: बाबर के आक्रमण के पूर्व
का भारत
16 वीं शताब्दी के आरंभ में बाबर के आक्रमण के समय भारत की राजनीतिक दशा बड़ी शोचनीय थी । उस समय भारत अनेक छोटे - छोटे राज्यों में विभाजित था । इन राज्यों में एकता की कमी थी और उनमें सत्ता के लिए परस्पर लड़ाइयाँ चलती रहती थीं । उस समय दिल्ली उत्तरी भारत का सबसे प्रसिद्ध राज्य था । इस पर इब्राहिम लोदी का शासन था । उसने अपनी नीतियों द्वारा अफ़गान सरदारों को अपना विरोधी बना लिया था । अतः वे उससे अपने अपमान का बदला लेने के लिए किसी स्वर्ण अवसर की तलाश में थे । पंजाब का सूबेदार दौलत खाँ लोदी स्वतंत्र होने के स्वप्न देख रहा था । अतः उसने बाबर को भारत पर आक्रमण का निमंत्रण दिया । बंगाल में उस समय नुसरत शाह हुसैन का शासन था । वह एक मह महत्त्वपूर्ण मुगल दरबार शासक था । उस समय मालवा में महमूद ख़लजी द्वितीय का शासन था । वह एक नाममात्र का शासक था । राज्य की वास्तविक शक्ति मेदनी राव के हाथ में थी । उस समय उत्तरी भारत का सबसे प्रसिद्ध राज्य मेवाड़ था । उस समय यहाँ राणा साँगा का शासन स्थापित हुआ । वह एक महान् योद्धा था । 1526 ई ० में गुजरात में बहादुर शाह का शासन स्थापित हुआ । वह एक सफल शासक सिद्ध हुआ । उस समय दक्षिण भारत में दो शक्तिशाली राज्य - बहमनी एवं विजयनगर थे । उस समय पुर्तगाली दक्षिणी भारत में एक शक्ति के रूप में उभर रहे थे ।
बाबर
बाबर का जन्म मध्य एशिया
में स्थित फरगना की राजधानी अंदीजान में 14 फरवरी, 1483 ई० को हुआ। उसका पिता उम्र शेख मिजजा, फरगना की छोटी-सी रियासत का
शासक था। बाबर का पिता तैमूर वंश से संबंध रखता था।1494 ई० में बाबर अपने पिता
की मृत्यु के पश्चात् फरगना का शासक बना । उस समय उसकी आयु केवल 11 वर्ष की थी। 1497 ई० में बाबर ने
अपने पूर्वज तैमूर की राजधानी समरकंद पर विजय प्राप्त की । परंतु बाबर को शीघ्र ही समरकंद को छोड़ना पड़ा
क्योंकि उसकी अनुपस्थिति में उज़बेकों,
जो मध्य एशिया की एक लड़ाकू जाति थी, ने फरगना पर अधिकार कर लिया
था। उज़बेकों का प्रधान शैबानी खाँ था। शीघ्र ही बाबर समरकंद से भी हाथ धो बैठा। 1501 ई० में बाबर ने शैबानी
खाँ को पराजित कर पुन: समरकंद पर अधिकार कर लिया परंतु इस बार भी उसको ৪ महीनों के पश्चात् समरकंद को छोड़ना पड़ा। 1504 ई० में बाबर
ने काबुल पर विजय प्राप्त की । 1510 ई० में शैबानी खाँ ईरान के सफ़ावी वंश के
शासक शाह इस्माइल से लड़ते हुए मारा गया। 1511 ई० में बाबर ने शाह इस्माइल के सहयोग से समरकंद पर तीसरी
बार अधिकार किया। 1513 ई० में उज़बेकों ने पुनः समरकंद पर अधिकार कर लिया। 1519 ई० तक बाबर ने काबुल
में अपनी शक्ति को संगठित करने में समय व्यतीत किया। इसके पश्चात् उसने भारत को जीतने की ओर अपना ध्यान
दिया क्योंकि उस समय भारत की राजनीतिक स्थिति बहुत दयनीय थी ।
बाबर की विजयें
1 पानीपत की प्रथम लडाई 1526 ई०
2 कनवाह की लडाई1527ई०
3 चंदेरी की लडाई 1528ई०
4 घाघरा की लडाई 1529ई०
I. पानीपत की प्रथम लड़ाई के कारण
बाबर काबुल का शासक था । वह अपने राज्य का विस्तार करना चाहता था । इसके अतिरिक्त वह भारत से अपार दौलत प्राप्त करना चाहता था । उस समय दिल्ली में इब्राहीम लोदी सिंहासनारुढ़ था । वह एक क्रूर एवं अभिमानी शासक था । अतः उसके अनेक सरदारों ने विवश होकर अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी थी । इसके चलते इब्राहीम लोदी एक शक्तिविहिन शासक बन कर रह गया था । यहाँ तक कि इब्राहीम लोदी का चाचा आलम ख़ाँ एवं पंजाब का सूबेदार दौलत ख़ाँ लोदी भी स्वतंत्र होने की योजनाएँ बनाने लगे । बाबर किसी ऐसे ही स्वर्ण अवसर की प्रतीक्षा में था । बाबर ने 1524 ई ० में पंजाब पर अधिकार कर लिया । बाबर ने दौलत ख़ाँ लोदी के सहयोग से प्रसन्न होकर उसको जालंधर दोआब तथा दीपालपुर के क्षेत्र दे दिए । इस कारण दौलत ख़ाँ लोदी को बहुत निराशा हुई । वह तो पूरे पंजाब का स्वतंत्र शासक बनना चाहता था । इसलिए उसने बाबर के काबुल लौटने के पश्चात् पूरे पंजाब पर अधिकार कर लिया । बाबर इस बात का दौलत ख़ाँ लोदी से बदला लेना चाहता था । इसलिए उसने नवंबर 1525 ई ० में भारत पर पाँचवीं बार आक्रमण किया । इस आक्रमण में उसने सर्वप्रथम दौलत ख़ाँ लोदी को पराजित करके पूरे पंजाब को अपने अधीन कर लिया । इस विजय से प्रोत्साहन पाकर बाबर ने इब्राहीम लोदी के साथ निपटने का निर्णय किया । इस उद्देश्य से उसने अपनी सेनाओं को दिल्ली की ओर कूच करने का आदेश दिया ।
II . घटनाएँ
बाबर की सेनाएँ तीव्रता से दिल्ली की ओर बढ़ रही थीं । इसकी सूचना मिलते ही इब्राहीम लोदी भी अपने एक लाख सैनिकों के साथ बाबर का मुकाबला करने के लिए दिल्ली से चल पड़ा । इस समय बाबर के पास केवल 8 हजार से लेकर 20 सैनिक थे । दोनों की सेनाएँ 12 अप्रैल , 1526 ई ० में पानीपत के मैदान में पहुंच गई । दोनों ओर से किसी ने भी एक - दूसरे पर एक सप्ताह तक आक्रमण करने का साहस नहीं किया । बाबर ने यह समय अपने सुरक्षा प्रबंधों को मज़बूत करने में लगाया । 21 अप्रैल , 1526 ई ० को बाबर ने इब्राहीम लोदी की सेनाओं पर ज़बरदस्त आक्रमण कर दिया । इब्राहीम लोदी के हाथियों ने भयभीत होकर पीछे की ओर भागना शुरू कर दिया । इस लड़ाई में इब्राहीम लोदी मारा गया अतः उसकी सेना में भगदड़ मच गई । लगभग 15,000 अफ़गान सैनिक मारे गए । बाबर की सेनाओं ने दिल्ली पर विजय प्राप्त कर ली । बाबर ने शीघ्र पश्चात् आगरा पर अधिकार कर लिया ।
III . परिणाम
पानीपत की प्रथम लड़ाई के निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण परिणाम निकले
( 1 ) लोदी वंश का अंत- पानीपत की लड़ाई एक निर्णायक लड़ाई थी । इसमें लोदी वंश का अंतिम सुल्तान इब्राहीम लोदी मारा गया । इस प्रकार भारत में लोदी वंश का अंत हो गया ।
( i i) मुग़ल वंश की स्थापना- पानीपत की प्रथम लड़ाई में विजय के कारण भारत साम्राज्य की स्थापना हुई । इससे भारत में एक नये युग का आरंभ हुआ ।
( ii i) बाबर का प्रोत्साहन - पानीपत की प्रथम लड़ाई में विजय के कारण बाबर तथा उसकी सेनाओं का प्रोत्साहन बहुत बढ़ गया । अब उन्होंने भारत के अन्य भागों को अपने अधीन करने का निर्णय किया ।
( iv ) युद्ध प्रणाली में परिवर्तन - बाबर से पूर्व भारत में तोपखाने का प्रयोग नहीं किया जाता था । इस युद्ध के पश्चात् तोपखाना युद्ध का आवश्यक भाग बन गया । इस तरह बाबर ने भारत की युद्ध प्रणाली में परिवर्तन किया । ( v) मुग़लों तथा राजपूतों के मध्य युद्ध अनिवार्य हो गया- पानीपत की विजय के पश्चात् मुग़लों तथा राजपूतों के मध्य युद्ध अनिवार्य हो गया । इसका कारण यह था कि राजपूतों का राणा साँगा दिल्ली पर अपना अधिकार करना चाहता था ।
IV . बाबर की विजय के कारण
पानीपत की प्रथम लड़ाई में बाबर की विजय के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे
( i ) दिल्ली का सुल्तान इब्राहीम लोदी अपने क्रूर व्यवहार एवं अत्याचारों के कारण अपने सरदारों तथा प्रजा में बहुत बदनाम था । वे ऐसे शासक से छुटकारा पाना चाहते थे । इब्राहीम लोदी की सेना भी बहुत निर्बल थी । अधिकाँश सैनिक लूटमार के उद्देश्य से एकत्र हुए थे । उनके युद्ध करने के ढंग पुराने थे और उनमें योजना का अभाव था ।
( ii ) इब्राहीम लोदी ने पानीपत में 8 दिनों तक बाबर की सेना पर आक्रमण न करके भारी राजनीतिक भूल की । बाबर एक योग्य सेनापति था । उसका मुकाबला करना कोई सहज कार्य न था । बाबर द्वारा तोपखाने के प्रयोग ने रणक्षेत्र में तबाही मचा दी ।

हुमायूँ
1530 ई ० में बाबर की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र नसीरुद्दीन मुहम्मद हुमायूँ 23 वर्ष की आयु में दिल्ली की राजगद्दी पर बैठा । उसे आंतरिक तथा बाह्य दोनों प्रकार की बहुत - सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा
I) प्रशासन अभी सुदृढ़ नहीं हुआ था ।
( ii ) वित्तीय स्थिति कमज़ोर थी । ( iii ) अफ़गानों को अभी अधीन नहीं किया गया था । वे अभी भी मुग़लों को भारत से निकालने की उम्मीद रखते थे ।
( iv ) हुमायूँ के संबंधियों ने उसकी विरोधता व्यवहार अपनाया हुआ था ।
( V ) यहाँ तक कि उसके भाई कामरान , असकरी तथा हिंदाल भी उसके प्रति वफ़ादार वरह तथा उसके जीवन में प्रत्येक पल कठिनाइयाँ पैदा करते रहे । हुमायूँ ने अपनी दयालुता के कारण उनके प्रति कोई कदम न उठाया । ( vi ) हुमायूँ को दो बाह्य शत्रुओं का सामना भी करना पड़ा - गुजरात का बहादुर शाह तथा बिहार का कर खाँ ( बाद में शेरशाह सूरी ) । हुमायूँ को 1540 ई ० में शेरशाह सूरी ने पराजित करके भारत में से निकाल दिया था । परंतु हुमायूँ ने शेरशाह सूरी के उत्तराधिकारी सिकंदर शाह सूरी को 1555 ई ० में पराजित करके पुनः दिल्ली पर अधिकार कर लिया था । जनवरी , 1556 ई ० में हुमायूँ की अचानक मृत्यु हो गई । हुमायूँ के बारे में यह कहावत प्रसिद्ध है कि वह जीवन भर लड़खड़ाता रहा और लड़खड़ाता ही मर गया ।
1. हुमायूँ तथा बहादुर शाह का संघर्ष
- बहादुर शाह गुजरात का शक्तिशाली शासक था । उसने कई क्षेत्रों को अपने अधीन करके अपनी स्थिति को बहुत मजबूत कर लिया था । अब उसने दिल्ली की गद्दी पर बैठने का स्वप्न देखना शुरू कर दिया था । इस उद्देश्य से उसने हुमायूँ के विरोधियों को अपने राज्य में शरण देनी शुरू कर दी थी । 1535 ई ० में उसने बहुत चतुराई से चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया था । बहादुर शाह के चित्तौड़ के आक्रमण के समय राजपूतों ने हुमायूँ से सहायता माँगी थी , परंतु हुमायूँ ने उनको सहायता न देकर एक बड़ी भूल की , परंतु जब बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर विजय पा ली तो हुमायूँ ने उसके साथ मुकाबला करने का निर्णय किया । उसने मंदसौर के स्थान पर बहादुर शाह को पराजित किया । बहादुर शाह भाग कर मालवा की राजधानी माँडू चला गया । हुमायूँ ने उसका पीछा किया तथा मालवा को अपने अधिकार में ले लिया । यहाँ से बहादुर शाह गुजरात चला गया । यहाँ भी हुमायूँ ने बहादुर शाह को पहले चंपानेर से और फिर कैबे से भगा दिया । बहादुर शाह ने दियू में जाकर पुर्तगालियों की शरण ली । हुमायूँ ने बहादुर शाह का पीछा न करके एक अन्य राजनीतिक भूल की । इसी समय मालवा में विद्रोह हो जाने के कारण हुमायूँ ने गुजरात का शासन प्रबंध अपने भाई असकरी को सौंप दिया । अयोग्य होने के कारण असकरी गुजरात का शासन प्रबंध अच्छी तरह न चला सका । ऐसी स्थिति से लाभ उठाकर बहादुर शाह ने असकरी को गुजरात से भगा दिया तथा गुजरात पर अधिकार कर लिया । पूर्व में शेर खाँ की बढ़ती हुई शक्ति को रोकने के लिए हुमायूँ को मालवा छोड़ना पड़ा । इस तरह मालवा भी मुगलों के हाथों से जाता रहा । इस तरह हम देखते हैं कि एक वर्ष में ही गुजरात जितनी आसानी से हुमायूँ के हाथ में आया था उतनी ही आसानी से उसके हाथ से निकल भी गया ।
