पर अधिकार कर लिया था। ताहिर की 822 ई० में मृत्यु हो गई थी। ताहिर के पश्चात् 873 ई० तलहा (Talha), अब्द-अल्लाह (Abd-Allah), ताहिर II (Tahir II), मुहम्मद (Muhammad) तथा हुसैन (Husayn) ने शासन किया। उन्होंने अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए कुछ नहीं किया। 873 ई० में याकूब (Yakub), जो सफ़ारी वंश (Saffarids) से संबंधित था, ने निशापुर पर अधिकार कर ताहिरी वंश का अंत कर दिया।

 

2. समानी वंश (The Samanids) समानी वंश का संस्थापक समन था। वह बल्ख का एक बड़ा जागीरदार था। उसने इस्लाम धर्म को ग्रहण कर लिया था। उसके चार पोतों को खलीफ़ा अल-मामुन ने समरकंद (Samarkond) फरगना (Farghana), शास (Shash) एवं हेरात (Herat) नामक प्रदेश शासन के लिए दिए। समानी वंश के शासकों में अहमद (Ahmed) एवं इस्माइल (Ismail) नामक शासक लोकप्रिय हुए। इस वंश का अंतिम शासक अब्द-अल-मलिक द्वितीय (Abd-al-Malik 11) था। उसे महमूद गजनवी (Mahmud Ghaznavi) ने पराजित कर समानी वंश का अंत कर दिया था।

 

3. तुलुनी वंश (The Tulinids) - तुलुनी वंश का संस्थापक अहमद-इन-तुलन (Ahmed-ibn-Tulun) था। यहाँ अहमद ने 868 ई० में अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी थी। वह एक योग्य शासक प्रमाणित हुआ। उसने 877 ई० में सीरिया पर अधिकार कर लिया था। उसने कत्ताई (Qatai) को तुलुनी साम्राज्य की राजधानी घोषित किया। उसने अपनी राजधानी में एक विशाल मस्जिद का निर्माण करवाया। उसने लोक भलाई के अनेक कार्य किए। अत: उसके शासनकाल में प्रजा बहुत खुशहाल थी। 884 ई० में उसकी मृत्यु हो गई। उसके उत्तराधिकारियों ने 905 ई० तक शासन किया। इस वंश का अंत खलीफ़ा अल-मुक्तफी (al-Muqtafi) ने किया।

 

4. बुवाही वंश (The Buyids) बुवाही वंश का संस्थापक मुइज-उद-दौला (Muizz-ud-Dawlah) था। उसने इस वंश की स्थापना 932 ई० में ईरान के क्षेत्र डेलाम (Daylam) में की थी। वह बुवाहो का पुत्र था जिससे इस वंश का यह नाम पड़ा। उसने शिराज (Shiraj) को बुवाही साम्राज्य की राजधानी घोषित किया। वह एक योग्य एवं महान् शासक सिद्ध हुआ। उसने 945 ई० में बगदाद पर अधिकार कर लिया था। बुवाही वंश का सर्वाधिक प्रसिद्ध शासक अदूद-अल-दौला (Adud-al Dawlah) था। उसने 949 ई० से 983 ई० तक शासन किया। तुग़रिल बेग (Tughri' 3eg) ने बुवाही वंश का अंत कर दिया।

 

5. फ़ातिमी वंश (The Fatimids) फ़ातिमी वंश एक प्रसिद्ध राजवंश था। इस वंश की स्थापना 909 ई० में अल-महदी (al Mehdi) ने उत्तरी अफ्रीका में की थी। यह वंश अपने आपको पैगंबर मुहम्मद की पुत्री फ़ातिमा के वंशज मानते हैं। यह मुसलमानों के शिया संप्रदाय से संबंधित है। अल-महदी ने 909 ई० से 934 ई० तक शासन किया। अल-मुइज़ के उत्तराधिकारियों ने 1171 ई० तक शासन किया। 1171 ई० में सालादीन ने अल-अजिंद (al-Azid) को पराजित कर फ़ातिमी वंश का अंत कर दिया।

