chapter -4 बौद्ध धर्म का इतिहास सांची स्तूप class 12th

 



600 ईसवी पूर्व से 600 ईसवी तक इतिहास के पुनर्निमाण के लिए ऐतिहासकार जिन स्रोतों का प्रयोग करते हैं  उनमें से चार प्रमुख हैं 

1 बौद्ध ग्रंथ 

2 जैन ग्रंथ 

3ब्राह्मण ग्रंथ 

4 भवन

सांची स्तूप 

साँची की गणना बौद्ध धर्मावलंबियों के एक विख्यात केंद्र के रूप में की जाती है । इसकी कला एवं शिल्पकारी देख कर आज भी व्यक्ति चकित रह जाते हैं । यह भोपाल से 20 मील उत्तर - पूर्व की तरफ एक पहाड़ी की तलहटी पर स्थित है । साँची स्तूप का निर्माण मौर्य काल में अशोक ने तीसरी सदी ई ० पू ० में करवाया था । इसमें महात्मा बुद्ध के अवशेषों को रखा गया था । अशोक के शासनकाल में साँची स्तूप को केवल ईंटों से बनाया गया था । शुंग काल में साँची का कायापलट कर दिया गया । इस काल में राजा अशोक द्वारा बनवाए गए स्तूप का आकार दुगुना कर दिया गया । यह गोलार्ध  आकार का था । इसे अंड ( anda ) कहा जाता था । इसे पत्थर का आवरण ( cover ) दिया गया । स्तूप के चारों ओर वेदिका ( railing ) एवं सीढ़ियाँ बनी होती थीं । अंड के ऊपर एक हर्मिका ( harmika ) बनाई गई थी । सातवाहन शासनकाल में पहली सदी ई ० पू ० में साँची स्तूप के चारों ओर चार प्रवेश द्वार बनवा दिए गए । इन प्रवेश द्वारों को तोरण कहा जाता था । सातवाहन शासनकाल में बने तोरण शिल्पकारी के अद्भुत नमूने हैं । ये तोरण लगभग 34 फुट ऊँचे हैं । इनके नीचे जो खंभे बनाए गए हैं वे 14 फुट ऊँचे हैं । इन खंभों के मध्य अंतर लगभग 9 फुट है । इन तोरणों पर महात्मा बुद्ध के जीवन से संबंधित अनेक सुंदर एवं सजीव चित्र बने हुए हैं । इन सभी दृश्यों में महात्मा बुद्ध को कहीं भी मानुषिक रूप में नहीं दर्शाया गया है । उनकी उपस्थिति प्रतीकों के रूप में - जैसे धर्मचक्र , पदचिन्ह , कमल एवं बोधि वृक्ष आदि दर्शाया जाता था । इन तोरणों में जो दृश्य दिखाए गए हैं उनमें सिंह , हाथी , मुनि , जनसाधारण लोग , आम के पेड़ों के साथ लटकती शालभंजिका ( shalabhanjika ) की मूर्तियाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं । इनके अतिरिक्त इनमें अनेक पुष्पों , पशुओं , पक्षियों , पौराणिक जीवों एवं नाग आदि के चित्र दिए गए हैं । निस्संदेह साँची स्तप की कला बहत उच्च कोटि की है ।

: सांची स्तूप की खोज करने वाले दो यूरोपीय  के नाम अलेक्जेंडर कनिंघम तथा जॉन मार्शल थे।

: सांची का स्तूप भोपाल के निकट एक पहाड़ी की तलहटी पर स्थित है इसका निर्माण मौर्य शासक अशोक ने तीसरी सदी ईस्वी पूर्व में करवाया था

: साँची स्तूप का निर्माण करने वाले तीन महत्वपूर्ण थे मौर्य वंश सातवाहन वंश शुंग वंश।

 वेद 

वेद चार हैं इनके नाम हैं ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद तथा अथर्ववेद

 सबसे प्राचीन वेद ऋग्वेद है ऋग्वेद की रचना 1500 -1000 ईसवी पूर्व में अनेक ऋषियों द्वारा की गई थी

 पूर्व वैदिक परंपरा की जानकारी हमें ऋग्वेद से मिलती है ऋग्वेद में अग्नि सोम ,इंदर आदि कई देवताओं की स्तुति का संग्रह उपलब्ध है।

 लोग यज्ञ क्यों करते थे? मवेशियों के लिए  

 पुत्र के लिए 

अच्छे स्वास्थ्य के लिए

 लंबी उम्र के लिए।

  वैदिक धर्म

I. ऋग्वैदिक काल का धार्मिक जीवन  ऋग्वैदिक काल के लोगों के धार्मिक जीवन की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं 

