CHAPTER 3 HISTORY 12TH सामाजिक इतिहास- महाभारत के संदर्भ से
मनुष्य एक पारिवारिक प्राणी है वह परिवार में जन्म लेता है परिवार उस की प्रथम पाठशाला होती है जहां मातृभाषा सामाजिक विकास आदर्श मूल्य तथा व्यवहार के तरीके सीखता है परिवार प्राथमिक सामाजिक संस्था तथा समाज की मौलिक इकाई है यह एक ऐसी संस्था है जो मनुष्य को समाज में पहचान प्रदान करती है इसके व्यवहारों को नियमित निर्देशित तथा नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अभिनित करती है निसंदेह परिवार के बिना मानव समाज की कल्पना करना मुश्किल है
परिवार से अभिप्राय उस संस्था से है जिसमें विवाह के पश्चात स्त्री पुरुष एवं उनके बच्चे आदि रहतेहैं।
परिवार के प्रकार
परिवार अनेक प्रकार के होते हैं प्रमुख प्रकार के परिवारों का संक्षिप्त विवरण मलिक अनुसार है
1. एक विवाही परिवार ( Monogamous Family ) -- एक विवाही परिवार वह होता है जिसमें एक समय परिवार अनेक प्रकार के होते हैं । पुरुष केवल एक ही स्त्री से विवाह कर सकता है । विश्व के अधिकाँश एवं सभ्य समाजों में एक विवाही परिवार व्यवस्था पाई जाती है ।
2. बहुपति विवाही परिवार ( Polyandrous Family ) - ऐसे परिवार में एक समय में एक स्त्री के अनेक पति अर्थात् दो या दो से अधिक पति होते हैं । यदि स्त्री के सभी पति आपस में सगे भाई हैं तो इसे भ्रातृ बहुपति विवाह ( Fraternal Polyandry ) कहते हैं और यदि स्त्री के सभी पति सगे भाई न होकर अर्थात् सब पति जब आपस में रक्त संबंधी न हों इसे अभ्रातृ बहुपति विवाह ( Non - Fraternal Polyandry ) की संज्ञा दी जाती है ।
3. बहुपत्नी विवाही परिवार ( Polygynous Family ) - बहुपत्नी विवाही प्रथा में एक पति व अनेक पत्नियाँ पाई जाती हैं । मुसलमान समाजों में ऐसे परिवार देखने को मिलते हैं । ऐसे परिवारों में बहनें तथा गैर - बहनें एक पुरुष की पत्नियाँ हो सकती हैं ।
4. रक्त संबंधी परिवार ( Consanguineous Family ) - रक्त संबंधी परिवारों में विवाह संबंध रक्त संबंधियों से स्थापित किये जाते हैं अर्थात् विवाह संबंध निकट संबंधियों के बीच स्थापित किए जाते हैं । चचेरे , ममेरे व फुफेरे भाई - बहनों के विवाह इसी श्रेणी में आते हैं । 5. पितृवंशीय परिवार ( Patrilineal Family ) - पितृवंशीय परिवार वह परिवार होता है जिसमें वंश पूर्वज पुरुष के नाम से चलता है । इन परिवारों में वंश परंपरा पिता के नाम से चलती है । संपत्ति के ऊपर पुत्रों का अधिकार होता है तथा बच्चे पिता के नाम से ही समाज में जाने जाते हैं । हिंदू समाज में पितृवंशीय परिवार ही पाये जाते हैं ।
6. मातृवंशीय परिवार ( Matrilineal Family ) - इन परिवारों में स्त्री या माता को घर का मुखिया माना जाता है । इन परिवारों में वंश स्त्री के नाम से चलता है । बच्चों को स्त्री के वंशज के रूप में जाना जाता है । संपत्ति के ऊपर अधिकार भी स्त्री का ही होता है ।
7. नव स्थानी परिवार ( Neolocal Family ) - जब स्त्री - पुरुष विवाह के पश्चात् अपने माता - पिता का घर नेड़ कर नये घर में रहना प्रारंभ करते हैं तो इस प्रकार से स्थापित नये परिवार को नवस्थानी परिवार कहते हैं ।
8. ग्रामीण परिवार( Rural Family ) - ग्रामीण परिवार कृषि व्यवसाय पर आधारित होते हैं । इन परिवारों का आकार बड़ा होता है । इन परिवारों में परंपरागत आदर्श व नियमों का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है । इन परिवारों में व्यक्ति के संबंध प्राथमिकता के होते हैं ।
9. नगरीय परिवार ( Urban Family ) - नगरीय परिवारों का आकार छोटा या सीमित होता है । यह परिवार नगर समुदाय में पाये जाते हैं । इन परिवारों में सदस्यों के बीच व्यक्तिवादिता की भावना पाई जाती है । नगरों में मुख्यतः एकाकी परिवार पाये जाते हैं 10. संयुक्त परिवार ( Joint Family ) संयुक्त परिवारों में सदस्यों की संख्या अधिक होती है । इन परिवारों में एक समय में तीन - चार पीढ़ियों के लोग इकट्ठे रहते हैं । वे एक सामान्य रसोई में बना भोजन करते हैं । इन परिवारों के सदस्य अपनी आय को साझा रखते हैं तथा साझे रूप से एक - दूसरे के सहयोग के साथ अपनी आवश्यकता को पूरा करते हैं ।
11. एकाकी परिवार ( Nuclear Family ) यह परिवार आकार में छोटे या सीमित होते हैं । इन परिवारों में सदस्यों की संख्या कम होती है । इन परिवारों में पति - पत्नी और उनके अविवाहित बच्चे साथ रहते हैं । नगरीय समुदायों में इस तरह के परिवार पाये जाते हैं ।