6. गजनवी वंश ( The Ghaznavids) गजनवी वंश का संस्थापक अल्पतिगीन (Alptegin) था। अल्पतिगोन ने इस वंश की स्थापना 962 ई० में गजनी में की थी। वह कुशल सवार एवं योद्धा था। उसने अपना जीवन समाय शासक के व्यक्तिगत अंगरक्षक के रूप में शुरू किया था। वह उन्नति करता हुआ 961 ई० में खुरासान का गवर्नर बन गया था। उसने 962 ई० से 976 ई० तक शासन किया था। गजनवी वंश का वास्तविक संस्थापक सुबुकतिमीन (Subuktegin) को माना जाता है। उसने 977 ई० से 997 ई० तक शासन किया। उसने अपने साम्राज्य का विस्तार किया। गजनवी वंश का सबसे महान् सुल्तान महमूद गजनी (Mahmud Ghazni) था। उसने 998 ई० मे 1030 ई० तक शासन किया। वह एक बहादुर शासक था। उसने 1000 ई० से 1027 ई० के मध्य भारत पर 17 बार आक्रमण किए। इन आक्रमणों के दौरान उसने भारत में भारी लूटमार की एवं पंजाब को गजनवी साम्राज्य में सम्मिलित का लिया।

 

" महमूद गजनवी के उत्तराधिकारियों ने 1186 ई० तक शासन किया। 1186 ई० में मुहम्मद गौरी (Muhammad Ghori) ने गजनवी वंश के अंतिम शासक खुसरो मलिक (Khusrau Malik) पराजित कर इस वंश का अंतकर दिया था।

 

7. सल्जुक वंश (The Saljugs) गजनवी वंश के खंडहरों पर सल्जुक वंश की स्थापना हुई। इस वंश की स्थापना तुगरिल बेग (Tughril Beg) एवं उसके भाई छागरी बेग (Chaghri Beg) ने 1037 ई० में खुरासान (Khurasan) को जीत कर की थी। उन्होंने निशापुर (Nishapur) को अपनी राजधानी घोषित किया। वे तुर्क (Turk) जाति से संबंधित थे। तुग़रिल बेग ने सल्जुक साम्राज्य के विस्तार में उल्लेखनीय योगदान दिया। उसकी सबसे महत्त्वपूर्ण सफलता 1055 ई० में बग़दाद पर अधिकार करना था। इससे बग़दाद में बुवाही शासन का अंत हुआ एवं इस पर पुनः सुन्नी मुसलमानों का शासन स्थापित हो गया। इससे प्रभावित होकर खलीफ़ा अल-कायम (al-Quim) ने तुग़रिल बेग को सुल्तान की उपाधि से सम्मानित किया। 1063 ई० में तुग़रिल बेग की मृत्यु के पश्चात् उसका भतीजा अल्प अरसलन (Alp Arslan) नया सुल्तान बना। उसने 1072 ई० तक शासन किया। वह एक योग्य शासक प्रमाणित हुआ। मलिक शाह की मृत्यु के पश्चात् सल्जुक साम्राज्य का विखंडन आरंभ हो गया तथा इसका अंत 1300 ई० में हो गया।

सूफी मत

सूफीवाद इस्लाम के भीतर ही एक रहस्यवादी आंदोलन के रूप में ईरान से शुरू हुआ था, जिसमें शिया और सुन्नी सम्प्रदायों के मतभेदों को दूर करने का प्रयास किया गया। सूफी शब्द की उत्पत्ति अरबी भाषा के सफा शब्द से हुई है – जिसका अर्थ है पवित्रता अर्थात् जो लोग आध्यात्मिक रूप से और आचार-विचार से पवित्र थे, वे सूफी कहलाए।सुफी बहुत उदार विचारों वाले थे। उन्होंने अपना जीवन मानव सेवा तथा इस्लाम धर्म के प्रचार के लिए समर्पित कर दिया। समय के व्यतीत होने के साथ-साथ सूफी मत 12 सिलसिलों या वर्गों में बँट गया। प्रत्येक सिलसिला एक पौर (गुरु) के अधीन होता था। वह बहुत पवित्र जीवन वाला व्यक्ति होता था। वह अपने शिष्यों के साथ जिनको मुरीद कहा जाता था, खानकाह (आश्रम) में रहता था। प्रत्येक पीर अपने मुरीदों में से एक वली या उत्तराधिकारी नियुक्त करता था ताकि उसके द्वारा प्रारंभ किये गये कार्यों को जारी रखा जा सके।