1. प्रकृति की उपासना  — ऋग्वैदिक आर्यों का धार्मिक जीवन बहुत पवित्र तथा सादा था । वे प्राकृतिक शक्तियों को देवता मानकर उनकी पूजा करते थे । वे कई देवी - देवताओं की पूजा करते थे । देवियों की संख्या तथा उनका महत्त्व भी देवताओं की तुलना में कम था । ऋग्वेद में 33 देवताओं का वर्णन किया गया है । इन देवी - देवताओं का भूमि से संबंधित , वायु से संबंधित तथा स्वर्ग से संबंधित तीन वर्गों में विभाजन किया गया है । पृथ्वी , अग्नि , सोम , बृहस्पति तथा नदियाँ प्रथम वर्ग से संबंधित हैं । इंद्र , रुद्र , वायु तथा अपाह ( जल ) द्वितीय वर्ग से तथा वरुण , सूर्य , ऊषा तथा अश्विन तीसरे वर्ग से संबंधित हैं । वरुण उनका सबसे बड़ा देवता था जो कि संसार के सब रहस्य जानता था । उसे आकाश का देवता कहते थे । वह पापियों को दंड देता था । उससे आर्य लोग अपने अपराधों की क्षमा माँगते थे । आर्यों का दूसरा बड़ा देवता इंद्र था । उसे युद्ध तथा वर्षा का देवता समझा जाता था । आर्य युद्ध में विजय तथा समय पर वर्षा के लिए उसकी पूजा करते थे । ऋग्वेद में सर्वाधिक मंत्र उसकी स्तुति में हैं । इनकी संख्या 250 है । ऋग्वेद में अग्नि से संबंधित 200 मंत्र दिए गए हैं । अग्नि को पृथ्वी तथा स्वर्ग के मध्य एक दूत के समान समझा जाता था । सोम आर्यों का एक अन्य महत्त्वपूर्ण देवता था ।सोमरस को एक ऐसा अमृत समझा जाता था जिसे पीकर देवता अमर हो जाते थे । इसका हवन में प्रयोग किया जाता था । इसे देवताओं को भेंट किया जाता था । इनके अतिरिक्त आर्य सूर्य , आंधी - तूफान के देवता मारुत , मृत्यु के देवता उनका विभिन्न रूपों में वर्णन किया है । शाम पवन देवता वायु आदि की पूजा भी करते थे । वे कई देवियों जैसे कि प्रातः की देवी ऊषा , रात की देवी रात्रि , अरती की देवी पृथ्वी , वन देवी आरण्यी आदि की भी पूजा करते थे । ऋग्वैदिक काल में उन्हें प्रमुखता प्राप्त नहीं । आर्य एक ईश्वर में विश्वास रखते थे । आर्यों का विश्वास था कि सभी देवता एक ही हैं ।

2 उपासना विधि  -आर्यों की उपासना विधि बहुत सरल थी । वे खुले वायुमंडल में एकाचित होकर मंत्रों का उच्चारण करते थे । वे अपने देवी - देवताओं को प्रसन्न करने के लिए कई प्रकार के यज्ञ करते थे । ये यज्ञ बहुत ध्यानपूर्वक किए जाते थे क्योंकि उन्हें यह भय होता था कि थोड़ी सी भूल से उनके देवता रुष्ट न हो जाएँ । सबसे पहले यज्ञ के लिए अग्नि प्रज्वलित को जाती थी । फिर उसमें घी , दूध , चावल और सोमरस डाला जाता था । इन यज्ञों में कई पशुओं की बलि भी दी जाती थी । वे यज्ञ कई प्रकार के होते थे । सबसे छोटा यज्ञ पारिवारिक स्तर पर होता था । बड़े यज्ञों की तैयारी बहुत पहले से आरंभ कर दी जाती थी और धनवान् लोग इन यज्ञों में भारी दान देते थे । इन यज्ञों तथा बलियों का मुख्य उद्देश्य देवताओं को प्रसन्न करना था । वे समझते थे कि इसके बदले में उन्हें लड़ाई में विजय प्राप्त होगी , धन प्राप्त होगा , संतान वृद्धि होगी तथा सुखमय दीर्घ जीवन मिलेगा । आर्य यह समझते थे कि प्रत्येक यज्ञ से संसार की फिर से उत्पत्ति होती है और यदि ये यज्ञ न कराए जाएँ तो संसार में अंधकार फैल जाएगा । इन यज्ञों के कारण गणित , खगोल विद्या तथा जानवरों की शारीरिक संरचना के ज्ञान के संबंध में वृद्धि हुई ।

उत्तर वैदिक काल का धार्मिक जीवन 

उत्तर वैदिक काल में आर्यों के धार्मिक जीवन में अनेक परिवर्तन आ गए थे तथा पहले की अपेक्षा अधिक जटिल हो गया था । समाज में पुरोहितों का प्रभुत्व स्थापित हो गया था तथा उन्होंने अपने स्वार्थी हितों के लिए धर्म को आडंबरपूर्ण बना दिया था । 

1. नए देवता  - उत्तर वैदिक काल में ऋग्वैदिक काल में पूजे जाने वाले देवी देवताओं का महत्त्व कम हो गया था । इस काल में कई नए देवी - देवताओं की पूजा आरंभ हो गई थी । प्रजापति ब्रह्मा को अब सर्वोच्च स्थान प्राप्त हुआ । उसे संसार का रचयिता माना जाता था । दूसरा स्थान विष्णु को मिला । उसे संसार का पालक तथा रक्षक माना जाता था । राम तथा कृष्ण को विष्णु का अवतार माना जाने लगा । तीसरा स्थान शिव को प्राप्त हुआ । उसे संसार को नष्ट करने वाला माना जाने लगा । इस प्रकार इस काल में त्रिदेव के सिद्धांत का प्रचलन हुआ । इनके अतिरिक्त इस काल में दुर्गा , काली तथा पार्वती आदि देवियों को अधिक महत्त्वपूर्ण माना जाने लगा । इस काल में देवी देवताओं की मूर्तियाँ बनाकर उनकी पूजा आरंभ कर दी गई थी ।