नातेदारी
नातेदारी व्यवस्था से अभिप्राय उस संस्था से है जिसमें नातेदारों के मध्य संबंधों की व्यवस्था होती है यह संबंध वंशावली पर आधारित होते हैं
विवाह से अभिप्राय उस सविकृत सामाजिक प्रणाली से है जिसमें दो या अधिक व्यक्ति परिवार की स्थापना करते हैं विवाह के बिना मानव सभ्यता के विकास की कल्पना नहीं की जा सकती है
विवाह आठ प्रकार के होते हैं
1एक विवाह
2 भारत्रबहुपति विवाह
3 गैर भृतर बहुपति विवाह
4बहू पत्नी विवाह
5अंतर्बिवाह
6 बहिर्विवाह
7 अनुलोम विवाह
8 प्रतिलोम विवाह
विवाह के उद्देश्य
1 इससे मनुष्य की लैंगिक इच्छाएं पूर्ण होती है
2 इससे वंश परंपरा आगे बढ़ती है
3इससे बच्चों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान होती है
गोत्र
गोत्र से अभिप्राय उस प्रथा से है जिसमें प्रत्येक गौत्र एक ऋषि के नाम पर होता था उस गोत्र के सदस्य ऋषि के वंशज माने जाते थे इसका प्रचलन 1000 ईसवी पूर्व के बाद हुआ
गोत्र के दो महत्वपूर्ण नियम विवाह के बाद स्त्री कों पिता के स्थान पर पति के गोत्र का माना जाता था एक ही गोत्र के सदस्य आपस में विवाह नहीं करवा सकते थे
: प्राचीन काल में उत्तम माने जाने वाले विवाह ब्रह्म विवाह एवं दैव विवाह थे
वर्ण व्यवस्था ( VARNA SYSTEM )
प्राचीन भारतीय सामाजिक संगठन में प्रत्येक व्यक्ति अपने - अपने वर्ण के अनुसार कार्य करता था । धर्मशास्त्रों के अनुसार वर्ण चार हैं । ये हैं ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य एवं शूद्र । वर्ण व्यवस्था में समाज के कार्यों का चार वर्णों अथवा वर्गों ( categories ) में बाँटा गया व्यवस्था मानते थे । धर्मसूत्रों एवं धर्मशास्त्रों में चारों वर्गों के लिए आदर्श जीविका से अनेक नियम भी दिए गए हैं । इन नियमों का पालन करना प्रत्येक वर्ण के लिए आवश्यक था ।
1. ब्राह्मण के कार्य ( Functions of Brahmanas ) — ब्राह्मणों को समाज में सर्वोच्च स्थान प्राप्त था । उन्हें देवता समान माना जाता था । पुरुषसूक्त के अनुसार वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न हुआ । अन . ब्राह्मण को श्रेष्ठ कार्य दिए गए हैं । उसके प्रमुख कार्य यज्ञ करना एवं करवाना , वेदों का अध्ययन करना , शिक्षा देना , दान देना एवं लेना तथा शासकों को परामर्श देना था । ब्राह्मण के बिना कोई भी धार्मिक कार्य अधूरा समझा जाता था । समाज में ब्राह्मण का विशेष सम्मान किया जाता था । लोग अपनी समर्था अनुसार उन्हें दान देते थे । यदि ब्राह्मण का अपने व्यवसाय से गुज़ारा नहीं होता था तो वह क्षत्रिय अथवा वैश्य का कार्य अपना सकता था ।
2. क्षत्रिय के कार्य ( Functions of Kshatriyas ) _ वर्ण व्यवस्था में क्षत्रिय का स्थान ब्राह्मण था । क्षत्रिय की उत्पत्ति ब्रह्मा की भुजाओं से हुई मानी गई है । उसके प्रमुख कार्य राज्य का शासन , रक्षा तथा संचालन करना थे । राजा क्षत्रिय होता था । वह ब्राह्मण की सलाह से राजकाज चलाता और दंड व्यवस्था को लागू करता था । इसके अतिरिक्त क्षत्रिय साम्राज्य की सुरक्षा के लिए उत्तरदायी होता था । किसी भी आक्रमण के समय उसे अपने शत्रुओं से दो - दो हाथ करने पड़ते थे । धर्मशास्त्रों में क्षत्रिय को ब्राह्मणों का आदर करने तथा विलासी जीवन से दूर रह कर अपने कर्तव्यों का पालन करने को कहा गया है । आवश्यकता पड़ने पर वे वैश्य के कार्य अपना सकते थे ।
3. वैश्य के कार्य ( Functions of Vaishyas ) — वैश्यों को वर्ण - व्यवस्था में तीसरा स्थान दिया गया है । इनकी उत्पत्ति ब्रह्मा की जांघ से हुई मानी जाती है । वैश्यों के प्रमुख कार्य वेदों का अध्ययन करना , दान देना , यज्ञ करना , कृषि , व्यापार तथा ब्याज पर ऋण देना थे । वैश्य वर्ण भी आवश्यकता पड़ने पर दूसरे वर्गों का व्यवसाय अपना सकता था ।
