CHAPTER-2 CLASS 11TH प्राम्भिक नगर
सिन्धु घाटी सभ्यता अध्याय से जुड़े कुछ प्रमुख शब्द
पुरातत्व विज्ञान
यह वह विज्ञान की वह शाखा जिसके अंतर्गत पुरा वस्तुओं या प्राचीन वस्तुओं के विश्लेषण के आधार पर इतिहास का पुनर्निर्माण किया जाता है उसे पुरातत्व विज्ञान कहते हैं |
पुरातत्व विद
विद्वान जो पुरा वस्तु की खोज और पुरा वस्तु का अध्ययन करके इतिहास का पुनः निर्माण करते हैं. उन्हें पुरातत्व विद कहते हैं।
प्राम्भिक नगर
मेसोपोटामिया की भौगोलिक विशेषता ।
मेसोपोटामिया ( इराक ) निस्संदेह एक भौगोलिक विविधता का देश है । मेसोपोटामिया नाम यूनानी भाषा के दो शब्दों मेसोस भाव मध्य तथा पोटैमोस भाव नदी से मिलकर बना है । अतः मेसोपोटामिया का अर्थ है दो नदियों - दज़ला तथा फ़रात के बीच का प्रदेश । मेसोपोटामिया के पूर्वोत्तर भाग में ऊंचे - नीचे मैदान हैं । ये मैदान बहुत हरे - भरे हैं । यहां विभिन्न प्रकार के जंगली फूल पाए जाते हैं । यहां अनेक स्वच्छ झरने हैं । यहां अच्छी फसल के लिए पर्याप्त वर्षा हो जाती है । मेसोपोटामिया के उत्तर में ऊंची भूमि है । इसे स्टेपी के मैदान के नाम से जाना जाता है । यहां घास बहुत होती है । अतः यहां के लोगों का प्रमुख व्यवसाय पशुपालन है । पूर्व में दज़ला की सहायक नदियां परिवहन का अच्छा साधन हैं । मेसोपोटामिया का दक्षिणी भाग एक रेगिस्तान है यहां सबसे पहले मेसोपोटामिया के नगरों का विकास हुआ । इसका कारण यह था कि दजला एवं फ़रात नदियां उत्तरी पर्वतों से निकल कर अपने साथ उपजाऊ मिट्टी लाती थीं । यहां फसलों का भरपूर उत्पादन होता था । यहां की प्रमुख फसलें गेहूं , जौ , मटर एवं मसूर थीं ।
नगरों का विकास
नगर किसे कहते हैं? इसकी कोई एक परिभाषा देना अत्यंत कठिन है । साधारणतया नगर उसे कहते हैं जिसके अधीन एक विशाल क्षेत्र हो , जहाँ काफी जनसंख्या हो , जहाँ के लोग पक्के मकानों में रहते हों , जहाँ की सड़कें तथा जहाँ लोगों को पूर्ण सुरक्षा प्राप्त हो । विश्व में नगरों का सर्वप्रथम विकास मेसोपोटामिया में हुआ । यहाँ नगरों पक्की हों , जहाँ यातायात एवं संचार के साधन विकसित हों , जहाँ लोगों को प्रत्येक प्रकार की सुविधाएँ प्राप्त हों का निर्माण 3000 ई ० पू ० में काँस्य युग । में आरंभ हुआ । यहाँ तीन प्रकार के नगरों का निर्माण हुआ । प्रथम , धार्मिक नगर थे जो मंदिरों के चारों ओर विकसित हुए । दूसरा , व्यापारिक नगर थे जो प्रसिद्ध व्यापारिक मार्गों एवं बंदरगाहों के निकट स्थापित हुए । तीसरा , शाही नगर थे जहाँ राजा , राज परिवार एवं प्रशासनिक अधिकारी रहते थे । ये नगर ऐसे स्थान पर होते थे जहाँ से संपूर्ण साम्राज्य पर नियंत्रण रखा जा सकता था । इन नगरों का विशेष महत्त्व होता था ।
I. नगरीकरण के कारण
मेसोपोटामिया में नगरीकरण के विकास के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे । इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित
1. अत्यंत उत्पादक खेती -- मेसोपोटामिया में नगरीकरण के विकास अनुसार है को बहुत प्रोत्साहन मिला । यहाँ की प्रमुख फ़सलें - गेहूँ , जौ एवं खजूर थीं । प्राकृतिक उर्वरता के कारण पशुओं को