 2. धर्म में जटिलता  - उत्तर वैदिक काल में धर्म काफी जटिल हो गया था । प्रत्येक व्यक्ति को जन्म से लेकर मृत्यु तक 40 संस्कार अवश्य करवाने होते थे । इस काल में यज्ञों पर अधिक बल दिया जाने लगा । ये यज्ञ पहले की अपेक्षा अधिक विस्तृत तथा जटिल हो गए थे । कुछ यज्ञ जैसे राजसूय rajasuya ) , अश्वमेध ( ashvarmeda ) एवं वाजपेय ( vajapeya ) नामक यज्ञ कई कई वर्षों तक चलते रहते थे । इन यज्ञों में पुरोहित बड़ी संख्या में सम्मिलित होते थे । वे मंत्रों के उच्चारण की शुद्धता पर बहुत ध्यान देते थे । इन यज्ञों में बड़े पैमाने पर पशुओं को बलि दी जाती थी । इसके अतिरिक्त अब मानवों को भी बलि दी जाने लगी । यज्ञों भाग लेने वाले पुरोहितों को भारी मात्रा में दक्षिणा देनी पड़ती थी । इन कारणों से अब ये यज्ञ बहुत महँगे हो गए । क्योंकि पुरोहितों के बिना कोई भी धार्मिक कार्य अधूरा समझा जाता था इसलिए समाज में उनका प्रभुत्व बहुत बढ़ गया ।

3. नए विश्वास - उत्तर वैदिक काल में आर्यों में नए धार्मिक विश्वास उत्पन्न हो गए थे । अब वे तप पर बहुत बल देने लगे थे । उनका विचार था कि जब तक शरीर को अधिक - से - अधिक कष्ट न दिया जाए , मन को नियंत्रण में नहीं किया जा सकता । इस काल में आवागमन , मुक्ति तथा कर्म सिद्धांत अधिक विकसित हो गए थे । आर्यों का विश्वास था कि मनुष्य मृत्यु के पश्चात् पुनर्जन्म धारण करता है । इस आवागमन के चक्र से मुक्ति पाने के लिए मोक्ष पाना आवश्यक है । मनुष्य को उसके कर्मों के अनुसार फल मिलता है , इसलिए उसे सदैव अच्छे कार्य करने चाहिएँ । इस काल में आर्यों के अंध - विश्वासों में बहुत वृद्धि हो गई थी । वे जादू - टोनों तथा भूत प्रेतों में विश्वास करने लगे थे ।

 

उपनिषद्

भारतीय दर्शन प्रणाली का वास्तविक आरंभ उपनिषदों से माना जाता है । उपनिषद् वे ग्रंथ हैं जिनमें दुनिया के सबसे ऊँचे आध्यात्मिक ज्ञान के मोती पिरोये हुए हैं । इन मोतियों की चमक से मनुष्य का आंतरिक अंधेरा दूर हो जाता है और ऐसा प्रकाश होता है जिसके आगे सूर्य का प्रकाश भी कम हो जाता है । यदि उपनिषदों को भारतीय दर्शन का मूल स्रोत कह दिया जाये तो इसमें कोई अतिकथनी नहीं होगी । उपनिषद् तीन शब्दों के मेल से बना है । ' उप ' से भाव है नज़दीक , ' नि ' से भाव है श्रद्धा और ' षद् ' से भाव है बैठना । इस तरह उपनिषद् से भाव है श्रद्धा भाव से नज़दीक बैठना । वास्तव में उपनिषद् एक ऐसा ज्ञान है जो एक गुरु अपने पास ( समीप ) बैठे हुए शिष्य को गुप्त रूप से प्रदान करता है । उपनिषदों को वेदांत भी कहा जाता है क्योंकि इनको वेदों का अंतिम भाग समझा जाता है । वेदांत से भाव अंतिम ज्ञान है । इसका भाव यह है कि उपनिषदों में ऐसा ज्ञान दिया गया है जिसके बाद और अन्य कोई ज्ञान नहीं है । उपनिषदों की रचना अलग - अलग ऋषियों द्वारा 1000 ई ० पू ० से 500 ई ० पू ० के मध्य की गई । उपनिषदों की कुल संख्या 108 है । इनमें से 11 उपनिषद् अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं । इनके नाम ये हैं ईश , केन , कठ , प्रश्न , मुंडक , मांडूक्य , तैतरीय , ऐतरेय , छांदोग्य


पुराणों से अभिप्राय है प्राचीन।इनकी कुल संख्या 18 है।इन्हें संस्कृत भाषा मे लिखा गया है।

: नियतिवादी द्वारा दिए गए कर्म सिद्धांत का वर्णन कीजिए ।

 - नियतिवादि कर्म सिद्धांत में विश्वास रखता था । इस सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति की किस्मत पहले निश्चित है । प्रत्येक व्यक्ति किस्मत के हाथों में एक खिलौने के समान है । वह लाख प्रयास करने पर भी इसमें परिवर्तन नहीं कर सकता । उसके कर्म एवं तपस्या भी किसी काम नहीं आते । उसे हर हाल में पूर्व निर्धारित सुखों एवं दुःखों को भोगना पड़ेगा ।

जैन धर्म 

स्वामी महावीर को जैन धर्म का वास्तविक संस्थापक माना जाता है । वह जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर ( शिक्षक ) थे । उनसे पूर्व 23 तीर्थंकर और हुए थे । पहले तीर्थंकर का नाम ऋष्भदेव तथा 23 वें तीर्थंकर का नाम पार्श्वनाथ था । स्वामी महावीर की संन्यास पद्धति अथवा जैन धर्म को आरंभ में ' निग्रंथ ' का नाम दिया गया । निग्रंथ का शाब्दिक अर्थ था बँधनों से मुक्ति । जैन धर्म ने लोगों को अहिंसा तथा परस्पर भ्रातृभाव का पाठ पढ़ाया । वास्तव में भारतीय संस्कृति को जैन धर्म की देन अद्वितीय है ।