2. हुमायूँ तथा शेर खाँ का संघर्ष - पूर्व में शेर खाँ हुमायूँ के लिए एक बड़ा ख़तरा बन रहा था । 1533-36 ई ० के समय दौरान शेर खाँ ने अपनी शक्ति में बहुत वृद्धि कर ली थी । उसने बिहार में अपनी स्थिति को मज़बूत करने के पश्चात् 1536 ई ० में बंगाल पर भी अधिकार कर लिया था । इस कारण हुमायूँ को अपने लिए एक बड़ा ख़तरा अनुभव हुआ । इसलिए हुमायूँ ने शेर खाँ के साथ टक्कर लेने का निर्णय किया । हुमायूँ ने पहले चुनार के किले को घेरा । अपने कुशल तोपची रूमी खाँ के प्रयासों के बावजूद इसे 6 महीने के घेराव के बाद जुलाई , 1537 ई ० में विजित किया जा सका । अब हुमायूँ ने बंगाल की ओर बढ़ना शुरू कर दिया । शेर खाँ बहुत चतुर था । उसने इस आक्रमण से पूर्व ही अपने सारे धन एवं परिवार को बंगाल से रोहतास गढ़ भेज दिया था । इसके अतिरिक्त उसने गौड़ ( बंगाल की राजधानी ) के महलों में भारी मात्रा में शराब रखवा दी । हुमायूँ ने बड़ी आसानी से बंगाल पर अधिकार कर लिया । हुमायूँ इस विजय की प्रसन्नता के कारण रंगरलियों में डूब गया । उसने गौड़ का नाम बदल कर जन्नताबाद रख दिया । शेर खाँ इस स्वर्ण अवसर की तलाश में था । उसने अपनी तैयारियां पूर्ण करके बंगाल को चारों ओर से घेर लिया । जब हुमायूँ को इस भूल का एहसास हुआ तो उसने बंगाल में से निकलने का प्रयास किया । शेर खाँ की सेनाओं ने उसका पीछा किया । जून , 1539 ई ० को चौसा के स्थान पर इन दोनों के मध्य लड़ाई हुई । इस लड़ाई में हुमायूँ की सेनाएँ बुरी तरह पराजित हुईं । हुमायूँ बहुत मुश्किल से अपने आपको बचा सका । शेर खाँ ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की तथा उसने शेरशाह की उपाधि धारण की । इसके पश्चात् उसने एक विशाल सेना के साथ हुमायूँ की सेना पर मई , 1540 ई ० में कन्नौज के स्थान पर आक्रमण कर दिया । इस लड़ाई में हुमायूँ की कड़ी पराजय हुई । परिणामस्वरूप हुमायूँ को भारत छोड़ना पड़ा ।
: हुमायूँ को भारत क्यों छोड़ना पड़ा ?
हुमायूँ ने गद्दी पर बैठते ही अपने राज्य के महत्त्वपूर्ण क्षेत्र अपने भाइयों कामरान , असकरी तथा हिंदाल में बाँट दिए थे । इस विभाजन के कारण राज्य के लिए बहुत विनाशकारी परिणाम निकले । हुमायूँ अपने दयालु स्वभाव के कारण अपने भाइयों को क्षमा कर देता था , परंतु उन्होंने अपनी राज्य विरोधी कार्यवाहियाँ जारी रखीं । हुमायूँ को जश्न मनाने , शराब पीने एवं अफ़ीम खाने का बहुत शौक था । रंगरलियों में मस्त रहने के कारण वह कोई भी कार्य नहीं कर सकता था । वह बिना किसी योजना के कार्य करता था । हुमायूँ ने बहादुर शाह के विरुद्ध राजपूतों की सहायता न करके , बहादुर शाह के विरुद्ध अपनी कार्यवाही पूरी न करके , असकरी को गुजरात का गवर्नर नियुक्त करके और शेर खाँ के विरुद्ध समय पर कार्यवाही न करके अपनी स्थिति को स्वयं खराब कर दिया । इन गलतियों के कारण हुमायूँ को भारत छोड़ना पड़ा ।

शेरशाह सूरी
भारतीय इतिहास में शेर शाह सुरी का नाम बहुत प्रसिद्ध है उसका प्रारंभिक नाम फरीद था तथा वह एक जागीरदार हसन खान का पुत्र था वह अपनी वीरता तथा योग्यता के कारण दिल्ली की गद्दी पर जा बैठा था
शेरशाह सूरी का शासन प्रबंध भारतीय इतिहास में शेर शाह सुरी का नाम बहुत प्रसिद्ध है द्वितीय अफगान राज्य की स्थापना का श्रेय शेरशाह सूरी को जाता ।उसने 1540 ईस्वी से 1545 ईस्वी तक शासन किया ।शेरशाह सूरी ना केवल एक महान विजेता था अपितु एक योग्य शासन प्रबंधक भी था उसका नाम भारतीय इतिहास में उस द्वारा शासन प्रबंध में किए गए प्रशासनिक सुधारों के लिए बहुत प्रसिद्ध था।
शेरशाह सूरी की विजये शेरशाह सूरी ने 1540 ईसवी से 1545तक शासन किया उसने अपने छोटे से शासनकाल में कई क्षेत्रों को अपने अधीन कर लिया था
उसकी मुख्य विजयों में ,,,,, पंजाब की विजय 1541 ईस्वी पंजाब में हुमायूं के भाई कामरान का राज था ।जब शेर शाह सुरी पंजाब की ओर बढ़ा तो कामरान बिना युद्ध किए ही भाग गया इस तरह से उसने पंजाब में अपना अधिकार कर लिया।
मालवा की विजय भी उसने आसानी से कर ली । इस मे मलू खान का राज था उसने शेर शाह सुरी को मुगलों के विरुद्ध सहायता देने का वचन दिया था परंतु आवश्यकता पड़ने पर उसने वह सहायता न की। परिणाम स्वरूप शेरशाह सूरी ने मालवा पर आक्रमण करके अपने राज्य में शामिल कर दिया।
इसी तरह उसने रायसिन, मारवाड़, मेवाड़ तथा कालिंजर की विजय कर अपने अधीन राज्य को कर लिया ।कालिंजर का किला सैनिक पक्ष से बहुत महत्वपूर्ण था यहां कीर्ति सिंह का शासन था इस किले पर अधिकार करने के लिए शेरशाह सूरी ने अंत तक आक्रमण किया यह घेरा डाल कर 6 महीने तक लड़ता रहा परंतु राजपूतों ने अपनी हार ना मानी ।अतः 22 मई 1545 ई० को शेरशाह सूरी के सैनिकों ने किले पर अधिकार कर लिया परंतु उसी दिन से शेरशाह सूरी जो कि अचानक एक गोले के फटने से घायल हो गया था की मृत्यु हो गई।
शेरशाह सूरी का प्रशासन प्रबंधन
: 1 प्रांतीय शासन-शेरशाह ने अपने राज्य को अनेक प्रांतों में बांटा हुआ था। प्रांतों को सरकारों अथवा जिलों में
विभक्त किया था। प्रत्येक सरकार परगनों में बंटी हुई थी। शासन की इन इकाइयों में शेरशाह ने बड़े योग्य अधिकारी
नियुक्त किए थे। गांव के प्रबंध के लिए पंचायतें थीं ।
2 भूमि प्रबंध-शेरशाह ने सारे राज्य की भूमि की पैमाइश करवाई और इसके आधार पर इसे तीन भागों-उत्तम,
मध्यम तथा निम्न में बांटा। उपज के आधार पर ही भूमि-कर नियत किया गया जो उपज का एक-तिहाई भाग होता था।
3 कृषकों से अच्छा व्यवहार-शेरशाह सदा कृषकों की भलाई का ध्यान रखता था। उन्हें अकाल के दिनों में ऋण
दिया जाता था। शेरशाह ने अपने सैनिकों को चेतावनी दी हुई थी कि वे चलते समय किसी कृषक की फसल को हानि
न पहुंचाएं।
4. पुलिस-जनता के धन-माल तथा जीवन की रक्षा करने के लिए शेरशाह सूरी ने पुलिस की उत्तम व्यवस्था की।
अपराधों के लिए स्थानीय अधिकारी स्वयं ज़िम्मेदार होते थे ।
5. गुप्तचर विभाग-शेरशाह ने देश में गुप्तचर विभाग स्थापित किया। गुप्तचर राजा को सभी घटनाओं से सूचित
करते रहते थे।
6 न्याय-शेरशाह एक न्यायप्रिय सम्राट् था। न्याय करते समय छोटे-बड़े या अमीर-गरीब का भेदभाव नहीं रखा
जाता था। उसके दंड बड़े कठोर थे। दंड देते समय वह अपने सरदारों और निकट संबंधियों को भी नहीं छोड़ता था ।
7. सड़कों का निर्माण तथा डाक व्यवस्था-शेरशाह सूरी ने पुरानी सड़कों की मुरम्मत करवाई और कई नई
सड़कों का निर्माण करवाया। उसकी बनवाई हुई सड़कों में से एक सड़क पेशावर से सुनार गांव तक जाती है। दूसरी
आगरा से बुरहानपुर तक जाती थी। तीसरी सड़क आगरा से जोधपुर तक और चौथी सड़क लाहौर से मुलतान तक चली
गई थी। शेरशाह सूरी ने डाक लाने और ले जाने के लिए सड़कों पर डाक चौकियों की स्थापना भी की।
8. प्रजा की भलाई के लिए कार्य-शेरशाह सूरी ने प्रजा की भलाई के लिए अनेक कार्य किए। उसने यात्रियो
की सुविधा के लिए कुए खुदवाएं और सडकों के किनारे छायादार वृक्ष लगवाए। रात को ठहरने के लिए थोड़ी-थोड़ी
दूरी पर सरायें भी बनवाई गई।
सच तो यह है कि शेरशाह एक महान् शासन-प्रबंधक था । उसके शासन प्रबंध की प्रशंसा करते हुए कीन ने ठीक
ही कहा है, "किसी भी सरकार ने यहाँ तक कि अंग्रेज़ी सरकार ने भी, इस पठान (शेरशाह) जैसी योग्यता नहीं।
व्यापार और वार्णिज्य की उन्नति के लिए किए गए प्रयास-शेरशाह से पूर्व देश में बाणिज्य और व्यापार को बढ़ावा दिया।


अकबर (1556-1605 ई.)-
जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर का जन्म सन् 1542 ई. में अमरकोट में हुमायूँ की पत्नी हमीदा बानू बेगम की कोख में हुआ। हुमायूँ की मृत्यु का समाचार अकबर को गुरुदासपुर के पास कलानौर में मिला था। यहीं पर 14 फरवरी, 1556 ई. को कलानोर (पंजाब) में अकबर को बादशाह घोषित कर दिया गया। इस समय अकबर की आयु मात्र 14 वर्ष थी, अत: बैरम खाँ ने उसके संरक्षक के रूप में शासन किया। 5 नवम्बर, 1556 ई. को बैरम खाँ ने पानीपत के द्वितीय युद्ध में हेमू को परास्त किया। इस प्रकार अकबर का एक प्रमुख प्रतिद्वन्द्वी समाप्त हो गया। बैरम खाँ ने अब्दुल लतीफ को अकबर का शिक्षक नियुक्त किया। इससे पहले 1551 ई. में मुनीम खाँ अकबर का शिक्षक था परन्तु अकबर का मन पढ़ाई में नहीं लगता था। प्रारम्भ के चार वर्ष बैरम खाँ ने शासन संभाला। 1560 ई. में अकबर ने बैरम खाँ को हटाकर सत्ता अपने हाथ में ले ली। 1560 से 1562 ई. के बीच अकबर अपनी धाय माँ माहम अनगा के प्रभाव में रहा, अतः इस काल के शासन को 'पर्दा शासन' अथवा 'पेटीकोट शासन' कहा गया है। 1562 ई. में अकबर ने स्वतन्त्र रूप से शासन करना आरम्भ किया।
अकबर के अधीन मुगल साम्राज्य का विस्तार अकबर की गणना विश्व के महान विजेताओं में की जाती है उसने अपने शासनकाल के दौरान बहुत से प्रदेशों पर विजय प्राप्त करके मुगल साम्राज्य को एक साम्राज्य में परिवर्तित कर दिया वास्तव में यह अकबर ही था जिसने न केवल मुगल साम्राज्य का विस्तार की किया अपितु उसको अच्छी तरह संगठित संगठित भी किया