बहुत चारे के लिए कोई कमी नहीं थी । अतः पशुपालन को भी बल मिला । पशुओं को न केवल दूध , माँस एवं ऊन प्राप्त करने के लिए पाला जाता था अपितु उनसे खेती एवं यातायात का कार्य भी लिया जाता था । खेती एवं पशुपालन कारण मानव जीवन स्थायी बन गया क्योंकि उसे भोजन की तलाश में स्थान - स्थान पर घूमने की ज़रूरत नहीं भी स्थायी जीवन होने के कारण मानव झोंपड़ियाँ बना कर साथ - साथ रहने लगा । इस प्रकार गाँव अस्तित्व में आए । खाद्य उत्पादन के बढ़ने से वस्तु विनिमय की प्रक्रिया आरंभ हो गई । इससे नए नए व्यवसाय आरंभ हो गए । इससे नगरीकरण की प्रक्रिया को बहुत प्रोत्साहन मिला ।
2. जल - परिवहन नगरीकरण के विकास के लिए कुशल जल - परिवहन का होना अत्यंत आवश्यक है । भारवाही पशुओं तथा बैलगाड़ियों के द्वारा नगरों में अनाज एवं अन्य वस्तुएँ लाना तथा ले जाना कठिन होता था । इसके तीन कारण थे । प्रथम , इसमें बहुत समय लग जाता था । दूसरा , इस प्रक्रिया में खर्चा बहुत आता था । तीसरा , रास्ते में पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था भी करनी पड़ती थी । नगरीय अर्थव्यवस्था इतना खर्च उठाने के योग्य नहीं होती । दूसरी ओर जल - परिवहन सबसे सस्ता साधन होता था । नावें ( boats ) हवा के वेग से चलती हैं जिस पर कोई खर्चा नहीं आता । प्राचीन मेसोपोटामिया की फ़रात ( Euphrates ) नदी विश्व व्यापार के मार्ग के लिए बहुत प्रसिद्ध थी । इस नदी से निकाली गई नहरें अनेक नगरों में जल - परिवहन का एक उत्तम साधन थीं ।
3. धातु एवं पत्थर का आयात ( Import of Metal and Stone ) किसी भी नगर के विकास में धातुओं एवं पत्थर का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है । धातुओं का प्रयोग विभिन्न प्रकार के औजार , बर्तन एवं आभूषण बनाने के लिए किया जाता है । औज़ारों से पत्थर को तराशा जाता है । वर्तन सभ्य समाज की निशानी हैं । इनका प्रयोग खाद्य वस्तुएँ बनाने , उन्हें खाने एवं संभालने के लिए किया जाना है । नगरों की स्त्रियाँ विभिन्न प्रकार के आभूषण पहनने की शौकीन होती हैं । पत्थरों का प्रयोग भवनों , मंदिरों , मूर्तियों एवं पुलों आदि के निर्माण के लिए किया जाता है । मेसोपोटामिया में धातुओं एवं पत्थरों की कमी थी । इसके चलते वहाँ नगरीकरण संभव नहीं था । अत : मेसोपोटामिया ने तुर्की , ईरान एवं खाड़ी पार के देशों से ताँबा , टिन , सोना , चाँदी , सीपी एवं विभिन्न प्रकार के पत्थरों का आयात करके इनकी कमी को दूर किया ।
4. श्रम विभाजन — श्रम विभाजन को नगरीय विकास का एक प्रमुख कारक माना जाता है । नगरों के लोग आत्मनिर्भर नहीं होते । उन्हें विभिन्न प्रकार की सेवाओं के लिए एक - दूसरे पर निर्भर रहना पड़ता है । उदाहरण के लिए एक पत्थर की मुद्रा ( stone scal ) बनाने वाले को पा र पर उकेरने के लिए काँसे के औजारों ( bronze tools ) की आवश्यकता होती है । ऐसे औजारों का वह स्वयं निर्माण नहीं करता । इसके अतिरिक्त वह मुद्रा बनाने के लिए आवश्यक रंगीन पत्थर के लिए भी अन्य व्यक्तियों पर निर्भर करता है । वह व्यापार करना भी नहीं जानता । उसकी विशेषज्ञता तो केवल पत्थर उकेरने तक ही सीमित होती है । इस प्रकार नगर के लोग अन्य लोगों पर उनकी सेवाओं के लिए अथवा उनके द्वारा उत्पन्न की गई वस्तुओं पर निर्भर करते हैं । संक्षेप में श्रम विभाजन को शहरी जीवन का एक प्रमुख आधार माना जाता है ।