4. शूद्र के कार्य ( Functions of Shudras ) — शूद्र की उत्पत्ति ब्रह्मा के पैरों से हुई मानी जाती है । जो स्थिति शरीर में पैरों की है वही स्थिति प्राचीन काल भारतीय समाज में शूद्रों की मानी जाती थी । समाज की सेवा का सारा भार उन पर ही होता था । उनका प्रमुख कर्त्तव्य द्विजों अथवा तीनों उच्च वर्गों की सेवा करना था । उसे कोई धार्मिक और सामाजिक अधिकार प्राप्त नहीं थे । उच्च जाति के लोग शूद्रों पर घोर अत्याचार करते थे । शूद्रों को वेद पढ़ने अथवा सुनने का अधिकार नहीं था । आगे चलकर उन्हें बढ़ईगिरी , चित्रकारी , पच्चीकारी , रंगसाजी आदि व्यवसाय करने का अधिकार मिल गया । महाभारत में शूद्रों को शिल्प , कृषि तथा पशुपालन आदि व्यवसाय अपनाने का अधिकार दिया गया । ब्राह्मणों ने उपरोक्त नियमों का पालन करने पर विशेष बल दिया । इस संबंध में उनका कथन था कि वर्ण व्यवस्था एक दैवीय व्यवस्था है । दूसरा , वे शासकों को यह उपदेश देते थे कि वे इस व्यवस्था के नियमों को अपने राज्यों में लागू करवाएँ । तीसरा , उन्होंने लोगों को यह विश्वास दिलाया कि उनका दर्जा जन्म पर आधारित है । अतः इनका उल्लंघन एक दंडनीय अपराध एवं पाप माना जाएगा । इस संबंध में महाभारत एवं अन्य अनेक ग्रंथों में वर्णित कहानियों पर बल दिया जाता था ।
जाति प्रथा
परिभाषा जाति शब्द का अंग्रेजी भाषा में रूपांतर cast है जो पुर्तगाली शब्द casta से लिया गया है कस्टा का अर्थ है नस्ल या प्रजाति इस अर्थ के अनुसार जाति एक बड़ा समूह है जिसका आधार प्रजाति भिन्नता अथवा जन्मजात भिनता है।
: जाति प्रथा की विशेषताएं
i) सदस्य्ता जन्म पर आधारित--जाति में सदस्यता जन्म पर आधारित होती है जो व्यक्ति जिस जाति में भी जन्म लेता था उसे समाज में उसी जाति से संबंधित दर्जा दिया जाता था वह अपनी योग्यता एवं मेहनत से इसे नहीं बदल सकता था।
( ii ) समाज का खंडात्मक विभाजन - भारतीय समाज जातीय आधार पर मुख्य तौ चार जातियों - ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य तथा शूद्र में बँटा हुआ था । समाज में सबसे उच्च ब्राह्मणों को प्राप्त था तथा सबसे निम्न स्थान शूद्रों को दिया गया था । प्रत्येक जाति एक समूह थी जिसमें अपने - अपने रीति - रिवाज थे । प्रत्येक जाति की अपनी पंचायत होती = जाति के नियमों के अनुसार अपने निर्णय देती थी । ब्राह्मणों को कभी भी मृत्यु दंड नहीं जाता था जबकि शूद्रों को छोटा - सा अपराध करने पर भी कठोर दंड दिया जाता था । एक जन्म लेने के पश्चात् कोई भी व्यक्ति अपनी जाति में परिवर्तन नहीं कर सकता था ।
( iii) जाति एक बंद समूह - जाति व्यवस्था में व्यक्ति की सदस्यता उसके जन्म पर अ होती थी । वह जिस जाति में जन्म लेता था सारी जिंदगी उसी जाति के घेरे में रह प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जाति से संबंधित व्यवसाय ही अपनाने पड़ते थे । कोई भी अपनी योग्यता के कारण किसी और जाति में प्रवेश नहीं कर सकता था । प्रत्येक ज व्यक्ति को अपनी जाति के नियमों का पालन करना पड़ता था । इसका उल्लंघन कर को जाति में से निष्कासित कर दिया जाता था ।
( iv ) जातीय धंधे - जाति प्रथा में धंधे जन्म से ही निर्धारित कर लिए जाते थे । जो जिस जाति में जन्म लेता था उसे उस जाति से संबंधित व्यवसाय अपनाना पड़ उदाहरणस्वरूप ब्राह्मण का कार्य धार्मिक कार्यों को संपूर्ण करवाना तथा लोगों के देना था । क्षत्रिय का कार्य देश की रक्षा करना तथा वैश्य का कार्य खेती करना था । कार्य तीनों उच्च जातियों की सेवा करना था । कोई भी व्यक्ति अपने जाति व्यव अतिरिक्त कोई दूसरा व्यवसाय नहीं अपना सकता था ।
( v ) जाति से जुड़े प्रतिबंध - जाति से जुड़े प्रतिबंध निम्नलिखित थे-
( i ) प्रत्येक व्य अपनी जाति से संबंधित व्यवसाय अपनाने पड़ते थे ।
( ii ) उसे खान - पान संबंधी प्रति पालन करना पड़ता था ।
( iii ) उसे अपनी जाति के अंदर ही शादी करवानी पड़ती थी ।।
iv) शूद्रोंको पढ़ने अथवा मंदिर में जाने की आज्ञा नहीं थी ।
( v ) शूद्रों को सार्वजनिक को की आज्ञा नहीं ।
: जाति प्रथा के गुण
(i)सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना - जाति अपने सदस्यों का न करती है । प्रत्येक जाति के सदस्य अपनी जाति के सदस्यों की सहायता के लि पर रहते हैं । इसलिए किसी व्यक्ति को चिंता करने की आवश्यकता नहीं रहती ।वह इसबबात से अच्छी तरह अवगत होता है कि किसी भी संकट के समय उसे अपनी जाति के स्यों द्वारा पूर्ण सहयोग प्राप्त होगा ।
( ii ) व्यवसाय संबंधी निपुणता - जाति प्रथा में प्रत्येक व्यक्ति के लिए व्यवसाय का कि की जाति के अनुसार किया जाता है । ये व्यवसाय पैतृक होते हैं । पीढ़ी - दर - पीढ़ी कर लेता है । ज्यों ही वह बड़ा होता है उसके जाति संबंधी व्यवसाय में दि पाय उसी प्रकार चलते जा रहे हैं । प्रत्येक बच्चा अपने व्यवसाय संबंधी जानकारी जाती है ।