1अकबर की प्रारंभिक विजय 1556 ईस्वी में जब दिल्ली में हुमायूं की आचानक मृत्यु हो गई थी तो स्थिति का लाभ उठाकर बंगाल के शासक आदिल शाह सूरी के प्रधानमंत्री हेमू ने दिल्ली और आगरा पर अधिकार कर लिया उस समय अकबर पंजाब में था । 5 नवंबर 1556 ई० को दोनों सेनाओं का पानीपत के ऐतिहासिक मैदान में का मुकाबला हुआ । *पानीपत की दूसरी लड़ाई में शुरू में टीमों का पलड़ा भारी था परंतु अचानक उसकी गर्दन में तीर लग जाने के कारण युद्ध की स्थिति ही बदल गई परिणाम स्वरूप इस लड़ाई में मुगलों की विजय हुई और हेमू की हत्या कर दी गई भारतीय इतिहास में यह लड़ाई बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है इस लड़ाई के पश्चात अकबर ने आसानी से दिल्ली और आगरा पर अधिकार कर लिया इस तरह भारत में मुगल साम्राज्य की पुनः स्थापना हुई।
2 मालवा की विजय
अकबर ने मालवा को अपने अधीन करने के लिए 1561 ईo में आजम खान एवं पीर मोहम्मद के नेतृत्व में सेना भेजी ।उस समय मालवा में बाज बहादुर का शासन था वह एक कुशल संगीत कार तथा कवि था ।उसमें मालवा की राजधानी मांडू भारत में एक प्रसिद्ध संगीत केंद्र बन गई थी बाज बहादुर ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली और इस तरह 1562 ईस्वी में मालवा पर मुगलों का अधिकार हो गया।
इस प्रकार अकबर ने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की यह पूर्व में बंगाल से लेकर पश्चिम में अफगानिस्तान तक एवं उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में गोदावरी नदी तक फैला हुआ था अंत में हम यही कहना चाहते हैं कि अकबर एक महान विजेता आ रहा।
अकबर की दक्षिण नीति
अकबर एक महान् विजेता था। उसने उत्तरी और मध्य भारत में अपनी स्थिति को दृढ़ करने के पश्चात् दक्षिण को ओर ध्यान दिया। वह दक्षिण की ओर अपने साम्राज्य का विस्तार करके वहाँ पर बढ़ रहे पुर्तगालियों के प्रभाव को समाप्त करना चाहता था। इसके अतिरिक्त वह उत्तरी तथा दक्षिणी राज्यों को एक शासन के अधीन लाकर भारत में राजनीतिक एकता स्थापित करना चाहता था। दक्षिणी राज्यों में उस समय पारंपरिक एकता की कमी थी। उनमें प्रायः सत्ता के लिए आपसी लड़ाइयाँ चलती रहती थीं। अकबर इस स्थिति से लाभ उठाना चाहता था। सबसे बढ़ कर वह एक महान् साम्राज्यवादी था। वह अपने साम्राज्य का विस्तार करके अपने गौरव में वृद्धि करना चाहता था। उस समय दक्षिण
में निम्नलिखित चार स्वतंत्र रियासतें थीं
(i) खानदेश की फर्रूखशाही रियासत
(ii) अहमदनगर की निजामशाही रियासत (iii) बीजापुर की आदिलशाही रियासत
(iv) गोलकुंडा की कुतुबशाही रियासत
(क) अहमदनगर की विजय 1600 ई० अहमदनगर राज्य
ने अकबर की अधीनता को स्वीकार करने से इंकार कर दिया था। 1594 ई० में इसके सुल्तान बुरहान-उल-मुल्क की मृत्यु के पश्चात् उत्तराधिकार के संबंध में युद्ध आरंभ हो गया। ऐसी स्थिति से लाभ उठाकर अकबर ने अहमदनगर पर अधिकार करने के लिए राजकुमार मुराद तथा अब्दुर्रहीम खान-ए-खाना के नेतृत्व में एक विशाल सेना भेजी शाही सेनाओं ने 1595 ई० में अहमदनगर को घेरे में ले लिया। चाँद बीवी (बुरहान-उल-मुल्क की बहन और बीजापुर की रानी) के नेतृत्व में अहमदनगर की सेनाओं ने मुग़लों का डटकर सामना किया, परंतु वे मुगलों को पराजित न कर पाए। इसलिए उन्होंने 1596 ई० में मुग़लों के साथ संधि कर ली। इस संधि के अनुसार बरार का प्रदेश मुग़लों को मिल गया और मुग़लों ने बुरहान-उल-मुल्क के लड़के बहादुर निजाम शाह को अहमदनगर का सुल्तान मान लिया। शीघ्र ही चाँद बीबी के विरोधियों ने उसकी हत्या कर दी और बरार पर आक्रमण कर दिया। मुग़ल सैनिकों ने बरार पर अधिकार न होने दिया। 1600 ई० में अकबर ने स्वयं अहमदनगर के दुर्ग को घेर लिया। घमासान युद्ध के पश्चात् अकबर ने अहमदनगर के दुर्ग पर अधिकार कर लिया, परंतु अकबर समूचे अहमदनगर पर अधिकार न कर पाया क्योंकि पहले अकबर को खानदेश की ओर तथा फिर सलीम के विद्रोह की ओर ध्यान देना पड़ा।
(ख) खानदेश की विजय 1601 ई० (₹ अकबर ने 1591 ई० में दक्षिण की चारों रियासतों की ओर अपने वकील भेजे ताकि वे अकबर की अधीनता को स्वीकार कर लें।
अकबर की राजपूत नीति
- अकबर बहुत दूरदशी बादशाह था। उसने यह बात अच्छी प्रकार जान ली थी कि राजपूतों के सहयोग के बिना भारत में स्थायी मुगल साम्राज्य की स्थापना लगभग नामुमि है। इसलिए उसने राजपूतों के प्रति मित्रता का हाथ बढ़ाया।
I. राजपूत नीति अपनाने के कारण
अकबर ने निम्नलिखित कारणों के चलते राजपूत नीति को अपनाया
1. राजनीतिक कारण- अकबर भारत में एक विशाल एवं स्थायी मुग़ल साम्राज्य को स्थापना करना चाहता था। राजपूत जो कि भारत की एक बहादुर एवं साहसी जाति थी है विरोध के चलते ऐसा कर पाना संभव न था। अतः अकबर ने राजपूतों के प्रति मित्रता की
को अपनाया।
2. व्यक्तिगत कारण- अकबर ने अपने शासनकाल के आरंभ में यह महसूस किया कि मुग़ल सैनिक पूरी तरह उसके प्रति वफ़ादार नहीं है। वे अपने स्वार्थी हितों को अधिक मह देते थे। यहाँ तक कि अकबर के अपने संबंधी उसके लिए विकट समस्या खड़ी करने से हिचकिचाते थे। विवश होकर अकबर ने राजपूतों से मित्रता करना उचित समझा। राजपूत अपने वचन पर मर मिटने को तैयार रहते थे।
3. राजपूताना की भौगोलिक स्थिति- अकबर राजपूताना की भौगोलिक स्थिति से बहुत प्रभावित था। राजपूताना दिल्ली व आगरा से अधिक दूर नहीं था। यदि अकबर राजपूतों शत्रुता मोल लेता तो राजपूत मुग़ल साम्राज्य का विनाश कर देते। इसलिए अकबर राजपूतों मित्रता करना उचित समझा।
II. राजपूत नीति की मुख्य विशेषताएँ
1. राजपूतों से विवाह संबंध- अकबर ने राजपूतों से मित्रता स्थापित करने के उद्देश्य से उनसे विवाह संबंध स्थापित किए। 1562 ई० में जब अंबर के शासक भारमल कछवाह ने अपन बेटी के विवाह के लिए अकबर के समक्ष प्रस्ताव रखा तो उसने इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया इस विवाह से भारतीय इतिहास में एक नए युग का सूत्रपात हुआ। इस विवाह के पश्चात अनेक अन्य राजपूत शासकों ने अकबर के साथ विवाह संबंध स्थापित किए। इन विवाह संबंध के कारण राजपूत मुग़ल साम्राज्य के घनिष्ठ मित्र बन गए।
2. धार्मिक स्वतंत्रता- अकबर ने हिंदुओं और राजपूतों का दिल जीतने के उद्देश्य उन पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान की थी। उन्हें मंदिरों में पूजा-पाठ करने, धार्मिक रीति-रिवाजों पालन करने और त्योहारों को मनाने की पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान की गई थी। अकबर ने हिंदु पर लगे तीर्थयात्रा कर को 1563 ई० में तथा जज़िया कर को 1564 ई० में समाप्त कर क्रांतिकारी पग उठाया। अकबर ने अपने युद्धों को कभी जिहाद का नाम नहीं दिया था। अ राजपूत मुग़ल राज्य के लिए अपनी जान न्योछावर करने के लिए तैयार हो गए।
3. राजपूतों के लिए उच्च पद- अकबर ने योग्यता के आधार पर राजपूतों को उच्च पदों न नियुक्त किया। अकबर से पूर्व मुस्लिम शासक राजपूतों के साथ अपमानजनक व्यवहार का थे। अकबर प्रथम बादशाह था जिसने राजपूतों को मुसलमानों के समान अधिकार दिए ।राजा भगवान दास, राजा मान सिंह, उदय सिंह, बीरबल और टोडरमल इत्यादि को राज्य के महत्त्वपूर्ण पदों पर नियुक्त किया गया। अकबर के इस व्यवहार से राजपूत मुगल साम्राज्य के निष्ठावान सेवक बन गए।
4. शत्रु राजपूत शासकों से युद्ध- अकबर ने उन राजपूत शासकों के साथ अच्छा व्यवहार
किया जिन्होंने उसकी अधीनता स्वीकार कर ली थी, परंतु जिन राजपूत राजाओं ने अकबर की
अधीनता स्वीकार करने से इंकार किया, अकबर ने उनके विरुद्ध युद्ध थिए। अकबर
रणथंभौर और कालिंजर राज्यों पर सुगमता से विजय प्राप्त कर ली थी। मेवाड़ के महाराणा
प्रताप ने अंत तक अकबर के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा। यह अकबर की महानता थी कि उसने
पराजित राजपूत शासकों के साथ भी अच्छा बर्ताव किया। अकबर की राजपूत नीति के दूरगामी परिणाम निकले। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है
III. राजपूत नीति के परिणाम
1. मुगल साम्राज्य का विस्तार- अकबर जब शासक बना था तो उसके पास नाममात्र का ही राज्य था, परंतु अपनी मृत्यु के समय वह विश्व का सबसे बड़ा सबसे धनी और शक्तिशाली साम्राज्य विरासत में छोड़ गया था। इतनी भव्य सफलता का मुख्य कारण राजपूतों की सच्ची सेवा थी। उन्होंने मुगल साम्राज्य का विस्तार करने के लिए प्रत्येक आवश्यक प्रयास किया।
2. मुगल साम्राज्य की प्रगति- अकबर की राजपूत नीति के कारण मुसलमानों और राजपूतों के बीच चला आ रहा सदियों पुराना संघर्ष समाप्त हो गया। अतः एक नए युग का सूत्रपात हुआ। मुग़ल साम्राज्य में शाँति एवं व्यवस्था की स्थापना हुई। अतः कृषि एवं व्यापार को प्रोत्साहन मिला । अतः मुगल साम्राज्य की आर्थिक दशा में सुधार हुआ और लोग समृद्ध हो गए।
3. कला एवं साहित्य के क्षेत्र में विकास :राजपूतों और मुसलमानों को भवन निर्माण कला, चित्रकला और संगीत कला से बहुत प्रेम था राजपूत एवं मुस्लिम विचारधाराओं के समन्वय के कारण कला के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई। इससे साहित्य के विकास को भी प्रोत्साहन मिला।अनेक मुस्लिम लेखकों ने हिंदी साहित्य की रचना की जबकि हिंदू लेखकों ने फ़ारसी साहित्य को लिखा।
अकबर की महानता के कारण
मध्यकालीन भारतीय इतिहास में अकबर को विशेष स्थान प्राप्त है। उसकी महानता के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार -है----
1. एक विशाल साम्राज्य की स्थापना-अकबर की महानता का प्रथम महत्त्वपूर्ण कारण यह था कि उसने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की थी। 1556 ई० में जब वह सिंहासन पर बैठा तो उस समय मुगल राज्य एक भयंकर संकट से गुजर रहा था। अकबर ने योग्यता एवं बहादुरी से 1605 ई० में अपनी मृत्यु तक एक विशाल मुगल साम्राज्य की स्थापना कर ली थी। निस्संदेह यह अकबर की एक महान सफलता थी।
2. एक कुशल शासन प्रबंध की स्थापना-अकबर की महानता का दूसरा महत्वपूर्ण कारण यह था कि उसने मुगल साम्राज्य को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से एक कुशल शासन प्रबंधकी स्थापना की। उसने मुगल प्रशासन में अनेक महत्त्वपूर्ण सुधार लागू किए। उसके प्रशासन का प्रमुख उद्देश्य प्रजा की भलाई करना था। उसने राज्य के विभिन्न पदों पर योग्य एवं ईमानदार कर्मचारियों को नियुक्त किया। उसने मुगल साम्राज्य की आर्थिक समृद्धि के लिए भू-राजस्व प्रबंध में अनेक प्रशंसनीय सुधार किए।