महावीर स्वामी - इनका जन्म 540 ई . पू . वैशाली ( बिहार ) के पास कुण्डग्राम ( वर्तमान मुजफ्फरपुर जिला ) में हुआ था । इनका वास्तविक नाम वर्द्धमान था । नातृक क्षत्रिय कुल के प्रधान सिद्धार्थ इनके पिता थे । इनकी माता त्रिशला थीं । राजकुमारी यशोदा इनकी पत्नी थीं । इनकी पुत्री का नाम अणोज्या ( प्रियदर्शना ) था । पार्श्वनाथ की तरह महावीर स्वामी ने भी 30 वर्ष की आयु में गृह त्याग दिया । समस्त इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने के कारण वे ' जिन ' कहलाये । सम्भवतः इसीलिये उनके अनुयायी जैन कहलाये । 72 वर्ष की आयु में पावा में इन्हें 468 ई . पू . निर्वाण प्राप्त हुआ । अपरिमित पराक्रम दिखाने के कारण उन्हें महावीर स्वामी कहा गया ।

: जैन धर्म के सिद्धान्त स्क्रीन महाव्रत - महावीर स्वामी ने 5 मुख्य महाव्रतों पर जोर दिया । 

( 1 ) सत्य - हमेशा सत्य बोलो , कभी झूठ न बोलो ।

 ( 2 ) अहिंसा कभी हिंसा मत करो , किसी का दिल न दुखाओ ।

 ( 3 ) अस्तेय -- कभी चोरी न करो । किसी का कुछ सामान को देख कर ललचाना भी चोरी है ।

 ( 4 ) अपरिग्रह - सम्पत्ति का संग्रह न करो । 

( 5 ) ब्रह्मचर्य - इन्द्रियों को वश में रखो । 

सिद्धान्त --ज्ञान प्राप्ति के बाद महावीर स्वामी ने जो विचार पू . प्रकट किये वे ही जैन धर्म के सिद्धान्त बन गये । ये निम्न हैं .

 ( 1 ) ईश्वर में अविश्वास – महावीर स्वामी ईश्वर को गय नहीं मानते थे । न तो ईश्वर इस संसार का रचयिता है और न ही की नियंत्रक । 

 ( 2 ) आत्मा का अस्तित्व - महावीर स्वामी आत्मा का अस्तित्व मानते थे । प्रत्येक जीव , पेड़ , पौधे सभी में आत्मा है । 

( 3) कर्मफल एवं पुनर्जन्म महावीर स्वामी ने पुनर्जन्म के सिद्धान्त को माना है । कर्मफल ही जन्म मृत्यु का कारण है । आवागमन का सिद्धान्त मनुष्य के कर्म पर आधारित है । 

( 4 ) मोक्ष अथवा निर्वाण - सांसारिक तृष्णा बन्धन से मुक्ति को निर्वाण कहा गया है । कर्म फल से मुक्ति पाकर ही से व्यक्ति मोक्ष अथवा निर्वाण की ओर अग्रसर हो सकता है ।

  त्रिरत्न 

महावीर स्वामी ने कर्मफल से छुटकारा पाने के लिये त्रिरत्नों को अपनाने पर बल दिया है ।

 ये निम्न हैं 

( 1 ) सत्य ज्ञान - सच्चा एवं पूर्ण ज्ञान का होना ही सम्यक् ज्ञान है । 

( 2 ) सत्य श्रद्धा - सत्य में विश्वास एवं यथार्थ ज्ञान के प्रति श्रद्धा ही सम्यक् दर्शन है 

( 3 ) सत्य आचरण/ सच्चा आचरण एवं सांसारिक विषयों से उत्पन्न सुख - दुःख के प्रति समभाव ही सम्यक् आचरण है।

 दिगम्बर तथा श्वेताम्बर

दिगंबर तथा श्वेतांबर जैन धर्म के दो प्रमुख संप्रदाय थे। दिगंबर से अभिप्राय था नग्न रहने वाले श्वेतांबर से अभिप्राय था श्वेत वस्त्र धारण करने वाले।

निर्वाण

निर्वाण पद से आशय है मोक्ष या जीवन मरण से बंधनों से छुटकारा पाना । निर्वाण प्राप्ति के पश्चात मनुष्य का आवागमन का चक्कर समाप्त हो जाता है तथा उसे शांति प्राप्त हो जाती है जैन धर्म एवं बौद्ध धर्म दोनों ही निरवान में विश्वास रखते थे।

 जैन धर्म लोकप्रिय ना हो सका क्योंकि जैन धर्म के प्रचार के लिए अधिक प्रयास नहीं किए तथा जैन धर्म को कोई विशेष राजकीय संरक्षण प्राप्त ना हो सका।

: जैन धर्म का योगदान 

जैन धर्म ने अहिंसा एवं समानता के सिद्धांत का प्रचार किया जैन धर्म के कारण कला के क्षेत्र में उन्नति हुई।।


 महात्मा बुध का  जीवन

1 जन्म तथा माता पिता--- महात्मा बुध का जन्म 577 ईसवी पूर्व में कपिलवस्तु के निकट लुंबिनी के स्थान पर हुआ । उनकी माता का नाम महामाया था । उनके पिता शुद्धोधन गणराज्य के प्रमुख थे । उनकी राजधानी का नाम कपिलवस्तु था । महात्मा बुद्ध का आरंभिक नाम सिद्धार्य था । पिता चाहते थे कि उनका पुत्र एक महान् सम्राट् बने । 16 वर्ष की आयु में सिद्धार्थ का एक अति सुंदर राजकुमारी यशोधरा के साथ कर दिया गया । उनके घर एक पुत्र का जन्म जिसका नाम राहुल रखा गया ।