. कुछ प्रसिद्ध सूफी संत 

1. राविया (Rabia)– राबिया सूफी मत से संबंधित प्रथम प्रसिद्ध महिला संत थी। वह बसरा (इराक) की रहने वाली थी। उसने अपना बचपन अत्यंत कठिनाइयों में व्यतीत किया। उसने परमात्मा की प्रशंसा में अनेक छोटी कविताओं की रचना की।उसका विचार था कि यदि कोई व्यक्ति संपूर्ण संसार पर अधिकार कर ले तो भी वह अमीर नहीं बन सकता क्योंकि उसकी मृत्यु के साथ ही उसका धन भी नष्ट हो जाता है। राबिया की शिक्षाओं का लोगों के दिलों पर जादुई प्रभाव पड़ा। उसकी मृत्यु 801 ई० में हुई।

2. वयाजिद विस्तामी (Bayazid Bistami) बयाजिद बिस्तामी की गणना ईरान के प्रसिद्ध सूफ़ियों में की जाती है। बयाजिद विस्तामी ने अपने आपको खुदा में लीन अथवा फ़ना (Fana) करने का उपदेश दिया। इस सिद्धांत का लोगों के दिलों पर गहन प्रभाव पड़ा।

3. धुलनुन मिस्त्री (Dhulnun Misri) धुलनुन मिस्त्री मित्र का एक महान् सूफी संत था। वह काहिरा के सादून (Sadun) का शिष्य था।  उसने लोगों को मानवता के साथ प्रेम करने का संदेश दिया। आपकी मृत्यु 861 ई० में हुई। आप की कब्र पर जो मिस्र में है, आज भी बड़ी संख्या में लोग दर्शनों के लिए आते हैं।

4. मंसूर अल-हल्लाज़ (Mansur-al Hallaj) मंसूर अल-हल्लाज़ बग़दाद का एक प्रसिद्ध सूफी संत था।  उसने लोगों को सादा एवं पवित्र जीवन व्यतीत करने के लिए प्रेरित किया।  उसने अनेक कविताओं की रचना की। उसके विरोधियों ने 922 ई० में बगदाद में उसे मृत्यु दंड दे दिया।

5. इब्न अल-फ़रीद (Ibn-al-Farid) इब्न-अल-फ़रीद काहिरा का सर्वाधिक प्रसिद्ध सूफी संत एवं कवि था। उसने परमात्मा की उपासना में अनेक कविताओं की रचना की। इन्हें कसिदा (odes) कहा जाता है। 

सूफी मत की शिक्षाएँ 

1. अल्लाह एक है सूफ़ियों के अनुसार परमात्मा एक है जिसको वे अल्लाह कहते हैं। वह सर्वोच्च, शक्तिशाली तथा सर्वव्यापक है। 

 2. पूर्ण आत्म-त्याग ; अल्लाह के समक्ष पूर्ण आत्म-त्याग सूफी मत के प्रमुख सिद्धांतों में से एक है। उनके अनुसार प्रत्येक सूफ़ी को साँसारिक मोह-माया तथा अपनी इच्छाओं को मिटाकर स्वयं को अल्लाह के समक्ष समर्पित कर देना चाहिए। 

3. पीर सूफ़ी मत्त में पीर या गुरु को सर्वाधिक महत्त्व दिया जाता है। वह अपने मुरीदों की कहानी उन्नति पर पूर्ण दृष्टि रखता है, ताकि वे इस भवसागर से पार हो सकें तथा अल्लाह के साथ एक हो सकें। 

4. इबादत  —सूफ़ी अल्लाह की इबादत (पूजा) पर जोर देते हैं। उनके अनुसार मात्र अल्लाह को इबादत करने से ही मनुष्य इस संसार से मुक्ति प्राप्त कर सकता है। उनके अनुसार अल्लाह की इबादत नमाज द्वारा। रोजे रखकर, दान करके तथा मक्का की यात्रा करके की जा सकती है। मनुष्य को शुद्ध हृदय से अल्लाह की इबादत करनी चाहिए।