3. धार्मिक सहनशीलता की नीति को अपनाना-अकबर की महानता का एक अन्य महत्त्वपूर्ण कारण यह भी था कि वह एक सहिष्णु शासक था। वह यह भली भांति जानता था कि यदि वह भारत में मुग़ल साम्राज्य को स्थायी बनाना चाहता है तो उसे हिंदुओं एवं मुसलमानों के मध्य खाई को दूर करना होगा। भाव उनमें प्रचलित आपसी तनाव को प्रेम के द्वारा दूर करना होगा। इस उद्देश्य से अकबर ने राजपूत राजकुमारियों से विवाह संबंध स्थापित किए तथा उन्हें पूरी धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान की। उसने 1563 ई० में तीर्थयात्रा कर एवं 1564 ई० में जजिया कर को समाप्त कर हिंदुओं का दिल जीतने की दशा में एक महान् पग उठाया। उसने सभी धर्मों के लोगों को खुले दिल से दान किया।
4. कला को प्रोत्साहन अकबर न केवल एक महान शासक था अपितु उसे कला से भी बहुत प्रेम था। उसने वास्तुकला, चित्रकला एवं संगीत कला को प्रोत्साहित किया। उसने अपने शासनकाल में अनेक भव्य भवनों का निर्माण करवाया। इनकी कला को देखकर आज भी व्यक्ति चकित रह जाता है। इसी प्रकार अकबर के शासनकाल में चित्रकला एवं संगीतकला का भी उल्लेखनीय विकास हुआ। तानसेन ने अकबर के दरबार को चार चांद लगा दिए थे।
5. साहित्य को प्रोत्साहन - अकबर ने अपने शासनकाल के दौरान साहित्य को भी खुले मन से प्रोत्साहित किया। उसके शासनकाल में फ़ारसी एवं हिंदी साहित्य का उल्लेखनीय विकास हुआ। अबुल फज्ल उसका सबसे प्रसिद्ध दरबारी इतिहासकार था। उसने अकबरनामा तथा आइन-ए-अकबरी की रचना करके अकबर के नाम को सदैव के लिए अमर कर दिया। तुलसीदास, सूरदास तथा अब्दुल रहीम खान-ए-खाना अकबर के दरबार के प्रसिद्ध हिंदी कवि
थे। अकबर ने संस्कृत के अनेक प्रसिद्ध ग्रंथों का फ़ारसी में अनुवाद करवाया।
जहाँगीर
जहाँगीर अकबर का पुत्र था। उसके बचपन का नाम सलीम था। वह 1605 ई० में 'नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर" के नाम से सिंहासन पर बैठा था। उसने 1611 ई० में नूरजहाँ से विवाह किया था। उसका वास्तविक नाम मेहरुन्निसा था। उसने जहाँगीर के शासनकाल में उल्लेखनीय भूमिका निभाई थी। जहाँगीर ने 1627 ई० तक शासन किया था। जहाँगीर ने अपने शासनकाल के दौरान मुगल साम्राज्य के विस्तार के लिए निम्नलिखित प्रयत्न किए
1 बंगाल के विद्रोह को कुचलना 1612 ई० — 1576 ई० में अकबर ने बंगाल को मुग़ल साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया था। दिल्ली से दूर स्थित होने के कारण तथा का झंडा बुलंद कर दिया था। उसने बंगाल की राजधानी ढाका पर अधिकार करने का प्रयत्न किया। उसे ढाके के समीप हुए एक भीषण युद्ध में मुगल सेनापति इस्लाम खाँ ने पराजित कर दिया तथा वह मारा गया। इससे अफ़गान सेनाओं का साहस टूट गया तथा उन्होंने आत्म-समर्पण कर दिया। इस तरह मुगलों ने बंगाल में पुनः शाँति स्थापित की।
2 मेवाड़ की अधीनता
1615 ई० अकबर के शासनकाल में मेवाड़ पर विजय प्राप्त करने के लिए प्रयत्न किए गए थे परंतु महाराणा प्रताप की वीरता के कारण मुगलों की एक न चली। 1597 ई० में जब महाराणा प्रताप की मृत्यु हो गई उस समय अकबर दक्षिणी भारत को विजयों में इतना व्यस्त था कि वह मेवाड़ की ओर ध्यान न दे सका। 1605 ई० में जब जहाँगीर सम्राट् बना तो उसने मेवाड़ पर विजय पाने का निर्णय किया। उस समय मेवाड़ पर राणा अमर सिंह का शासन था। 1606 ई० से 1613 ई० के समय के दौरान जहाँगीर की ओर से मेवाड़ को जीतने के लिए भेजे गए तीनों सैनिक अभियान असफल रहे। 1613 ई० में जहाँगीर ने मेवाड़ को जीतने के लिए अपने पुत्र खुर्रम के नेतृत्व में एक विशाल सेना भेजी। कुछ ही समय में उसने मेवाड़ के अधिकाँश प्रदेशों पर अपना अधिकार कर लिया। इनमें से अधिकतर प्रदेशों को नष्ट कर दिया गया। राणा अमर सिंह अपने देश का ऐसा भारी विनाश नहीं देख सकता था। परिणामस्वरूप उसने 1615 ई० में मुग़लों के साथ संधि कर लो। इस संधि के साथ जहाँगीर का मेवाड़ को अधीन करने का सपना साकार हो गया। इसके अतिरिक्त उसने राजपूतों को अपना घनिष्ठ मित्र बना लिया।
3. दक्षिण नीति
जहाँगीर ने अकबर की दक्षिण नीति को जारी रखा। क्योंकि अकबर परे अहमदनगर को अपने अधीन नहीं कर सका था इसलिये जहाँगीर ने सर्वप्रथम इसकी ओर अपना ध्यान दिया। उस समय अहमदनगर राज्य ने अपने योग्य वजीर मलिक अंबर के नेतृत्व में अपनी शक्ति को मजबूत कर लिया था।
4. कांगड़ा की विजय 1620 ई० कांगड़ा का भौगोलिक पक्ष से बहुत •महत्त्व था। इसलिए जहाँगीर उस पर अधिकार करना चाहता था। पंजाब के सुबेदार मुर्तजा खाँ के अधीन 1615 ई० में कांगड़ा के विरुद्ध भेजा गया अभियान असफल रहा था। 1619 ई० में एक विशाल सेना शहजादा खुरम के नेतृत्व में काँगड़े पर विजय पाने के लिये भेजी गई। 14 महीनों के लंबे घेरे के पश्चात् नवंबर 1620 ई० में कांगड़ा के मजबूत किले पर विजय प्राप्त की जा सकी। काँगड़ा की विजय जहाँगीर की एक महत्त्वपूर्ण सफलता थी। वह कांगड़ा को विजय करने वाला प्रथम मुस्लिम शासक बना। वह मुग़ल उपलब्धि का जश्न मनाने स्वयं 1620 ई० में कांगड़ा गया था।
5असम के अहोमो से संघर्ष
इन्होंने मुगलों के साथ किसी प्रकार के संबंध रखने को अस्वीकार कर दिया। परंतु कामरूप तथा कूच बिहार पर मुगल सत्ता स्थापित हो जाने से वे असम की सीमाओं के बिल्कुल निकट पहुँच गए थे। इस कारण, युद्धप्रिय अहोमों का लगभग प्रत्येक वर्ष मुग़लों से संघर्ष होने लगा तक उन्होंने जहाँगीर को अधीनता स्वीकार करने से इंकार कर दिया। उनकी सैनिक प्रबलता तथा छापामार आक्रमणों के 'मुग़लों को कभी भी चैन की साँस न लेने दी
6 कंधार की हानि
1622 ई० कंधार के क्षेत्र का भौगोलिक तथा व्यापारिक पक्ष से बहुत महत्त्व था। इसलिये कंधार भारत और ईरान के मध्य एक लड़ाई का कारण बना हुआ था। 1595 ई० में अकबर ने इसको एक जागीर के बदले मुजफ्फर हुसैन मिर्जा से प्राप्त कर लिया था। ईरान का शासक शाह अब्बास कंधार के क्षेत्र पर पुनः अपना अधिकार करने के लिये किसी स्वर्ण अवसर की तलाश में था। यह अवसर उसको 1622 ई० में मिला। उस समय नूरजहाँ तथा शाहजहाँ के बीच जहाँगीर के उत्तराधिकारी के प्रश्न पर परस्पर नाव चल रहा था। उसने कंधार पर अचानक आक्रमण करके उस पर अधिकार कर लिया। जहाँगीर खुरंम तथा महाबत खाँ के विद्रोह में व्यस्त होने के कारण कंधार को वापस लेने की ओर ध्यान न दे सका। इस तरह 1622 ई० मुग़लों ने कंधार को खो दिया। अश्विनी अग्रवाल का यह कहना उचित है,।
शाहजहाँ का जीवन परिचय
शाहजहाँ, अकबर का पोता और जहाँगीर का बेटा था जिसने ठीक वैसे ही गद्दी हासिल की जैसे उसके पिता जहाँगीर ने हासिल की थी यानी की छल-कपट से। शाहजहाँ भोग-विलासी होने के साथ न्याय पसंदी राजा था लेकिन उसकी छवि एक आशिक के तौर पर बन गई थी, तो आइये जानते हैं शाहजहाँ के जन्म और उसके बचपन के बारे में।
शाहजहाँ का जन्म 5 जनवरी 1592 को हुआ था ऐसा कहा जाता है की जहाँगीर और जगत गोसाई “जोधाबाई” से हुई संतान शाहजहाँ को अकबर ने गोद ले लिया था और उसे एक महान योद्धा बनाने में अकबर ने बड़ा योगदान दिया था। शाहजहाँ का जीवन बहुत ही ऊपर नीचे वाला रहा।
शाहजहाँ का बचपन का नाम खुर्रम था जिसका हिन्दी अर्थ होता है “ दुनिया का राजा ” और खुशमिज़ाज़ । खुर्रम यह जहाँगीर की दूसरी संतान था
नहीं थे। शाहजहां के उसके पिता जहांगीर से अच्छे संबंध नहीं थे
क्योंकि जहांगीर अपनी दूसरी बेगम नूरजहां की बात अधिक मानता था और उसी को तवज्जो भी देता था नूरजहाँ यह बिलकुल भी नहीं चाहती थी की शाहजहाँ राजा बने और उसे रोकने के लिए अक्सर क्षड़यंत्र रचा करती थी। जिसके चलते शाहजहां और जहांगीर में ज्यादा नहीं बनती थी।
24 फरवरी दिन गुरूवार ई.सन 1628 में शाहजहां गदी पर बैठा और अपने सबसे बेहतरीन शासनकाल की शुरुआत की।
शाहजहां के शासनकाल को स्थापत्य कला का स्वर्णिम युग कहा जाता है. शाहजहां ने दिल्ली का लालकिला, दीवाने आम, दीवाने खास, दिल्ली की जामा मस्जिद, आगरा की मोती मस्जिद का निर्माण करवाया था। शाहजहाँ के तीस साल के शासनकाल को ही मुगल वंश के स्वर्णकाल के रूप में जाना जाता है। अकबर ने जिस क्षेत्र की स्थापना की थी, उसे शाहजहाँ ने विस्तार किया और बहुत खूबी से शासित किया।
शाहजहाँ ,कला और वास्तुकला का बहुत बड़ा पसंदगार था । सबसे बड़ा उदाहरण ताजमहल है, जो दुनिया के सात आश्चर्यों में से एक है। शाहजहाँ के शासनकाल को संगमरमर काल भी कहा’जाता है क्योंकि शाहजहाँबाद के महलों की तरह ही और सभी महलों को बनाने के लिए संगमरमर के पत्थर का ही उपयोग हुआ है।
शाहजहां ने दिल्ली का लालकिला, दीवाने आम, दीवाने खास, दिल्ली की जामा मस्जिद, आगरा की मोती मस्जिद भी बनवाई।1612 ई में 20 वर्ष की आयु में खुर्रम का विवाह आसफ खान की बेटी अरजुमंद बानो बेगम यानी मुमताजमहल से हुआ, जिसे शाहजहां ने मलिका-ए-जमानी की उपाधि दी। 1631 ई में 14 वीं संतान के प्रसव पीड़ा के कारण उसकी मृत्यु हो गई उसके प्रेम वियोग में शाहजहाँ पूरी तरह से टूट गया और मुमताज़ के याद में शाहजहाँ ने “ताजमहल” का निर्माण कराया।
शाहजहाँ के कुल चौदह संताने थी जिसमे से सिर्फ सात ही जीवित बची थी जिसमे 4 लड़के थे चार लड़कों के नाम दारा शिकोह, शाह शुजा, औरंग़ज़ेब, मुराद बख्श था इन सभी के आपस में बिलकुल भी नहीं बनती थी।
लेकिन उसके पुत्र औरंगजेब ने छल से शाहजहाँ की गद्दी पे अधिकार कर लिया और 18 जून को 1658 को शाहजहाँ को बंदी बना लिया 8 साल तक औरंगजेब ने शाहजहाँ को क़ैद में रखा जिसके कारण शाहजहाँ बीमार रहने लगा और 31 जनवरी 1666 को उसकी मृत्यु हो गई और इसी के साथ उसके राज़ का अंत आया और उसके बेटे औरंगजेब ने शाहजहाँ से अभी अधिक क्रूरता दिखाई।
औरंगजेब भारत देश के एक महान मुग़ल शासक थे, जिन्होंने भारत में कई वर्षो तक राज्य किया. वे छठे नंबर के मुग़ल शासक थे, जिन्होंने भारत में शासन किया. औरंगजेब ने 1658 से 1707 लगभग 49 साल तक शासन किया, अकबर के बाद यही मुग़ल थे, जो इतने लम्बे समय तक राजा की गद्दी पर विराजमान रहे.