iii ) रक्त की शुद्धता - जाति प्रथा में विवाह संबंधी कठोर प्रतिबंध थे । कोई भी व्यक्ति अपनी जाति से बाहर शादी नहीं करवा सकता था । इस कारण उच्च जातियों की शादी उच्च जातियों में तथा निम्न जातियों की शादी निम्न जातियों में होती थी । इस नियम का उल्लंघन करने वाले को जाति से निकाल दिया जाता था । इस नियम का कठोरता से पालन इसलिए किया जाता था ताकि रक्त की शुद्धता बनी रहे ।
( iv ) मानसिक सुरक्षा प्रदान करना- जाति से सदस्यों को मानसिक सुरक्षा भी मिलती है । उनको शादी - विवाह , व्यवसाय , खान - पान , रीति - रिवाज आदि के विषयों में नये सिरे से नहीं सोचना पड़ता | जाति ही इन सबका निश्चय करती है । व्यक्ति को किस समूह में विवाह करना है , कौन - सा व्यवसाय करना है , खान - पान में किन नियमों का पालन करना है आदि जीवन की अनेक अत्यंत महत्त्वपूर्ण समस्याओं का सुलझाव जाति के नियमों से हो जाता है ।
जाति प्रथा के दोष
(i) निम्न जातियों का शोषण - जाति प्रथा में व्यक्ति को समाज में उच्च अथवा निम्न दर्जा जन्म के आधार पर प्राप्त होता है । उच्च जातियों के लोग निम्न जातियों के लोगों के साथ जानवरों से भी बदतर व्यवहार करते थे । निम्न जातियों के लोगों का केवल एक ही कर्त्तव्य था कि वे उच्च जातियों के लोगों की सेवा करें । उन्हें प्रत्येक प्रकार के अधिकारों से वंचित रखा गया था । उनके निवास स्थान गाँव अथवा शहर से बाहर बनाए जाते थे । यदि किसी निम्न जाति के लोगों की परछाईं भी उच्च जाति के लोगों पर पड़ जाती तो उन पर बहुत अत्याचार किए जाते थे ।
( ii ) जाति एक बंद समूह - जाति व्यवस्था में व्यक्ति की सदस्यता उसके जन्म पर आधारित होती है । वह जिस जाति में जन्म लेता है सारी जिंदगी उसी जाति के घेरे में रहता है । प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जाति से संबंधित व्यवसाय ही अपनाने पड़ते थे । कोई भी व्यक्ति अपनी योग्यता के कारण किसी और जाति में प्रवेश नहीं कर सकता था । प्रत्येक जाति के व्यक्ति को अपनी जाति के नियमों का पालन करना पड़ता था । इसका उल्लंघन करने वाले को जाति में से निष्कासित कर दिया जाता था ।
( iii ) जाति चेतनता - जाति व्यवस्था में जाति चेतनता पाई जाती थी । प्रत्येक व्यक्ति को यह पता होता था कि समाज में उसकी स्थिति उसकी जाति पर निर्भर है । यह जाति उसे जन्मजात प्राप्त होती थी । यदि किसी व्यक्ति का जन्म किसी ब्राह्मण के घर होता तो उसे विशेष अधिकार प्राप्त होते थे तथा समाज द्वारा उसका विशेष सम्मान किया जाता था । निम्न जाति के घर पैदा होने वाले व्यक्ति को न केवल सभी अधिकारों से वंचित रखा जाता बल्कि उसके साथ बहुत बुरा व्यवहार किया जाता था । कोई भी व्यक्ति अपनी योग्यता के अनुसार किसी और जाति में प्रवेश नहीं कर सकता था । इसलिए वह अधिक परिश्रम करने की चेष्टा नहीं करता था ।
( iv ) सामाजिक एकता में रुकावट - जाति सामाजिक एकता के रास्ते में एक बड़ी रुकावट थी । इसका कारण यह है कि जाति के कारण समाज कई खंडों में बँट जाता था । एक जाति के लोगों को दूसरी जाति के लोगों के साथ सामाजिक संबंध स्थापित करने की आज्ञा नहीं होती थी । इस कारण एक जाति के लोगों का दूसरी जाति के लोगों के साथ प्यार नहीं रहता था । प्रत्येक जाति का सदस्य केवल अपनी जाति के कल्याण के बारे सोचता था । उच्च जाति के लोग निम्न जाति के लोगों का शोषण करते थे । इस कारण विभिन्न जातियों में सामाजिक एकता स्थापित न हो सकी ।
वर्ग
विश्व के सभी समाजों में वर्ग पाए जाते हैं कोई भी ऐसा समाज दिखाई नहीं पड़ता जो पूर्णता वर्ग हीन हो ।ये वर्ग आयु, लिंग ,शिक्षा ,व्यवसाय तथा आय के आधार पर आदिकाल से बनते रहे हैं वर्ग ऐसे व्यक्तियों का समूह है जो एक दूसरे को समान समझते हैं अन्य शब्दों में सामाजिक वर्ग समान सामाजिक स्थिति वाले व्यक्तियों का समूह है जो जन्म के अतिरिक्त किसी अन्य आधार पर बनता है सभी वर्ग सभी सामाजिक वर्गों की समाज में अपनी निश्चित स्थिति होती है जिनके अनुसार उन्हें समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।
सामाजिक वर्ग की विशेषताएं वर्ग की प्रमुख विशेषताओं का संक्षिप्त विवरण निबंध अनुसार है समिति स्थिति समूह का उतार-चढ़ाव वर्गों की कैसी श्रेणी होती है जिसमें कुछ वर्गों पर कुछ वर्ग मध्यम एवं कुछ निम्नतम स्तर पर होते हैं उच्च वर्ग के लोगों की सामाजिक प्रतिष्ठा एवं शक्ति अन्य वर्गों की तुलना में सर्वाधिक होती है उनके सदस्यों की संख्या कम होती है निम्न वर्ग के सदस्यों की संख्या अधिक होती है उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा एवं शक्ति भी कम होती है