 5. नमाज  — सूफ़ियों के अनुसार नमाज पढ़ना मनुष्य का सर्वोत्तम कर्त्तव्य है। इसके द्वारा मनुष्य अपनी आत्मा की आवाज परमात्मा तक पहुँचा सकता है। ऐसी नमाज सच्चे हृदय से पढ़ी जानी चाहिए। अशुद्ध हृदय से पहों गयी नमाज को पूर्ण रूप से व्यर्थ बताया गया है तथा कुरान में ऐसे व्यक्ति की कड़े शब्दों में आलोचना की गई है।

6. रोजे रखना सूफी रोजे रखने में विश्वास रखते थे। ऐसा करने वाले व्यक्ति की आत्मा शुद्ध होती है। रोजा रखने से अभिप्राय मात्र खाने-पीने की वस्तुओं से परहेज करने को ही नहीं, बल्कि प्रत्येक प्रकार की बुराइयों से दूर रहने के लिए कहा गया है।

 7. दान  – संसार के समस्त धर्मों में दान देने के संबंध में प्रचार किया गया है, परंतु सूफ़ी धर्म वा ने इसको आवश्यक माना है। प्रत्येक व्यक्ति के लिए जिसकी अपनी आवश्यकता से अधिक आय है को कुछ भाग दान देना आवश्यक है। 

8. मक्का की यात्रा (:) मक्का की यात्रा करने को सूफी विशेष महत्त्व देते हैं। मान्य हृदय से की गई इस यात्रा से मनुष्य इस संसार से मुक्ति प्राप्त कर सकता है तथा उसके समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं।

 9. तरक-ए-दुनिया : प्रत्येक सूफी के लिए यह आवश्यक है कि वह इस संसार से लगाव का त्याग करे। कोई व्यक्ति जितना धन-संपदा, सुंदर स्त्री, पुत्रों तथा सरकारी नौकरियों आदि के चक्करों में फंसा रहेगा उतना ही वह उस अल्लाह से दूर होता चला जायेगा। 

 10. भक्ति संगीत ( सूफी भक्ति संगीत पर बहुत जोर देते हैं। उनका यह पूर्ण विश्वास है कि भक्ति संगीत मानवीय हृदयों में अल्लाह के प्रति प्रेम उत्पन्न करता है। इसके प्रभाव के कारण मनुष्य के बुरे विचार नष्ट हो जाते हैं तथा वह अल्लाह के समीप पहुँच जाता है। सूफ़ियों की धार्मिक संगीत सभाओं को समा कहा जाता है।

11. मानवता से प्रेम : मानवता की सेवा करना सूफ़ी अपना परम कर्त्तव्य मानते हैं। इससे संबंधित वे मनुष्यों के बीच किसी जाति-पाति, रंग या नस्ल आदि का भेदभाव नहीं करते। उनके अनुसार सभी मनुष्य एक ही अल्लाह की संतान हैं। इसलिए उनके बीच किसी प्रकार का भेदभाव करना उस सर्वोच्च अल्लाह का अपमान करना है।

 

साहित्य का विकास

1.-अबू अली सिना:-अबू अली सीना मध्य काल अरब का एक महान् दार्शनिक एवं चिकित्सक था।उसका जन्म 980 ई० में बुखारा में हुआ था।उनकी विश्वविख्यात किताब का नाम क़ानून है। यह किताब मध्यपूर्व जगत में मेडिकल सांइस की सबसे ज़्यादा प्रभावी और पढ़ी जाने वाली किताब है। इस प्रकार अपने समय के प्रसिद्ध चिकित्सक थे। अबू अली सीना न केवल नास्तिक चिकित्सकों और दार्शनिकों में सबसे आगे हैं बल्कि पश्चिम में शताब्दियों तक वे चिकित्सकों के सरदार के रूप मे प्रसिद्ध रहे।

2. अबू नुवास  अबू नुवास खलीफ़ा हारुन-अल-रशीद का प्रसिद्ध दरबारी कवि था। दरबारी जीवन पर अनेक कविताएँ लिखीं। उसने शराब एवं प्रेम जैसे नए विषयों को हुआ। उसकी कविताओं ईरानी कवियों की छाप देखी जा सकती है। उसे आधुनिक अरबी कविता का एक महान् कवि माना जाता है