 2. बाल्यकाल तथा विवाह - सिद्धार्थ का पालन पोषण बहुत लाड प्यार से हुआ था उन्हें शिक्षा देने के लिए हर प्रकार के प्रबंध किए गए थे वह आराम से ही कुछ गंभीर स्वभाव के थे 16 वर्ष की आयु में सिद्धार्थ का विवाह एक अति सुंदर राजकुमारी यशोधरा से कर दिया उनके घर एक पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम राहुल रखा गया

3. चार महान् दृश्य तथा महान् त्याग - सिद्धार्थ एक दिन अपने सारथि चन्न को लेकर बाहर निकले । रास्ते में उन्होंने एक बूढ़ा , एक रोगी , एक व्यक्ति की अर्थी तथा एक साधु का देखा इन दृश्यों का सिद्धार्थ के मन पर गहरा प्रभाव पड़ा । उन्होंने जान लिया कि संसार दुःखों का घर है इसलिए सिद्धार्थ ने घर त्याग देने का निश्चय किया । एक रात वह अपनी पत्नी तथा पुत्र को सोते हुए छोड़ कर सत्य की खोज में निकल पड़े । उस समय सिद्धार्थ की आयु 29 वर्ष का । 

4. ज्ञान की प्राप्ति - घर का त्याग करने के पश्चात् सिद्धार्थ ऊरवेला के जंगलों में चले गए । यहाँ उन्होंने 6 वर्ष तक कठोर तप किया परंतु उन्हें ज्ञान की प्राप्ति न हुई । अब सिद्धार्थ बोध गया गए । यहाँ उन्होंने एक पीपल के वृक्ष के नीचे समाधि लगाई । यहाँ उन्हें सर्वोच्च ज्ञान की प्राप्ति हुई । ज्ञान प्राप्ति के समय महात्मा बुद्ध की आयु 35 वर्ष थी ।

 II . महात्मा बुद्ध की शिक्षाएँ 

महात्मा बुद्ध की शिक्षाएं सरल एवं प्रभावशाली थीं । उनकी शिक्षाओं को सुत पिटक में दी गई कहानियों के आधार पर पुननिर्मित किया गया है । इन्हें लोगों की आम भाषा पालि में रचा गया था । महात्मा बुद्ध की प्रमुख शिक्षाओं का वर्णन निम्नलिखित अनुसार है 

1. चार आर्य सत्य - महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं का सार चार आर्य सत्य हैं । ये चार आर्य सत्य ये हैं

( i)  संसार दुःखों से भरा हुआ है - महात्मा बुद्ध के अनुसार संसार दुःखों से भरा हुआ है । जन्म से लेकर मृत्यु तक मानव के जीवन में दुःख ही दुःख हैं । क्षणिक सुखों को सुख मानना मानव की मूर्खता है । 

( ii ) दुःखों का कारण है - महात्मा बुद्ध के अनुसार दुःखों का कारण मानव की तृष्णा हैं । अज्ञानता के कारण मानव इंद्रिय सुखों के पीछे लगा रहता है । इस कारण वह तमाम उस दुःखों को भोगता है ।

 ( iii) दुःख निवारण - महात्मा बुद्ध के अनुसार मानव तृष्णा का त्याग कर दुःखों का निवारण कर सकता है ।

( iv ) दुःख निवारण मार्ग - महात्मा बुद्ध के अनुसार मानव अष्ट मार्ग पर चलकर दुःखों से निवारण प्राप्त कर सकता है । 

2. अष्ट मार्ग - महात्मा बुद्ध ने दुःखों से मुक्ति प्राप्त करने के लिए अपने अनुयाथियों को अष्ट मार्ग पर चलने का उपदेश दिया । इसे मध्यम मार्ग भी कहा जाता है , तपस्या एवं विषयासक्ति के बीच का मार्ग था । अष्ट मार्ग निम्नलिखित हैं 

 (i ) सत्य विश्वास - सभी को यह सत्य विश्वास होना चाहिए कि तृष्णा का त्याग करने से ही वे दुःखों से मुक्ति पा सकते हैं एवं निर्वाण प्राप्त कर सकते हैं । 

( ii ) सत्य कर्म - किसी को भी झूठ बोलने , निंदा करने , अप्रिय वचन नहीं बोलने चाहिए । सभी को मानवता से प्रेम करना चाहिए ।

( ii ) सत्य आजीविका - सभी को अपनी जीविकोपार्जन के लिए सत्य मार्ग को अपनाना वाहिए । कड़ी मेहनत एवं ईमानदारी इसका आधार है ।

 ( iv ) सत्य विचार - सभी के विचार सत्य होने चाहिएं । कोई भी व्यक्ति दूसरों के प्रति द्वेष एवं हिंसा की भावना से दुःखों से छुटकारा नहीं पा सकता ।

 ( v ) सत्य प्रयत्न - सभी मनुष्यों को निर्वाण प्राप्त करने के लिए सत्य प्रयत्न करने चाहिएं । उसे तृष्णा के पीछे नहीं भागना चाहिए ।

 ( vi ) सत्य ध्यान - सभी मनुष्यों को निर्वाण प्राप्ति के लिए निरंतर चेतन रहने की आवश्यकता है । अतः उन्हें सादा एवं पवित्र जीवन व्यतीत करना चाहिए । 

( vii ) सत्य वचन - सभी मनुष्यों के वचन सत्य होने चाहिएं । उसे झूठ , हिंसा एवं चुगली आदि से कोसों दूर रहना चाहिए । 

( viii ) सत्य समाधि - मनुष्य को बुरी प्रवृत्तियों से दूर होकर सत्य समाधि की ओर अपना पूर्ण ध्यान लगाना चाहिए । 

3. सदाचारी जीवन - महात्मा बुद्ध ने सदाचारी जीवन पर अत्याधिक बल दिया । इसके विजा मनुष्य के लिए निर्वाण प्राप्त करना असंभव है । ये नियम इस प्रकार हैं- 