: सामाजिक वर्ग की विशेषताएं
वर्ग की प्रमुख विशेषताओं का संक्षिप्त विवरण निमनलिखित अनुसार है
1 स्थिति समूह का उतार-चढ़ाव
वर्गों की ऐसी श्रेणी होती है जिसमें कुछ वर्गों ऊपर, कुछ वर्ग मध्यम एवं कुछ निम्नतम स्तर पर होते हैं उच्च वर्ग के लोगों की सामाजिक प्रतिष्ठा एवं शक्ति अन्य वर्गों की तुलना में सर्वाधिक होती है उनके सदस्यों की संख्या कम होती है निम्न वर्ग के सदस्यों की संख्या अधिक होती है उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा एवं शक्ति भी कम होती है।
2. ऊँच - नीच की भावना - एक वर्ग के लोग दूसरे वर्ग के प्रति उच्चता या हीनता की भावना रखते हैं तथा अपने वर्ग के प्रति उनमें हम की भावना पाई जाती है । शासक एवं संपन्न गों के लोग शासित एवं ग़रीब वर्गों को अपने से हीन समझते हैं । निर्धन लोग धनी वर्ग को अपने से ऊँचा समझते हैं।
3 . वर्ग चेतना - प्रत्येक वर्ग के लोगों में वर्ग चेतना पाई जाती है । प्रत्येक वर्ग की सामाजिक प्रतिष्ठा दूसरे से भिन्न होती है । उनमें उच्चता , निम्नता या समानता की भावना पाई जाती है । एक वर्ग के लोगों की जीवन - शैली , खान - पान , सुख - सुविधाएँ समान होने से लोगों में अपने वर्ग के प्रति चेतना का निर्माण होता है । यह वर्ग चेतना उनके व्यवहारों एवं वर्गों के पारस्परिक संबंधों को भी तय करती है । वर्ग चेतना के आधार पर ही एक वर्ग दूसरे वर्ग से प्रतिस्पर्धा करता है ।
4. सीमित सामाजिक संबंध - एक वर्ग के लोगों के सामाजिक संबंध प्रायः अपने वर्ग के लोगों तक ही सीमित होते हैं और वे अन्य वर्गों से एक निश्चित सामाजिक दूरी बनाए रखते हैं । वे अपने ही वर्ग में से अपने मित्र एवं जीवन - साथी आदि का चुनाव करते हैं । आर्थिक , सामाजिक एवं सांस्कृतिक समानता के कारण एक वर्ग के लोगों के संबंध अपने ही वर्ग में अधिक पाए जाते हैं ।
5. मुक्त - द्वार -- वर्ग - व्यवस्था जाति की भाँति कठोर एवं बंद न होकर एक मुक्त व्यवस्था है जिसका अर्थ है कि एक व्यक्ति एक वर्ग से दूसरे वर्ग में आ जा सकता है । एक व्यक्ति परिश्रम करके धनी बन सकता है तथा उच्च वर्ग की सदस्यता ग्रहण कर सकता है और दूसरी ओर संपन्न व्यक्ति दिवाला निकलने पर ग़रीब वर्ग में सम्मिलित हो जाता है । अत : यह आवश्यक नहीं है कि एक व्यक्ति जीवनपर्यंत उसी वर्ग का सदस्य रहेगा जिस वर्ग में उसने जन्म लिया है ।
6. जन्म का महत्त्व नहीं- यह आवश्यक नहीं है कि एक व्यक्ति उसी वर्ग का सदस्य होगा जिसमें उसका जन्म हुआ है । वर्ग की सत्यता को तय करने में व्यक्ति की शिक्षा , योग्यता , संपत्ति तथा कुशलता भी महत्त्वपूर्ण पक्ष हैं । वर्ग , जाति की भाँति सदैव के लिए जन्म के आधार पर निर्धारित नहीं होते है।
.जाति एवं वर्ण (वर्ग)में मुख्य अंतर
( i ) बंद एवं खुला - जाति एक बंद वर्ग है , जिसकी सदस्यता का परित्याग लगभग असंभव है । केवल धर्म परिवर्तन द्वारा ही जाति की सदस्यता छोड़ी जा सकती है । वर्ग की सदस्यता सबके लिए खुली होती है । व्यक्ति एक समय में कई वर्गों का सदस्य बन सकता है तथा इनकी सदस्यता छोड़ भी सकता है ।
( ii ) जन्म पर आधारित - जाति जन्म पर आधारित होती है । व्यक्ति अपनी योग्यता से इसे परिवर्तित नहीं कर सकता । दूसरी ओर कुशलता , योग्यता , गुण , अनुभव तथा उपलब्धियों के द्वारा व्यक्ति किसी भी वर्ग का सदस्य बन सकता है ।
( iii ) जाति अंतर्विवाही है वर्ग नहीं - जाति के सदस्यों को अपनी ही जाति में विवाह करना आवश्यक है । जातीय नियम जाति से बाहर अर्थात् अंतर्जातीय विवाह पर प्रतिबंध लगाते हैं । वर्गों में इस तरह का कोई प्रतिबंध नहीं होता । एक वर्ग का सदस्य अन्य किसी भी वर्ग में विवाह कर सकता है । धनवान् व्यक्ति गरीब के साथ , शिक्षित अशिक्षित के साथ विवाह कर सकता है ।
( iv ) व्यवसाय - जातियों के व्यवसाय पूर्व निर्धारित होते हैं । विभिन्न जातियों का अपना अपना व्यवसाय होता है । वर्ग के सदस्यों के व्यवसाय निश्चित नहीं होते । शिक्षित व्यक्ति डॉक्टर , इंजीनियर तथा प्राध्यापक आदि : महाभारत