5. मुद्राओं का प्रयोग मेसोपोटामिया के नगरों से हमें बड़ी संख्या में मुद्राएँ मिली हैं । ये मुद्राएँ पत्थर की होती थीं तथा इनका आकार बेलनाकार ( cylinderical ) था । ये बीच में आर - पार छिदी होती थीं । इसमें एक तीली लगायी जाती थी । इसे फिर गीली मिट्टी के ऊपर घुमा कर चित्र बनाए जाते थे । इन्हें अत्यंत कुशल कारीगरों द्वारा उकेरा जाता था । इन मुद्राओं पर कभी - कभी इसके स्वामी का नाम , उसके देवता का नाम तथा उसके रैंक आदि का वर्णन भी किया जाता था । इन मुद्राओं का प्रयोग व्यापारियों द्वारा अपना सामान एक स्थान से दूसरे स्थान पर सुरक्षित भेजने लिए किया जाता था । ये व्यापारी अपने सामान को एक गठरी में बाँध कर ऊपर गाँठ लगा लेते थे । इस गाँठ पर वह मुद्रा का ठप्पा लगा देते थे । इस प्रकार यह मुद्रा उस सामान की प्रामाणिकता का प्रतीक बन जाती थी । यदि यह मुद्रा टूटी हुई पाई जाती तो पता लग जाता कि रास्ते में सामान के साथ छेड़छाड़ की गई है अन्यथा भेजा गया सामान सुरक्षित है । निस्संदेह मुद्राओं के प्रयोग ने नगरीकरण के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई ।
II . *प्रसिद्ध नगर*l
प्राचीन काल मेसोपोटामिया में नगरीकरण की प्रक्रिया 3000 ई ० पू ० में आरंभ हुई थी । इस काल के कुछ प्रसिद्ध नगरों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है
1. *उरुक* ( Uruk ) उरुक मेसोपोटामिया का सबसे प्राचीन नगर था । यह नगर आधुनिक इराक की राजधानी बग़दाद से 250 किलोमीटर दक्षिण - पूर्व की ओर फ़रात ( Euphrates ) नदी के तट पर स्थित था । इसका उत्थान 3000 ई ० पू ० में हुआ था । इसकी गणना उस समय विश्व के सबसे विशाल नगरों में की जाती थी । यह उस समय 250 हैक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ था । यह सिंधु घाटी के मोहनजोदड़ो नगर से दो गुना बड़ा था । 2800 पू ० के आस - पास इसका आकार बढ़ कर 400 हैक्टेयर हो गया था । उस समय इस नगर में 50,000 से 80,000 के मध्य लोग निवास करते थे । इस नगर की स्थापना सुमेरिया के प्रसिद्ध शासक एनमर्कर ( Enmerkar ) ने की थी । उसने इस नगर में प्रसिद्ध इन्नाना देवी ( Goddess Inanna ) के मंदिर का निर्माण किया था । उरुक के एक अन्य प्रसिद्ध शासक गिल्गेमिश ( Gilgamesh ) ने इसे अपने साम्राज्य की राजधानी घोषित किया था । उसने इस नगर की सुरक्षा के लिए इसके चारों ओर एक विशाल दीवार का निर्माण किया था । इस नगर के उत्खनन ( excavation ) का वास्तविक कार्य जर्मनी के जूलीयस जोर्डन ( Julius Jordan ) ने 1913 ई ० में आरंभ किया । उरुक शासकों द्वारा बनाए गए युद्धबंदियों एवं वहाँ के स्थानीय निवासियों को अनिवार्य रूप में शासक का अथवा मंदिर का काम करना पड़ता था । ऐसे व्यक्तियों को काम के बदले अनाज दिया जाता था । इसका अनुमान इस बात से लगाया जाता है कि हमें उस समय की बड़ी संख्या में राशन सूचियाँ मिली हैं जिनमें काम करने वाले लोगों के नामों के आगे उन्हें दिए जाने वाले अनाज , तेल एवं कपड़े आदि की मात्रा लिखी गई थी । उस समय शासक की आज्ञा के अनुसार साधारण लोग पत्थर खोदने , मिट्टी से ईंटें तैयार करने , मंदिर के लिए उपयुक्त सामान लाने , मंदिर का निर्माण करने आदि कार्यों में जुटे रहते थे ।