( 1 ) अहिंसा का पालन करना ।

 ( ii ) सदैव सत्य बोलना । 

( iii ) चोरी न करना । 

( iv ) संपत्ति का त्याग करना ।

 ( v ) ब्रह्मचर्य का पालन करना ।

 ( v i) नृत्य , गान एवं मादक वस्तुओं से दूर रहना ।

 ( vii ) सुगंधित वस्तुओं का प्रयोग न करना । 

( viii) असमय भोजन न करना ।

 ( ix ) किसी को कष्ट न पहुँचाना ।

 ( x ) स्त्रियों से दूर रहना । 

4. कर्म सिद्धान्त में विश्वास - महात्मा बुद्ध ने कर्म सिद्धांत पर विशेष बल दिया है । उनके विचारानुसार मनुष्य जैसे कर्म करता है उसे वैसे ही फल भोगने पड़ते हैं । अच्छे कर्म करने से निर्वाण प्राप्त होता है तथा कष्टों से छुटकारा मिलता है । हमारा वर्तमान जीवन पिछले जन्म के कर्मों पर आधारित होता है । इस जीवन के कर्मों के अनुसार हमें अगले जीवन में फल भोगना पड़ेगा । 5. आपसी भाईचारा - महात्मा बुद्ध ने लोगों को आपसी भाईचारे एवं प्रेम का संदेश दिया । उनका विचार था कि संसार में फैली नफरत एवं हिंसा का अंत केवल प्रेम से ही किया जा सकता है । आपसी प्रेम से ही धरती पर स्वर्ग की स्थापना होगी । महात्मा बुद्ध ने अपने धर्म के द्वार सभी - जातियों एवं वर्गों के लिए खोलकर मानवता को एक नई दिशा दिखाई । 

6. अनीश्वरवाद - महात्मा बुद्ध ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं रखते थे । उनके अनुसार विश्व की उत्पत्ति के लिए ईश्वर की आवश्यकता नहीं है । उनके अनुसार संसार का संचालन धर्म नामक शक्ति द्वारा होता है । 

7. यज्ञ बलियों एवं जाति प्रथा में अविश्वास - महात्मा बुद्ध वैदिक कर्मकांडों के घोर विरोधी थे । उनका कथन था कि निर्वाण प्राप्त करने के लिए यज्ञों एवं बलियों की कोई आवश्यकता नहीं है । बलियां देने से मनुष्य के पापों में वृद्धि होती है । महात्मा बुद्ध ने हिंदू समाज में प्रचलित जाति प्रथा की कड़े शब्दों में आलोचना की । वे मनुष्यों की समानता में विश्वास रखते थे । के अनुसार मानव जीवन का परम लक्ष्य निर्वाण प्राप्त करना है । 

8. निर्वाण - महात्मा बुद्ध निर्वाण से अभिप्राय था अहंकार एवं इच्छा का खत्म हो जाना । निर्वाण प्राप्त करके मनुष्य आवागमन के चक्कर से सदैव के लिए मुक्ति प्राप्त कर लेता है । इस प्रकार उसके सभी दुःखों का अंत हो जाता है ।

 बौद्ध धर्म के शीघ्र प्रसार के कारण

 - भारत में बौद्ध धर्म के शीघ्र प्रसार एवं पतन के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे । इसका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

.बौद्ध धर्म का शीघ्र प्रसार

 1. सरल शिक्षाएँ - बौद्ध धर्म की शिक्षाएँ अत्यंत सरल थीं । इसके चलते यह धर्म शीघ्र ही लोकप्रिय हो गया । बौद्ध धर्म में आत्मा - परमात्मा तथा स्वर्ग - नरक आदि जटिल प्रश्नों के लिए कोई स्थान नहीं था । इसके अतिरिक्त धर्म अंधविश्वासों से कोसों दूर था । इस धर्म का मूल तत्त्व यह था कि लोगों को अष्ट मार्ग के अनुसार अपना जीवन व्यतीत करना चाहिए । बौद्ध धर्म की सरल शिक्षाओं के कारण लोग बड़ी संख्या में बौद्ध धर्म में सम्मिलित हुए ।

 2. महात्मा बुद्ध का व्यक्तित्व - चौद्ध धर्म के विकास में महात्मा बुद्ध के अपने व्यक्तित्व का उल्लेखनीय योगदान था । उनका जीवन पवित्र था । वह नम्रता , त्याग , सत्य और परोपकार का जीवित उदाहरण थे । उन्होंने जिस बात का भी प्रचार किया , उसे पहले खुद अपनाया । उन्होंने अपने शाही ऐश्वर्य , सुंदर पत्नी और पुत्र आदि को त्याग कर लोगों के सम्मुख उदाहरण प्रस्तुत के तर्क सुनकर बड़े - बाड़े विद्वान् भी उनका लोहा मान गए । इस प्रकार बुद्ध के व्यक्तित्व का सभी पर चमत्कारी प्रभाव पड़ा तथा वे बौद्ध धर्म में सम्मिलित होते चले गए । 

3. समानता का सिद्धांत - चौद्ध धर्म में ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य तथा शूद्र सभी को एक समान दर्जा प्राप्त था । बुद्ध के अनुसार मनुष्य के कर्म ही उसके ब्राह्मण अथवा शूद्र होने के संबंध में सूचित करते हैं । जन्म के आधार पर सभी मनुष्य एक समान हैं । बौद्ध धर्म में स्त्रियों तथा पुरुषों को समान अधिकार दिए गए । उस समय हिंदू समाज में स्त्रियों तथा शूद्रों की दशा बहुत दयनीय थी । उन्होंने भारी संख्या में बौद्ध धर्म में सम्मिलित होना आरंभ कर दिया । इस प्रकार बौद्ध धर्म के समानता के सिद्धांत ने उसे बहुत लोकप्रिय बनाया ।