औरंगजेब की दक्षिण नीति
औरंगजेब की दक्षिण नीति न केवल औरंगजेब के लिए अपितु मुगल साम्राज्य के लिए घातक प्रमाणित हुई। औरंगजेब दक्षिण में इस्लाम धर्म का प्रसार करना चाहता था एवं वहाँ से धन प्राप्त करना चाहता था। इन उद्देश्यों से वह 1682 ई० से 1707 ई० तक दक्षिण में रहा।
1. बीजापुर की विजय 1686 ई०- औरंगजेब के द्वारा बीजापुर को जीतने के लिए 1665 ई० में जय सिंह के नेतृत्व में तथा 1679 ई० दिलेर ख़ाँ के नेतृत्व में भेजे गए अभियान बुरी तरह असफल रहे। इसलिए 1685 ई० में शहजादा आजम के नेतृत्व में बीजापुर के विरुद्ध विशाल सेना भेजी गई। बीजापुर के सैनिकों ने लगभग 15 महीनों तक मुगल सेना को आगे बढ़ने से रोक कर रखा। अंत में औरंगजेब स्वयं बीजापुर पहुँचा। उसके नेतृत्व में मुगल सेना बहुत वीरता से लड़ी। अंत में विवश होकर बीजापुर के सुल्तान सिकंदर आदिल शाह ने मुगलों के आगे हथियार डाल दिए। इस प्रकार 1686 ई० में बीजापुर मुगल साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया गया।
2. गोलकुंडा की विजय 1687 ई०- बीजापुर की विजय से उत्साहित होकर औरंगजेब ने अपना ध्यान गोलकुंडा की ओर किया। उस समय गोलकुंडा में अब्बू-अल-हसन का शासन था। औरंगजेब ने फरवरी 1687 ई० को गोलकुंडा के किले को घेर लिया परंतु गोलकुंडा के सैनिकों ने शाही सेनाओं का डटकर मुकाबला किया। इनमें से अब्दुल रज़्ज़ाक का नाम उल्लेखनीय है। वह अंतिम दम तक बहुत वीरता से मुग़ल सैनिकों का मुकाबला करता रहा। यह घेरा आठ महीनों तक जारी रहा। विवश होकर औरंगजेब ने छलकपट का मार्ग अपनाया। उसने किले के एक पहरेदार अब्दुल पानी को घूस (रिश्वत) देकर अपने साथ मिला लिया। उसने एक रात: किले के दरवाजे खोल दिए जिसके कारण मुग़लों ने किले पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार 1687 ई० में गोलकुंडा को मुगल साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया गया।
3. औरंगज़ेब तथा मराठे- शिवाजी के नेतृत्व में महाराष्ट्र में मराठे बहुत शक्तिशाली हो गये थे। औरंगजेब द्वारा शिवाजी को कुचलने के सभी प्रयास असफल रहे। 1674 ई० में शिवाजी ने स्वतंत्र शासक होने की घोषणा कर दी। 1680 ई० में शिवाजी की मृत्यु के पश्चात् उनका पुत्र शंभूजी राजगद्दी पर बैठा। मुगलों तथा मराठों के बीच चला आ रहा संघर्ष अब भी जारी रहा। औरंगजेब ने 1689 ई० में शंभूजी को पकड़ कर उनकी हत्या करवा दी और मराठों के कई क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। परंतु मराठों ने अपना साहस नहीं छोड़ा। उन्होंने पहले राजा राम के नेतृत्व में और फिर उसकी रानी ताराबाई के नेतृत्व में औरंगजेब के विरुद्ध अपना संघर्ष जारी रखा। मराठों ने औरंगजेब को मरते दम तक सुख की साँस न लेने दी तथा मुग़लों से अधिकाँश क्षेत्र पुनः प्राप्त कर लिए।
4. परिणाम- मुग़लों की दक्षिण नीति विनाशकारी परिणाम निकले। दक्षिण राज्यों पर विजय प्राप्त करने से मुग़ल साम्राज्य का बहुत विस्तार हो गया। यातायात के साधनों के अभाव के कारण विशाल साम्राज्य को नियंत्रण में रखना कठिन हो गया। दक्षिण को नियंत्रण में रखने के लिए औरंगजेब को निरंतर युद्धों में उलझे रहना पड़ा। इस कारण वह उत्तरी भारत की ओर ध्यान न दे सका। परिणामस्वरूप उत्तरी भारत में भ्रष्टाचार का बोलबाला हो गया। स्थान-स्थान पर विद्रोह होने लगे। दक्षिण की निरंतर लड़ाइयों के कारण कृषि तथा व्यापार को गहरा आघात लगा। सरकार पर ऋण का बोझ बढ़ गया। परिणामस्वरूप मुगल साम्राज्य छीन भिन्न हो गया।
औरंगजेब की राजपूत नीति
-औरंगजेब एक कटर सुन्नी मुसलमान था। इसलिए यह राजपूतों के साथ बहुत
ईर्ष्या करता था। परंतु उसने मेवाड़ के राजा जय सिंह तथा मारवाड़ के राजा जसवंत सिंह के जीवित रहते राजपूतों के साथ युद्ध करने का साहस न किया। 1667 ई० में जय सिंह तथा 1678 ई० में जसवंत सिंह की मृत्यु हो गई थी। अतः उसने राजपूतों के साथ टक्कर लेने का निर्णय किया। उसने राजपूतों के कई प्रख्यात मंदिर गिरा दिये तथा उनसे जजिया कर (1679 ई०) भी वसूल किया जाने लगा। इस 'कर' को अकबर ने 1564 ई० में हटा दिया था। इसके अतिरिक्त औरंगजेब ने मारवाड़ की प्रजा की इच्छा के विरुद्ध इंद्र सिंह को वहाँ का शासक घोषित कर दिया। इस समय लाहौर में जसवंत सिंह की दो विधवा रानियों ने दो बच्चों को जन्म दिया। इनमें से एक की तो कुछ दिनों के पश्चात् मृत्यु हो गई परंतु दूसरा बच्चा, जिसका नाम अजीत सिंह रखा गया था, जीवित रहा। औरंगजेब अपने मार्ग के इस रोहे को हटाना चाहता था। इसलिए वह दोनों रानियों तथा अजीत सिंह को बलपूर्वक अपने महल में ले आया। उसने अजीत सिंह को मुसलमान बनाने के प्रयत्न किए। जब मारवाड़ के राजपूतों का इस बारे में पता चला तो उन्होंने इस अपमान का बदला लेने की शपथ ली। दुर्गा दास राठौर बहुत चतुराई से दोनों रानियों तथा अजीत सिंह को औरंगजेब के जाल से छुड़ाकर मारवाड़ ले आया। जब औरंगजेब को इस बात का पता लगा तो वह क्रोध से तिलमिला उठा।
औरंगजेब ने राजपूतों को सबक सिखाने के उद्देश्य से जुलाई, 1679 ई० में एक विशाल सेना शहजादा अकबर के नेतृत्व में मारवाड़ भेजी। उसने सारे मारवाड़ में भारी विध्वंस किया परन्तु दुर्गा दास राठौर के नेतृत्व में राजपूतों ने मुग़लों के विरुद्ध अपना संघर्ष जारी रखा। ऐसे समय में मेवाड़ के शासक राज सिंह ने मारवाड़ को अपना पूर्ण समर्थन दिया। 1681 ई० में शहजादा अकबर ने औरंगजेब के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। उसके इस विद्रोह में मारवाड़ तथा मेवाड़ ने इसको अपना पूरा समर्थन दिया। इस प्रकार औरंगजेब के लिए एक नया संकट पैदा हो गया था। परन्तु औरंगजेब ने ऐसे समय में बहुत साहस से काम लिया। उसने कुछ झूठे पत्रों के द्वारा राजपूतों तथा अकबर के बीच सन्देह उत्पन्न कर दिया। परिणामस्वरूप अकबर दक्षिण की ओर भाग गया। इसके पश्चात् औरंगजेब ने मेवाड़ के नये शासक जय सिंह से 1681 में संधि कर ली। इस संधि के अनुसार जय सिंह को मेवाड़ का राणा स्वीकार कर लिया गया तथा उसको 5,000 की मनसबदारी दी गई। इसके बदले जय सिंह ने मारवाड़ को मुगलों के विरुद्ध सहायता न देने का वचन दिया। इस संधि के बावजूद मारवाड़ के राजपूतों का साहस किसी भी प्रकार कम न हुआ। उन्होंने 1707 ई० में औरंगजेब की मृत्यु तक उसको सुख सांस न लेने दी। इस प्रकार औरंगजेब की राजपूत नीति बुरी तरह असफल रही। हजारों सैनिक मरवा कर तथा लाखों रुपये व्यय करके वह केवल राजपूतों को साम्राज्य का कट्टर शत्रु बनाने के अतिरिक्त कुछ अधिक प्राप्त न कर सका।
मुगल साम्राज्य के पतन के कारण
- मुगल साम्राज्य के पतन के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे। इन कारणों को दो में बाँटा जाता है। प्रथम वे कारण थे जिनके लिए औरंगजेब उत्तरदायी था। दूसरा वे अन्य कारण थे जिनके लिए औरंगजेब प्रत्यक्ष रूप से उत्तरदायी नहीं था। इन कारणों का संक्षिप्त वर्णन अग्रलिखित अनुसार है
1. औरंगजेब उत्तरदायी
1. औरंगज़ेब की धार्मिक नीति- औरंगजेब की धार्मिक नीति ने मुग़ल साम्राज्य की नैया को डुबाने में प्रमुख भूमिका निभाई। उसने हिंदुओं के अनेक मंदिरों एवं मूर्तियों को नष्ट करवा दिया। उनको राज्य के सभी पदों से वंचित कर दिया गया। उन पर जजिया एवं तीर्थ यात्रा करें को जो अकबर के शासनकाल में हटा दिए गए थे पुनः लगा दिया गया। उन्हें बलपूर्वक इस्लाम धर्म में सम्मिलित किया जाने लगा। उनके धार्मिक रीति-रिवाजों पर कड़ी पाबंदी लगा दी गयी। उसकी इस नीति के कारण राजपूत, मराठे, जाट, सिख तथा सतनामी औरंगजेब के कट्टर शत्रु बन गए। ऐसे साम्राज्य का पतन निश्चित था।
2. राजपूतों से दुर्व्यवहार- औरंगजेब ने राजपूतों से शत्रुता मौल लेकर मुगल साम्राज्य की दिया गया। उनके प्रदेशों पर बलपूर्वक अधिकार किया गया। उसकी इस अनुचित नीति के भयंकर परिणाम निकले।
3. सिखों से दुर्व्यवहार- औरंगजेब को गैर-मुसलमान एक आँख नहीं भाते थे। वह पंजाब
में सिखों की बढ़ती हुई शक्ति को सहन नहीं कर सकता था। अतः उसमे 1 नवंबर, 1675 ई०
को सिखों के नौवें गुरु, गुरु तेग बहादुर जी को दिल्ली में शहीद करवा दिया। इस कारण पंजाब के सिख भड़क उठे। उन्होंने मुगलों के अत्याचारी शासन का अंत करने का प्रण किया।
4. औरंगजेब की दक्षिण नीति- औरंगजेब की दक्षिण नीति मुगल साम्राज्य के पतन का एक महत्त्वपूर्ण कारण सिद्ध हुई। उसे गोलकुंडा और बीजापुर की रियासतों को मुग़ल साम्राज्य में सम्मिलित करने तथा मराठों से युद्ध करने के लिए 25 वर्षों तक दक्षिण में रहना पड़ा। उसकी दक्षिण नीति साम्राज्य के लिए विनाशकारी सिद्ध हुई। यहाँ उसे अपार धन और जन हानि हुई। इसके अतिरिक्त दीर्घकाल तक राजधानी से अनुपस्थिति के कारण उत्तरी भारत में अराजकता एवं अशांति फैल गई।
5. औरंगजेब का संदेहशील स्वभाव- औरंगजेब का संदेहशील स्वभाव भी मुगल साम्राज्य के लिए घातक प्रमाणित हुआ। वह सभी को संदेह की दृष्टि से देखता था। यहाँ तक कि वह अपने शहजादों एवं मंत्रियों पर भी विश्वास नहीं करता था। उसके गुप्तचर सभी पर कड़ी निगरानी रखते थे। इसने विद्रोहों को जन्म दिया। इस कारण साम्राज्य में अराजकता फैली।
II. अन्य कारण