2. *उर* ( Ur ) - उर मेसोपोटामिया का एक अन्य प्राचीन एवं महत्त्वपूर्ण नगर था । यह बग़दाद से 300 किलोमीटर दक्षिण - पूर्व की ओर स्थित था । यह फ़रात नदी से केवल 15 किलोमीटर दक्षिण - पश्चिम की ओर स्थित था । इस नगर की सबसे पहले खुदाई एक अंग्रेज़ जे ० ई ० टेलर ( J. E. Taylor ) द्वारा 1854-55 ई ० में की गई । इस नगर की व्यापक स्तर पर खुदाई का कार्य 1920 एवं 1930 के दशक में सर लियोनार्ड वूले ( Sir Leonard Woolley ) के निर्देशन में आर ० सी ० थामसन ( R.C. Thompson ) एवं एच ० आर ० हाल ( H. R. Hall ) ने किया । उर नगर की स्थापना उर के प्रथम राजवंश के शासक मेसनीपद ( Mesanepada ) ने लगभग 2670 ई ० पू ० में की थी । मेसनीपद ने इसे अपने साम्राज्य की राजधानी घोषित किया था । उर एक प्रसिद्ध व्यापारिक नगर एवं बंदरगाह था । 2200 ई ० पू ० में एलमाइटों ( Elemites ) ने अपने आक्रमण के दौरान इस नगर का विनाश कर दिया था । उर - नमू ( Ur - Nammu ) जो उर के तीसरे राजवंश का प्रथम शासक था ने उर का 2100 ई ० पू ० में किया । उर में जिन राजवंशों ने शासन किया उनमें चालदी ( Chaldees ) राजवंश सर्वाधिक प्रसिद्ध था । इस राजवंश के अधीन उर ने उल्लेखनीय प्रगति की । 550 ई ० के पश्चात् उर नगर का अनेक कारणों से पतन हो गया । उर नगर की खुदाई से जो निष्कर्ष सामने आता है उससे यह पता चलता है कि इसमें नगर योजना का पालन नहीं किया गया था । इसका कारण यह था कि इस नगर की गलियाँ संकरी एवं टेढ़ी - मेढ़ी थीं ।
3 *मारी*
मारी में अक्कदी , एमोराइट , असीरियाई तथा आर्मीनियन जाति के लोग रहते थे । मारी के राजा एमोराइट समुदाय से संबंधित थे । उनकी पोशाक वहाँ के मूल निवासियों से भिन्न होती थी । मारी के राजा मेसोपोटामिया के विभिन्न देवी - देवताओं का बहुत सम्मान करते थे । इस प्रकार मारी में विभिन्न जातियों एवं समुदायों के मिश्रण से वहाँ एक नई संस्कृति का जन्म हुआ । ( ii ) मारी के प्रसिद्ध शासक ज़िमरीलिम ने वहाँ एक विशाल राजमहल का निर्माण करवाया था । यह 2.4 1 हैक्टेयर के क्षेत्र में फैला हुआ था । इसके 260 कमरे थे । यह अपने समय में न केवल अन्य राजमहलों में सबसे विशाल था अपितु यह अत्यंत सुंदर भी था । इसका निर्माण विभिन्न रंगों के सुंदर पत्थरों से किया गया था । ( ii ) मारी नगर व्यापार का एक प्रसिद्ध केंद्र भी था । इसके न केवल मेसोपोटामिया के अन्य नगरों अपितु विदेशों , तुर्की , सीरिया , लेबनान , ईरान आदि देशों के साथ व्यापारिक संबंध थे । मारी में आने - जाने वाले जहाज़ों के सामान की अधिकारियों द्वारा जाँच की जाती थी । वे जहाज़ों में लदे हुए माल की कीमत का लगभग 10 % प्रभार वसूल करते थे ।