महाभारत की कथा ---महाभारत न केवल भारत अपितु विश्व भर में सबसे बड़ा एक महाकाव्य है इसकी रचना ऋषि वेदव्यास जी ने की थी। यह संस्कृत में है। इसकी रचना 500 ईसवी पूर्व से 500 ईसवी के बीच की गई इसमें पहले 8800 लोग थे और इस ग्रंथ का नाम जय था ।बाद में इसकी 24000 श्लोकों के और इसका नाम भारत रखा गया अंत में इसमें 100000 श्लोक हो गए और इसका नाम महाभारत पड़ा ।महाभारत का प्रमुख विषय कौरवों और पांडवों की बीच सिहासन के लिए होने वाला युद्ध था इसमें अंततः पांडव विजयी रहे।
महाभारत में वर्णित जीवन
महाभारत में भारतीय राजनीतिक ,सामाजिक आर्थिक तथा धार्मिक जीवन पर प्रकाश डाला गया है इस काल में इन क्षेत्रों में अनेक महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए इन का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है–----
( क ) राजनीतिक जीवन ( Political Life )
1. विशाल राज्यों की स्थापना - महाभारत काल में आयाँ ने विस्तृत राज्य थे । ये राज्य इतने विशाल थे कि इन्हें अनेक प्रशासनिक इकाइयों में विभाजित किया गया था ताकि विशाल राज्यों की स्थापना कर ली थी ।
2. राजा ( The King ) - महाभारत काल में राजा का पद सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण था । उसे देवतुल्य माना जाता के पश्चात् उसका ज्येष्ठ पुत्र सिंहासन पर बैठता था । महाभारत काल में राजा के प्रमुख कर्तव्य ये थे-
( i ) प्रजा की सुरक्षा करना ,
( ii ) राज्य में शांति स्थापित करना ,
( iii ) कृषि को प्रोत्साहन देना
( iv ) दान देना
( v ) सड़कों का निर्माण करना ,
( vi ) प्रजा के भौतिक तथा नैतिक उत्थान में सहायता देना ।
3. मंत्रिपरिषद् - महाभारत काल में राजा ने कुशल प्रशासन के उद्देश्य से एक मंत्रिपरिषद् का गठन किया था । महाभारत में मंत्रियों की संख्या 36 बताई गई है । राजा राज्य प्रशासन के महत्त्वपूर्ण विषयों में इनसे परामर्श लेता था । केवल नीतिकुशल , ईमानदार , चरित्रवान् तथा प्रतिभावान व्यक्तियों को था । इस काल के महत्त्वपूर्ण मंत्री ये थे-
4. प्रशासनिक इकाइयाँ ... महाभारत काल में राज्य की कुशल शासन व्यवस्था के लिए इसे अनेक प्रशासनिक इकाइयों में विभाजित किया गया था । प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी । इसका मुखिया ग्रामिणी कहलाता था । प्रत्येक ग्राम लगभग आत्म - निर्भर होता था । ग्राम से ऊपर दस ग्रामों का एक समूह होता था । इसका प्रमुख अधिकारी दशनामी कहलाता था । इसी प्रकार बीस ग्रामों के प्रमुख अधिकारी को विषयपति , सौ ग्रामों के अधिकारी को शतग्रामी तथा हजार ग्रामों के अधिकारी को अधिपति कहा जाता था । ये सभी अधिकारी अपने अधीन क्षेत्र में शांति व्यवस्था स्थापित करने , अपराधियों को दंड देने तथा भू - राजस्व एकत्र करने के लिए उत्तरदायी थे ।
5. वित्तीय व्यवस्था _ महाभारत काल में कुशल वित्तीय व्यवस्था की स्थापना की गई थी । राज्य की आय का प्रमुख स्रोत भू - राजस्व था । यह उपज का 1/6 भाग होता था । व्यापारियों , खानों तथा वनों पर भी कर लगाए जाते थे । अपराधियों से जुर्माना वसूल किया जाता था । ब्राह्मणों , स्त्रियों तथा बच्चों को करो से मुक्त रखा गया था।
6न्याय व्यवस्था-- महाभारत काल में न्याय व्यवस्था का उल्लेखनीय विकास हुआ राजा को सर्वोच्च न्यायाधीश माना जाता था वह प्रवेष्ठा नामक मंत्री से परामर्श से निर्णय देता था उसका निर्णय अंतिम माना जाता था ।
7 सेना व्यवस्था
--महाभारत काल में प्रत्येक राजा अपने साम्राज्य की सुरक्षा एवं उसकी विस्तार के लिए एक विशाल सेना रखता था सेना के चार --पैदल सेना, हाथी सेना, घुड़सवार सेना तथा रथ सेना प्रमुख अंग थे ।
(ख ) सामाजिक जीवन
1. परिवार ( Family ) — महाभारत काल में परिवार को समाज की मूल इकाई माना जाता था । इस काल में भी परिवार संयुक्त एवं पितृ प्रधान रहे । अब भी परिवार का सबसे वयोवृद्ध व्यक्ति जिसे गृहपति कहते थे , परिवार के कार्यों की देखभाल करता था । परिवार के सभी व्यक्ति उसके आदेशों की पालना करना अपना आदर्श समझते थे । परिवार में पुत्र का होना गर्व की बात समझी जाती थी क्योंकि वह ही वंश को आगे बढ़ा सकता था तथा अन्य धार्मिक अनुष्ठानों को पूर्ण कर सकता था ।