मुगल साम्राज्य के पतन के लिए कुछ अन्य कारण भी उत्तरदायी थे। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है
6. औरंगज़ेब के दुर्बल उत्तराधिकारी
मुग़ल साम्राज्य के पतन का एक महत्त्वपूर्ण कारण औरंगजेब के दुर्बल उत्तराधिकारी थे। वे अपना अधिकतर समय सुरा एवं सुदंरी के संग व्यतीत करते थे। बहादुर शाह प्रथम शाह-ए-बेखबर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। जहाँदर शाह एक वेश्या लाल कँवर पर लड्डू हो गया। मुहम्मद शाह ऐय्याश शासक था। वह प्रजा में 'रंगीला' के नाम से प्रसिद्ध हुआ। ऐसे अयोग्य एवं निकम्मे उत्तराधिकारियों के चलते महान् मुग़ल साम्राज्य की
नैया डुब गयी।
7. मुग़ल अमीर- मुगल अमीरों का नैतिक पतन व उनका स्वार्थ मुग़ल साम्राज्य के पतन में काफी हद तक सहायक सिद्ध हुआ। अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ के शासनकाल में मुगल साम्राज्य के गौरव को बढ़ाने में अमीरों ने कोई प्रयास शेष न छोड़ा। परंतु उत्तरकालीन मुग़ल बादशाहों के समय में मुगल अमीरों का नैतिक पतन हो गया। वे भी बादशाहों की तरह भोग-विलासी जीवन व्यतीत करने लगे। इसके अतिरिक्त वे कई गुटों में बँट गए। उनमें आपसी ईर्ष्या बहुत अधिक थी। ऐसे साम्राज्य का छिन्न-भिन्न होना निश्चित था।
8. मुग़ल सेना की दुर्बलताएँ- मुगल साम्राज्य के पतन का एक अन्य महत्त्वपूर्ण कारण उत्तरकालीन मुगल बादशाहों के समय सेना का दुर्बल होना था। सेना की अलग-अलग टुकड़ियाँ अलग-अलग मनसबदारों द्वारा भर्ती की जाती थीं। अतः यह प्रबंध बहुत दोषपूर्ण था। मनसबदारों के सैनिकों में न तो एक समान अनुशासन तथा कुशलता थी और न ही उनमें किसी प्रकार का कोई तालमेल था। इसके अतिरिक्त ये सैनिक अपने-अपने मनसबदारों को ही अपना स्वामी समझते थे और बादशाह के आदेशों की कोई परवाह नहीं करते थे। ऐसे साम्राज्य की सुरक्षा का केवल भगवान् ही मालिक था।
9. विदेशी आक्रमण- मुग़ल साम्राज्य की दुर्बलता के कारण विदेशियों को भी भारत पर आक्रमण करने का साहस हुआ और उन्होंने यहाँ आक्रमण करना आरंभ कर दिया। इन आक्रमणकारियों में नादिरशाह तथा अहमद शाह अब्दाली प्रमुख थे। उन्होंने अपने आक्रमणों के दौरान भारत में भयंकर लूटमार की। अतः ये आक्रमण मुगल साम्राज्य के लिए घातक प्रमाणित हुए।
इतिवृत्तों की रचना
मुग़ल बादशाहों को इतिवृत्त तैयार करवाने में विशेष दिलचस्पी थी। इस उद्देश्य से उन्होंने अपने दरबार में अनेक विद्वान् इतिहासकारों को संरक्षण प्रदान किया था। इन दरबारी इतिहासकारों (court historians) ने जो विवरण लिखे उनका मुख्य विषय बादशाह एवं उसके समय की घटनाएँ, शाही परिवार, दरबार, अभिजात वर्ग एवं प्रशासनिक संस्थाएँ थीं। इन इतिवृत्तों को अनेक उद्देश्यों से लिखा गया था। प्रथम, बादशाह के लिए उसके अधीन क्षेत्रों से संबंधित उपयोगी जानकारियाँ एकत्रित करना । दूसरा, लोगों के सामने एक प्रबुद्ध राज्य (enlightened kingdom) की तसवीर प्रस्तुत करना। तीसरा, मुग़ल राज्य के सभी विरोधियों को यह दर्शाना कि उनके प्रयास कभी सफल नहीं हो सकते। चौथा, बादशाह यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि उनसे संबंधित विवरण भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रहें। निस्संदेह मुग़ल बादशाहों द्वारा तैयार करवाए गए इतिवृत्त साम्राज्य और उसके अध्ययन के लिये महत्वपूर्ण स्तोत्र हैं।
*अकबर ने फ़ारसी को राज्य भाषा घोषित किया
- (i) अकबर ने फ़ारसी को राज्य भाषा इसलिए घोषित किया था कि वह ईरान एवं बौद्धिक संपर्क बनाए रखना चाहता था।
(ii) मुगल दरबार में पद पाने की इच्छा रखने वाले ईरानी एवं मध्य एशिया के लोगों ने बादशाह को इस भाषा को अपनाए जाने के लिए प्रेरित किया जाता था।
(iii) उस समय फ़ारसी को शक्ति एवं प्रतिष्ठा का सूचक समझा में कोई संकोच नहीं किया। भाषा की बादशाह शाही परिवार एवं दरबार के अभिजात वर्ग के लोग बोलते थे।
भाषा उनको प्रथम पसंद बन गई। (v) शीघ्र ही फारसी लेखाकारों, लिपिकों तथा अन्य अधिकारियों में भी लोकप्रिय हो गई।
.
नस्तलिक शैली से अभिप्राय
- नस्तलिक शैली सुलेखन की एक कला थी। इसे मुगल बादशाह अकबर द्वारा अपनाया गया था। वास्तव में एक तरल शैली थी। इसे लंबे सपाट प्रवाही ढंग से लिखा जाता था। इसे 5 से 10 मिलीमीटर की नौक वाले छँटे हुए सरकंडे जिसे कलम कहा गया था के टुकड़े से स्याही से डुबोकर लिखा जाता था। आमतौर पर कलम की नोक के मध्य में एक छोटा-सा सुराख कर दिया जाता था ताकि यह स्याही को सुगमता से सोख ले।"
मुग़ल पांडुलिपियाँ तैयार करने में चित्रकारी की क्या भूमिका
– मुग़ल पांडुलिपियाँ तैयार करने में चित्रकारी की उल्लेखनीय भूमिका होती थी। एक मुगल बादशाह के शासन की घटनाओं का विवरण देने वाले इतिहासों में लिखित पाठ के साथ ही उन घटनाओं को चित्रों के माध्यम से भी दर्शाया जाता था। अतः जब किसी पुस्तक में घटनाओं अथवा विषयों को दृश्य रूप दर्शाना होता था तो सुलेखक उसके आस-पास के पृष्ठों को खाली छोड़ देते थे। चित्रकार विषय का अध्ययन कर उसके अनुरूप अलग से चित्र बना लेते थे। बाद में इन चित्रों को पांडुलिपि में संबंधित पृष्ठ पर लगा दिया जाता था। ये सभी लघुचित्र होते थे। इन चित्रों द्वारा पांडुलिपि की सुंदरता को चार चाँद लगाए जाते थे।\
अबुल फ़ज़्ल का
अकबरनामा
- अबुल फ़ज़्ल का
अकबरनामा निस्संदेह मुगल साम्राज्य के इतिहास को जानने का एक प्रामाणिक एवं
महत्त्वपूर्ण स्रोत है। यह अकबर के शासनकाल की वास्तविक तस्वीर हमारे समक्ष
प्रस्तुत करता है। अबुल करते ने इतिहास लेखन में बौद्धिक तत्त्व का समावेश किया।
उसने इतिहास लेखन को एक दिशा प्रदान की। उसने इसे लिखते समय विवेकपूर्ण एवं
धर्म-निरपेक्ष दृष्टिकोण अपनाया। वह कट्टरवाद एवं परंपरावाद से कोसों दूर रहा।
उसने अकबरनामा में उन घटनाओं का वर्णन किया है जो उसकी आँखों देखी थी अथवा जिनकी
प्रामाणिकता उसने अन्य स्रोतों से जाँच कर ली थी।
. बादशाहनामा और इसके महत्त्व
-- बादशाहनामा को शाहजहाँ के शासनकाल से संबंधित
सबसे बहुमूल्य एवं प्रामाणिक स्रोत माना जाता है। इसमें शाहजहाँ के शासनकाल से
संबंधित 30 वर्षों की घटनाओं का विवरण दिया गया है। इसके
प्रथम 20 वर्षों का विवरण अब्दुल हमीद लाहौरी द्वारा तथा
बाद के 10 वर्षों का विवरण मुहम्मद वारिस द्वारा दिया गया
है। इसमें शाहजहाँ के पूर्वजों, शाहजहाँ के शासनकाल के
शेखों, विद्वानों एवं कलाकारों के जीवन का भी वर्णन
किया गया है।
सुलह-ए-कुल
- सुलह-ए-कुल से अभिप्राय
था सबके साथ शाँति मुग़ल बादशाह अकबर ने सुलह-ए-कुल को अपने साम्राज्य में लागू
किया। वह विभिन्न धर्मों का सहयोग तलवार के बल पर नहीं अपितु प्रेम के बल से
प्राप्त करना चाहता था। अतः उसने मुग़ल साम्राज्य के सभी अधिकारियों को प्रशासन
में सुलह-ए-कुल के नियमों का अनुपालन करने के आदेश जारी किए। उसने 1563 ई० में तीर्थयात्रा कर तथा 1564 ई० में जजिया कर को हटा दिया था। इसके अतिरिक्त उसके अधीन अभिजात वर्ग में
ईरानी, तूरानी, अफ़गानी, राजपूत भारतीय मुसलमान आदि सम्मिलित थे। इन्हें दिए गए पद एवं
ईनाम पूरी तरह से उनकी बादशाह के प्रति सेवा एवं निष्ठा पर आधारित थे।निस्संदेह इससे मुग़ल
इतिहास में एक नये युग का सूत्रपात हुआ।
. झरोखा दर्शन से अभिप्राय
उत्तर- मुगल बादशाह प्रातः
कालीन नमाज के पश्चात् सूर्योदय के समय पूर्व की ओर मुँह किए झरोखा दर्शन के लिए
आता था। यहाँ वह लगभग एक घंटा रहता था। अकबर ने इस संस्था को आरंभ किया था। झरोखे
के लिए शाही महलों में एक निर्धारित खिड़की होती थी। इसके नीचे एक विस्तृत प्रांगण
दिखाई देता था जहाँ छोटे-बड़े, - अमीर-गरीब, स्त्री-पुरुष प्रत्येक वर्ग के लोग बादशाह के दर्शन के लिए
इकट्ठे होते थे। वे बिना किसी अवरोध के बादशाह के समक्ष अपनी फरियाद कर सकते थे।
बादशाह अकबर तत्काल उनका निवारण कर देता था। इसके पश्चात् बादशाह यहाँ सेना
का निरीक्षण करता था तथा पशुओं के युद्ध को देखता था।
हरम - मुगल काल में हरम
शब्द का प्रयोग राजमहल के उस भाग के लिए किया जाता था जहाँ शाही परिवार से संबंधित
स्त्रियाँ रहती थीं। हरम शब्द फ़ारसी से निकला है जिससे अभिप्राय है पवित्र स्थान।
मुग़ल परिवार में बादशाह की पलियाँ, उपपलियाँ, उसके निकट के एवं दूरवर्ती रिश्तेदार जिनमें माता, सौतेली माताएँ एवं उपमाताएँ, बहनें, पुत्रियाँ, पुत्र वधुएँ, चाचियाँ, मौसियाँ एवं बच्चे आदि सम्मिलित थे। इनके अतिरिक्त हरम में
महिला गुलाम एवं नौकरानियाँ भी सम्मिलित थीं।
मुगलों के प्रांतीय शासन
प्रबंध
1. केंद्रीय प्रशासन
मुगलों के केंद्रीय प्रशासन
की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित थीं
1. बादशाह-बादशाह मुग़ल प्रशासन की धुरी हुआ करते थे। मुग़ल बादशाह को
निम्नलिखित शक्तियां प्राप्त थीं
(i) वह साम्राज्य का सर्वोच्च
अधिकारी था। उसे असीमित शक्तियां प्राप्त थीं।
(ii) वह साम्राज्य का सर्वोच्च कार्यपालक था। वह राज्य के सभी उच्च अधिकारियों की
नियुक्ति करता था। वह जब चाहे किसी को भी कोई भी पदोन्नति दे सकता था अथवा उसे
उसके पद से हटा सकता था।
(iii) वह शाही सेनाओं का सर्वोच्च
सेनापति था। अतः राज्य की सारी सेना उसके अधीन होती थी तथा उसकी आज्ञा का पालन
करती थी।