4 *किश* – किश प्राचीन मेसोपोटामिया का एक महत्त्वपूर्ण नगर था । यह बेबीलोन ( Babylon ) से 12 किलोमीटर पूर्व में स्थित था । यह जलप्लावन ( flood ) के पश्चात् स्थापित होने वाला प्रथम नगर था । इसका उत्थान लगभग 3000 ई ० पू ० में हुआ था । इसका प्रथम शासक उतुंग ( Urtung ) था । वह एक पराक्रमी शासक था । उसने अपने शासनकाल में ईरान पर आक्रमण कर वहाँ लूटमार की थी । यह नगर 2800 ई ० पू ० से 2370 ई ० पू ० में अपनी उन्नति के शिखर पर था । यह नगर 600 ई ० तक अस्तित्व में रहा । कू - बबा ( Ku - baba ) किश नगर पर शासन करने वाली प्रथम रानी थी । वह 2450 ई ० पू ० में सिंहासन पर बैठी थी । इस नगर का प्रमुख देवता जबाबा ( Zababa ) था । इस नगर के उत्खनन का कार्य 1912 से 1914 ई ० तक एक फ्रांसीसी दल तथा 1923 से 1933 ई ० तक ऐंग्लो - अमेरिकन के संयुक्त दल द्वारा किया गया । इस नगर के उत्खनन से हमें एक विशाल महल , एक मंदिर , तीन जिगुरात एवं कुछ समाधियाँ मिली हैं ।6 *निनवै*
निनवै प्राचीन मेसोपोटामिया की महत्वपूर्ण नगरों में से एक था वह दजला नदी के पूर्वी तट पर स्थित था यह 1800 एकड़ भूमि में फैला हुआ था इसकी स्थापना 1800ईसवी में निनस में की थी। नीनस ने यहां एक विशाल राज महल का निर्माण करवाया यह 210 मीटर लंबा और 200 मीटर चौड़ा था इसमें 80 कमरे थे इसे अत्यंत सुंदर मूर्तियां एवं चित्रकारी से सुसज्जित किया गया था ।उसने यातायात के साधनों का विकास किया कृषि के विकास में अनेक नहरे खुदवाई। सुरक्षा के लिए चारों ओर एक विशाल दीवार का निर्माण करवाया।
5*लगश*
लगश सुमेर का सबसे प्राचीन एवं महत्वपूर्ण नगर था यह आधुनिक इराक के शहर बसरा से लगभग 200 किलोमीटर उत्तर पश्चिम की ओर स्थित था जिस नगर की राजधानी का नाम गिरशु था। लगश का प्रथम शासक उरनिना था। इस शहर मेंअनेक शासक हुए परंतु गुड़िया लगश शासकों में सबसे महान शासक था उसके अधीन लगश ने पुनः अपना गौरव प्राप्त किया उसने एलम को अपने अधीन किया वह अपने धार्मिक कार्यों उदारता एवं न्याय प्रियता के लिए प्रसिद्ध था उसके शासन काल में भवन निर्माण कला एवं मूर्ति निर्माण के क्षेत्र में अद्वितीय विकास हुआ उसने बड़ी संख्या में मंदिरों का निर्माण कराया और अपनी मूर्तियां भी बनवाई उसने सिंचाई व्यवस्था का विस्तार किया उसने विदेशी व्यापार को परिणाम स्वरूप उसके शासनकाल में प्रजा बहुत समृद्ध हुई।
7 निमरुद
निमरुद प्राचीन काल मेसोपोटामिया का एक महत्वपूर्ण नगर था यह दजला नदी के दक्षिणी तट पर स्थित था इस नगर को प्राचीन काल में कल्हु के नाम से जाना जाता था । इस साल में अनेकों भव्य भवनों का एवं मंदिरों का निर्माण करवाया यहां एक विशाल राज महल का निर्माण कराया गया इस राजमहल में अनेक प्रकार के चित्र भी लगाए गए थे यह चित्र देखने में बिल्कुल सजीव लगते थे।
8 *बेबीलोन* : बेबीलोन दज़ला नदी के उत्तर - पश्चिम में स्थित था । इसकी राजधानी का नाम बेबीलोनिया था । इस नगर ने प्राचीन काल मेसोपोटामिया के इतिहास में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी । इस नगर की स्थापना अक्कद के शासक सारगोन ने की थी । उसने यहाँ अनेक भवनों का निर्माण करवाया । हामूराबी के शासनकाल में बेबीलोन ने उल्लेखनीय विकास किया । बाद में असीरिया ने बेबीलोन पर अधिकार कर लिया था । 