2. स्त्रियों की स्थिति ( Position of women ) _ महाभारत काल में स्त्रियों की स्थिति अच्छी न थी । इस काल में पुत्र को पित्तरों का उद्धार करने वाला तथा पुत्री को घोर संकट का मूल समझा जाता था । इसके बावजूद महाभारत में अनेक ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहाँ पुत्रियों को अपने माता - पिता द्वारा असीम प्यार दिया गया था । कन्याओं की शिक्षा की ओर विशेष ध्यान दिया जाता था । वे गृह कार्यों में दक्ष होती थीं । उन्हें वेदों तथा दर्शन शास्त्रों की शिक्षा के अतिरिक्त संगीत तथा नृत्य की भी शिक्षा दी जाती थी । कुंती , दमयंती , देवयानी तथा द्रौपदी इस काल की प्रतिष्ठित स्त्रियाँ थीं । इस काल में विवाह को अनिवार्य समझा जाता था । महाभारत में अपनी कन्या का विवाह न करने वाले व्यक्ति को ब्रह्मघाती कहा गया है । इस काल में बाल विवाह का अभाव था । कन्याओं के वयस्क होने पर उनका विवाह किया जाता था । उन्हें अपना पति चुनने की स्वतंत्रता थी । राजवंशों में विवाह प्रायः स्वयंवर प्रथा द्वारा होते थे । महाभारत काल में पर्दा प्रथा प्रचलित थी अथवा नहीं इस संबंध में इतिहासकारों में मतभेद हैं । इस काल में वेश्या प्रथा प्रचलित थी । इस काल में सती प्रथा का प्रचलन भी आरंभ हो गया था । इन प्रथाओं के कारण समाज में स्त्रियों के सम्मान को अवश्य धक्का लगा था ।
3. जाति प्रथा ( Caste System ) - महाभारत काल में जाति प्रथा वैदिक काल की अपेक्षा अधिक कठोर । गई थी । इस काल में भी समाज चार प्रमुख जातियों - ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य तथा शूद्र में विभाजित था । समाज में ब्राह्मणों को सर्वोच्च स्थान प्राप्त था । वह राजा का प्रमुख परामर्शदाता तथा पथ प्रदर्शक होता था । उसका प्रमुख कार्य वेदों का अध्ययन करना , यज्ञ - हवन आदि करना , दान लेना तथा देना तथा समाज की बौद्धिक उन्नति में सहायता देना था । इस कारण उन्हें समाज में विशिष्ट सुविधाएँ प्राप्त थीं । उन्हें मृत्यु - दंड तथा करों से मुक्त रखा गया था । इस काल में अनेक ब्राह्मणों ने क्षत्रियों तथा वैश्यों के कार्यों को अपना लिया था । समाज में दूसरा महत्त्वपूर्ण स्थान क्षत्रियों को प्राप्त था । वे योद्धा तथा प्रशासक थे । वैश्य प्रमुखतः कृषि , पशु - पालन तथा व्यापार का कार्य करते थे । शूद्र समाज का सबसे निम्न वर्ग था । उसका मुख्य कार्य द्विज जातियों की सेवा करना था ।
4. पोशाक ( Dress ) - महाभारत काल में जनसाधारण लोगों की पोशाक सादी थी । इस काल में सूती , ऊनी तथा रेशमी वस्त्रों का प्रयोग किया जाता था । इस काल में स्त्री एवं पुरुष दो प्रकार के वस्त्र - अधोवस्त्र ( यह कमर के नीचे भाग में पहना जाता था ) तथा उर्ध्ववस्त्र ( यह कमर के ऊपरी भाग में पहना जाता था ) पहनते थे । लोगों में रंगीन वस्त्र धारण करने की बहुत रुचि थी । कुछ वस्त्र विशेष अवसरों से संबंधित थे जैसे मंगलमय अवसरों पर श्वेत वस्त्र , मृत्यु के अवसर पर काले वस्त्र तथा युद्ध के अवसर पर लाल रंग के वस्त्र धारण किए जाते थे । कभी कभी साधु कंबल , मृगचर्म तथा सन के बने हुए वस्त्र भी धारण करते थे । पुरुषों में पगड़ी अथवा मुकुट धारण करने की प्रथा प्रचलित थी । स्त्रियाँ भी अपना सिर ढकती थीं । कुछ पुरुष दाढ़ी - मूंछ रखते थे जबकि कुछ उन्हें कटवा लेते थे । स्त्रियाँ अपने बालों को विभिन्न प्रकार से संवारती थीं तथा उनमें फूल भी लगाती थीं । इस काल में स्त्री एवं पुरुष दोनों ही आभूषणप्रिय थे । वे सोने , चाँदी , हीरे , मोती , बहुमूल्य पत्थरों , पीतल तथा जानवरों की हड्डियों आदि से निर्मित विभिन्न प्रकार के आभूषण धारण करते थे ।
5. भोजन ( Diet ) - महाभारत काल में जनसाधारण लोगों में शाकाहारी भोजन प्रचलित था । वे गेहूँ , जौ , चावल , दालों , सब्जियों , दूध , दही तथा घी आदि का प्रयोग करते थे । इस काल में राजवंशों तथा धनिकों द्वारा आयोजित प्रीतिभोज के अवसरों पर विभिन्न प्रकार का माँस ( गाय का माँस खाना वर्जित था ) तथा मदिरापान का प्रचलन था ।
6. मनोरंजन ( Amusements ) - महाभारत काल के लोग विभिन्न साधनों से अपना मनोरंजन करते थे । इस काल के लोगों के मनोरंजन के प्रमुख साधन शिकार , नृत्य तथा संगीत थे । इस काल में जुए का प्रचलन बहुत बढ़ गया था । युधिष्ठिर ने तो जुए में द्रौपदी को भी दाँव पर लगा दिया था । इनके अतिरिक्त मल्ल युद्ध तथा हाथियों के युद्ध भी लोगों के मनोरंजन के महत्त्वपूर्ण साधन थे । लोगों के मनोरंजन के लिए सुंदर उद्यानों तथा जलकुंडों का भी निर्माण किया गया था ।
: (ग)आर्थिक जीवन