3. रुदकी — रुदकी समानी दरबार का एक महान कवि था। उसे नयी फ़ारसी कविता का माना जाता है। वह प्रथम कवि था जिसने गजल  एवं स्वाइयाँ  लिखीं। रुबाई पंक्तियों वाले छंद को कहते हैं। इसका प्रयोग प्रियतम के सौंदर्य का वर्णन करने, संरक्षक की प्रशंसा करने से दार्शनिक विचारों का वर्णन करने के लिए किया जाता है। रुदकी ने शराब पर भी कुछ कविताएँ लिखीं।

4. उमर खय्याम --उमर खय्याम एक महान् कवि, खगोल वैज्ञानिक एवं गणितज्ञ में उसका जन्म 1048 ई० में निशापुर (Nishapur) जो कि सल्जुक साम्राज्य की राजधानी था, में हुआ। उमरखय्याम  की गणना विश्व के प्रसिद्ध फ़ारसी कवियों में की जाती है। उसकी रुबाइयों ने लोगों के दिलों पर जादुई प्रभाव छोड़ा। इसी कारण आज विश्व की अनेक भाषाओं में उसकी रुबाइयों का अनुवाद किया जा चुका है। उसने राष्टि एवं खगोल विज्ञान के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। उसने रिसाला (Risala) नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की स्वर की। उमर खय्याम के विभिन्न क्षेत्रों में दिए गए प्रशंसनीय योगदान के कारण उसे ठीक ही फारस का वाल्या कहा जाता है।

5. फिरदौसी (Firdausi) – फिरदौसी महमूद गजनवी का सर्वाधिक प्रसिद्ध फ़ारसी का दरबारी कवि था। उसका जन्म 950 ई० में खुरासान में हुआ था। उसने 30 वर्ष की अथक मेहनत के पश्चात् शाहनामा (Shahnama) नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की। इसमें 60,000 पद दिए गए हैं। इसे इस्लामी साहित्य की एक सर्वश्रेष्ठ कृति माना जाता है। इसमें प्रारंभ से लेकर अरबों की विजय तक ईरान के इतिहास का काव्यात्मक शैली में वर्णन किया गया है। इसमें रुसतम की प्रसिद्ध कहानी का वर्णन किया गया है। इस ग्रंथ में महमूद गजनवी के जीवन पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है। ईरानी कवियों की छाप देखी जा सकती है। उसे आधुनिक अरबी कविता का एक महान् कवि माना जाता है


 

6. इब्न अल-मुक्फ्फा (Ibn-al Muqaffa)- इब्न-अल-मुक्फ्फा अरबी का एक प्रसिद्ध लेखक था। उसने कलीला व दिमना (Kalila wa-Dimna) नामक पुस्तक का पहलवी से अरबी में अनुवाद किया। यह मूल रूप से संस्कृत की प्रसिद्ध पुस्तक पंचतंत्र (Panchatantra) का अनुवाद है। कलीला व दिमना दो गीदड़ों के नाम थे। इस पुस्तक में जानवरों की कहानियों का संग्रह है। इसके अतिरिक्त लेखक ने तहदीब-अल-अखलाक (Tabdhib al-Akhlaq) नामक पुस्तक की रचना की। 

7. एक हजार एक रातें (The Thousand and One Nights) यह अनेक प्रसिद्ध कहानियों का संग्रह है। इन कहानियों को अनेक लेखकों द्वारा विभिन्न समयों में लिखा गया था। यह संग्रह मूल रूप से भारतीय फ़ारसी भाषा में था। दसवीं शताब्दी में इसका अनुवाद आबी भाषा में बगदाद में किया गया था। इन कहानियों को शहरसाद (Shahzad) द्वारा अपने पति को हरेक रात को एक-एक करके सुनाया गया था। इस कारण इस संग्रह को अरबी रातें (The Arabian Nights) के नाम से भी जाना जाता है। बाद में मामलुक काल में इसमें और कहानियाँ जोड़ दी गईं। इन कहानियों को मनुष्य को शिक्षा देने एवं मनोरंजन करने के उद्देश्य से लिखा गया था। ये कहानियाँ अरबी साहित्य में प्रमुख स्थान रखती हैं।

 