625 ई ० पू ० में नैबोपोलास्सर ने बेबीलोनिया को असीरियाई शासन से स्वतंत्र करवा लिया था । उसके एवं उसके उत्तराधिकारियों के अधीन बेबीलोन में एक गौरवपूर्ण युग का आरंभ हुआ । इसकी गणना विश्व के प्रमुख नगरों में की जाने लगी । इसके चारों ओर एक तिहरी दीवार बनाई गई थी । इसमें अनेक विशाल एवं भव्य राजमहलों एवं मंदिरों का निर्माण किया गया था । बेबीलोन एक प्रसिद्ध व्यापारिक केंद्र भी था । इस नगर ने भाषा , साहित्य , विज्ञान एवं चिकित्सा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया । नैबोनिडस स्वतंत्र बेबीलोन का अंतिम शासक था ।
*प्रारंभिक शहरी समाजों के स्वरूप*
1. नगर योजना ( Town Planning ) मेसोपोटामिया के नगर एक निश्चित योजना के अनुसार बनाए गए थे । इस बात की ओर विशेष ध्यान रखा जाता था कि नगरों में बनाए जाने वाले भवन मज़बूत हों । इसलिए मकानों की नींव में पकाई हुई ईंटों का प्रयोग किया जाता था । बेबीलोन के शासक हामूराबी ने निश्चित योजना के अनुसार सभी भवनों को बनाने के लिए विशेष निर्देश जारी किए थे । उसने नगर निर्माण को सुंदर बनाने के लिए भी योजनाएँ तैयार कीं । जो इन नियमों का पालन नहीं करता था उसे कठोर दंड दिए जाते थे । उस समय अधिकतर घर एक मंजिला होते थे । इन घरों में एक खुला आँगन होता था । इस आँगन के चारों ओर कमरे बनाए जाते थे । गर्मी से बचने के लिए धनी लोग अपने घरों के नीचे तहखाने बनाते थे । मकानों में प्रकाश के लिए खिड़कियों का प्रबंध होता था । उर नगर के लोग परिवारों की गोपनीयता बनाए रखने के लिए खिड़कियाँ नहीं बनाते थे । पानी की निकासी के लिए नालियों का प्रबंध किया जाता था । नगरों में यातायात की आवाजाही के लिए सड़कों का उचित प्रबंध किया जाता था । प्रशासन सड़कों की सफ़ाई की ओर विशेष ध्यान देता था । सड़कों पर रोशनी का भी प्रबंध किया जाता था ।
2. प्रमुख वर्ग ( Main Classes ) — उस समय प्रारंभिक शहरी समाजों में सामाजिक असमानता का भेद आरंभ हो चुका था । उस समय समाज में तीन प्रमुख वर्ग प्रचलित थे । प्रथम वर्ग कुलीन लोगों का था । इसमें राजा , राज्य के अधिकारी , उच्च सैनिक अधिकारी , धनी व्यापारी एवं पुरोहित सम्मिलित थे । इस वर्ग को समाज में सर्वोच्च स्थान प्राप्त था। इस वर्ग के लोग ऐश्वर्या पूर्ण जीवन व्यतीत करते थे वह सुंदर महलों और भवनों में रहते थे मूल्यवान वस्तुओं को पहनते थे स्वादिष्ट भोजन खाते थे उनकी सेवा में अनेक दास् दासियाँ रहती थी ,दूसरा वर्ग मध्यमवर्ग था इस वर्ग के छोटे व्यापारी शिल्पी राज्य के अधिकारी एवं बुद्धिजीवी सम्मिलित थे इनका जीवन भी काफी अच्छा था ।तीसरा वर्ग समाज का सबसे निमन वर्ग था इसमें किसान मजदूर एवं दास सम्मिलित थे यह समाज का बहुसंख्यक वर्ग था इस वर्ग की स्थिति अत्यंत दयनीय थी।
3. *परिवार* — परिवार को समाज की आधारशिला माना जाता था । प्राचीन काल में मेसोपोटामिया के समाज में एकल परिवार का प्रचलन अधिक था । इस परिवार में पुरुष , उसकी पत्नी एवं उनके बच्चे सम्मिलित होते थे । पिता परिवार का मुखिया होता था । परिवार के अन्य सदस्यों पर उसका पूर्ण स्वामित्व होता था । अतः परिवार के सभी सदस्य उसकी आज्ञा का पालन करते थे । परिवार में पुत्र का होना अनिवार्य माना जाता था । माता - पिता अपने बच्चों को बेच सकते थे । बच्चों का विवाह माता - पिता की सहमति से होता था । उस समय विवाह बहुत धूमधाम से किए जाते थे । दोनों पक्षों की ओर से उपहारों का आदान - प्रदान किया जाता था । वे एक साथ मिलकर भोजन करते थे तथा मंदिर जाकर भेंट चढ़ाते थे ।
