तुम मुझे यूं भुला न पाओगे.
तुम मुझे यूं भुला न पाओगे...
मोहम्मद रफी यानी सुरों का बेताज बादशाह। रफी साहब को हमारे बीच से गुजरे हुए आज 31 जुलाई 2014 को पूरे 34 साल हो जाएंगे। इन 34 सालों के गुजर जाने के बावजूद हमें यही लगता है कि रफी साहब अपनी मीठी आवाज के बलबूते आज भी हमारे बीच मौजूद हैं। उन्हें कभी भी सुना जाए, मन है कि भरता नहीं और दिल है कि मानता नहीं।
सबसे पहला गीत : 28 फरवरी 1941 को लाहौर में संगीत निर्देशक स्व. श्याम सुंदर ने एक पंजाबी फिल्म 'गुल बलोच' के लिए रफी से पहली बार गीत गवाया। यह गीत बहुत लोकप्रिय हुआ था।
पूरी तरह मौलिक कलाकार : रफी साहब जो भी गीत गाते थे, वे पूरी तन्मयता, तल्लीनता व मिठास के साथ गाते थे। उनकी गायन-शैली में कहीं भी कृत्रिमता व बनावटीपन नहीं था। वे पूरी तरह मौलिक कलाकार थे। रफी साहब की नकल शब्बीर कुमार और मो. अजीज जैसे कलाकारों ने भी की, किंतु वे उनके 'क्लोन' बनना दूर, उनकी आवाज के आसपास भी कहीं ठहर नहीं पाए हैं। उनके जैसा मौलिक व शानदार फनकार सदियों में कोई एक ही जन्मता है।
शांत व फरिश्ता इंसान : मोहम्मद रफी एक नेक, सज्जन व फरिश्ता इंसान थे। उनके चाहने वालों की संख्या अपार थी। वे तंबाकू-सिगरेट जैसी चीजों से भी काफी दूर रहते थे। जब उनकी आवाज के बारे में तारीफ की जाती थी तो वे आसमान की ओर हाथ उठाकर कह दिया करते थे कि 'सब खुदा की मेहरबानी है'। उन्हें अपनी आवाज का कभी घमंड नहीं हुआ।
'बाबुल की दुआएं लेती जा...' और रफी रो दिए : 'नीलकमल' फिल्म के गीत 'बाबुल की दुआएं लेती जा, जा तुझको सुखी संसार मिले...' की रिकॉर्डिंग के बाद रफी साहब खुद रो दिए। पूछने पर रफी साहब ने यही कहा कि बेटी का रिश्ता तय हुआ है इसलिए गीत गाकर आंखें भर आईं।
समय के पाबंद रफी : वे रोजाना फजर की नमाज घर पर ही अता करते और कुरान शरीफ पढ़ते या कोई और किताब। वे रिकॉर्डिंग रूम में समय से पहले पहुंच जाते थे। इसके पीछे तर्क यह था कि किसी ने रिकॉर्डिंग रूम किराए पर लिया है। अपने लेट होने से उसे किराया ज्यादा देना पड़ सकता है। वे दूसरों की सुख-सुविधाओं का भी ख्याल रखते थे।
एक फकीर से मिली थी गाने की प्रेरणा : आवाज की दुनिया के बेताज बादशाह मोहम्मद रफी को पार्श्वगायन करने की प्रेरणा एक फकीर से मिली थी और बडे़ भाई ने उनके मन में संगीत प्रेम को पहचाना था।
वे एक फकीर के गीतों को सुना करते थे जिससे उनके दिल में संगीत के प्रति एक अटूट लगाव पैदा हो गया। उनके बडे़ भाई हमीद ने रफी के मन में संगीत के प्रति बढ़ते रुझान को पहचान लिया था और उन्हें इस राह पर आगे बढ़ने में प्रेरित किया।
बाल्यावस्था में पहला स्टेज शो : मोहम्मद रफी ने संगीत की शिक्षा लाहौर में उस्ताद अब्दुल वाहिद खान से ली तथा इसके साथ ही उन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत भी गुलाम अली खान से सीखना शुरू कर दिया। एक बार उनके भाई हमीद, रफी को लेकर केएल सहगल के संगीत कार्यक्रम में गए, लेकिन बिजली नहीं रहने के कारण सहगल ने गाने से इंकार कर दिया।
इस पर हमीद ने कार्यक्रम संचालक से निवेदन किया कि वे उनके भाई रफी को गाने का मौका दें। संचालक के राजी होने पर रफी ने पहली बार 13 वर्ष की उम्र में अपना पहला गीत स्टेज पर दर्शकों के बीच पेश किया। वहां बैठे संगीतकार श्याम सुंदर ने उनका गाना सुना, जो उन्हें अच्छा लगा और उन्होंने मोहम्मद रफी को मुंबई आने के लिए न्योता दिया।
रफी ने श्याम सुंदर के संगीत निर्देशन में अपना पहला गाना 'सोनिये नी हिरीये नी' पार्श्व गायिका जीनत बेगम के साथ एक पंजाबी फिल्म 'गुल बलोच' के लिए गाया। वर्ष 1944 में नौशाद के संगीत निर्देशन में उन्हें अपना पहला हिन्दी गाना 'हिन्दुस्तान के हम हैं' फिल्म 'पहले आप' के लिए गाया।
सैकड़ों फिल्में, हजारों गाने : 'दुलारी' (1949) में गाए गीत 'सुहानी रात ढल चुकी' के जरिए रफी सफलता की ऊंचाइयों पर पहुंच गए। इसका संगीत निर्देशन नौशाद ने किया था। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
मोहम्मद रफी ने अपने संपूर्ण सिने करियर में लगभग 700 फिल्मों के लिए 26,000 से भी ज्यादा गीत गाए। वे दिलीप कुमार, देवानंद, शम्मी कपूर, राजेन्द्र कुमार, शशि कपूर, राजकुमार जैसे नामचीन नायकों की आवाज कहे जाते थे।
हिन्दी के अलावा मो. रफी ने मराठी और तेलुगु फिल्मों के लिए भी गाने गाए। वे 6 बार फिल्म फेयर अवॉर्ड से सम्मानित किए गए। वे 1965 में पद्मश्री पुरस्कार से भी सम्मानित किए गए।
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