8. अल-जहीज़ (Al-Jahiz)- अल-जहीज बसरा का एक प्रसिद्ध लेखक था। वह यूनानी दर्शन से बहुत प्रभावित था। उसने विभिन्न विषयों पर अनेक पुस्तकें लिखीं। इन पुस्तकों में किताब-अल-बुखाला (Kitab-al Bukhala) एवं किताब-अल-हैवान (Kitab-al-Hayawan) सर्वाधिक प्रसिद्ध थीं। प्रथम पुस्तक में कंजूसों को कहानियाँ दी गई हैं तथा लालच के बारे में बताया गया है। द्वितीय पुस्तक में जानवरों की कहानियाँ दी गई हैं। इसके अतिरिक्त इसमें अरबी परंपराओं एवं अंधविश्वासों का वर्णन किया गया है। अल-जहीज़ के लेखों ने आने वाले लेखकों पर गहन प्रभाव डाला है।

 

9. बालाधुरी : वालाधुरी 9वीं शताब्दी का अरबी भाषा का एक प्रसिद्ध लेखक था। उसने दो प्रसिद्ध पुस्तकों अनसब-अल-अशरफ (Ansab-al-Ashraf) एवं फुतुह-अल-बुलदन (Futub-al-Buldan) की

 

रचना की। अनसव-अल-अशरफ में उस समय के गणमान्य सामंतों की वंशावलियों (genealogies of the importan nobles) का वर्णन किया गया है। उसकी दूसरी पुस्तक फुतुह-अल-बुलंदन में अरबों द्वारा विभिन्न शहरों एवं प्रदेश की विजयों पर महत्वपूर्ण प्रकाश डाला गया है। ऐतिहासिक पक्ष से इसे एक अमूल्य कृति माना जाता है।"

 

10. तावरी (Tabari)—–ताबरी की गणना अरब के महान इतिहासकारों में की जाती है। उसकी तारीख रसूल वल मुलुक (Tarikh-al-Rasul Wal Muluk) एक अमर रचना है। इसमें उसने संसार को रचना से लेक ई० तक समूचे मानव इतिहास का वर्णन किया है। इसमें उसने इस्लामी धर्म प्रचारकों एवं राजाओं के इतिहास 915 का विशेष वर्णन किया है। इस पुस्तक के स्रोतों को प्राप्त करने के उद्देश्य से ताबरी ने ईरान, इराक, सीरिया एवं मिस्र की यात्रा की। तावरी ने अपनी पुस्तक में क्रमानुसार घटनाओं का वर्णन किया है। इसे अरबी इतिहास की सबसे प्रमाणिक पुस्तक माना जाता है। यह पुस्तक आने वाले इतिहासकारों के लिए प्रेरणा का एक प्रमुख स्रोत रही। इसका अंग्रेजी में 38 खंडों में अनुवाद किया गया है।

 

11. मुकदसी (Muqadassi) मुकदसी दसवीं शताब्दी का एक महान् लेखक एवं यात्री था। वह जेरुसलम (Jerusalem) का निवासी था। उसने विश्व के अनेक देशों की यात्रा की थी। उसने अहसान-अल-तकसीम (Ahsan-al-Taqasim) नामक एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक की रचना की। इसमें लेखक ने विश्व के विभिन्न देशों के भूगोल के संबंध में विस्तृत प्रकाश डाला है। निस्संदेह यह एक बहुमूल्य रचना है।

 

12. मसूदी (Masudi) मसूदी दसवीं शताब्दी का एक अन्य महान् लेखक था। वह बगदाद का निवासी था। वह प्रथम ऐसा लेखक था जिसने इतिहास के साथ भूगोल का वर्णन किया है। उसके द्वारा 943 ई० में लिखी गई पुस्तक मुरुज-अल-थाहाब (Muruj-al-Dhahab) बहुत लोकप्रिय हुई। इसे स्वर्णिम घासस्थली (The Golden Meadows) के नाम से भी जाना जाता है। वास्तव में मसूदी ने इतिहास को एक नई दिशा देने में उल्लेखनीय योगदान दिया। इससे आने वाले इतिहासकारों को एक नई प्रेरणा मिली। उसे ठीक ही अरबों का हैरोडोटस (Herodotus of the Arabs) कहा जाता है।

 