4. *स्त्रियों की स्थिति*
— प्रारंभिक शहरी समाज में स्त्रियों की स्थिति काफी अच्छी थी । वे पुरुषों के साथ धार्मिक एवं सामाजिक उत्सवों में समान रूप से भाग लेती थीं । दहेज पर वधु का अधिकार माना जाता था । पति की मृत्यु होने पर वह पति की संपत्ति की संरक्षिका मानी जाती थी । पत्नी को पती से तलाक लेने एवं पुनः विवाह करने का अधिकार प्राप्त था । वे अपना स्वतंत्र व्यापार कर सकती थीं तथा अपने पृथक् दास - दासियाँ रख सकती थीं । वे पुरोहित एवं समाज के अन्य उच्च पदों पर नियुक्त हो सकती थीं । निस्संदेह स्त्रियों के ये अधिकार समाज में उनके सम्मान को दर्शाते हैं । उस समय समाज में देवदासी प्रथा प्रचलित थी । किंतु इसे बुरा नहीं समझा जाता था । पुरुष एक स्त्री से विवाह करता था किंतु उसे अपनी हैसियत के अनुसार कुछ उप - पत्नियाँ रखने का भी अधिकार प्राप्त था ।
5. *दासों की स्थिति* — प्रारंभिक शहरी समाजों में दासों की स्थिति सबसे निम्न थी । उस समय दास तीन प्रकार के थे-
( i ) युद्धबंदी
( ii ) माता - पिता द्वारा बेचे गये बच्चे एवं
( ii ) कर्ज न चुका सकने वाले व्यक्ति । दास बनाए गए व्यक्तियों को पशुओं की तरह खरीदा एवं बेचा जा सकता था । इन दासों को किसी प्रकार का कोई अधिकार प्राप्त न था । उन्हें अपने स्वामी की संपत्ति माना जाता था तथा उनकी आज्ञा का पालन करना पड़ता था । ऐसा न करने वाले दास अथवा दासी को कड़े दंड दिए जाते थे । यदि कोई दास भागने पर पकड़ा जाता तो उसे मृत्यु दंड दिया जाता था । स्वामी जब चाहे किसी दास की सेवा से प्रसन्न होकर उसे मुक्त कर सकता था । कोई भी दास अपने स्वामी को धन देकर अपनी मुक्ति प्राप्त कर सकता था । कोई भी स्वतंत्र नागरिक अपनी दासी को उप - पत्नी बना सकता था । दासी से उत्पन्न संतान को स्वतंत्र मान लिया जाता था ।
6. *मनोरंजन*
— प्रारंभिक शहरी समाजों के लोग विभिन्न साधनों से अपना मनोरंजन करते थे । वे नृत्य गान के बहुत शौकीन थे । इसका अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि हमें उत्खनन से बाँसुरी , वीणा एवं ढोल आदि के अवशेष मिले हैं । मंदिरों में भी संगीत एवं नृत्य - गान के विशेष सम्मेलन होते रहते थे । वे शिकार खेलने , पशु - पक्षियों की लड़ाइयाँ देखने एवं कुश्तियाँ देखने के भी बहुत शौकीन थे । वे शतरंज खेलने में भी बहुत रुचि लेते थे । बच्चे अपना मनोरंजन अनेक प्रकार के खिलौनों से करते थे ।
*गिल्गेमिश के महाकाव्य*
