बसों-टैक्सियों में स्कूली बच्चों की जान हथेली पर
सुबह-सवेरे एक ओर जहां
लोग सैर को निकलते हैं, वहीं छोटे-छोटे बच्चे पीठ पर बस्ता उठाए स्कूल जा
रहे होते हैं। हर सुबह पौने सात बजे यह सिलसिला शुरू हो जाता है, पर किन
दिक्कतों से जूझते हुए ये मासूम स्कूल की दहलीज तक पहुंचते हैं,
सुबह-सवेरे की इस कड़ी में जानें पूरा सच…
सुबह-सवेरे
नहलाकर साफ-सुथरी वर्दी पहनाकर आप बच्चों को बड़े लाड़ से स्कूल के लिए
तैयार करते हैं, पर स्कूल बस में चढ़ते ही बच्चों की परेशानियां शुरू हो
जाती हैं। मतलब, भारी भीड़ के चलते खड़े होकर स्कूल तक सफर करना, बस की छत
पर खुद बैग रखना, घंटों जाम में फंसे रहना आदि कई ऐसी दिक्कते हैं, जिन्हें
न तो स्कूल प्रबंधन समझता है और न ही प्रशासन। सुबह-सवेरे की इस कड़ी में
जानें स्कूली गाडि़यों का हाल और उसमें दिक्कतों से दो चार होते स्कूली
बच्चे। जानकारी के अनुसार पर्यटन नगरी धर्मशाला में शुक्रवार और शनिवार
सुबह साढ़े छह से नौ बजे के बीच कचहरी चौक, शिक्षा बोर्ड, पोस्ट आफिस,
कोतवाली बाजार, श्यामनगर, रामनगर, बड़ोल, दाड़ी आईटीआई चौक, दाड़ी बाइपास,
फतेहपुर सिद्धबाड़ी चौक पूरी तरह से स्कूली बच्चों से व्यस्त दिखे। बच्चों
को स्कूल तक पहुंचाने के लिए 400 के करीब गाडि़यां शहर व इसके आसपास के
क्षेत्रों में पहुंची हुई थीं, जिनमें ठूंस-ठूंस कर बच्चों को भरने का
सिलसिला स्कूल पहुंचने तक जारी रहा। निजी स्कूलों की इक्का-दुक्का बसों को
छोड़कर कहीं पर भी कोई सहायक गाड़ी में नजर नहीं आया, जो कि बच्चों को बस
में उतार या चढ़ा सके और उनके बस्तों को छत पर रख सके। यही हाल प्रदेश की
राजधानी शिमला का है। यहां निजी स्कूलों तक बच्चों को पहुंचाने व घर तक
छोड़ने वाली बसों व टैक्सियों में बच्चों को ठूंस-ठूंस कर भरा जाता है। यदि
बच्चों की सुरक्षा की दृष्टि से देखा जाए तो इन परिस्थितियों में नन्हे
बच्चों की सुरक्षा राम भरोसे ही है। इस ओर न तो स्कूल प्रशासन, न अभिभावक
और न ही तो आपरेटर गंभीर हैं। वैसे तो निजी स्कूल प्रबंधन द्वारा बच्चों को
स्कूल तक लाने और घर वापस पहुंचाने के लिए टैक्सियों व बसों की व्यवस्था
की गई है। कई जगहों पर तो अभिभावकों ने स्वयं मासिक शुल्क आधार पर वाहन
लगाए हुए हैं, लेकिन यह व्यवस्था केवल मात्र अपने निजी शेड्यूल से
औपचारिकताएं पूरी करने मात्र प्रतीक होता है। इतना ही नहीं टैक्सी चालक
बच्चों को सड़कों के किनारों पर उतार देते हैं, जिसके कारण नन्हे बच्चों को
स्वयं सड़क पार करते हुए पाया गया। सबसे पढ़े-लिखे जिला हमीरपुर में भी
यही आलम है। यहां भी बसों-टैक्सियों में बच्चों को ठूंस-ठूंस कर भरा जाता
है। जिस कारण जाम के दौरान या खराब सड़कों पर दुर्घटनाओं का अंदेशा बना
रहता है। बात अगर बिलासपुर की करें तो यहां भी बसों में बच्चों को बिठाने
के लिए कोई विशेष व्यवस्था नहीं थी। जिन बच्चों के साथ उनके अभिभावक आए थे,
वे तो अपने बच्चों को आसानी से बस में बिठा दे रहे थे, लेकिन जो बच्चे
अकेले थे, वे अपने आप ही बस में सवार हो रहे थे। यही आलम ऊना शहर का है।
शहर व आसपास के क्षेत्रों से सुबह-सवेरे छात्र-छात्राओं को स्कूल पहुंचाने
के लिए करीब 100 से अधिक छोटे-बड़े वाहन हैं। शहर में बच्चों को सुरक्षित
स्कूल पहुंचाने के लिए हालांकि पर्याप्त कदम उठाए जाते हैं, लेकिन बच्चों
के रोज के सफरनामे में कई कमियां भी हैं। बच्चों को लेकर जाने वाले वाहनों
की खिड़कियों में ग्रिल होनी जरूरी हैं, लेकिन ज्यादातर वाहनों में ये न के
बराबर थीं। कुल्लू शहर में तो स्कूल बसों व टैक्सियों में बैग रखने के कोई
उचित प्रबंध नहीं हैं। बच्चों को सीट पर बैग के साथ ही बैठना पड़ता है।
यहां बसों का हाल तो ठीक है, लेकिन जीप व अन्य छोटे वाहनों में बच्चों को