1कृषि--- महाभारत काल में लोगों का प्रमुख व्यवसाय कृषि था कृषि के लिए हलो का प्रयोग किया जाता था यह हाल लकड़ी तथा लोहे के बनाए जाते थे तथा उन्हें बलों द्वारा खींचा जाता था इसके अतिरिक्त कुदाल तथा हसीया का प्रयोग भी किया जाता था राज्य की ओर से कृषि को प्रोत्साहन दिया जाता था । वह सिंचाई की समुचित व्यवस्था तथा कृषकों को तकावी कर्ज प्रदान करता था । किसी को भी कृषि को क्षति पहुँचाने की अनुमति नहीं थी । कृषक कृषि को उपज बढ़ाने के उद्देश्य से खाद का प्रयोग करते थे । इस काल की प्रमुख फ़सलें गेहूँ , जौ , चावल , तिल , गन्ना तथा आमं थे । इनके अतिरिक्त विभिन्न प्रकार की दालें , मस्जियाँ तथा अन्य फल भी उपजाए जाते थे ।
2 , पशु - पालन ( Domestication of Animals -महाभारत काल में पशु - पालन भी लोगों का एक महत्त्वपूर्ण व्यवसाय था । इस काल में भी पशुओं को समृद्धि का माप माना जाता था अर्थात् जिसके पास जितने अधिक पशु होते थे . उसे उतना ही धनवान् माना जाता था । इस काल में पाले जाने वाले प्रमुख पशु गाय , बैल , भेड़ बकरियाँ , घोड़े , हाथी , कुत्ते , गधे तथा ऊँट थे । इस काल में भी गाय की पूजा की जाती थी तथा उसके वध पर निषेध था । लोग पशुओं के स्वभाव , उनके गुणों तथा रोगों आदि से भली - भाँति परिचित थे । राज्य की ओर से भी पशुओं की देखभाल की जाती थी तथा इस उद्देश्य से गोपाध्यक्ष नामक अधिकारी नियुक्त किए गए थे ।
3. व्यापार ( Trade ) — महाभारत काल में व्यापार को प्रोत्साहन देने के लिए राज्य की ओर से विशेष पग उठाए गए । प्रथम , प्रमुख नगरों को सड़क मार्गों से जोड़ा गया था । दूसरा , वस्तुओं के निर्यात तथा आयात पर कम चुंगो लगाई जाती थी । तीसरा , माल को होने के लिए समुद्री तथा नदी मार्गों का अधिक प्रयोग किया जाने लगा क्योंकि यह साधन सड़क मार्ग की अपेक्षा अधिक सस्ता था । चौथा . इस काल में शिल्पियों तथा वणिकों के संघ अधिक संगठित हो गए थे । इनके प्रधान को श्रेष्ठि अथवा जेठक कहा जाता था । इन संघों को राज्य की ओर से मान्यता प्राप्त थी । इन संघों ने व्यापार को प्रोत्साहन देने में प्रशंसनीय भूमिका अदा की । कुरु , पाँचाल , मगध , कोशल , कौशांबी , काशी , विदेह तथा अंग इस काल के प्रसिद्ध व्यापारिक नगर थे ।
4. अन्य व्यवसाय ( Other Occupations ) - महाभारत काल में उपर्युक्त व्यवसायों के अतिरिक्त अनेक प्रकार के अन्य व्यवसाय भी प्रचलित थे । इनमें वस्त्र उद्योग सर्वाधिक उन्नत था । इस काल में सूती , ऊनी तथा रेशमी वस्त्र तैयार किए जाते थे । इस काल में आभूषण बनाने की कला भी बहुत उन्नत थी । ये आभूषण सोने , चाँदी , बहुमूल्य पत्थरों तथा हाथो दाँत आदि से निर्मित किए जाते थे । इनके अतिरिक्त इस काल में अनेक लोग कुम्हार , बहई , रंगरेज , रथकार , खनिक , नट , ज्योतिषी , मणिकार , संगीतकार तथा वैद्य आदि का व्यवसाय भी करते थे ।
( घ ) धार्मिक जीवन ( Religious Life )
1. नए देवता ( New Deities ) — महाभारत काल में वैदिक काल में प्रचलित प्राकृतिक देवी देवताओं की पूजा लोप हो गई थी । इनका स्थान ब्रह्मा , विष्णु तथा शिव ने ले लिया था । ब्रह्मा को सर्वोच्च देवता माना गया । उसे संसार का रचयिता माना जाता था । दूसरा स्थान विष्णु को मिला । उसे संसार का पालक तथा रक्षक माना जाता था । तीसरा स्थान शिव को प्राप्त हुआ । उसे संसार को नष्ट करने वाला माना जाने लगा । इस प्रकार त्रिदेव के सिद्धांत का प्रचलन हुआ । इनके अतिरिक्त इस काल में दुर्गा , काली तथा पार्वती आदि देवियों का महत्त्व बढ़ गया ।
2. अवतारवाद ( Incarnation ) - महाभारत काल में अवतारवाद का सिद्धांत प्रबल हो गया । लोगों का यह मानना था कि ईश्वर समय - समय पर इस संसार में पापियों का नाश करने तथा धर्मियों का उत्थान करने के लिए अवतार धारण करता है । श्रीराम तथा श्रीकृष्ण को विष्णु का अवतार माना जाने लगा ।
3 यज्ञ ( Yajnas ) - महाभारत काल में भी यज्ञों का प्रचलन था । राजसूय तथा अश्वमेध यज्ञों को अब भी महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था । स्वयं श्रीराम , कौरवों तथा पांडवों ने अनेक यज्ञ किए थे । इस काल में यज्ञों में दी जाने वाली पशु बलि धीरे - धीरे लुप्त हो गई थी । लोगों में यह धारणा अधिक प्रबल हो गई थी कि सच्चा यज्ञ वह है जो अहिंसा तथा आत्मसंयम पर आधारित हो ।
4. नए सिद्धांत ( New Principles ) - महाभारत काल में आवागमन , मुक्ति तथा कर्म सिद्धांत ए अधिक बल दिया जाने लगा । इस काल में लोगों का विश्वास था कि मनुष्य मृत्यु के पश्चात् पुनर्जन्म धारण करता है । इस
आवागमन के चक्र से मुक्ति पाने के लिए मोक्ष पाना आवश्यक समझा जाता था।
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