(iv) वह न्याय का स्रोत
था। उसके मुख से निकला प्रत्येक शब्द कानून समझा जाता था।
मुग़ल बादशाह को अनेक
विशेषाधिकार प्राप्त थे। इनका उपयोग कोई अन्य व्यक्ति नहीं
कर सकता था। इन
विशेषाधिकारों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित अनुसार था
(i)
केवल बादशाह ही सिंहासन पर
बैठ सकता था। कोई अन्य व्यक्ति नहीं।
(ii)
केवल बादशाह ही प्रतिदिन
झरोखे से प्रजा को दर्शन दे सकता था।
(iii)
केवल बादशाह को ही किसी भी
अपराधी को मृत्यु दंड देने का अधिकार प्राप्त था।
(iv)
केवल बादशाह को खुतबा पढ़ने
तथा सिक्के जारी करने का अधिकार प्राप्त था।
(v)
केवल बादशाह ही शाही दरबार
में ऊंचे स्थान पर बैठ सकता था।
(vi)
केवल बादशाह को ही उपाधियां देने का अधिकार प्राप्त था।
(vii)
केवल बादशाह ही किसी से युद्ध अथवा संधि की घोषणा कर सकता
था।
2. वकील-मुग़ल प्रशासन में केंद्र में बादशाह के पश्चात् दूसरा
सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थान वकील को प्राप्त था। उसे वज़ीर अथवा प्रधानमंत्री के
नाम से भी जाना जाता था। मुग़ल काल में वकील के प्रमुख कार्य निम्नलिखित थे
(i) वह सदैव बादशाह की सेवा में उपस्थित रहता था तथा उसे महत्त्वपूर्ण विषयों में परामर्श देता था।
(ii) वह बादशाह को राज्य में
घटने वाली समस्त महत्त्वपूर्ण घटनाओं की जानकारी देता था।
(iii) वह राज्य में बादशाह के
आदेशों का पालन करवाता था।
(iv) वह राज्य के विभिन्न
विभागों का निरीक्षण करता था।
(v) वह बादशाह तथा शासन के उच्च
पदाधिकारियों के बीच एक कड़ी का काम करता था।
(vi) वह बादशाह की बीमारी के कारण अथवा उसकी अनुपस्थिति में उसका प्रतिनिधित्व करता था ।
3. दीवान-ए-आला --वकील के पश्चात् केंद्रीय मंत्रिमंडल में दूसरा सर्वाधिक
महत्त्वपूर्ण पद दीवान-ए-आला का था। वह राज्य का वित्त मंत्री था। मुग़ल काल में
दीवान-ए-आला की मुख्य शक्तियां निम्नलिखित थीं
(i) बादशाह की आर्थिक नीति को
कार्यान्वित करने और उसे सफल बनाने का उत्तरदायित्व
उस पर था।
(ii) वह भू-राजस्य तथा
अन्य करों को एकत्र करने संबंधी नियम बनाता था।
(iii) साम्राज्य के भीतर कर एकत्र
करने वाले सभी कर्मचारी उसके अधीन थे।
(iv) वह साम्राज्य की आय
को विभिन्न विभागों में वितरित करता था तथा इन विभागा के व्यय की जाँच भी करता था।
(v) उसके आदेश के बिना राजकोष
से धन नहीं निकाला जा सकता था तथा न ही किसी को कोई भुगतान किया जा सकता था।
(vi) वह दुर्भिक्ष पड़ने पर
किसानों को भू-राजस्व में दी जाने वाली छूट की घोषणा करता था।
(vii) वह प्रांतीय दीवानों
की नियुक्ति के संबंध में बादशाह को परामर्श देता था तथा उनके कार्यों का निरीक्षण
भी करता था।
4. मीर बख्शी- मीर बख्शी मुगल काल का तीसरा महत्त्वपूर्ण मंत्री था। वह
सेना का अध्यक्ष तथा महावेतनाधिकारी था। मीर बख्शी के मुख्य कार्य निम्नलिखित थे
(i) वह बादशाह का प्रमुख सैनिक परामर्शदाता था।
(ii) वह मनसबदारी व्यवस्था के
सुचारू संचालन के लिए उत्तरदायी था।
(iii) वह सभी सैनिक एवं असैनिक मनसबदारों के रिकार्ड अपने पास
रखता था।
(iv) वह सेना में भर्ती होने
वाले इच्छुक उम्मीदवारों को बादशाह के सम्मुख प्रस्तुत करता था।
(v) वह सैनिक तथा घोड़ों का वार्षिक निरीक्षण करता था तथा इस संबंध में एक प्रमाण
पत्र जारी करता था।
(vi) वह मनसबदारों की नियुक्ति,
उन्नति एवं स्थानान्तरण संबंधी बादशाह को सिफारिश करता था।
(vii) वह बादशाह को विशिष्ट सेवा के लिए पुरस्कृत होने
वाले मनसबदारों की सिफारिश करता था।
(vii) उच्च अधिकारियों,
राजदूतों एवं अन्य विशिष्ट मेहमानों को बादशाह के सम्मुख प्रस्तुत करता था।
5. सदर-उस-सुदूर ---सदर-उस-सुदूर की गणना मुग़ल काल के महत्त्वपूर्ण मंत्रियों
में की जाती है। उसे सदर-ए-जहाँ अथवा सदर-ए-कुल भी कहा जाता था। वह धर्म, न्याय, दान एवं शिक्षा विभागों का
अध्यक्ष था। इस पद पर पवित्र विचारों वाले एवं उच्च चरित्र वाले व्यक्ति को ही नियुक्त किया जाता था। मुगल काल में
सदर-उस-सुदूर के मुख्य कर्त्तव्य निम्नलिखित ये के
(i) वह बादशाह का प्रमुख धार्मिक सलाहकार था।
(ii) वह राज्य की धार्मिक
नीति नियंत्रित करता था तथा यह सुनिश्चित करता था कि बादशाह कुरान के आदेश अनुसार शासन करे ।
(iii) वह इस्लामी कानून की
व्याख्या करता था तथा उसका निर्णय मिल्लत (प्रजा) एवं बादशाह दोनों के लिए बाध्य
समझा जाता था।
(iv) उसे उलेमाओं का प्रतिनिधि
समझा जाता था। अतः वह उलेमाओं के हितों की रक्षा करता था।
(v) वह इस्लामी कानून द्वारा स्वीकृत दो धार्मिक करों-जकात (मुसलमानों से वसूल
किया जाने वाला कर) एवं जजिया (गैर-मुसलमानों से वसूल किया जाने वाला कर) की वसूली
का प्रबंध करता था।
(vi) वह राज्य के पीरों-फकीरों,
संतों एवं महात्माओं की सूची तैयार करता था ताकि सरकारी
सहायता दी जा सके।
6. खान-ए-सामां-खान-ए-सामां मुगल काल का एक महत्त्वपूर्ण मंत्री था। उसे
मीर सामा भी कहा जाता था। वह शाही परिवार का प्रबंधक मंत्री था। वह बादशाह एवं
उसके परिवार की सभी आवश्यकताओं को पूर्ण करता था। उसके प्रमुख कर्त्तव्य
निम्नलिखित होते थे
(i) वह बादशाह एंव उसके
हरम में काम आने वाली आवश्यकता की प्रत्येक वस्तु तैयार करता था।
(ii) वह इस बात को ध्यान में रखता था कि शहज़ादों एवं शहजादियों
की आवश्यकता की वस्तुएं सदैव उनके पास उपलब्ध रहें।
(iii) वह उन उपहारों की व्यवस्था करता था जो बादशाह मनसबदारों,
विदेशी राजदूतों, विद्वानों, शहजादों, शहजादियों एवं अन्य लोगों
को देने की घोषणा करता था। वह इन उपहारों के मूल्यों के आँकड़े भी रखता था। (iv)
वह बादशाह को दिए जाने वाले उपहारों का संग्रह तथा उनका
मूल्यांकन भी करता था
(v) वह बादशाह के दिन-प्रतिदिन
के व्यय का ब्योरा रखता था।
7. काज़ी-उल- कज़ात-मुगल काल में बादशाह स्वयं साम्राज्य का सर्वोच्च
न्यायाधीश या उसकी सहायता के लिए राजधानी में एक प्रमुख काजी नियुक्त किया जाता
था। उसे काजी उल-कजात कहा जाता था। मुगल काल के अधिकतर काजी भ्रष्ट एवं बेईमान थे।
अतः उनसे निष्पक्ष न्याय की आशा नहीं की जा सकती थी। मुगल काल में काजी-उल-कजात के
प्रमुख कार्य निम्नलिखित थे
(i) वह बादशाह को न्याय संबंधी
परामर्श देता था।
(ii) वह इस्लामी कानून के अनुसार
न्याय करता था।
(iii) वह प्राँतों में काजियों
एवं मुफतियों की नियुक्तियों के लिए बादशाह से सिफारिश करता था।
(iv) वह प्राँतीय एवं स्थानीय
अदालतों के कार्यों का निरीक्षण करता था तथा उनके निर्णय के विरुद्ध अपीलें भी सुनता था।
II. प्रांतीय प्रशासन
बाबर ने भारत में केवल चार
वर्षों तक शासन किया। इस समय के दौरान वह युद्धों में उलझा रहा। हुमायूँ को भी
अपने शासनकाल में अनेक युद्धों एवं पराजयों का सामना करना पड़ा। यहाँ तक कि वह
पंद्रह वर्षों तक भारत से निर्वासित रहा। इन कारणों से इन दोनों बादशाहों को
प्रशासन को सुदृढ़ करने का अवसर नहीं मिला। मुग़ल बादशाह अकबर के समय मुगल
साम्राज्य का काफ़ी विस्तार हो गया था। अतः अकबर ने शासन व्यवस्था की सुगमता के
लिए मुग़ल साम्राज्य को 15 सूर्यो अथवा प्राँतों में
विभक्त किया था। जहाँगीर के शासनकाल में इन सूबों की संख्या 17, शाहजहाँ के शासनकाल में 22 तथा औरंगज़ेब के शासनकाल में 21 थी। अकबर ने सभी सूबों के लिए एक समान प्रशासनिक पद्धति का विकास किया।
1. सूबेदार ---प्रत्येक प्रांत के सर्वोच्च अधिकारी को अकबर के काल में
सूबेदार अथवा सिपहसालार कहा जाता था। मुग़ल काल में कई बार एक से अधिक सूबों के
लिए एक ही सूबेदार को नियुक्त किया जाता था। सूबेदार के प्रमुख कर्त्तव्य
निम्नलिखित थे
(i) उसका प्रमुख कर्त्तव्य प्राँत में शांति तथा व्यवस्था बनाए रखना था।
(ii) वह बादशाह के आदेशों को
सख्ती से प्राँत में लागू करवाता था। इन आदेशों की अवहेलना करने वालों को वह दंडित करता था।
(iii) उसके अधीन एक सेना होती थी। इसकी सहायता से वह आन्तरिक
विद्रोहों का दमन करता था तथा प्रजा की अत्याचारी अधिकारियों से रक्षा करता था। सूबे के सभी अधिकारी उसके अधीन होते थे। यदि कोई
अधिकारी उसके आदेश का उल्लंघन करता तो सूबेदार उसे दंड दे सकता था।
(v) वह प्रांतीय सेना को
पूर्णतया अपने नियंत्रण में रखता था तथा उसके अपव्यय को रोकता था।
2. दीवान ----प्रांत के सूबेदार के पश्चात दीवान का पद सर्वाधिक
महत्त्वपूर्ण था। उसकी नियुक्ति केंद्रीय दीवान-ए-आला की सिफारिश पर बादशाह द्वारा
की जाती थी। वह अपने कार्यों के प्रति सूबेदार की अपेक्षा केंद्र के प्रति उत्तरदायी
था। उसे अपने मनसब के अतिरिक्त पचास घुड़सवारों का एक निजी दस्ता मिला होता था। वह
सूबे के वित्त विभाग का अध्यक्ष था।
उसके मुख्य कर्त्तव्य
निम्नलिखित थे
(1) वह प्राँत की आय और व्यय का
ब्योरा रखता था।
(ii) उसका सूबे के राजकोष पर
पूर्ण नियंत्रण होता था तथा उसकी अनुमति के बिना कोई धन व्यय नहीं किया जा सकता
था।
(iii) उसका कर्त्तव्य यह
देखना भी होता था कि केवल बादशाह अथवा दीवान-ए-आला द्वारा स्वीकृत कार्यों के
लिए धन खर्च किया जाए और उतना ही धन खर्च किया जाए जितने क लिए स्वीकृति मिली हो ।
(iv) वह कृषि को प्रोत्साहन देता था तथा इस उद्देश्य से किसानों को तकावी कर्जे
बांटे जाते.