ठूंस-ठूंस कर ही भरा जाता है। जिससे कि उन्हें आने-जाने में काफी
परेशानियों का सामना करना पड़ता है। बात यदि मंडी शहर की करें तो यहां
बच्चों को स्कूल छोड़ने का सिलसिला सुबह सात बजे से शुरू हो जाता है।
प्राइवेट वाहनों में क्षमता से अधिक बच्चे भरे होते हैं। यही नहीं, कई
वाहनों में तो स्कूली बच्चों के बस्तों को रखने का भी उचित प्रबंध नहीं
होता है। कई स्कूल बसों में जहां चालक ही बच्चों को बसों में बैठाते हैं,
वहीं उतारते भी खुद हैं, जबकि कई स्कूल बसों में परिचालक भी होते हैं। यही
हाल चंबा जिला का भी है। यहां भी बसों या टैक्सियों में बच्चों को
ठूंस-ठूंस कर भरा जाता है। जिला सिरमौर के मुख्यालय नाहन में तो निजी
स्कूलों की बसों में बच्चों को क्षमता से अधिक मात्रा में बिठाकर स्कूल
प्रबंधन चंद सिक्कों को बचाने की खातिर बच्चों की जान जोखिम में डाल रहे
हैं। अभिभावक भी इस बात से खासे चिंतित हैं। बच्चों को स्कूल स्टापेज तक
छोड़ने आने वाले अभिभावकों में इस बात को लेकर रोष तो है, परंतु स्कूल
प्रबंधन के सामने कई मर्तबा इस विषय को उठाने के बावजूद इसका समाधान नहीं
निकल पा रहा है। सोलन में शनिवार सुबह पाया गया कि निजी वाहन नियमों को ताक
पर रख कर बच्चों को स्कूल छोड़ने का कार्य कर रहे हैं, जबकि एक वाहन में
12 से 15 बच्चों को ठूंस-ठूंस कर भरा गया है। यहां एक ऑटोरिक्शा में आठ से
दस बच्चों कोे बैठाकर स्कूल पहुंचाया जाता है। इसके अलावा बसों से बच्चों
को उतारने और चढ़ाने के लिए बस सहायक की व्यवस्था भी कम ही है।
बच्चों के बैठने की माकूल व्यवस्था हो
अभिभावकों का कहना है कि बच्चों को बस में स्कूल भेजना
अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित है। छोटे बच्चों को कई बार बस में खड़े होकर सफर
करना पड़ता है। स्कूल प्रशासन को इस संबंध में बस आपरेटर्ज को निर्देश देने
चाहिए तथा छोटे बच्चों को बैठाने के लिए उचित प्रबंध करने चाहिएं।
मोटी कमाई के चक्कर में दांव पर नन्ही जिंदगी
निजी स्कूल संचालक अकसर मोटी कमाई के चक्कर में रहते हैं और लालच
में आकर नन्ही जिंदगियों को दांव पर लगा देते हैं। उदाहरण के तौर पर यदि
एक स्कूल बस की क्षमता 30 छात्रों की है तो वह उसमें 40 छात्र ठूंस देंगे,
क्योंकि एक्स्ट्रा 10 छात्रों के लिए वह अलग से गाड़ी का इंतजाम नहीं करते।
इन 40 छात्रों के अलावा बस में चार से पांच अध्यापक या अध्यापिकाएं भी
बच्चों संग स्कूल पहुंचती हैं।
जाम का कारण बन रहे स्कूली वाहन
प्रदेश के हर शहर में स्कूली बच्चों के लिए लगाए गए वाहनों से
अकसर जाम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है, जिसके चलते हर वर्ग को समस्या
झेलनी पड़ती है। चालकों द्वारा ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करने और अपनी
सुविधा के मध्य नजर यहां-वहां वाहनों के पार्क करने से शहर की सड़कों पर
जाम लगा जाता है।
सुरक्षा व्यवस्था स्कूल प्रशासन की जिम्मेदारी
निजी स्कूल प्रशासन को बच्चों की सुरक्षा की दृष्टि से सुरक्षा
के इंतजामों को पुख्ता करने की आवश्यकता है। इसमें रोजाना स्कूल पहुंच रही
टैक्सियों में ओवरलोडिंग की चैकिंग, ड्राइवर का व्यवहार जांचना जरूरी है।
समय-समय पर बच्चों की सुरक्षा के लिए अभिभावकों व चालकों को जागरूक करने की
भी आवश्यकता है।
एक तो ओवरलोडिंग उस पर ओवर स्पीड
अकसर देखा गया है कि बैठने लायक जगह न होने पर भी जबरदस्ती ही
गाडि़यों में बोरियों की तरह बच्चों को लादा जाता है। उसके बाद ओवरलोड
स्कूली गाडि़यां बच्चों को स्कूल पंहुचाने के लिए ओवर स्पीड से सड़कों पर
दौड़ना शुरू हो जाती हैं जो कि दुर्घटना का कारण बनती हैं। स्कूली बच्चों
से लदी गाडि़यों के कई हादसे प्रदेश में हो चुके हैं।
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