13. अल्यरुनी (Alberuni) अल्बरुनी ग्यारहवीं शताब्दी का एक महान् विद्वान् एवं इतिहासकार था। उसका जन्म 973 ई० में खीवा (Khiva) में हुआ था। उसने खगोल विज्ञान, गणित, भूगोल, दर्शन, इतिहास एवं धर्म का गहन अध्ययन किया था। जब महमूद गजनवी ने 1017 ई० में खोवा पर विजय प्राप्त की तो अल्बरुनी को बंदी बना लिया गया। अल्बरुनी को गजनी लाया गया। उसकी प्रतिभा से प्रभावित होकर महमूद गजनवी ने उसे अपने दरबार का रत्न बनाया। वह महमूद गजनवी के भारतीय आक्रमणों के समय उसके साथ भारत आया। भारत में उसने जो कुछ अपनी आँखों से देखा उसके आधार पर उसने एक बहुमूल्य पुस्तक तहकीक-मा-लिल हिंद (Tahqiq tha-lil Hind) की रचना की। इसे तारीख-ए-हिंद (Tankh-i-Hind) के नाम से भी जाना जाता है। इसे अरबी भाषा में लिखा गया था। यह 11वीं शताब्दी के भारतीय इतिहास को जानने के लिए हमारा एक विश्वसनीय एवं प्रमाणिक स्त्रोत हैं। उसके इस बहुमूल्य योगदान के कारण भारतीय इतिहास में उसे सदैव स्मरण किया जाता रहेगा।

 *धर्म युद्ध*

: उत्तर-(i) अरबों द्वारा जेरुसलम पर अधिकार- जेरुसलम ईसा मसीह के जीवन से संबंधित था। इसलिए ईसाइयों के लिए बहुत पवित्र भूमि थी। इसका ईसाइयों के लिए वही स्थान है जो मुसलमानों के लिए मक्का का एवं सिखों के लिए अमृतसर का है। उस समय जेरुसलम पर बाइजेंटाइन साम्राज्य का अधिकार था। 638 ई० में अरबों ने जेरुसलम पर अधिकार कर लिया था। ईसाइयों के लिए इसे सहन करना कठिन था। अतः वे इसे वापस प्राप्त करने के लिए किसी स्वर्ण अवसर की तलाश में थे।


 

(i) सल्जुक तुर्की के ईसाइयों पर अत्याचार-सल्जुक तुर्कों ने 1071 ई० में जेरुसलम पर अपना अधिकार कर लिया था। वे कट्टर सुन्नी मुसलमान थे। अतः वे अपने साम्राज्य में ईसाई धर्म की उन्नति को सहन नहीं कर सकते थे। अतः उन्होंने ईसाइयों पर घोर अत्याचार शुरू कर दिए। जेरुसलम में रहने वाले ईसाइयों पर अनेक प्रकार के प्रतिबंध लगा दिए गए। मुसलमान जब चाहते ईसाइयों के घरों को लूट लेते एवं उन्हें अग्नि भेंट कर देते। ईसाइयों को तलवार के बल पर इस्लाम धर्म में सम्मिलित किया जाता। इस्लाम धर्म स्वीकार न करने वाले ईसाइयों को अनेक प्रकार के कर देने के लिए बाध्य किया गया। इसने स्थिति को विस्फोटक बना दिया।

 

(iii) तात्कालिक कारण ईसाइयों का खून मुसलमानों से बदला लेने के लिए खौल रहा था। वास्तव में युद्ध के लिए बारूद पूर्ण रूप से तैयार था। उसे केवल एक चिंगारी दिखाने की आवश्यकता थी। 1092 ई० में सल्जुक सुलतान मलिक शाह की मृत्यु के पश्चात् उसके साम्राज्य का विखंडन आरंभ हो गया। बाइजेंटाइन सम्राट् एलोक्सियस प्रथम ने यह स्वर्ण अवसर देख कर जेरुसलम एवं अन्य क्षेत्रों पर अधिकार करने की योजना बनाई। इस उद्देश्य से उसने अपने पोप अर्बन द्वितीय को सहयोग देने की अपील की। पोप अर्बन द्वितीय इसके लिए तुरंत तैयार हो गया। ऐसा करके वह अपने प्रभाव में वृद्धि करना चाहता था। उसने 26 नवंबर, 1095 ई० को फ्राँस के क्लेयरमांट नामक नगर में एक विशाल जनसभा का आयोजन किया। इसमें उसने ईसाइयों के उत्पीड़न एवं फिलीस्तान की दुर्दशा का उल्लेख किया। उसने ईसा मसीह के पवित्र स्थान जेरुसलम की रक्षा के लिए समस्त ईसाइयों को धर्मयुद्ध में सम्मिलित होने के लिए प्रेरित किया।