(v) वह भू-राजस्व वसूल करवाता
था। वह कृषकों द्वारा बकाया भू-राजस्व को इस प्रकार से वसूल करता था ताकि उन्हें
किसी प्रकार का कष्ट न हो।
(vi) वह राजस्व विभाग के सभी कर्मचारियों पर नियंत्रण रखता था। वह यह भी देखता
था कि ये कर्मचारी रिश्वत न
लें तथा अनाधिकृत करों की वसूली न करें।
3. बख्शी --वह प्राँत का एक अन्य महत्त्वपूर्ण अधिकारी था। उसकी
नियुक्ति मीर बख्शी की सिफारिश पर बादशाह द्वारा की जाती थी। उसके मुख्य कार्य
निम्नलिखित थे
(i) वह प्राँतीय सेना की भर्ती
करता था तथा उसमें अनुशासन बनाए रखता था।
(ii) वह मनसबदारों तथा उनके अधीन
सैनिकों एवं घोड़ों का ब्योरा रखता था।
(iii) वह सैनिकों के हुलिया तथा घोड़ों को दागे जाने संबंधी
नियमों को लागू करवाता था।
(iv) वह समस्त सैनिकों को
वेतन भी बांटता था। (v) वह प्रांतीय सैनिकों को
पदोन्नतियां देता था तथा उनका स्थानांतरण भी करता था।
4. सदर-- प्रांतीय सदर की
नियुक्ति बादशाह द्वारा सदर-उस-सुदूर के परामर्श पर की जाती थी। इस पद पर किसी
साधु स्वभाव एवं विद्वान् व्यक्ति को ही नियुक्त किया जाता था। उसका लोगों द्वारा बहुत आदर एवं सम्मान किया जाता था।
सदर के प्रमुख कार्य अग्रलिखित थे
(i) वह प्राँत के संतों
एवं पीरों-फकीरों की सूचियां तैयार करता था तथा उन्हें अनुदान देने के लिए बादशाह
को आग्रह करता था।
(ii) वह विद्वानों, कलाकारों तथा अन्य जरूरतमंद
व्यक्तियों के लिए वजीफा मंजूर करता था।
(iii) वह धर्मार्थ दी गई
भूमि का प्रबंध करता था।
(iv) वह दान संबंधी झगड़ों
निर्णय करता था।
(v) वह प्राँतीय शिक्षा
के प्रसार को प्रोत्साहन देता था।
5. काज़ी- वह प्राँतीय न्याय विभाग का अध्यक्ष होता था। उसकी
नियुक्ति बादशाह द्वारा काजी-उल-कजात के परामर्श से की जाती थी। काजी के प्रमुख
कर्त्तव्य निम्नलिखित थे
(i) वह प्राँत के दीवानी मुकद्दमों का निर्णय करता था।
(ii) वह प्राँत के अधीन सरकारों
(जिलों) तथा नगरों के काजियों के काम-काज का निरीक्षण करता था।
(iii) वह प्राँत के बड़े-बड़े अमीरों एवं सरदारों के विवाह रस्मों
को पूर्ण करवाता था।
6. वाकियानवीस-वह प्रांतीय गुप्तचर विभाग का मुखिया था। उसके प्रमुख
कर्तव्य निम्नलिखित थे
(1) वह प्राँत की सभी घटनाओं की जानकारी रखता था।
(ii) वह प्राँत की सभी महत्त्वपूर्ण घटनाओं की जानकारी बादशाह को भेजता था।
(iii) वह प्रांत में अनेक
स्थानों पर गुप्तचरों की नियुक्तियां करता था। ये गुप्तचर प्रांत में घटित होने
वाली प्रत्येक घटना की जानकारी वाकियानवीस को भेजते थे।
7. कोतवाल -----वह नगर पुलिस का प्रधान अधिकारी था। उसकी नियुक्ति केंद्रीय
सरकार द्वारा की जाती थी। उसके
प्रमुख कर्त्तव्य निम्नलिखित थे
(i) वह नगर में शांति व्यवस्था
के लिए उत्तरदायी था।
(ii) वह नगर को विभिन्न मुहल्लों में विभक्त करता था तथा विभिन्न मुहल्लों के
चौकीदारों एवं मुखबिरों से नगर की महत्त्वपूर्ण घटनाओं की सूचना प्राप्त करता था।
(iii) वह नगर की सुरक्षा
के लिए प्रबंध करता था तथा रात के समय चौकीदारी की उचित व्यवस्था करता था।
(iv) वह नगर में प्रकाश तथा
सफ़ाई को भी ध्यान में रखता था।
(v) वह नगर के बदमाशों,
वैश्याओं, शराब तथा अन्य नशीली
वस्तुएं बेचने वालों की गतिविधियों पर कड़ी निगरानी रखता था।
मनसबदारी प्रथा
- मुगल बादशाह अकबर ने
मनसबदारी प्रणाली में उल्लेखनीय सुधार किए। इसका प्रमुख उद्देश्य मुग़ल सेना को संगठित करना था। यह प्रणाली
अकबर के उत्तराधिकारियों के समय भी जारी रही।
मनसबदारी प्रणाली
से अभिप्राय- मनसबदारी अरबी भाषा का
शब्द है जिससे अभिप्राय है पदवी अथवा स्थान निश्चित करना। अतः मनसबदारी वह प्रबंध
था जिसके अनुसार मुग़ल कर्मचारियों का पद, आय तथा दरबार में
स्थान निश्चित किया जाता था। मनसब केवल सैनिक कर्मचारियों को नहीं अपितु असैनिक
कर्मचारियों को भी दी जाती थी।
I. मनसबदारी प्रणाली की
विशेषताएँ
मुग़लों की मनसबदारी
प्रणाली की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं
1. मनसबदारों की नियुक्ति, पदोन्नति तथा पद मुक्ति--- मुगल बादशाह प्रायः
मनसबदारों की नियुक्ति मीर बख़्शी की सिफ़ारिश पर स्वयं करते थे, परंतु वे राजकुमारों, प्राँतों के सूबेदारों आदि की सिफारिशों को भी मानते थे। उल्लेखनीय बात यह है
कि मनसबदारों को योग्यता के आधार पर भर्ती किया जाता था। मनसबदार निम्न पद पर
भर्ती होकर उच्च पद पर पहुँचते थे। परंतु बादशाह किसी भी मनसबदार की वीरता एवं काम
से प्रसन्न होकर मनसबदारी का कोई भी पद दे सकता था। मनसबदारों की पदोन्नति हर शुभ
अवसर पर तथा युद्धों से पूर्व या बाद में की जाती थी। बादशाह ठीक कार्य न करने
वाले मनसबदारों का पद कम कर सकता था। उनको पद से निलंबित कर सकता था।
2. मनसबदारों के वर्ग- अबुल फ़ज़्ल के
अनुसार अकबर ने मनसबदारों की 66 श्रेणियों की स्थापना की
थी। पर वास्तव में इनकी संख्या 33 थी। अकबर के प्रारंभिक काल
में भनसबदारों का सबसे निम्न पद 10 का तथा सबसे बड़ा पद 10,000 का था। अकबर के अंतिम वर्षों में यह पद 12,000 का हो गया था। राज दरबारियों को 7,000 तक की मनसब दी जाती थी। इससे ऊपर की मनसब शाही कुल से संबंधित सदस्यों के लिए सुरक्षित रखी जाती
थी। 500 से नीचे श्रेणी वाल को मनसबदार, 500 से 2500 के मध्य श्रेणी वालों को
अमीर तथा 2500 व उससे उच्चतम श्रेणी
वालों को अमीर-ए-उम्दा अथवा उम्दा-ए-आजम कहा जाता था।
3. जात तथा सवार पद- मनसबदारों को अपने
पद के अनुसार सैनिक तथा घोड़े रखने होते. थे। जब अकबर ने देखा कि मनसबदार उतने घोड़े
नहीं रखते जितने उनको रखने चाहिए तो उसने दो तरह की मनसब बना दी। इसको जात एवं
सवार कहा जाता था। जात का अर्थ है व्यक्तिगत । अतः जात मनसब के अनुसार मनसबदारों
की पदवी तथा उनकी आय निश्चित की जाती थी। सवार से अभिप्राय उन घुड़सवारों से था जो
मनसबदार अपने अधीन रखते थे सवार मनसब की तुलना में जात मनसब को अधिक महत्त्वपूर्ण
माना जाता था। जात एवं सवार मनसब के अनुसार मनसबदारों के तीन वर्ग थे। प्रथम वर्ग
के मनसबदारों का जात तथा सवार मनसब समान होते थे जैसे 5000/50001 दूसरे वर्ग में वे मनसबदार थे जिनका सवार मनसब जात मनसब के
आधे से अधिक था जैसे 5000/3000 तृतीय वर्ग में वे मनसबदार
थे। जिनका =t सवार मनसब जात मनसब के आधे
से कम या जैसे 5000/20001 5. मनसबदारों के कर्त्तव्य-
बादशाह मनसबदारों को किसी भी प्रकार के सैनिक एवं गैर सैनिक कार्यों पर लगा सकता
था। उनको दूसरे देशों को जीतने, विद्रोहियों को कुचलने तथा
चोर-डाकुओं को पकड़ने के लिए भेजा जा सकता था। उनको प्रशासन प्रबंध के किसी भी विभाग में या दरबार में
उपस्थित होने के लिए भी कहा जा सकता था। 6. वेतन- मनसबदारों को वेतन उनके वर्गों के पदों के अनुसार दिए जाते थे। ये वेतन
जात तथा सवार पद के लिए भिन्न-भिन्न होते थे। अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ के समय मनसबदारों को अच्छे वेतन मिलते थे। मनसबदारों की
मृत्यु के पश्चात् उनकी संपत्ति जब्त कर ली जाती थीं।
II. मनसबदारी प्रणाली के गुण
एवं दोष
मुग़लों की मनसबदारी प्रणाली के प्रमुख गुण एवं दोष निम्नलिखित थे
1. मनसबदारी प्रणाली के गुण-
मनसबदारी प्रणाली के अनेक गुण थे। मनसब योग्यता के आधार पर दिये जाते थे। इसलिए
प्रत्येक मनसबदार अपनी कार्यकुशलता दिखाने का हर संभवः प्रयास करता था। मनसबदारों
को अपने वेतन तथा पदोन्नति के लिए बादशाह पर निर्भर रहना पड़ता था। इसलिए विद्रोह
की संभावना कम हुई। मनसबदारी प्रणाली के कारण ही मुगल बादशाह एक विशाल स्वामी भक्त
सेना का संगठन करने में सफल हुए।
2. मनसबदारी प्रणाली के दोष- मनसबदारी प्रणाली में अनेक
दोष भी थे। सैनिक एवं गैर सैनिक सेवाओं को एक करने के कारण सेना की कार्यकुशलता कम
हो गई। अधिक वेतन तथा जब्ती प्रथा होने के कारण मनसबदार ऐश्वर्य का जीवन व्यतीत
करने लगे। मनसबदार सैनिक मनसबदारों के प्रति अधिक विश्वसनीय होते थे न कि बादशाह
के विभिन्न मनसबदारों के अंतर्गत कार्य करने वाले सैनिकों में आपसी तालमेल की कमी
थी
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