गणित
हौवा नहीं जीवन का हिस्सा है
गणित
को सामान्यतः लोग एक नीरस विषय मानते हैं क्योंकि गणित के आधारभूत नियमों और
सूत्रों की जानकारी के अभाव में गणित को समझना कठिन है; साथ ही गणित को समझने में सूझ एवं
तर्क शक्ति की परम आवश्यकता होती है। अतः मस्तिष्क पर दबाव डालना पड़ता है। जिनके
पास सूझ, तर्क शक्ति एवं अच्छी स्मरण शक्ति है, उन लोगों के लिए गणित एक आनन्द का सागर है। समस्याओं से खेलना उनके लिए
कष्ट-प्रद न होकर आनन्द-प्रद होता है। समस्याओं को समझने तथा उनके समाधान मिलने पर
उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा तथा अपार प्रसन्नता मिलती है। गणित अपने आपमें
रहस्यों का संसार है। जिज्ञासु जब इस रहस्यमय संसार में प्रविष्ट करता है तो एक के
बाद एक नये रहस्य सामने आने लगते हैं। रहस्यों के अनावृत्त होने पर यह रहस्यमय
संसार परलोक में बदल जाता है। प्रस्तुत पत्रिका अंबिका दर्शन का उद्देश्य पाठकों को गणित सम्बन्धी कुछ
सामान्य बातों की जानकारी प्रदान कर गणित के प्रति रुचि जाग्रत करना है, जिससे कि वे इससे मिलने वाले आनन्द को प्राप्त करने से वंचित न रहें।
बच्चों से लेकर
वयस्कों तक गणित के प्रति एक उदासीनता है। स्कूली बच्चों में तो गणित का हौवा रहता
ही है पर वयस्क भी गणित को दूर की कोड़ी समझकर उससे दूर भागते हैं। पर क्या गणित के
बिना हम आधुनिक जिंदगी की कल्पना भी कर सकते हैं? और क्या गणित को समझना वाकई मुश्किल है। हम गणित की पढ़ाई को जिंदगी से जुड़े उदाहरणों से
नहीं जोड़ पाते। किसी भी विषय में मौलिक चीजों को समझना जरूरी होता है। गणित भी ऐसी
ही मौलिक चीज है। गिनती का ज्ञान शिक्षा के पहले चरण से ही शुरु हो जाता है।
विज्ञान और गणित बचपन से ही डराते हैं।
बच्चों को शुरु से ही गणित को रटवाने की बजाय उसे समझाकर सिखाना आवश्यक है। केवल मौखिक निर्देश काफी नहीं है। अध्यापक की जटिल भाषा बच्चों को समझ नहीं आती और डर से बच्चा कुछ पूछ नहीं पाता जिसका नतीजा होता है कि बच्चे के लिए गणित फोबिया बन जाता है। बच्चों को इस स्थित से निकालने के लिए उनके मानसिक स्तर के अनुसार उन्हें समझाया जाए। अध्यापक अक्सर सोचते है कि बच्चों में समझने की क्षमता नहीं है। परिणामस्वरूप बच्चा गणित से डरने लगता है मैं अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए कहता हूँ कि गणित संबंधित इस तरह की जानकारी जैसी कि आज दी जा रही है हमारे समय में होती तो आज मेरी स्थित अलग होती। अभाव में पलने-पढ़ने वाले बच्चों में भी प्रतिभा होती है बस जरूरत है उन्हें मौका व सुविधाएं देने की।
मेरे एक मित्र का कहना है की
मुझे बचपन में जो गणित का डर था यदि वो निकल गया होता तो मैं आज ऐसा होता या नहीं होता या बेहतर जगह पर होता।
कोई भी विषय डरावना नहीं होता। जरूरत है हमें विषय को समझने की। यदि हम किसी विषय को खेल की तरह लेते हैं तो वह सरल हो जाता है। अत: गणित विषय से न डरे |
विज्ञान और गणित बचपन से ही डराते हैं।
बच्चों को शुरु से ही गणित को रटवाने की बजाय उसे समझाकर सिखाना आवश्यक है। केवल मौखिक निर्देश काफी नहीं है। अध्यापक की जटिल भाषा बच्चों को समझ नहीं आती और डर से बच्चा कुछ पूछ नहीं पाता जिसका नतीजा होता है कि बच्चे के लिए गणित फोबिया बन जाता है। बच्चों को इस स्थित से निकालने के लिए उनके मानसिक स्तर के अनुसार उन्हें समझाया जाए। अध्यापक अक्सर सोचते है कि बच्चों में समझने की क्षमता नहीं है। परिणामस्वरूप बच्चा गणित से डरने लगता है मैं अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए कहता हूँ कि गणित संबंधित इस तरह की जानकारी जैसी कि आज दी जा रही है हमारे समय में होती तो आज मेरी स्थित अलग होती। अभाव में पलने-पढ़ने वाले बच्चों में भी प्रतिभा होती है बस जरूरत है उन्हें मौका व सुविधाएं देने की।
मेरे एक मित्र का कहना है की
मुझे बचपन में जो गणित का डर था यदि वो निकल गया होता तो मैं आज ऐसा होता या नहीं होता या बेहतर जगह पर होता।
कोई भी विषय डरावना नहीं होता। जरूरत है हमें विषय को समझने की। यदि हम किसी विषय को खेल की तरह लेते हैं तो वह सरल हो जाता है। अत: गणित विषय से न डरे |
--------------- JL Verma TGT Non
Medical
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