- गिल्गेमिश के महाकाव्य को विश्व साहित्य में विशेष स्थान प्राप्त है । गिल्गेमिश उरुक का एक प्रसिद्ध शासक था जिसने लगभग 2700 ई ० पू ० वहाँ शासन किया था । उसके महाकाव्य को 2000 ई ० पू ० में 12 पट्टिकाओं पर लिखा गया था । इस महाकाव्य में गिल्गेमिश के बहादुरी भरे कारनामों एवं मृत्यु की मानव पर विजय का बहुत मर्मस्पर्शी वर्णन किया गया है । गिल्गेमिश उरुक का एक प्रसिद्ध एवं शक्तिशाली शासक था । वह एक महान् योद्धा था । उसने अनेक प्रदेशों को अपने अधीन कर एक विशाल साम्राज्य की स्थापना कर ली थी । जहाँ एक ओर गिल्गेमिश बहुत बहादुर था वहीं दूसरी ओर वह बहुत अत्याचारी भी था । उसके अत्याचारों से देवताओं ने उसके अत्याचारों से प्रजा को मुक्त करवाने के उद्देश्य से एनकीडू को भेजा । दोनों के मध्य एक लंबा युद्ध हुआ । इस युद्ध में दोनों अविजित रहे । इस कारण दोनों में मित्रता स्थापित हो गई । इसके पश्चात् गिल्गेमिश एवं एनकीडू ने अपना शेष जीवन मानवता की सेवा करने में व्यतीत किया । कुछ समय के पश्चात् एनकीडू एक सुंदर नर्तकी के प्रेम जाल में फंस गया । इस कारण देवता उससे नाराज़ हो गए एवं दंडस्वरूप उसके प्राण ले लिए । एनकीडू की मृत्यु से गिल्गेमिश को गहरा सदमा लगा । वह स्वयं मृत्यु से भयभीत रहने लगा । इसलिए उसने अमृत्तव की खोज आरंभ की । वह अनेक कठिनाइयों को झेलता हुआ उतनापिष्टिम से मिला । अंतत : गिल्गेमिश के हाथ निराशा लगी । उसे यह स्पष्ट हो गया कि पृथ्वी पर आने वाले प्रत्येक जीव की मृत्यु निश्चित है । अत : वह इस बात से संतोष कर लेता है कि उसकी मृत्यु के पश्चात् उसके पुत्र एवं उरुक निवासी जीवित रहेंगे ।
*मेसोपोटामिया में हुए लेखन कला के विकास के बारे में*
- मेसोपोटामिया में 3200 ई ० पू ० में लेखन कला का विकास आरंभ हुआ । इसके विकास में मेसोपोटामिया के मंदिरों ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई । वास्तव में मंदिरों के पुरोहितों को मंदिर की आय - व्यय का ब्योरा रखने के लिए लेखन कला की आवश्यकता महसूस हुई । आरंभ में मेसोपोटामिया में चित्रलिपि का उदय हुआ । यह लिपि बहुत कठिन थी । इस लिपि को मिट्टी की पट्टिकाओं पर लिखा जाता था । इस पर कीलाकार चिन्ह बनाए जाते थे । इसे क्यूनीफार्म कहा जाता था । इन पट्टिकाओं पर लेखन कार्य पूरा होने पर उन्हें धूप में सुखा लिया जाता था । मेसोपोटामिया की सबसे पुरानी ज्ञात भाषा सुमेरियन थी । 2400 ई ० पू ० में अक्कदी ने इस भाषा का स्थान ले लिया । 1400 ई ० पू ० में अरामाइक भाषा का भी प्रचलन आरंभ हो गया । मेसोपोटामिया लिपि बहुत जटिल थी । इस कारण मेसोपोटामिया में साक्षरता की दर बहुत कम रही ।
. *विश्व को मेसोपोटामिया की देन*
विश्व को मेसोपोटामिया ने निम्नलिखित क्षेत्रों में बहुमूल्य योगदान दिया ( i ) उसकी कालगणना तथा गणित की विद्वतापूर्ण परंपरा को आज तार्किक माना जाता है । ( ii ) उसने गुणा और भाग की जो तालिकाएँ , वर्ग तथा वर्गमूल और चक्रवृद्धि ब्याज की जो सारणियाँ दी हैं , उन्हें आज सही माना जाता है । ( ii ) उन्होंने जो 2 के वर्गमूल का जो मान दिया है , वह आज के वर्गमूल के मान के बहुत निकट है । ( iv ) उन्होंने एक वर्ष को 12 महीनों , एक महीने को 4 हफ्तों , एक दिन को 24 घंटों तथा एक घंटे को 60 मिनटों में विभाजित किया है । इसे आज पूर्ण विश्व द्वारा अपनाया गया है । ( v ) उनके द्वारा सूर्य एवं चंद्र ग्रहण , तारों और तारामंडल की स्थिति को आज तार्किक माना जाता है । ( vi ) उन्होंने आधुनिक विश्व को लेखन कला से अवगत करवाया ।

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