 4. बौद्ध संघ के प्रयत्न- -बौद्ध धर्म के विकास में बौद्ध संघों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई । इन संघों में बौद्ध भिक्खुओं को दीक्षा तथा बौद्ध धर्म के संबंध में शिक्षा दी जाती थी । धीरे - धीरे ये संघ शिक्षा के विख्यात केंद्र बन गए । इनमें बौद्ध धर्म के प्रसार के संबंध में महत्त्वपूर्ण निर्णय लिए जाते थे । इन संघों का संगठन प्रजातंत्रीय सिद्धांतों पर आधारित था । इन संघों में कार्य करने वाले भिक्षु तथा भिक्खुनियों ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए कोई प्रयास न छोड़ा । उनके अपना जीवन बड़ा पवित्र तथा सादा था । इसलिए लोगों पर उनके प्रचार का जादुई प्रभाव पड़ा । किया 

5. राजकीय संरक्षण - बौद्ध धर्म को अनेक भारतीय शासकों से संरक्षण प्रदान हुआ इस कारण बौद्ध धर्म दिन - प्रतिदिन प्रगति करता गया । महात्मा बुद्ध के काल में ही मगध , कोशल तथा लिच्छवी राजवंशों ने बौद्ध धर्म के प्रचार में अपना सहयोग दिया । महात्मा बुद्ध था । पश्चात् अशोक , कनिष्क और हर्ष ने अपने अथक प्रयत्नों से बौद्ध धर्म को न केवल भारत अपितु विदेशों में भी फैला दिया ।  

बौद्ध धर्म का पतन

1. बौद्ध धर्म में फूट - महात्मा बुद्ध की मृत्यु के पश्चात् बौद्ध धर्म परस्पर फूट का शिकार हो गया । यह न केवल महायान और हीनयान बल्कि कई अन्य छोटे - छोटे संप्रदायों में बँट गया । इन्होंने बौद्ध धर्म के संबंध में अलग - अलग व्याख्या करनी आरंभ कर दी । इनके परस्पर मतभेदों और विवादों के कारण बौद्ध धर्म की प्रतिष्ठा को भारी आघात पहुँचा । बौद्धों की वजयान शाखा जादू - टोनों में विश्वास रखती थी । इसने हर प्रकार के नशे करने , माँस भक्षण तथा पर - स्त्री गमन की खुली छूट दे दी थी । इसने बौद्ध धर्म की नैया को डुबो दिया । 

2. बौद्ध संघों में भ्रष्टाचार - आरंभ में बौद्ध संघों ने बौद्ध धर्म के प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी । उस समय इनमें कार्यरत भिक्खुओं तथा भिक्खुनियों का जीवन बड़ा पवित्र होता था । बाद में राजकीय सहायता के कारण बौद्ध संघ धन से मालामाल हो गए । परिणामस्वरूप भिक्खु भ्रष्टाचारी और विलासी हो गए । वे अब अपना समय बौद्ध धर्म के प्रचार की अपेक्षा सुरा तथा सुंदरी के संग व्यतीत करने लगे । इसने बौद्ध धर्म के पतन को अवश्यंभावी बना दिया ।

 3. हिंदू धर्म की पुनर्स्थापना - समय के साथ - साथ ब्राह्मणों ने हिंदू धर्म के पुराने गौरव को पुनः स्थापित करने के प्रयत्न आरंभ कर दिए थे । उन्होंने हिंदू धर्म में प्रचलित बुराइयों को दूर करने का प्रयत्न किए । कुमारिल भट्ट और शंकराचार्य ने अपने अथक प्रयत्नों से हिंदू धर्म में नवप्राण फूंके । हिंदू धर्म की पुनः स्थापना से बौद्ध धर्म का गौरव जाता रहा । 

4. राजकीय संरक्षण की समाप्ति - बौद्ध धर्म को लोकप्रिय बनाने में महाराजा अशोक , कनिष्क और हर्षवर्धन ने कोई कोशिश नहीं छोड़ी थी परंतु इन शासकों को छोड़ कर भारत के अधिकाँश शासकों ने हिंदू धर्म को अपना संरक्षण दिया था । उत्तर में राजपूत वंशों ने और दक्षिण में चोल और चालुक्य राजवंशों ने हिंदू धर्म के प्राचीन गौरव को पुनः स्थापित करने में अत्यधिक सफलता प्राप्त की । दूसरी ओर राजकीय संरक्षण न मिलने से बौद्ध धर्म का प्रभाव दिन - प्रतिदिन कम होता चला गया । 

5. हूणों के आक्रमण- -हूणों के आक्रमणों से बौद्ध धर्म को एक गहरा आघात लगा । हूण मध्य एशिया की एक बहुत ही अत्याचारी जाति थी । उनके नेता मिहिरकुल ने भारत में हजारों बौद्धों की हत्या करवा दी । बौद्धों के बहुत - से मठों को नष्ट कर दिया गया । परिणामस्वरुप पंजाब और राजपूताना में बौद्धों का नामो - निशान मिट गया । 

6. मुसलमानों के आक्रमण -11 वीं तथा ।2 वीं शताब्दी में मुसलमानों ने भारत पर आक्रमण आरंभ कर दिए थे । बौद्ध अहिंसा की नीति के कारण इन मुस्लिम आक्रमणों का सामना न कर सके । मुसलमानों ने बड़ी संख्या में बौद्धों की हत्या कर दी । उन्होंने भारत में बहुत - से बौद्ध विहारों तथा मठों को ध्वस्त कर दिया । नालंदा विश्वविद्यालय को पूरी तरह जला दिया गया । वास्तव में ये मुस्लिम आक्रमण बौद्धों के लिए विनाशकारी प्रमाणित हुए ।

 हीनयान और महायान में दो अंतर बताइए- 

( i ) हीनयान से भाव था छोटा यान एवं महायान से भाव था बड़ा यान । 

( ii ) हीनयान मूर्ति पूजा के विरुद्ध था जबकि महायान इसके पक्ष में था ।

त्रिपिटक से आप क्या समझते हैं ? 