 

प्रश्न . प्रथम धर्मयुद्ध पर एक संक्षिप्त नोट लिखो।

 उत्तर- प्रथम धर्मयुद्ध का आरंभ 1096 ई० में हुआ। पोप अर्बन द्वितीय के भाषण से उत्तेजित होकर लगभग 70 हजार धर्मयोद्धा पीटर दा हरमिट के नेतृत्व में जेरुसलम को मुसलमानों से मुक्त कराने के लिए चल पड़े। सम्राट् आलेक्सियस प्रथम ने उन्हें धैर्य से काम लेने तथा सैनिकों के वहाँ पहुँचने तक इंतजार करने के लिए कहा। किंतु: इन धर्मयोद्धाओं ने जो धार्मिक जोश से प्रेरित थे, इस परामर्श को ठुकरा दिया। इन धर्मयोद्धाओं ने कुस्तुनतुनिया क आक्रमण कर वहाँ लूटमार आरंभ कर दी। तुर्क मुसलमानों ने जो कि अत्यधिक संगठित थे, ने अधिकांश धर्मयोद्धाओं को मौत के घाट उतार दिया। इस घटना से धर्मयोद्धाओं के प्रोत्साहन में कोई कमी नहीं आई। जर्मनी एवं इटली के शासकों ने एक विशाल सेना गॉडफ्रे के नेतृत्व में जेरुसलम की ओर रवाना की। इन सैनिकों ने एडेस्सा एवं ऍटीओक पर अधिकार कर लिया। उन्होंने 15 जुलाई, 1099 ई० में जेरुसलम पर अधिकार को लिया। निस्संदेह यह उनको सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण सफलता थी। जेरुसलम पर अधिकार करने के पश्चात् धर्मयोद्धाओं ने बड़ी संख्या में मुसलमानों को मौत के घाट उतार दिया। इसके साथ ही प्रथम धर्मयुद्ध का अंत हो गया।

 

प्रश्न  यूरोप व एशिया पर धर्मयुद्धों का क्या प्रभाव पड़ा

(i) धर्मयुद्धों के कारण पोप की प्रतिष्ठा एवं गौरव में बहुत वृद्धि हुई। जर्मनी, फ्राँस, इंग्लैंड एवं हंगरी आदि के शासक पोप के निर्देशों का पालन करने के लिए सदैव तैयार रहते थे। परिणामस्वरूप दो शताब्दियों तक पीए ने यूरोप की राजनीति में प्रमुख भूमिका निभाई।

 (ii) धर्मयुद्धों के कारण सामंतों की शक्ति का पतन हुआ एवं राजाओं की शक्ति में वृद्धि हुई। 

(iii) धर्मयुद्धों के सफल संचालन के लिए लोगों ने दिल खोल कर चर्च को दान दिए। इस कारण चर्चा के पास अपार दौलत एकत्र हो गई। इस धन के चलते धीरे-धीरे चर्चा में भ्रष्टाचार फैल गया।

 (iv) धर्मयुद्धों के दौरान मुसलमानों एवं ईसाइयों ने एक-दूसरे के क्षेत्रों में भारी लूटमार की। इससे दोनों समुदायों के मध्य नफ़रत की भावना फैली। 

(v) धर्मयुद्धों में यूरोपीय स्त्रियों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस कारण उनकी स्थिति में सुधार आया एवं उनका दृष्टिकोण विशाल हुआ। 

(vi) धर्मयुद्धों के कारण सामंतों के प्रभाव में कमी आई। इससे लोगों को उनके अत्याचारों से राहत मिली। 

(vii) धर्मयुद्धों के कारण यूरोपियों के ज्ञान में बहुत वृद्धि हुई। वे मुस्लिम नगरों एवं विज्ञान के क्षेत्रों में हुई प्रगति को देखकर चकित रह गए।

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