शिक्षक दिवस पर विशेष
हर मंजिल को संभव बनाते हैं शिक्षक
( राजेंद्र पालमपुरी लेखक, मनाली, कुल्लू से हैं )
पूर्व राष्ट्रपति डा. सर्वपल्ली राधा कृष्णन जी के शब्दों में, ‘मानव विकास स्वतः नहीं होता, उसके लिए सचेत होकर प्रयास करना पड़ता है।’ और वास्तविकता यही है कि बिना गुरु की ज्ञान की प्राप्ति संभव ही नहीं। अर्थात बिन शिक्षक के हम किसी मंजिल, किसी लक्ष्य तक पहुंचने में सक्षम हो ही नहीं सकते…
बहुत सी परिभाषाएं, संज्ञाएं और कई संबोधन हैं समाज में शिक्षक के। कहीं पथ प्रदर्शक हैं शिक्षक, जो समाज में हो रहे विकास, हमारी परंपराओं, संस्कृति को संरक्षित कर रहे हैं, तो कहीं आईना है शिक्षक। कहीं समाज में पनपती बुराइयों को दूर करता है, तो कहीं चिराग बनकर अपनी रोशनी देता भी नजर आता है एक शिक्षक। कुल मिलाकर कहा जाए तो शिक्षक हमारे समाज, हमारी व्यवस्थाओं को कायम रखता किसी ‘भीष्म पितामह’ से कम नहीं। अध्यापक पूरे समाज को अपने रंगों में रंग देने वाला एक ऐसा इंद्र धनुष है, जो सिर्फ सावन के मौसम में ही नहीं, बल्कि हमारी जिंदगी को निरंतर सराबोर करता एक झरना है। शिक्षक सदैव, जीवन जीने की प्रेरणा देता है, विश्वास जगाता है। जीवन और जीवन के मूल्यों का एहसास भी दिलाता है शिक्षक। समाज पर किसी अन्य व्यक्ति या वर्ग विशेष का उतना प्रभाव नहीं पड़ता, जितना एक शिक्षक का। शिक्षक के व्यक्तित्व की छाप समय के साथ-साथ, सीधे-सीधे बच्चों यानी शिक्षक के अनुयायियों पर पड़ती ही है, जो जीवन भर बच्चे के साथ रहती है।
इसी बात को लेकर हमारे भारत के द्वितीय राष्ट्रपति डा. सर्वपल्ली राधा कृष्णन जी के शब्दों में, ‘मानव विकास स्वतः नहीं होता, उसके लिए सचेत होकर प्रयास करना पड़ता है।’ और वास्तविकता यही है कि बिना गुरु की ज्ञान की प्राप्ति संभव ही नहीं। अर्थात बिन शिक्षक के हम किसी मंजिल, किसी लक्ष्य तक पहुंचने में सक्षम हो ही नहीं सकते। मेरा जीवन भी कुछ गुरुओं से बेहद प्रभावित रहा है। उनमें से एक हैं स्व. श्री परस राम आचार्य जी। उनके आदेश मुझे आज भी सही दिशा-निर्देश देने की क्षमता रखते हैं और जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं। उनका वह पहरावा सफेद पायजामा, लंबा कुर्ता, हाथ में लिए बेंत का डंडा और सिर पर तुरलेदार साफा अब तक भी नहीं भूला हूं मैं। सच्चे अर्थों में गुरु समाज की निःस्वार्थ सेवा करता है। उसमें हमेशा सीखने की क्षमता तो होती ही है, तो गुरु इसके लिए एक अवसर बनकर आता है। एक अच्छा शिक्षक सदैव अपने शिष्य को कुछ न कुछ नया सीखने और कुछ नया करने की प्रेरणा देता है, उसे हर कदम पर उत्साहित करता है।
गुरु के अथक परिश्रम द्वारा ही बच्चों में बोलने, सुनने और लिखने जैसे कौशलों का विकास होता है। जीवन में मूल्यों जैसे ‘चरित्र निर्माण’ के मूल्यों का निर्माण यदि हो सकता है तो वह केवल गुरु या शिक्षक द्वारा ही संभव है। सतत और समग्र विकास की ऊंचाइयां छूना, सिर्फ और सिर्फ गुरु के माध्यम से ही इनसान प्राप्त कर सकता है। गुरु ‘गुड़’ और चेला ‘शक्कर’ जैसी लोकोक्तियों का सिर्फ बोलचाल में ही उपयोग नहीं है, बल्कि ये वास्तविकता को भी प्रदर्शित करती हैं। ऐसी कई घटनाएं, जिसमें गुरु द्रोणाचार्य के ‘एकलव्य’ और ‘आरुणी’ जैसे शिष्यों की गणना सदियों से होती आई है और ऐसा मेरा अपना लगभग, चार दशकों तक बतौर शिक्षक कार्य करने का अनुभव है। प्रत्येक शिक्षक हमेशा ही अपने शिष्य के सुखद और उज्ज्वल भविष्य की कामना अपने स्वयं के, अपने परिवार के बच्चों जैसे ही करता है। यही नहीं, वह अपने ही बच्चों जैसी जीवन की सफलताओं और असीमित सुखद अनुभूतियों की अपेक्षाएं भी रखता है अपने शिष्यों से। शिक्षक सदैव अपने अनुयायियों के कदमों से कांटे उठाकर उन्हें फूलों पर चलने और जीवन में आने वाली अनेक कठिनाइयों से जूझने, उनके समाधान करने की शक्ति का स्रोत भी बनता है। गुरु का ऋण तो हम कभी नहीं चुका सकते, परंतु शिक्षकों के व्यक्तिगत जीवन इनकी समस्याओं, इनकी आवश्यकताओं और मजबूरियों को ही जरा भर अनुभव कर लें, समझ लें, तो शायद शिष्य होते हुए इनके एहसानों को लेशमात्र तो चुका ही सकते हैं। गुरु को केवल ‘भगवान’ मानकर ही इनसे समय-असमय हुई ‘गलतियों’ को नजरअंदाज तो कर ही सकते हैं। अतः हमें और हमारे समाज को चाहिए कि हम अपने सामाजिक और राष्ट्रीय उत्सवों या शिक्षक दिवस सरीखे अवसरों पर हम शिक्षकों का सम्मान करें। मैंने अनुभव किया है, अकसर निजी उत्सवों को तो छोडि़ए, हमारे राष्ट्रीय उत्सवों पर भी हम अपनी पाठशालाओं या सरकारी प्रतिष्ठानों में ऐसे शिक्षकों को आमंत्रित नहीं करते, जिन्हें सरकार द्वारा सम्मानित किया गया है। परिस्थिति वश या फिर राजनीतिक दबावों के चलते आज ऐसा कर पाना संभव नहीं हो पाता है, जो कि दुखद है। इस वर्ष शिक्षक दिवस से हमें इन तमाम विसंगतियों को मिटाकर गुरुओं के सम्मान की एक नई परंपरा विकसित करनी होगी।
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