- त्रिपिटक बौद्ध साहित्य के सबसे प्राचीन ग्रंथ हैं । इन्हें पालि भाषा में लिखा गया था । त्रिपिटकों के नाम हैं सुत्त पिटक , विनय पिटक तथा अभिधम्म पिटक । सुत्त पिटक में महात्मा बुद्ध के उपदेश , विनय पिटक में बौद्ध भिक्खु , एवं भिक्खुनियों के लिए नियम तथा अभिधम्म पिटक में बौद्ध दर्शन के बारे में जानकारी दी गई है । 

जातक कथाएँ क्या हैं ? 

- जातक कथाएँ एक प्रकार की लोक कथाएँ हैं । इनकी संख्या 549 है । ये पालि भाषा में लिखी गई हैं । इनमें महात्मा बुद्ध के पूर्व जन्मों का वर्णन किया गया है ।

वैष्णववाद से क्या अभिप्राय है?

 वैष्णववाद की स्थापना मथुरा के वासुदेव कृष्ण ने की थी वैष्णववादी एकेश्वरवादी थे। वे विष्णु को परमात्मा समझते थे  वह पापियों का नाश करने एवं विश्व की रक्षा के लिए अलग-अलग रूपों में उतार लेता था वह ईश्वर के प्रति समर्पण एवं आत्म शुद्धि पर विशेष बल देते थे वे फल की इच्छा किए बिना कर्म में विश्वास रखते थे वैष्णव बाद का दर्शन भगवत गीता में दर्शाया गया है

शैववादसे क्या अभिप्राय है?

 हिंदू धर्म की जितने संप्रदाय थे शैवमत सबसे प्राचीन था इसके साक्ष्य में हड़प्पा काल एवं वैदिक काल में मिलते हैं लाकुनिन नामक व्यक्ति ने इसकी स्थापना की थी ।गुप्त काल के दौरान शैवमत  ने उल्लेखनीय स्थान प्राप्त किया इस काल में बड़ी संख्या में शिव देवता के मंदिरों तथा मूर्तियों का निर्माण किया शैववाद दक्षिण भारत में बहुत लोकप्रिय हो गया यहां के नयनारों ने इसे लोकप्रिय बनाया शैवमत को बनाने वाले शिव की पशुपति (पशुओं का स्वामी )के रूप में के रूप में उपासना करते थे ।वे शिवलिंग एवं नंदी की भी उपासना करते थे ।वे शरीर पर भस्म मलते थे वे नृत्य गान में भी विश्वास रखते थे। वे शमशान के पास निवास करते थे।

स्तूप से क्या अभिप्राय है ? - महात्मा बुद्ध के स्मृति चिन्हों के ऊपर बनाए गए भवनों को स्तूप कहा जाता है । यह अर्द्ध - गोलाकार होते थे । इनके भीतर जाने के लिए एक या अधिक तोरण ( द्वार ) बनाए जाते थे । स्तूप के चारों ओर एक मार्ग का निर्माण किया जाता था जिसे प्रदक्षिणा पथ कहा जाता था । महाराजा अशोक तथा अन्य शासकों ने हज़ारों स्तूपों का निर्माण करवाया । इनमें से साँची एवं भरहुत स्तूप कला के पक्ष से विशेष महत्त्व रखते हैं । 

sanchi stupas
amaravati stupas

 अमरावती स्तूप की गणना भारत के प्रसिद्ध स्तूपों में की जाती है । यह आंध्र प्रदेश के गुंटूर ज़िले के उत्तर में लगभग 35 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है । 1796 ई ० में एक स्थानीय राजा जिसका नाम वसु रेड्डी नायडु था ने अमरावती में एक मंदिर का निर्माण आरंभ करवाया । इसकी खुदाई करते समय अचानक अमरावती के स्तूप के अवशेष मिल गए । इसके महत्त्व से अनजान राजा ने इसके पत्थरों का प्रयोग करने का निर्णय किया । 1797 ई ० में एक अंग्रेज़ कर्नल कॉलिन मैकेंजी ने अमरावती स्तूप से संबंधित महत्त्वपूर्ण जानकारी एकत्रित की । मौर्यकालीन स्तूपों में साँची का स्तूप सर्वाधिक प्रसिद्ध है । यह मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के निकट स्थित है । इसका निर्माण तीसरी शताब्दी ई ० पू ० में अशोक द्वारा किया गया था । शुंग एवं सातवाहन कालों में इसके विस्तार एवं सौंदर्य में वृद्धि की गई । 1818 ई ० में एक अंग्रेज़ अधिकारी जनरल टायलर द्वारा साँची स्तूप की खोज की गई । 1850 ई ० में मेजर अलेक्जेंडर कनिंघम ने साँची के अवशेषों का विस्तृत अध्ययन किया । साँची स्तूप के संरक्षण में भोपाल की बेगमों - शाहजहाँ बेगम एवं सुल्तानजहाँ बेगम ने उल्लेखनीय योगदान दिया ।



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